नाम है फून्दीबाई और सहजता से चौंकने वाल बात है कि कौन फून्दीबाई....? फून्दीबाई नए भारत के सृजनकारों में से है। अब तो आपका प्रश्न और भी सूर्ख होगा कि फून्दीबाई और सृजनकार..... कौन, कैसे....? फून्दीबाई को समझने से पहले आइये थोड़े से पूर्वाग्रहों से दूर हो लें। यह आवश्यक नहीं है कि सृजन करने का लक्ष्य बहुत बड़ा हो या कोई महान कृति, कार्य हो। प्रत्येक सृजन जो जीवन को उल्लास दे, जीने का ढंग दे, सहारा दे वह भी श्रेष्ठ सृजन है। यदि सृजन लोकोउपयोगी है तो और भी बेहतर। जो सृजन समाज व राष्ट्र को उन्नति के मार्ग पर पहुँचाए वह सर्वश्रेष्ठ सृजन है। हिमालय का निर्माण कोई एक दिन में नहीं हुआ। सृजन के एक-एक अणु परमाणु के युग-युगीन प्रयत्नों के पश्चात उसका निर्माण हुआ। सार यही है कि सृजन कभी छोटा या बड़ा नहीं होता। वह तो सिर्फ सद्कार्यों की कसौटी पर कसा होना चाहिए। एक मूर्तिकार द्वारा किसी मूर्ति का सृजन करने के उपरांत जो उसे आल्हाद होता है, उसी में जीवन छुपा होता है। इसी तरह श्रेष्ठ विचार, रचनाओं के सृजन से यदि समाज व देश की धारा थोड़ी बहुत भी परिवर्तित हो जाए तो वह सृजन का वास्तविक स्वरूप होता है। आजादी के संघर्ष के दौरान गांधीजी द्वारा किया गया विचारों का सृजन संपूर्ण आजादी का आधार स्तम्भ बना था।
बस हम इसी सरल से सृजन की बात कर रहे हैं और आदिवासी फून्दीबाई ऐसी ही प्रतिबध्द महिला सरपंच हैं जो उच्च जाति के दबदबे वाले क्षेत्र में साहस के साथ न केवल कार्य कर रही है वरन् अपने क्षेत्र में स्कूल वाली बाई के नाम से भी विख्यात हो गई है। हम बहुत बड़े बदलावों की उम्मीद बगैर धेर्य के करने के लिए आदी हो चुके हैं और ऐसे में छोटे बदलाव हमारे लिए अक्सर तुच्छ होते हैं, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि बड़े बदलावों के पीछे इन्ही छोटे-छोटे प्रयासों का हाथ होता है। सोचिए अकेले गांधी से कोई आशय नहीं निकलता है, पूरा राष्ट्र् का सहयोग मिलकर ही गांधी को पूर्ण परिभाषित करता है। फून्दीबाई हमारे उसी बदलाव की भूमिका को अपने ढ़ंग से रच रही हैं। सारंगी जिला झाबुआ की सरपंच बनी फून्दीबाई ने जब अपनी निकटतम प्रतिद्वंदी को महज 14 वोटों से हराया तो खुद पढ़ी नहीं होने और उससे होने वाली हानियों से परिचित होकर फून्दीबाई ने सर्वप्रथम शिक्षा को ही अपने एजेंडे में लिया और विशेषकर बालिका शिक्षा को प्राथमिकता दी। जब हम उनकी पंचायत में पहुंचे तो पूरे तीन वर्ष उनके कार्यकाल को हो चुके थे और पहला प्रश्न पूछते ही उन्हौने अपनी भीली बोली में जवाब दिया कि 'वगर भणेली सोरी, लाकड़ा नी लोगई बणी जावे' मतलब बगैर पढ़ीलिखी लड़की एक काठ (लकड़ी) की पुतली बनी रहती है। उनकी अपनी फिलॉसाफी है कि एक लड़की के पढ़ने से तीन घर सुधर जाते हैं। एक तो उसका मायका, दूसरा उसका खुद का घर यानि ससुराल और तीसरा उसकी होने वाली लड़की का घर।
उन्हौने अपनी पंचायत में ऐसी लड़कियों की सूची बनवाई जो स्कूल नहीं जा रही थी और फिर उनके माता-पिता को प्रेरित करने का अभियान चलाते हुए उन्हे स्कूल जाने के लिए तैयार कर ही लिया। उन्हे समय जरूर लगा परंतु उनकी कोशिश में रंग भर चुके थे। आज सारंगी में बालिकाओं ने हायर सेकंडरी की कक्षाओं में कदम रख दिया है और इस वर्ष करीब 22 बालिकाओं को स्कूल जाने के लिए शासकीय योजनाओं के चलते साईकल मिल चुकी है। फून्दीबाई के हौसले और प्रयास का परिणाम तब निकलता हुआ दिखाई देता है कि जब पंचायत की बालिका से हम पूछते हैं कि वह क्या बनना चाहती है तो दबंगता से कहती है, डॉक्टर...!
पंचायत के सभी स्कूलों में फून्दीबाई स्वयं भ्रमण करती हैं और मध्यान भोजन की गुणवत्ता से लेकर शिक्षा की गुणवत्ता जैसे पहलुओं को छूती हैं। जब हम उनसे मिलने पहुंचे थे तो वे स्वयं एक स्थान पर सफाई कर रही थीं और पुछने पर बताती हैं कि वानिकी विकास के लिए हमने पंचायत से प्रयास किए हैं और पौंधों के बचाव के लिए कोई और नहीं मिला तो वे स्वयं ही कार्य में लग गई। उनके चेहरे पर पसीने की बूंदों में सूर्य की किरणों से टकराकर इन्द्रधनुष के सात रंग दिखाई दे रहे थे। ये वही रंग हैं जो उनके अरमानों में हैं और इसका पूर्वाभास हमें हो गया। अनायास गांधी की 'नई तालीम' भी याद आ गई जिसमें उन्हौने व्यवहारिक ज्ञान की शिक्षा के बारे में कहा है।
अपनी तीन लड़कियों को भरपूर शिक्षा दे रही फून्दीबाई स्वयं भी उन्ही से अपना अक्षर ज्ञान बढ़ा रही हैं। कम उम्र में विवाह के सामाजिक दबाव के बावजूद वे अपनी लड़कियों को उच्च शिक्षा दिलवाने का ख्वाब रखती हैं। कम उम्र में विवाह की इस कुरीति के साथ-साथ वधु-मूल्य की परंपरा को भी कम करवाने के प्रयास में समाज से सीधे-सीधे लड़ रही है। वधु-मूल्य वास्तव में भील आदिवासी परम्परा में लड़के वालों की और से लड़की पक्ष को मूल्य चुकाने को कहा जाता है। यह सामान्य परम्परा से विपरीत है।
जीवन को जीना और जीवन को ढोना एक सिक्के के दो पहलू हैं। प्रत्येक जीव अपना अस्तित्व इन्हीं में खोज लेता है। सृजनशीलता का निरंतर प्रवाह जीवन को जीने के लिए प्रेरित करता है वहीं, 'जैसा है वैसा चलने देने' वाला जीवन सृजनशीलता के अभाव को प्रकट करता है। कई बार परिस्थितियाँ ऐसी रहती हैं जो सृजनशीलता से विलग ही कर देती हैं वहाँ जीवन को ढ़ोना ही महत्वपूर्ण कार्य समझा जाता है। एक और स्थिति होती है जीवन की, जहां सृजन तो होता है परंतु विसंगतियों का सृजन। देव व असुरों के मध्य विभेद का एक यह बिन्दु भी प्रमुख रहा है। एक सृजन सद्कार्यों के लिए व दूसरे का विघ्वंस के लिए। यूँ तो जड़ या निर्जीव वस्तुएँ ही अच्छी रहती है जो सृजन तो नहीं करती हैं परंतु वे सृजन का माध्यम जरूर बन जाती हैं। फून्दीबाई एक ऐसी ही प्रतीक हैं जिनके प्रयास हमारे लिए देवत्व के समान हैं। तमाम विसंगतियों से निकलकर सर्वश्रेष्ठ सृजन कर देना ही हमारी छुपी महानता को प्रकट करता है। यही हमारे आदर्श के रूप में स्थापित भी होना चाहिये। आदर्शों की कमी का संकट आज हमारे चारों ओर विद्यमान है लेकिन साथ ही साथ कई आदर्श हमारे चारों ओर स्थापित भी तो हो रहे हैं, बस देर इस बात की है कि उन्हे हमें पहचानना है और अपनाना है।
लोकेन्द्र सिंह कोट
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