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  विनोबा को प्रासंगिक करती पंचायत की महिलाएँ  
     
 

आचार्य विनोबा भावे ने दशकों पहले एक आदर्ष ग्राम पंचायत का स्वप्न देखा था। उनके अनुसार हर गांव में ग्रामसभा बनेगी, जिसमें हर घर का एक-एक व्यक्ति सदस्य होगा। ग्रामसभा की तरफ से सर्वसम्मति से एक पंचायत चुनी जावेगी जो सेवा करेगी। पंचायत का सीधा अर्थ पाँच उन व्यक्तियों की समिति से है जो उसे सुचारू रूप से संचालन के लिए आवश्यक है। पंचायत के पाँच भाग प्रेम, निर्भयता, ज्ञान, उद्योग और स्वच्छता। वर्तमान समय के उदारीकरण के दौर में जहाँ गाँव स्वयं भी बाजार बन चुके हैं और विकास की अस्पष्ट परिभाषा को लिए विनोबा का स्वप्न पूरे ढ़ंग से तो सार्थक हो नहीं रहा है। इसके बावजूद भी 33 प्रतिशत आरक्षण के तहत नेतृत्व करती कई महिलाओं ने पंचायतों को सही ढंग़ से समझने का प्रयास किया है। जिस संवेदनशीलता के लिए वास्तव में महिलाएँ जानी जाती हैं वही उनके लिए आज एक हथियार बन गया है। पुरूष भी जहाँ हैं वे कोई ऐसे गुल नहीं खिला रहे हैं जिन्हे की रेखांकित किया जा सके। वहीं महिलाएँ चाहे उनकी संख्या अभी कम हो फिर भी अपना पक्ष मजबूती से रख रही हैं।

यह तय है कि विनोबा आज यदि सार्थक व प्रासंगिक हो सकते हैं तो इन्ही नेतृत्व करती महिलाओं के जरिए। कुछेक महिलाएँ अपने क्षेत्र में इस ढ़ंग से कार्य भी कर रही हैं कि प्रेम, निर्भयता, ज्ञान, उद्योग और स्वच्छता के पक्ष अलग-अलग ही सही, मुद्दा बनकर सामने परिलक्षित हो रहा हैं। यह सब एक ही पंचायत में होना चाहिये परंतु विकट समय में इतना होना भी फिलहाल हमारे लिए संतोषजनक है। पंचायतों के लिए विनोबा का पहला मुद्दा है, प्रेम। ग्राम पंचायत को एक ऐसी लिंक चाहिये जो आपसी प्रेम को बढ़ा सके और पंचायत की विभिन्न समस्याओं को सही ढंग से प्रस्तुत कर सके। इस प्रेम और सद्भाव को झाबुआ के विभिन्न महिला आधारित पंचायतों में ज्यादा देखा जा सकता है। मूल सिध्दांत यह है कि जब तक पारिवारिक तौर पर सामजस्य और प्रेम नहीं होगा तो सामाजिक स्तर पर कैसे हो सकता है। आदिवासी समाज के आपसी प्रेम का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि घर के किसी भी लड़के का ब्याह होने पर वह घर से ही जुड़े हिस्से में रहकर अलग ही रहने लगता है और उनका खाना भी अलग ही बनता है। इस तरह आपसी समस्याओं से तो दूर भी रह लेते हैं और संयुक्त परिवार की परिभाषा भी जस की जस रहती है। कोई भी आंच आने पर पूरा परिवार एक ईकाई की तरह कार्य करता है। इन सब में महिलाएँ अपनी विशिष्ट भूमिकाएँ अदा करती हैं।

यही आपसी सद्भाव सामाजिक स्तर पर भी कामयाब है। स्थानीय आदिवासी समाज में भीली बोली का एक शब्द इस्तेमाल होता है, अड़जी-पड़जी! इसका अर्थ है, काम के बदले काम। आदिवासियों के मध्य किसी एक के कार्य के लिए सभी मिलकर सहयोग करते हैं और फिर एक-एक कर सभी को मिलकर मदद करते हैं। इससे कार्य भी जल्दी हो जाता है और उसके लिए कोई धनराशि खर्च नहीं होती है। आदिवासी समाज में सदियों से एक दूसरे को सहयोग करने की प्रथा चली आ रही है। सिर्फ एक प्रथा कितना जनजीवन प्रभावित कर सकती है, वह यह देखकर लगाया जा सकता है कि आमदनी बढ़ने से बच्चों की देखभाल बेहतर ढंग से हो रही है। समूह में रहने से एकता भी विकसित हुई है और सामाजिक सशक्तिकरण भी हुआ है। जिन महिलाओं ने एक क्षेत्र विशेष में इस प्रथा को बनाए रखने के लिए अथक प्रयास किए उनमें से प्रमुख हैं, भील कोटड़ा की सूरजबाई, पीपलीपाड़ा की शांतिबाई, जूनाखेड़ा की मीराबाई, सामली की मड़ीबाई आदि-आदि जैसे कई नाम हैं जो व्यवस्थित रूप से अपने कार्यों को संचालित कर रही हैं।

विनोबा के अनुसार पंचायतों के लिए दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है निर्भयता। वास्तव में देखा जाय तो हमारे ग्रामीण समाज में समय के साथ एक नया खौफ पैदा हुआ है और वह है अविश्वास का। हमारे विश्वास को तमाम बाजारी हरकतों ने लील दिया हैं। गाँव में भी अब कोई जाता है तो सहज उस पर यकीन नहीं किया जाता है क्योंकि वे ग्रामीण कइयों बार छले जा चुके हैं। आज भी जब हम बात करते हैं गाँव की महिला सरपंचों से तो वे अपने अवसाद को झलका ही देती हैं। ग्राम पंचायत तितरा, जिला सीधी की सरपंच शकुंतला कोल कहती हैं कि विश्वातस तो आपस में कम हुआ है लेकिन शहरी आदमी पर विश्वास हम सहजता से नहीं कर पाते हैं जबकि गांव के आदमी पर तुरंत विश्वास कर लेते हैं। ऐसे कई वाकिये हमारे साथ हुए हैं कि शहरियों ने हमें धोखा दिया है। पंचायत के सारे काम-काज विश्वास पर ही तो होते हैं।

सामली जिला झाबुआ की सरपंच मैनाबाई कहती हैं कि हमारे यहाँ इतनी योजनाएँ आई परंतु कोई भी ज्यादा जिन्दा नहीं रही। इससे हमारे धेर्य को भी चुनौती मिली हुई है और यही एक कारण भी हमारे अविश्वास के बढ़ने का। गाँव के लोगों के विश्वास पर ही तो हमने चुनाव जीता है और उसी को बनाए रखना भी हमारी जिम्मेदारी है। वे आगे कहती हैं कि पंचायत में सभी एक दूसरे को जानते हैं इसलिए हमारे अंदर कम से कम विश्वास कमजोर इतना नहीं हुआ है जितना बाहर के या शहरी लोगों से हुआ है।

विनोबा के अनुसार पंचायतों के लिए तीसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है ज्ञान। ऐसा मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मानवीय मन पर सर्वाधिक प्रभाव उसे मिले हुए ज्ञान का ही पड़ता है। वस्तुत: यह सही भी है क्योंकि हम अपने आम जीवन में यत्र-तत्र इसके प्रभाव देखते हैं, महसूस करते हैं। बकसरी बाई जयमालपुरा ग्राम पंचायत, जिला हरदा की सरपंच हैं और तीसरे दर्जे तक ही पढ़ी हैं। सबसे पहले उन्हौने अभिभावकों की बैठकें कर यह निश्चित किया कि प्रत्येक बच्चे का स्कूल जाना तय हो। केन्द्रों पर यह भी निश्चित किया गया कि दलिया ठीक पके और सही मात्रा में बच्चों में सही मात्रा में वितरित हो। इन सब विशेष प्रयासों का परिणाम यह रहा कि स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई। उन्हौने गांव की ही एक शिक्षित बहु को शिक्षक के रूप में स्कूल में शिक्षक नियुक्त किया और उनका वेतन अभिभावक संघ के द्वारा दिया गया।

ऐसा नहीं है कि महिलाओं को नेतृत्व हासिल कर लेने के बाद स्वयं की कम शिक्षा का अफसोस होता है। वैशाली परिहार तो बयावड़ा ग्राम पंचायत, जिला होशंगाबाद की सरपंच हैं और स्वयं एम.एससी., एल.एल.बी. हैं। उन्हे कभी भी यह प्रेरणा नहीं मिली कि उच्च शिक्षित होने पर वे गांव में रहकर अपना जीवन व्यर्थ कर रही हैं। खुद उच्च शिक्षित होने का परिणाम भी यह रहा कि पंचायत के कई कार्यों में जितनी सहजता उन्हे हुई और किसी को नहीं हो सकती थी। शिक्षा उन्हे एक अध्यापक के रूप में जीवन में सुधार लाने का बुनियादी तरीका लगता है। उनकी ग्राम पंचायत में सिर्फ प्राथमिक स्कूल है और हाई स्कूल वहाँ से तीन किलोमीटर दूर है। अक्सर इस वजह से लड़कियों का स्कूल छुड़वा लिया जाता था। उन्होने पहल की और परिणाम भी बहुत जल्द मिला कि उनकी अपनी पंचायत में माध्यमिक स्कूल खुलवाया और बड़ी संख्या में अब लड़कियाँ उस स्कूल में पढ़ने जाती हैं। यह सब महिलाएँ समझ पा रही हैं और जिनके पास नेतृत्व है वे अपने प्रयासों से इस ओर ध्यान भी दे रही हैं।

पंचायती राज के बारह-तेरह वर्षों बाद अब महिलाओं को रास्ते भी मिल गए हैं और वे उन रास्तों को व्यवस्थित करने में बाकायदा लगी हुई है। चिकटगांव की सावित्री, चौपणा की यशोदाबाई, बावड़ी की सुगना, रामटेक की फूलवती, तिनसई की श्यामा, कटला की मनु, रोहाना की रामवती, कोठार की मीरा..... यह फेहरिस्त बढ़ती ही जा रही है और ऐसा लगता है उनके दिलों में कहीं न कहीं जवाहरलाल नेहरू की यह बात उनके पास है कि, ''अगर सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएं तो भारत में ज्ञान और कर्म के विभिन्न क्षेत्रों में हजारों प्रथम श्रेणी के व्यक्तियों का निर्माण निसंदिग्ध रूप से हो सकता है लेकिन अधिकांश लोगों को अवसर ही नहीं मिलता है। मुझे और किसी बात की तकलीफ नहीं होती जितनी कि उन बच्चों की मायूस ऑंखों से जिन्हे पढ़ाई का अवसर तो दूर भोजन और वस्त्र भी पूरी तरह प्राप्त नहीं होते हैं। यदि आज हमारे बच्चों को शिक्षा से दूर रखा गया तो कल के भारत की तस्वीर बहुत दयनीय होगी।''

विनोबा के अनुसार पंचायतों के लिए चौथा महत्वपूर्ण मुद्दा है उद्योग। रंगवासा और मिर्जापुर जिला इन्दौर की महिलाएँ सोनू हाथिया और लीलाबाई को यदि आप खेत में ट्रेक्टर चलाते हुए देखें तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। घर में जीन बहने होने से उन्हौने स्वयं ही माता-पिता के सहयोग से खेती का कार्य भार संभाल लिया। फूलों की खेती वे तीनों मिलकर ही करती हैं और आस-पास के लोगों विशेषकर महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। इसी तरह कुल 1,23,964 महिला पंचों में से एक मुस्लिम दलित पंच है तस्लीम। उज्जैन के क्वाथा गांव में मैला ढ़ोने का कार्य करती थीं। संयोग से तस्लीम की मुलाकात एक गैर सरकारी संगठन 'गरीमा' के कार्यकर्ताओं से होती है और 1993 के कानून जिसमे अस्पृश्यता को दंडनीय अपराध माना गया है का पता उसे चलता है। परिवार और गाँव वालों के भारी विरोध के बावजूद तस्लीम ने मैला फेकने के कार्य के लिए मना कर दिया। स्वयं उदाहरण बनकर उसने आस-पास के कई गांवों में भी इसके लिए मुहिम चलाई और किसी हद तक सफल भी रही। अक्सर गॉवों में इस तरह के बदलाव एवं बदलावकर्ता दोनों को बहुत ही बुरे ढ़ंग से लिया जाता है, यहाँ तक की बहुत कुछ सुनना-सहना भी होता है और विद्रोही करार दिए जाने के बाद सामाजिक स्थिति में भी हिकारत षामिल हो जाती है। लेकिन ग्रामीण समाज का एक मनोरंजक और सुखदाई पक्ष यह भी है कि विद्रोही स्वर यदि लगातार और किसी सशक्त संस्था के माध्यम से चलाए जाते हैं तो वे गुजरते समय के साथ पूर्णत: तो नहीं परंतु आंशिक रूप सामान्य होते जाते हैं। कृषि जैसे व्यस्त कार्यों में लगा जनमानस ज्यादा उलझने के बजाय उसके विकल्पों की तलाश में लग जाता है।

धार जिले के चिकटाबढ़ गांव की ऐसी ही एक पंच हैं सावित्री और गांव की भाषा में बात की जावे तो उसने एक गुनाह किया। गुनाह भी यह कि सरपंच के खिलाफ कदम उठा दिए। गांव की अन्य महिलाओं के साथ मिलकर भ्रष्ट माहौल को जब बाहर लाया गया तो स्थितियाँ उनके विरूध्द थी। शासन के हस्तक्षेप से जीत सावित्री की हुई और शेष बचे कार्य को महिला मंडल द्वारा ही सम्पन्न किया गया जो तमाम व्यवस्थाओं पर करारे तमाचे की तरह था। वास्तव में देखा जाय तो आमतौर पर गांवों की जनसंख्या इतनी होती है कि उसमें रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को सहजता से जानता ही नहीं समझता भी है और ऐसे में अधिकांशत: भ्रष्टाचार के मामले दबे ही रह जाते हैं। कौन इससे पंगा ले.... या कौन संबंध खराब करे..... रोज तो कोई न कोई काम पड़ता है खेती-किसानी में..... या फिर बेटी ब्याही है तो उनके खिलाफ हम तो बोल ही नहीं सकते हैं..... आदि-आदि जैसे पक्ष भी हैं जो उभर कर सतह पर आते हैं।

विनोबा के अनुसार पंचायतों के लिए पाँचवा महत्वपूर्ण मुद््दा है स्वच्छता। ग्राम सारंगी जिला झाबुआ की सरपंच से मिलने जब हम पहँचे थे तो वे स्वयं एक स्थान पर सफाई कर रही थीं और पूछने पर बताती हैं कि वानिकी विकास के लिए हमने पंचायत से प्रयास किए हैं और पौंधों के बचाव के लिए कोई और नहीं मिला तो वे स्वयं ही कार्य में लग गई। महासमुंद की बेचमा ग्राम पंचायत की सरपंच नंदकुमारी आज भी आपको गांव की गलियों की झाडू करते मिल जाएगी। पलासनेर ग्राम पंचायत जिला हरदा की पूर्व सरपंच अयोध्याबाई ने तो सिर्फ सफाई के मुद्दे के लिए अविश्वास प्रस्ताव का सामना किया। वे कहती हैं कि गाँव में नाली न होने के कारण कीचड़ और गंदगी की भरमार थी और नाली नहीं होने का सबसे बड़ा कारण गाँव में व्याप्त अतिक्रमण था। कुछ ने तो पक्के ओटले और बरामदे भी बना रखे थे। ग्राम सभा के माध्यम से उन्हौने इन्हे हटवाने के प्रस्ताव पारित कर हटवाने के लिए नोटिस दिया। मामला उपरी स्तर तक पहुँच गया और अतत: उन्हे अपने पद से भी हटना पड़ा लेकिन वे उपचुनाव के जरिए फिर से चुनी गई और अपने कार्य को फिर से अंजाम दिया।

कुलमिलाकर देखा जाय तो आज भी खरे हैं हमारे महान विचारक और उससे भी खरे हैं महिलाओं का जीवट बने रहकर आदर्शों को बनाए रखना। आचार्य विनोबा के संदेश को आज भी जीवित पाकर हमारी पृष्ठभूमि पर नाज होने लगता है कि हमें सिर्फ थोड़े से प्रयास से कितना अच्छे परिणाम निकल सकते हैं। माना कि अभी स्थितियाँ बहुत ज्यादा अच्छी नहीं है परंतु एक बात साफ है कि महिलाओं के साथ कार्य कर हम उनकी संवेदनशीलता का उपयोग करते हुए ज्यादा ठीक ढंग से अपने लक्ष्य पर पहुँच सकते हैं।

लोकेन्द्र सिंह कोट

 
     
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