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  थोड़ी-थोड़ी पिया करो के खिलाफ शान्तिबाई  
     
 

अक्सर गांव के विकास की परिभाषा में यह जोड़ा जाता है कि उसे सड़क से जोड़ देने पर उसमें क्रांतिकारी बदलाव आ जावेंगे। एकबारगी तो इससे कोई दो राय भी नहीं हो सकता है। लेकिन हम उस सर्वविदित तथ्य को सामने होने के बाद भी भूल जाते हैं कि सुख-सुविधाओं के साथ-साथ 'साइड इफेक्ट' के रूप में हमें कई बार दुख और असुविधाओं से भी रूबरू होना होता है। जैसे ही पेटलावद तहसील जिला झाबुआ का एक गांव सड़क से जुड़ा तो शहर की बुराईयां भी उसके साथ प्रवेश कर गई। शराब उनमें प्रमुख था।

वैसे भील आदिवासी समाज में शराब का सेवन करना उनकी कई धार्मिक, सामाजिक प्रक्रियाओं का हिस्सा है लेकिन शहर से प्राप्त अज्ञान ने उन्ही आदिवासियों को उसमें डूबे रहने के लिए प्रेरित किया और वहाँ की महिलाओं को प्रतिफल में मिले झगड़े, प्रताड़नाएँ....। पुरूषों का इस तरह बेलगाम होना सारी सामाजिक प्रक्रिया में विश घोलने लगा। ऐसे समय में इसी को नियति मान लेने वाले लोगों की कमी नहीं थी लेकिन गांव की ही शांतिबाई को यह सब रास नहीं आया और उन्हौने ठान लिया कि सिर्फ बैठे रहने से कुछ नहीं होगा। क्षेत्र में कार्यरत कई स्वयं सेवी संगठनों के कार्यकलापों और नुक्कड़ नाटकों से प्रेरणा लेकर उन्हौने गांव की ही महिलाओं का समूह बनाया। समूह बनाने की प्रकिया भी इतनी आसान नहीं थी क्योंकि इस तरह के कार्यों में कई परेशानियो का सामना करना होता है लेकिन एक बार समूह बन जाने और उसके परिणाम देखकर और भी महिलाओं को लगा कि वे भी इस सार्थक कार्य से जुड़ सकती हैं।

जिस उम्र में एक सरकारी कर्मचारी रिटायर हो जाता है उस 60 की उम्र में शांतिबाई कलारा ने गांधी को नहीं पढ़ने के बावजूद उन्ही के सिध्दांतों को समझा और उसके लिए सबसे पहले प्रयास किए। उन्हौने सर्वप्रथम आर्थिक मजबूती को उठाया क्योंकि सामाजिक विकास के सारे रास्ते उसी के सहारे आगे बढ़ते हैं। शराब से निपटने के पहले उन्हौने बचत समूह के माध्यम से साहूकारों के कर्ज से मुक्ति का मार्ग खोला और फिर अवैध शराब बनाने और लाने वालों पर टूट पड़ीं। जगह-जगह बनाई जा रही शराब को उन्हौने उनकी शराब वाली मटकी फोड़ कर विरोध किया और कई मामलों में पुलिस का भी सहयोग लिया। इस कार्यक्रम में भरी विरोध भी उन्हे नहीं डिगा पाया। इसके बदले उन्हौने गालियाँ, फब्तियाँ खूग खाई परंतु अपने इरादे नहीं बदले। पंचायत के माध्यम से उन्होंने 1000 रूपये का जुर्माना भी ऐसे लोगों के लिए तय करवाया।

समूह की महिलाओं को शांतिबाई के आत्मविश्वास का ही बहुत बड़ा संबल था कि उन्होंने शराबियों को पेड़ से बाँधकर भी उनकी खूब खबर ली। वास्तव में कोई भी सामाजिक परिवर्तन के लिए वहाँ की पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। तमाम विविधताओं के चलते हम किसी भी प्रक्रिया को जनरलाईज नहीं कर सकते हैं, इसलिए समाज शास्त्र के कई सिध्दांत अक्सर प्रायोगिक धरातल पर असफल हो जाते हैं। हमारे यहाँ तो विविधताओं का यह आलम है कि हर बारह कोस में भाषा-बोली, आचार-विचार, संस्कृति-संस्कार बदल जाते हैं। समस्याओं के हल में क्षेत्रियता प्रमुख स्थान रखती है। कई समस्याएँ तो ऐसी होती हैं जो अध्ययन की सीमाओं से भी परे होती हैं। उन्हे समझ भी सकते हैं, तो वे है वहाँ के रहवासी। यही काम शांतिबाई ने किया है।

अक्सर कुरीतियों के विरोध और उनके खिलाफ मुहिम की सस्टेनेब्लिटी थोड़े समय के बाद कमजोर पड़ जाती है। वजहें कई हैं लेकिन यह सही है कि समाज को प्रोजेक्ट में नहीं बाँटा जा सकता है। अधिकांशत: ऐसी मुहिमें किसी सरकारी, गैर सरकारी प्रोजेक्ट का हिस्सा होती हैं और उनके समात्त होने के साथ ही वे भी वही रह जाती हैं। शांतिबाई के क्षेत्र में यह उनके आत्मविश्वास और लगातार बने रहने का परिणाम है कि यह कार्य पिछले 12 वर्षों से चल रहा है और अब जाकर उसकी नींव गहरी हुई है। ऐसा नहीं है कि क्षेत्र में सारी परिस्थितिया बदल गई हैं लेकिन उनके नियंत्रण में जरूर हैं। वे इस दौर में हैं कि यह सब वे अपनी आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करें और यह प्रक्रिया सतत चलती रहे। वे इस दिशा में नई महिला साथियों को जोड़कर और उन्हे मार्गदर्शन देकर कर भी रही हैं।

शांतिबाई स्वयं कहती हैं कि इस कार्य को लगातार चलाए रखने का परिणाम यह रहा है कि महिलाओं की क्षेत्र में साख और रूतबा बढ़ा है। वे आगे कहती हैं कि जब हमारे सारे कार्य सुचारू रूप से चलने लग गए तो हमने पानी, मिट्टी बचाओ और वृक्षारोपण के कार्यों में भी कार्य करना प्रारंभ कर दिए हैं। कई लोगों को आज भी यह सब गवारा नहीं है लेकिन फिर भी वे अपनी अलख जगाए हुए है। वे आज के समाजशास्त्रियों, नीतिनिर्धारकों के लिए भी व्यवहारिक किताब का एक बहुत बड़ा पाठ हैं। ऐसे पाठ हमें निश्चित रूप से पढ़ना भी चाहिये और आने वाली पीढ़ी को पढ़ाना भी चाहिये।

लोकेन्द्र सिंह कोट

 
     
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