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  स्कूल चलें हम का बिगुल बजाया महिला नेतृत्व ने  
     
 

कहा जाता है कि सृष्टि का उद्गम शिक्षा था। प्रमाण भले ही हो या ना हो परन्तु हम इस तथ्य को नहीं नकार सकते कि शिक्षा ही जीवन की प्रतिष्ठा है, अभिव्यक्ति का माध्यम है और अस्तित्व की हुंकार। अनुभूतियों के विभिन्न रंगों को, कल्पना की प्रत्येक उड़ान को और भावनाओं के अथाह सागर के आंदोलन को चित्रित करने में सक्षम हैं शिक्षा। ऐसा मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मानवीय मन पर सर्वाधिक प्रभाव उसे दी गई शिक्षा का ही पड़ता है। वस्तुत: यह सही भी है क्योंकि हम अपने आम जीवन में यत्र-तत्र इसके प्रभाव देखते हैं, महसूस करते हैं। बच्चें, युवा और वृध्द कोई भी इससे अछूता नहीं है।

विकास की प्रक्रिया का भी अभिन्न अंग है शिक्षा। किसी भी समाज, राज्य, राष्ट्र के नागरिकों की परम्परा, संस्कृति और जीवन स्तर का दर्पण है शिक्षा। यही वह नींव का पत्थर है जिस पर सभ्यता के भव्य महलों का निर्माण किया जा सकता है। अनुभवों की उर्वरा पर विकसित, पल्लवित अध्ययन मनन रूपी पुष्पों का पराग है शिक्षा। चाणक्य के अनुसार, अज्ञान जैसा शत्रु दूसरा नहीं है। सुप्रसिध्द विद्वान फ्रांसिस बेकन के शब्दों में अध्ययन हमें आनंद प्रदान करता है, अलंकृत करता है और योग्यता प्रदान करता है। इसलिए उपनिषद भी कहते हैं कि मनुष्य को अज्ञान के अंधकार में ज्ञान का प्रकाश फैलाना चाहिए।

महिला नेतृत्व ने पहचाना शिक्षा का मर्म

शिक्षा का शाब्दिक अर्थ है, ''देखरेख या प्रशिक्षण, सिखाना, शारीरिक, मानसिक और सांस्कृतिक सामर्थ्य बढ़ाना'' जबकि ज्ञान का शाब्दिक अर्थ है, सुनिश्‍चत विश्‍वास, सूचना निर्देश, यांत्रिक ज्ञान, व्यवहारिक कौशल और जानकारी।'' इन अर्थों से यह बात साफ हो जाती है कि शिक्षा वह प्रक्रिया है जिसके जरिये शारीरिक, मानसिक और सांस्कृतिक विकास हो। यह मन, मस्तिष्क और शरीर की शक्तियों को एकजुट करने का नाम है।

शिक्षा के इस महत्व को पुरूष आधारित सत्ता ने उतना नहीं पहचाना था जितना महिलाओं को नेतृत्व मिलने के बाद उन्हौने पहचाना है। वास्तव में बच्चे की प्रथम गुरू होने के नाते उसे कहीं ज्यादा शिक्षा के महत्व को संवेदनशीलता के साथ पहचानना लाजमी भी था। पंचायती राज ने जैसे ही आरक्षण के तहत महिलाओं को सत्ता सौंपी, पहले-पहल तो वे हड़बड़ाई लेकिन फिर संभल कर चलते हुए शिक्षा सहित कई प्राथमिक जरूरतों की ओर जी तोड़ प्रयास किये।

पंचायती राज के प्रारंभ में छुट-पुट उदाहरण सामने आ रहे थे कि सीहोर जिले के अमलाहा ग्राम पंचायत की सरपंच एकता जायसवाल ने तो पंचायती राज व्यवस्था को ही नए आयाम दे दिये। नयी दिल्ली स्थित इंस्टीटयूट ऑफ सोषल साइंसेस ने उन्हें पहली विशिष्ट महिला सरपंच से सम्मानित किया था। किसी दूसरे गांव से व्याहकर आई एकता ने अपने ससुराल में आकर निर्भीक होकर पंचायत चुनाव लड़ा और सरपंच चुनी गई। पहले पहल तो किसी ने नहीं सोचा था कि चुपचाप सी रहने वाली एकता इतना कुछ कर लेगी कि देश भर में चर्चा का विषय बनेगी। खुद शिक्षित होने व शिक्षा के महत्व को जानते हुए एकता ने शिक्षा पर बहुत जोर दिया। बालिका शिक्षा उनकी पंचायत में लगभग न के बराबर थी, उसे उन्होंने स्वयं के विशेष प्रयासों से 75 प्रतिशत तक पहुंचा दिया। यहाँ तक कि कई बार एकता ने स्वयं स्कूल में पढ़ाया भी है, क्योंकि स्कूलों में शिक्षकों की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। इसके अलावा उन्हौंने अपनी पंचायत को भी कम्प्यूटरीकृत कर दिया और इंटरनेट से भी जोड़ दिया।

एकता का यह कदम आने वाले समय के लिए एक मिसाल बनकर सामने खड़ा हो गया और पंचायती रात के तीसरे सत्र में कई महिला नेता अब शिक्षा की अलख जगाने में लगी हुईं हैं। आदिवासी समुदाय से संबंध रखने वाली मैनबाई कुर्लीकलां, जिला सीहोर की ही एक सरपंच हैं। तमाम तरह के दबावों के चलते वे पूर्णत: तो मुखर तो नहीं हो पाती हैं फिर भी उन्हे स्वयं का कम शिक्षा का अभाव खलता है और वे अपने गांव के स्कूल के कामकाज, निर्माण कार्य, दोपहर भोजन की निगरानी खुद करती हैं।

बकसरी बाई जयमालपुरा ग्राम पंचायत, जिला हरदा की सरपंच हैं और तीसरे दर्जे तक ही पढ़ी हैं। सबसे पहले उन्हौने अभिभावकों की बैठकें कर यह निश्चित किया कि प्रत्येक बच्चे का स्कूल जाना तय हो। केन्द्रों पर यह भी निश्चित किया गया कि दलिया ठीक पके और सही मात्रा में बच्चों में सही मात्रा में वितरित हो। इन सब विशेष प्रयासों का परिणाम यह रहा कि स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या में अप्रत्याशित बढ़ोतरी हुई। उन्हौने गांव की ही एक शिक्षित बहु को शिक्षक के रूप में स्कूल में शिक्षक नियुक्त किया और उनका वेतन अभिभावक संघ के द्वारा दिया गया।

ऐसा नहीं है कि महिलाओं को नेतृत्व हासिल कर लेने के बाद स्वयं की कम शिक्षा का अफसोस होता है। वैशाली परिहार तो बयावड़ा ग्राम पंचायत, जिला होशंगाबाद की सरपंच हैं और स्वयं एम.एससी., एल.एल.बी. हैं। उन्हे कभी भी यह प्रेरणा नहीं मिली कि उच्च शिक्षित होने पर वे गांव में रहकर अपना जीवन व्यर्थ कर रही हैं। खुद उच्च शिक्षित होने का परिणाम भी यह रहा कि पंचायत के कई कार्यों में जितनी सहजता उन्हे हुई और किसी को नहीं हो सकती थी। शिक्षा उन्हे एक अध्यापक के रूप में जीवन में सुधार लाने का बुनियादी तरीका लगता है। उनकी ग्राम पंचायत में सिर्फ प्राथमिक स्कूल है और हाई स्कूल वहाँ से तीन किलोमीटर दूर है। अक्सर इस वजह से लड़कियों का स्कूल छुड़वा लिया जाता था। उन्हौने पहल की और परिणाम भी बहुत जल्द मिला कि उनकी अपनी पंचायत में माध्यमिक स्कूल खुलवाया और बड़ी संख्या में अब लड़कियाँ उस स्कूल में पढ़ने जाती हैं।

कुसुम कुशवाहा महराउच ग्राम पंचायत, जिला सतना की सरपंच हैं और पारिवारिक तौर पर बेहद गरीब हैं। स्वयं आठवीं तक पढ़ी हैं और पहले चुनाव की हिचकिचाहट से बाहर निकल कर इस बार उन्हौने स्वयं के बलबूते पर कुछ करने की ठानी है। वे अपने गांव को शिक्षित करने का सपना संजोए हुए है और पंचायत के ही स्कूल में शिक्षकों की नियुक्ति पर जोर दे रही हैं।
देखा जाय तो हमारे जैसे देश के लिए इसी शिक्षा का मूल आधार साक्षरता से ही प्रारंभ होता है क्योंकि हमारे यहाँ गुलामी के एक लम्बे अध्याय के पश्‍चात विरासत में निरक्षरता का अभिशाप भी हिस्से आया था। साक्षरता से गांधीजी की 'नई तालीम' का स्मरण हो आता है। गांधीजी 'नई तालीम' को जीवन के लिए शिक्षा कहा करते थे। वे इस बात पर जोर देते थे कि शिक्षा जीवन के लिए और जीवन शिक्षा के लिए है। उनके अनुसार जीवन की सबसे कम महत्व वाली बातें भी शिक्षा के दायरे में होना चाहिये। स्वास्थ्य और स्वच्छता, काम और पूजा, खेलकूद तथा मनोरंजन जैसे जीवन के सभी पक्षों का शिक्षा से प्रत्यक्ष संबंध अधिक न्यायोचित समाज की व्यवस्था से था। वे इस बात पर भी जोर देते थे कि व्यक्ति शिक्षा पाने के बाद इतना सक्षम हो जाना चाहिये कि वह खुद अपना कार्य सुचारू रूप से कर सके। उसे जीवन की जरूरी बातें जैसे सफाई, स्वास्थ्य-रक्षा, पौष्टिक आहार, सामाजिक कार्य आदि पता हो तथा वह उन्हे सहजता से सीख सके।

खेर इन तमाम बातों के चलते भी यदि हम थोड़ी बहुत ईमानदारी रख सके तो हो सकता है हम स्थितियों में बदलाव की रूपरेखा रच पाएँ। और यह सब महिलाएँ समझ पा रही हैं और जिनके पास नेतृत्व है वे अपने प्रयासों से इस ओर ध्यान भी दे रही हैं। पंचायती राज के बारह-तेरह वर्षों बाद अब महिलाओं को रास्ते भी मिल गए हैं और वे उन रास्तों को व्यवस्थित करने में बाकायदा लगी हुई है। चिकटगांव की सावित्री, चौपणा की यशोदाबाई, बावड़ी की सुगना, रामटेक की फूलवती, तिनसई की श्यामा, कटला की मनु, रोहाना की रामवती, कोठार की मीरा..... यह फेहरिस्त बढ़ती ही जा रही है और ऐसा लगता है उनके दिलों में कहीं न कहीं जवाहरलाल नेहरू की यह बात उनके पास है कि, ''अगर सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएं तो भारत में ज्ञान और कर्म के विभिन्न क्षेत्रों में हजारों प्रथम श्रेणी के व्यक्तियों का निर्माण निसंदिग्ध रूप से हो सकता है लेकिन अधिकांश लोगों को अवसर ही नहीं मिलता है। मुझे और किसी बात की तकलीफ नहीं होती जितनी कि उन बच्चों की मायूस ऑंखों से जिन्हे पढ़ाई का अवसर तो दूर भोजन और वस्त्र भी पूरी तरह प्राप्त नहीं होते हैं। यदि आज हमारे बच्चों को शिक्षा से दूर रखा गया तो कल के भारत की तस्वीर बहुत दयनीय होगी।''

लोकेन्द्र सिंह कोट

 
     
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