महिला नेतृत्व या सत्ता में महिलाओं की भागीदारी की जब भी बात होती है तो हम तत्काल किसी महिला सरपंच की कहानी खोजने में जुट जाते हैं। फिर देखते हैं कि किसी सरपंच ने सड़क बनवाई, किसने तालाब खुदवाया और उससे यह जरूर पूछते हैं कि तुम्हें चुनाव पति या ससुर ने लड़वाया था क्या? महिला सक्तिकरण की परिभाषा को हमने बहुत सीमित कर लिया है।
अब मध्यप्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था में पंचों और सरपंचों के आधे पद महिलाओं के लिये आरक्षित कर दिये हैं। राजनैतिक नजरिये से यह एक प्रगतिशील कदम माना जा रहा है किन्तु महिला राजनीति के नजरिये से जरा परतों को उधेड़ने की जरूरत है। जब-जब महिलाओं के आरक्षण के लिये कोई कदम उठाया जाता है तब-तब सरकारी वक्तव्यों में उस कदम को आधी आबादी के साथ किया गया सबसे ऊंचा राजनैतिक न्याय कहा जाता है। एक ताजा विश्लेषण यह सिध्द करता है कि मध्यप्रदेश में महिलाओं को आरक्षण (या कहें कि अवसर उन्हीं स्तरों पर मिला है जहां उन्हें तयशुदा नीतियों और कार्यक्रमों का बिना किसी सवाल-जवाब के अनुसरण करना होता है। उन स्तरों एवं मंचों से महिलायें गायब हैं जहां से नीतियां और कार्यक्रमों का जन्म होता है। राज्य में विश्लेषण के लिये चिन्हित किये गये 353 अहम् पदों (जिनमें विधानसभा, संसद, आयोग और निगम-मण्डलों के सभी सर्वोच्च पद शामिल हैं) में से 325 पदों पर पुरूषों का आधिपत्य है। एक कड़वा सच सामने आता है कि मध्यप्रदेश में 92 फीसदी सर्वोच्च पदों से महिलाओं को पूरी तरह से वंचित रखा गया है।
मध्यप्रदेश के आयोगों में महिला
राज्य में सामाजिक न्याय और समतामूलक विकास की मंशा से स्थापित किये गये आयोगों, निगमों और मण्डलों की कुर्सियों पर बहुतायत की मात्रा में पुरूषजन ही विराजमान हैं। मध्यप्रदेश में सरकार द्वारा स्थापित 11 आयोगों में से 10 आयोगों के अध्यक्ष पर पर पुरूर्षों का कब्जा है। इनमें से राज्य महिला आयोग ही केवल एक ऐसा आयोग है जिसमें अध्यक्ष और सदस्य के पदों पर महिलाओं को अपनी क्षमतायें दिखाने का अवसर दिया गया है। संभवत: इसका कारण यही है कि इस आयोग का काम ही महिलाओं से सम्बन्धित है इसलिये यहां महिलाओं की नियुक्ति का प्रावधान किया गया। मध्यप्रदेश राज्य मानव अधिकार आयोग की भूमिका अधिकारों के संरक्षण में अत्यंत गंभीर मानी जाती है। मध्यप्रदेश उन 3 राज्यों में शामिल है जहां महिलाओं की मानवाधिकारों के हनन् से ज्यादातर प्रकरण सामने आते हैं किन्तु इस आयोग के अध्यक्ष के पद पर भी पुरूषों का ही वर्चस्व रहा है। मध्यप्रदेश राज्य अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष और जनजाति आयोग के प्रभारी अध्यक्ष भी पुरूष ही हैं। ऐसी स्थिति में इन आयोगों के काम-काज और कार्यशैली में महिला मुद्दों को देखने के नजरिये में पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण अहम् होता है। आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया में मध्यप्रदेश में भी विद्युत ऊर्जा सम्बंधी निर्णय लेने के लिये राज्य विद्युत नियामक आयोग बना है। आज इसकी भूमिका एक तरह से सरकार के निर्णयकर्ताओं से भी ज्यादा है किन्तु इसमें न केवल अध्यक्ष बल्कि सदस्य और सचिव सभी पुरूष हैं। महिला आयोग के अलावा केवल मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग ही है जिसमें एक महिला सदस्य, अध्यक्ष नहीं, की नियुक्ति की गई है। 11 आयोग में से तीन आयोगों में सचिव अथवा अधिकारी के पद पर महिलाओं की मौजूदगी नजर आ रही है। यह विश्लेषण इन मायनों में महत्वपूर्ण हो जाता है कि ये आयोग मानव अधिकारों के संरक्षण और लोक न्याय के संदर्भ में ताकतवर हैं। एक तरह से इन्हें राजनैतिक अधिकारों के नजरिये से भी शक्ति संपन्न माना जाता है किन्तु सच यह है कि राज्य सरकार अब भी इन अहम् पदों पर नियुक्तियाँ करते समय अपने पितृसत्तात्म्क नजरिये से मुक्त नहीं हो पाई है।
मध्यप्रदेश में विश्वविद्यालय
पिछले दिनों राज्य के एक मात्र महिला अध्ययन केन्द्र की उपयोगिता पर सवाल खड़ा करते हुये उसे बंद करने का निर्णय ले लिया गया था। बरकतुल्ला विश्वविद्यालय के तहत संचालित इस केन्द्र की भूमिका और महत्व को विश्वविद्यालय का नेतृत्व महसूस ही नहीं कर पाया। संभवत: यह एक आश्चर्यजनक तथ्य होगा कि महिला मुद्दों पर शिक्षा, प्रशिक्षण और शोध का सबसे कम काम राज्य के विश्वविद्यालयों में ही होता है। यहां स्त्री शिक्षा का अर्थ केवल गृह विज्ञान एवं प्रजनन स्वास्थ्य से ही लगाया जाता है। मध्यप्रदेश में स्थापित कुल 12 विश्वविद्यालयों में में किसी भी विश्वविद्यालय में न तो कुलपति (हालांकि यह पदनाम भी लैंगिक भेदभाव का प्रतीक है) महिला हैं न ही कुल सचिव या पंजीयक के पद पर महिलाओं की नियुक्ति हुई है। क्या राज्य में उच्च शिक्षा की नीति बनाने वाले यह मानते हैं कि महिलाओं के नेतृत्व में विश्वविद्यालय अपनी भूमिका नहीं निभा सकते हैं या फिर राज्य में ऐसी महिलायें ही नहीं हैं जो कुलपति की जिम्मेदारी निभा सके?
सत्ता और जनप्रतिनिधित्व में महिलायें
यह सच है कि आज की सबसे बड़ी लड़ाई महिलाओं और पुरूषों के राजनैतिक प्रतिनिधित्व को लेकर ही है। यही कारण है कि पंचायतों में तो उन्हें अब बराबरी के पद मिल गये हैं किन्तु विधानसभा और संसद की सीमाओं से आज भी उन्हें बाहर ही रखा गया है। मध्यप्रदेश की सवा तीन करोड़ महिलाओं के पक्ष को रखने के लिये कुल जमा 18 विधायक विधानसभा में हैं जबकि पुरूष विधायकों की संख्या 212 है। लोकसभा की 29 सीटों में से 3 पर और राज्यसभा की 11 सीटों में से तीन पर महिलायें हैं। आधी आबादी को सत्ता में अभी दसवां हिस्सा भी नहीं मिला है और पितृसत्तात्मक राजनीति शायद इससे ज्यादा बंटवारा करने के पक्ष में नजर नहीं आती है। मध्यप्रदेश सरकार के कुल 30 मंत्रियों में से केवल दो मंत्री महिला हैं और उन्हें भी मिला है महिला एवं बाल विकास विभाग। सरकार ही नहीं, समाज ही यह मानता है कि महिलाओं को ज्यादा गंभीर काम का बोझ नहीं सौंपा जाना चाहिये।
व्यापार और विकास के निगमों में महिलायें
पिछले कुछ वर्षों में राज्य के विकास को निवेश और निर्माण के साथ जोड़कर देखा जाने लगा है। सरकार अब निजीकरण के सिध्दान्त को पूरे मन से स्वीकार कर चुकी है। हम मुख्यमंत्रियों के श्रीमुख से जितनी राशि के निवेश के दावे सुन चुके हैं यदि उन्हें जोड़ा जाये तो मध्यप्रदेश में कागज पर 2 लाख 76 हजार करोड़ रूपये का निवेश बिल्कुल तैयार रखा है। इन दावों को नियंत्रित करने के लिये छह कार्पोरेशन बने हैं। इन छहों कार्पोरेशन में न तो किसी भी अध्यक्ष पद पर महिलायें हैं न ही सचिव या आयुक्त पद पर। ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा, जब हम देखेंगे कि निवेश आधारित विकास की पूरी प्रक्रिया से महिलायें बहिष्कृत हो जायेगी और हम बच्चों को इंदिरा नूयी की कहानी सुनाते रहेंगे। पता नहीं वह दिन कब आयेगा जब स्वाभाविक रूप से महिला को नेतृत्व के लायक माना जायेगा। इसी तरह राज्य के 11 विभागों में से 10 पर, आठों सहकारी संघ के अध्यक्ष पद पर और पांचों बोर्ड-मण्डलों के अध्यक्ष पर पर पुरूष सत्ता का दखल है।
सर्वोच्च पद पर विद्यमान कौन?
संस्थायें |
कुल |
पुरूष |
महिला |
प्रतिशत |
निगम |
11 |
10 |
1 |
9 |
सहकारी संघ |
8 |
8 |
0 |
0 |
कार्पोरेशन लिमिटेड |
6 |
6 |
0 |
0 |
बोर्ड / मण्डल |
5 |
5 |
0 |
0 |
आयोग |
11 |
10 |
1 |
9 |
विश्वविद्यालय |
12 |
12 |
0 |
0 |
विधानसभा |
230 |
212 |
18 |
7.8 |
लोकसभा |
29 |
26 |
3 |
10.3 |
राज्यसभा |
11 |
8 |
3 |
27.27 |
मानव विकास के लिए प्रत्यक्ष सत्ता में महिलाओं की सहभागिता को अहम् माना गया है। यूनीसेफ की रिपोर्ट 2007 स्पष्ट उल्लेख करती है कि महिलाओं की प्राथमिकतायें पुरूषों से अलग होती है और राजनीति में प्रवेश करने के पीछे महिलाओं का दायरा पुरूषों से अक्सर भिन्न होता है। 40 फीसदी महिलायें सामाजिक कार्य में दिलचस्पी के कारण राजनीति में आई। वे पुरूषों की तरह दलीय राजनीति के परम्परागत रास्ते से नहीं आई हैं। अनेक देशों में राजनीति और वित्तीय व्यवस्थाओं पर पुरूषों का नियंत्रण होता है। शराब और सिगरेट पीने या गॉल्फ खोलने जैसी सांस्कृतिक परम्परायें इन व्यवस्थाओं के भीतर पुरूर्षों की एक जुटता को बढ़ावा देती है और राजनैतिक पद के रास्ते की प्रमुख सीढ़ियां बन जाती हैं। मध्यप्रदेश में पारम्परिक पितृसत्तात्मक व्यवस्व्था का सत्ता पर प्रभाव साफ-साफ महसूस किया जा सकता है। जब ऊंचे और राजनैतिक पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया में महिलाओं की अनुपस्थिति के कारण महिलाओं के शीर्ष पदों पर पंहुचने के अवसर भी कम हो जाते हैं। वर्तमान अफसरशाही एक तरह से निरंकुश है और महिलाओं की मौजूदगी से उन्हें अपना आचरण और व्यवहार नियंत्रित करना पड़ता है। यही एक कारण भी है जिससे महिलाओं को मातहत अफसर और कर्मचारी अपने नेता के रूप में नहीं देखना चाहते हैं।
मध्यप्रदेश के सामने मातृ मृत्यु, शिशु मृत्यु, स्वास्थ्य और महिला हिंसा के ऊंचे स्तर की चुनौतियां हैं। वास्तविक स्थिति सामने होने के बावजूद सरकार इन चुनौतियों से उल्लेखनीय ढंग से नहीं निपट पा रही है क्योंकि नीतियां बनाने और सामाजिक न्याय के निर्णय लेने के लिये अधिकृत मंचों से महिलाओं को बहिष्कृत रखा गया है। यह बहिष्कार अनजाने में नहीं हुआ है बल्कि नये दौर की व्यवस्था महिलाओं को सत्ताा की भूल-भुलैया में ढकेल देना चाहती है। आज अफगानिस्तान की संसद में 27.3 प्रतिशत महिलायें हैं किन्तु मध्यप्रदेश की विधानसभा में मात्र 7.8 प्रतिशत महिलायें ही जनता का प्रतिनिधित्व करती है। जनवरी 2005 की स्थिति में पूरी दुनियाभर के सरकारी मंत्रालयों में से 14.3 मंत्रालयों की बागडोर महिलाओं के पास थी किन्तु मध्यप्रदेश में केवल 6.6 प्रतिशत महिला मंत्री पद महिलाओं के पास हैं।
इस परिदृश्य में देखने पर इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि मध्यप्रदेश में दलीय राजनीति में तो दोयम स्तरों पर महिलाओं की उपस्थिति दिख रही है किन्तु नेतृत्व के विकास के लिये उन्हें निर्णयात्मक भूमिका देने की पहल अभी राज्य में नहीं हुई है। विशेष या सामान्य निगम-मण्डलों से लेकर विभिन्न वर्गों के अधिकारों की संरक्षा के लिये स्थापित आयोगों में अब भी महिलाओं के पक्ष में माहौल नहीं बना है और वहां महिलाओं की अनुपस्थिति के कारण न्याय की उम्मीद तलाशती महिलायें भी नाउम्मीद हो रही हैं। महिला सशक्तिकरण का दावा आज सर्वव्यापी है किन्तु नेतृत्व की कुर्सी के ठीक नीचे एक ऐसी पारदर्शी परत बिछा दी गई है जिससे महिलाओं के लिये सत्ता के ऊंचे पदों पर पहुंचने की साफ संभावना तो नजर आती है किन्तु उन्हें उस परत को पार नहीं करने दिया जाता है। शोषणकारी सामाजिक व्यवस्था में बदलाव लाने के लिये हमने लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार किया था। लोकतांत्रिक व्यवस्था में समाज की दषा और दिशा राजनीतिक निर्णयों से ही तय होती है किन्तु आज राजनीति का रूप इतने विकृत ढंग से पेश किया जाता है कि यह महिलाओं के लिये एक अनैतिक और प्रतिबंधित क्षेत्र बनता जा रहा है।
सचिन कुमार जैन
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