ग्रामीण राजनैतिक क्षेत्र में एक दशक पूर्व तक महिलाओं की भूमिका नगण्य रही है तथा पंचायतों में उनका प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर रहा है। आज ग्राम पंचायत से जिला स्तर की संस्थाओं में महिलाएं निर्वाचित होकर ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
जहाँ तक ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक दृष्टि से ग्रामीण महिलाओं की स्थिति का प्रश्न है वह स्थिति दयनीय है फिर भी जनतांत्रिक माहौल व महिलाओं की भागीदारी के चलते स्थितियों में बदलाव आना प्रारंभ हो गया है। कुछ समय में देश के कुछ हिस्सों में ग्रामीण महिलाओं ने अभूतपूर्व जागृति का परिचय दिया है। मणिपुर, आंध्र प्रदेश तथा हरियाणा में शराब बंदी लागू करने के पीछे ग्रामीण महिलाओं के आंदोलन की ही एकमात्र भूमिका रही है। मणिपुर में तो ग्रामीण महिलाओं ने न केवल शराब बंदी के लिए आंदोलन चलाया बल्कि शराब पीने वाले पुरूषों का सामाजिक बहिश्कार किया तथा शराब पिए हुए पुरूषों की पिटाई करने तक का आंदोलन चलाया तथा इसमें अपने परिवार के पुरूषों तक को भी नहीं बख्शा।
प्रकृति की प्रत्येक वस्तु और वे सारी अच्छी-बुरी घटनाएँ जो हमारे या दूसरे के जीवन में घटती है, वे सभी हमारी गुरू साबित हो सकती हैं, बशर्ते हम उन पर ध्यान दें। एक गलती में से यथार्थ को खोजकर यदि मूल बात का ज्ञान हमें हो जाय तो हो सकता है हम अगली बार गलती को दोहराएँ नहीं। यही बात आज के महिला नेतृत्व पर भी लागू होती है। उन्हे भी अपनी पूर्ववर्ती महिलाओं के प्रेरणास्पद कार्य जो उन्हौने सत्ता में बैठकर संघर्ष के साथ किए थे को गुरूमंत्र बनाकर आगे बढ़ना होगा। कहा भी गया है कि ज्ञान में से भी ज्ञान उतारने के लिए एक अच्छे गुरू की आवश्यकता होती है, वरना वह अर्थ का अनर्थ भी निकाल सकता है।
उदाहरण के रूप में हरियाणा के भिवानी जिले में लोहाक ब्लाक के अमीरदास गांव में सर्वप्रथम महिला पंचायत चुनकर पुरुष प्रधान राजनैतिक प्रणाली को एक चुनौती दी और उस गांव के बुजुर्गो का कहना था कि महिलाओं को सत्ता में शत-प्रतिशत हिस्सा देकर हम देश के नेताओं को दिखाना चाहते हैं कि केवल बातों से ही महिलाओं का मुकद्दर नहीं बदला जा सकता है। अगर वे महिलाओं का उत्थान चाहते हैं तो उन्हे उनके अधिकार बाकायदा सौंपे जाने चाहिये। इसके अलावा अन्य राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश के कुछ भागों में इन चुनी हुई महिलाओं ने सामाजिक बुराईयों तथा अन्याय के प्रति संघर्ष का बिगुल बजाकर उन पर काबू पाने में आषातीत सफलताएं अर्जित कर अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए थे।
केसरा बाई एक गांव की प्रधान थी। तीसरे दर्जे तक पढ़ी थीं। उसने गांव के बदमाशों के खिलाफ आवाज उठाई। जब उन्होंने उसके पति को परेशान करना शुरू किया, तो वह घबराई नहीं और शिकायत पुलिस में दर्ज करा दी। परिणामस्वरूप बदमाशी करने वाले परिवार के एक सदस्य को जेल भी हुई। उनके इन्हीं साहसी प्रयासों में गांव की जनता भी उनके साथ थी। जबकि मध्यप्रदेश के रायगढ़ जिले में लखनीवाल गाँव की सरपंच भंवरीबाई के इसी तरह के प्रयासों को प्रभावशाली व्यक्तियों के द्वारा कुचल दिया गया लेकिन उसने भी अपनी लड़ाई से एक बारगी तो यह आभास करवा दिया कि आज तक कमी थी तो बस अधिकारों की। भंवरीबाई के विपरीत इटारसी के सोनासांवरी गांव की सरपंच केसरबाई ने गांव में रह रहे गुंडों द्वारा महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ जेहाद छेड़कर उन्हे जेल की हवा खिलाई।
पुस्तकों से महज बिंदुवार अव्यवहारिक ज्ञान मिल सकता है तथा इसी तरह मशीनें भी कुछ हद तक पुस्तकों का सहज रूपान्तरण प्रस्तुत कर सकती हैं परन्तु व्यवहारिक और जमीनी सच्चाई तो किसी के अनुभव से ही मिल सकती है। यह जीवनानुभव गुरू से ही मिल सकता है। एक मशीन एक नदी की औसत गहराई तीन फीट बता सकती है परन्तु नदी की गहराई हर जगह थोडे़ ही तीन फीट होगी। यह बात तो अनुभवी गुरू से ही मिल सकती है, इसके अभाव में डूबना तो स्वाभाविक है ही।
अब उदाहरण लीजिए उज्जैन की एक ग्राम पंचायत में सुगनाबाई पर तत्कालीन सरपंच ने बहुत जुल्म किए और उसके तीन बेटों की नृषंस हत्या भी कर दी। लेकिन सुगनाबाई डरी नहीं और उसने भी आगे चलकर पंचायत के चुनाव लड़े और उसी सरपंच को भारी मतों से हराया। आज वह स्वयं ट्रेक्टर खरीदकर अपनी खेती स्वयं देखती है। दभंगता की एक और मिसाल मध्यप्रदेश के खरगोन जिले की बालझिरी ग्राम पंचायत की आदिवासी सरपंच श्रीमती गीताबाई की थी। उसके विरूध्द लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को उच्च न्यायालय ने अवैध करार दिया। न्यायालय ने कहा, ''अविश्वास प्रस्ताव तभी पारित माना जाता है जब उसे कम से कम दो तिहायी सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो।'' यह जीत गीताबाई के संघर्ष का ही परिणाम थी।
सामाजिक विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली ने प्रदेश में तीन पंचायतों के प्रतिनिधियों को अध्ययन किया था। राजगढ़ जिले में सल्हौना गांव की सरपंच द्रौपदी देवी को देर रात तक चली बैठक में वहां के प्रखंड विकास अधिकारी के सामने निर्वस्त्र किया गया क्योंकि उसने अपना त्यागपत्र देने या अन्य सदस्यों का त्यागपत्र स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। श्री पी. नाथ ने अपनी रिपोर्ट में सरपंच गुडिया बाई अहिरवार, सरपंच, पिपरा ग्राम पंचायत और बलदेव गढ़ ब्लाक के फुटेर ग्राम पंचायत की सरपंच कुमनी देवी अहिरवार की समस्याओं का अध्ययन किया था। गुडिया बाई का आजादी की 50 वीं वर्षगांठ के अवसर पर 15 अगस्त को स्थानीय स्कूल में झंडा फहराना, गांव वालों को अच्छा नहीं लगा। उसको बुरा-भला कहा गया। लेकिन अहिरवार ने प्रत्युत्तर में कहा कि सरपंच होने के नाते उसने अपना फर्ज निभाया। जब यह खबर समाचार-पत्र में आई तो राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि अगले वर्ष टीकमगढ़ जिला मुख्यालय पर झंडा पिपरा गांव की सरपंच गुंडिया बाई फहरायेगी और उसने झंडा भी फहराया था।
एक अन्य अध्ययन से पता चला था कि हरियाणा में महिलाओं के पंचायतों में आरक्षण से एक स्पष्ट क्रांति सामने आई। पंच के रूप में निर्वाचित ज्यादातर महिलाएं अनपढ़ थी, दो वर्ष बाद वे अपनी बेटियों को शिक्षा देने की मांग करने लगी थी। इसी तरह राजस्थान के अलवर जिले की निम्मुचाना गांव की सरपंच श्रीमती कोयली देवी ने अपने ही ससुर और पति को अधिसूचना जारी की कि वे बताए कि पंचायत की जमीन हड़पने की वहज से उनके खिलाफ कार्यवाही क्यों न की जाए। रेबड़ी ब्लाक की एक महिला सरपंच ने अपने इलाके शराब की दुकान हटवाई। बेट्टा-पट्टी ग्राम पंचायत की सरपंच ने वहां पानी की समस्या का समाधान करवाया। रायगढ़ मध्यप्रदेश के खजूरिया ग्राम पंचायत की सरजू बाई ने बाल विवाहों को बंद करवाने का बीड़ा उठाया और इसमें काफी हद तक उन्हे सफलता भी मिली।
कुछ राज्यों में निर्वाचित महिलाओं ने कम-वेतन तथा पीने के पानी के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन में भाग लिया। सीहोर (म.प्र.) की अमलाहा ग्रामपंचायत की एकता जायसवाल ने तो सरपंच होने के मायने ही बदल दिए हैं। उन्हीं दस हजार महिला सरपंचों में मध्यप्रदेश के सीहोर जिले के अमलाहा ग्राम पंचायत की सरपंच एकता जायसवाल ने तो पंचायती राज व्यवस्था को ही नए आयाम दे दिये थे। नयी दिल्ली स्थित इंस्टीटयूट ऑफ सोशल साइंसेस ने उन्हें पहली विशिष्ट महिला सरपंच से सम्मानित किया था। किसी दूसरे गांव से ब्याहकर आई एकता ने अपने ससुराल में आकर निर्भीक होकर पंचायत चुनाव लड़ा और सरपंच चुनी गई। पहले पहल तो किसी ने नहीं सोचा था कि चुपचाप सी रहने वाली एकता इतना कुछ कर लेगी कि देश भर में चर्चा का विषय बनेगी। खुद शिक्षित होने व शिक्षा के महत्व को जानते हुए एकता ने शिक्षा पर बहुत जोर दिया। बालिका शिक्षा उनकी पंचायत में लगभग न के बराबर थी, उसे उन्होंने स्वयं के विशेष प्रयासों से 75 प्रतिशत तक पहुंचा दिया। यहाँ तक कि कई बार एकता ने स्वयं स्कूल में पढ़ाया भी, क्योंकि स्कूलों में शिक्षकों की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। इसके अलावा उन्हौंने अपनी पंचायत को भी कम्प्यूटरीकृत कर दिया और इंटरनेट से भी जोड़ दिया है। कम्प्यूटर युग में उनके द्वारा उठाया गया यह कदम निश्चिय ही प्रेरणादायी था।
एक महिला द्वारा इतने कार्यों से प्रभावित होकर गाँव की अन्य महिलाएँ भी अब आगे आने लगी हैं और अपनी समस्याएँ, सुझाव बेखौफ देने लगी थी। जो गांव एक समय प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए तरसता था वहाँ अब एक उन्नत प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र था तथा जरूरत का सारा सामान वहाँ हमेशा उपलब्ध रहता था। एकता ने अपनी पंचायत में नशा विरोधी कार्यक्रम भी चलाया। यहाँ तक कि शराबी पुरूषों को उनकी पत्नियों के सामने माफी मंगवाने से भी वे नहीं चूकती थीं।
शिक्षा और जागरूकता कितना उजाला फैला सकती है यह हम एकता की मिसाल से देख सकते हैं। अब वह समय आ गया है कि हम भी व्यक्तिगत कार्यों से ऊपर उठकर सामाजिक प्रतिबध्दता के तहत कुछ ऐसे भी कार्य करें जो हमारे आसपास का वातावरण/माहौल को सुधारें। क्योंकि यही सुधरा हुआ माहौल हमारे भविष्य को एक मजबूत नींव दे सकता है।
सिहोर जिले के जमुनिया टैंक ग्राम पंचायत की दो बार से लगातार निर्वाचित सरपंच राधाबाई के अथक प्रयासों से ग्रामसभा की बैठकों में महिलाओं की उपस्थिति में इजाफा हुआ था और इसी वजह से पीने के पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि जैसे मुद्दे अब बहुलता के साथ बैठकों में उठाए जा रहे थे। इन्ही प्रयासों से जमुनिया टैंक की स्थिति आदर्श पंचायत की बन गई थी।
गुरू का विहंगम रूप में अर्थ होता है कि समाज में उपस्थित एक प्रामाणिक प्रतिबिम्ब अर्थात किसी भी सांसारिक पहलू को परखने का मापदण्ड। प्रत्येक गुरू के व्यक्तित्व की मान्यताओं के आधार पर कुछ दृष्टि भेद स्वाभाविक हैं, क्योकि प्रत्येक व्यक्ति अपने विशिष्ट गुण-स्वाभाव के अनुसार व्यवहार करता है परन्तु फिर भी विभिन्नता के मध्य एकत्व रहता है और यही ज्ञानवान होने का प्रमाण भी है। यही समाज को एक नवीन दिशा प्रदान करता है। आज के संदर्भों में देखा जाय तो इसी प्रामाणिकता को महिला नेतृत्व द्वारा अपनाने का कार्य किया जाना चाहिये। कुछ उन्हे अपना भी रही हैं और अभी तो इसे शुरुवात ही कहेंगे और शुरुवात में ही महिलाओं द्वारा किये गए ये प्रयास निश्चय ही देश के ग्रामीण राजनैतिक भविष्य की ईबारत बदलने के लिए पर्याप्त हैं।
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