PovertyMedia and Rights Food Security Livelihood Disability Women Rights Globalisation Health Social Exclusion Education Child Rights Environment Right to Information and Governance

 

     
 
| Print this Page
 
     
  YOU ARE HERE: Home > Women Rights > Samay Hai Kalai Par Bandhe Pyar Ko Nibhane Ka  
     
  समय है कलाई पर बँधे प्यार को निभाने का  
     
 

एक आदमी के चारो ओर पिता, माता, बहन, भाई, मामा, दोस्त.... आदि के रूप में एक भरा-पूरा आवरण विद्यमान रहता है। इस आवरण का ताना-बाना इसी मूलाधार से बुना होता है कि हमे प्रत्येक से हमेशा कुछ न कुछ मिलता ही रहता है जो हमारे आचार-व्यवहार व संस्कारों से झलकता है। जीवन की पृष्ठभूमि पर जहाँ सभी रिश्तेस अपनी-अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं वहीं भाई-बहन का रिश्ता अपनी तमाम मिठास के साथ एक अलग ही दोस्तीनुमा ममत्व की छटा बिखेरता है। माँ की ममता से अलग भाई-बहन के रिश्ते में एक विशेष तरह की आत्मीयता, अंतरंगता, तन्मयता, करूणा, कृतज्ञता, विनम्रता, उत्सर्ग, सम्पर्ण, मानवता और प्रेम की भावनाएं बहती हैं। इन सबको हम अपने आस-पास भाई-बहनों के मध्य महसूस भी कर सकते हैं।

बहन चाहे बड़ी हो या छोटी वह हमारी परम्पराओं एवं माँ की दी हुई शिक्षा की बदौलत ऐसे कार्यों को संचालित कर लेती है कि भाई को दूसरी बातों की तो दूर अपनी चिंता करने की जरूरत नहीं पड़ती है। कब खाना है, कब पढ़ना है, कब सोना है, कब जाना है.... सब कुछ कम्प्यूटर की भांति त्वरित व सही समय पर बहन के वट वृक्ष तले हो जाया करता है। सुखवती बाई, सरपंच खटिया पंचायत, मंडला कहती है कि हम दूसरी बार सरपंच बने हैं लेकिन भाई के लिए तो हम आज भी वही बहन ही हैं हममे कोई घमंड नहीं है। वहीं इसी जिले की चौगान जनपद पंचायत की सदस्य सोनाबाई उईके सहजता से कहती हैं कि मायके के नाम पर तो हम अपनी पोस्ट-वोस्ट सब भूल जाती हैं, माना जिम्मेदारियाँ बढ़ गई हैं लेकिन रक्षाबंधन तो रक्षाबंधन होता है। वास्तव में बहन के साथ का गणित ही उलटा होता है, जो भी खुशियां घर में आती हैं उसे बहन बाँट कर भी द्विगुणित कर देती हैं। इस तरह दु:ख भी भारी मात्रा में आते हैं और जहाँ तक संभव होता है बहन उन्हे पहले ही अपने आंचल में समेट लेती हैं। वे कई बार तो सभी तक पहुंच ही नहीं पाते हैं और यदि पहुंच भी जाते हैं तो वे बहन के डर से सहमकर दुबले हो जाते हैं।

कहते हैं सच्चा मित्र वही है जो सुख और दु:ख में समान रहे। जिस तरह दिन के पूर्वार्ध में सबेरे हमारी छांया लम्बी होती है, दोपहर के समय सिमट जाती है और दिखाई नहीं देती है तथा पुन: उत्तरार्ध में शाम होने पर लम्बी हो जाती है, बहन भी ऐसी ही एक दोस्त है.... दु:ख में शामिल और सुख में किनारा। राजौद जिला धार की सरपंच दीतूबाई नरवे कहती हैं कि पंचायत से प्रभावशाली लोगों ने निलंबित करवा दिया परंतु अपने परिवार के सहयोग से पुन: कोर्ट से जीतकर आज फिर पद पर हूं और मैं भी उनकी कई मुश्किलों में सहारा बनी हूँ। बहने ही सच्ची मित्र हैं हर्ष हो या विशाद दोनों मौकों पर वह हमारी भावनाएं व्यक्त करवानें में तत्पर रहती हैं। बेटों को चाहने वाली परम्पराओं के चलते भी बहने होले से अपनी उपस्थिति दर्ज करवा देती हैं....और साथ में अपने प्रगाढ़ स्नेह को भी संलग्न कर देती हैं। बगैर कुछ कहे हम बहुत कुछ कर पाते हैं इन्ही बहनों के सहारे। सही मायनो में बहने हमारी भावनाओं की अभिव्यक्ति हैं, जिन्हें हम शब्दों के सहारे व्यक्त नहीं कर सकते हैं। जो भी अच्छा है या इस जमी पर जो भी बचा-खुचा अच्छा है उसी को प्रकट करती हैं बहने। आज भी साँझे चूल्हे पर माँ का हाथ बँटाती और रोटी पकाती बहन के हाथ का खाना सारे पकवानों को घसीटकर हॉशिये पर पटक देता है। बहन के साथ साँझे ऑंगन में पल-बढ़ रहे भाईयों की खिलखिलाहटों में सुरक्षा की चहक होती है।

ऐतिहासिक संदर्भ में रक्षाबंधन

रक्षाबंधन की ऐतिहासिकता के प्रमाण शास्त्रों में भी मिलते हैं। कहते हैं देव और दानवों में जब युध्द प्रारंभ हुआ तो दानव देवों पर हावी होते नजर आए। इंद्र सहित सभी देव इस पर चिंतित हो उठे। इस पर इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने कुछ रेशम के धागों को अभिमंत्रित कर अपने पति के हाथ पर बाँध दिया और उस दिन श्रावण पूर्णिमा का दिन था। इस धागे की शक्ति ने इंद्र सहित देवों को विजय दिलवाई। तभी से श्रावण पूर्णिमा के दिन से रक्षा सूत्र बाँधने का प्रचलन चल पड़ा। राजपूतों में इसी प्रथा का अनुकरण किया जाता है और प्रत्येक श्रेष्ठ कार्य के लिए जाने से पूर्व रक्षा सूत्र को बाँधने का प्रावधान है। किवदंतियों में तो यह भी है कि सिकंदर की पत्नी ने भी अपने पति के शत्रु पुरुवास को भी राखी बाँधकर सिकंदर को न मारने का प्रण लिया था और पुरुवास ने रक्षाबंधन के वचन को निभाते हुए उसे जीवनदान भी दिया। मेवाड़ की महारानी कर्मावती ने भी हुमायूं को राखी बाँधकर अपने राज्य की रक्षा की थी। महाभारत मे भी भगवान कृप्ण एक प्रसंग में रक्षा सूत्रों का महत्व युधिप्ठिर को समझाते हुए कहते हैं कि यदि संकटों से निजात पाना है तो रक्षा बंधन को अपनाना होगा। उत्तर भारत में आज भी रक्षाबंधन को नारकी पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है और इस दिन वरुण राजा को नारियल दान करते हैं। दक्षिण भारत में भी इस त्यॉहार को अबनी अविट्टम के रुप में मनाया जाता है।

वर्तमान संदर्भ में रक्षाबंधन

वक्त के इस मुकाम पर जहाँ दौड़-भाग कुछ ज्यादा ही है, किसी के पास ज्यादा ठहरने का समय नहीं है, न चाहते हुए भी हर एक को जमाने के समानान्तर चलने और कंधे से कंधे मिलाने के लिए भागना ही पड़ता है। यह एक विडंबना है कि भागना आज हमारी विवशता पर बन चुका है। इसी विवशता का शिकार होकर आज संयुक्त परिवार की प्रथा जुदा हो चली है। ऐसे में बहन के प्रति स्नेह तो बरकरार है परंतु उसकी छत्र-छाया से विलग होना भी मजबूरी हो गई है। वैसे भी विवाह के बाद बहन दूर तो हो जाती है परंतु उसका प्रगाढ़ स्नेह हर-दम एक सहयोगी की तरह साथ लगा रहता है। बहन दो परिवारों में अपने-आपको सलाई बनाकर जिस कपड़े को बुनती है वह समाज के लिए आपसी सामंजस्य का एक अनोखा पाठ है। बोला पंचायत की सरपंच शांतिबाई अभी उतनी मुखर नहीं हैं लेकिन वे भी स्वीकार करती हैं कि एक औरत को हमेशा परीक्षा ही देना होती है, पहले एक परिवार फिर दूसरा परिवार फिर बच्चों, पति का ध्यान रखना और उपर से सरपंच की जिम्मेदारी, देखा जाय तो हम बचपन से ही प्रबंधन सम्हालना सीख जाती हैं। यदि पुरूष को यह जिम्मेदारियाँ निभाना हो तो वे चारो खाने चित्त हो जावेंगे। यदि समाज को एक मशीन मान लिया जाए तो बहनें उस मशीन को सरलता से चलने में सहयोग करने वाला ग्रीज़ ही है जो समाज रूपी मशीन के आपसी व्यवहार की स्मूथनेस (चिकनाई) को बरकरार रखती है।

बहन के इतने महत्वपूर्ण होने के बाद भी यह सुनकर कितना विचित्र लगता है उन्हे नेतृत्व करते देख आज भी कई जगह कमजोर व अयोग्य माना जाता है। रूनीजा, जिला उज्जैन की सरपंच माधुरी कहती हैं कि समय आने पर लड़कियों का स्थान वही हो जाएगा जहाँ प्राचीन भारत में वे थी। जहाँ समृध्दी होगी वहाँ बेहतर शिक्षा व बेहतर आर्थिक सुरक्षा होगी तथा यही सब स्त्री-पुरुप के भेद को भी खत्म कर देगी। अच्छी शिक्षा का परिणाम तो यही होना चाहिये कि 'बेटा ही सब कुछ है' जैसी पारम्परिक रुढियों का विनाश हो परंतु हमारे देश में इस सिध्दांत के विपरीत परिणाम सामने आए हैं। समृध्दी ने इतनी ताकत दे दी है कि जन्म से पूर्व ही खर्चिला लिंग परिक्षण कर कन्या होने की स्थिति में उसकी हत्या कर दी जाती है। एक भी लड़की का सीधा मतलब निकाला जाता है 'खर्च' और एक पुत्र का मतलब 'आमदानी।' यह सब उन समृध्द परिवारों में ज्यादा होता है जहाँ ज्यादा जायदाद होती है। एक गरीब परिवार आज भी उतना ध्यान इस गणित पर नहीं दे पाता है और न ही खर्चिले लिंग परिक्षण को वह वहन कर सकता है। परम्परा और आधुनिक तकनीक का यह अवांछित गठजोड़ समाज में नई विकृति को जन्म दे रहा है और वह भी यह सब बहन और भाई के रिश्तों की अनिवार्यता को ताक में रखकर कर रहा है।

कुल मिलाकर देख जाय तो आज जरुरत इस बात की है कि हमे यदि इंसान बने रहना है तो रिश्तों की अहमियत भी समझना होगी। हमारे मशीनी संस्करण में ग्रीज का कार्य करने वाली बहन आज जब संकट के दौर से गुजर रही है तो ऐसे में भाईयों का भी फर्ज बनता है कि वे भी आगे आकर अपनी बहनों की रक्षा करें और इसे एक आन्दोलन का स्वरुप देकर अपने रक्षा सूत्र बँधवाते समय खाई गई कसम को निभावें।

लोकेन्द्र सिंह कोट

 
     
  Next Article  
  Women Rights Main Page  
  Women Rights Archives