एक स्वतंत्र आंकलन से पता चला है कि जब महिलाओं को समाज में निर्णय लेने, निर्णय को क्रियान्वित करने और अपनी प्राथमिकतायें तय करने की स्वतंत्रता मिलती है तो समाज में होने वाला परिवर्तन ज्यादा मानवीय होता है। पंचायतों में नेतृत्व के संदर्भ में विगत एक दशक में हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि को यदि चिन्हित करना हो तो यह बात उभर कर आती है कि हम स्त्री नेतृत्व के कौशल और महत्व को महसूस कर पाने की प्रक्रिया में प्रवेश कर पाये हैं। जिन पंचायतों में महिला सरपंच और जन प्रतिनिधियों को निर्णय लेने या पहल करने के अवसर मिले हैं वहां गांव की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के प्रयास किये गये हैं, जैसे - वहां मातृत्व सहायता और परिवार सहायता योजना का बेहतर क्रियान्वयन हुआ है, पानी की समस्या को हल करने के प्रयास ज्यादा हुये हैं, लड़कियों की शिक्षा एवं शिक्षकों के व्यवहार पर ज्यादा ध्यान दिया गया है। वहीं दूसरी ओर जहां पंचायतों पर पुरूष मानसिकता का नियंत्रण रहा है, यानी पुरूष सरपंच या पंचों ने निर्णय लिये हैं, वहां आप पायेंगे कि अधोसंरचनात्मक विकास के ज्यादा काम हुये हैं, इमारतें बनाने के काम को ज्यादा प्राथमिकता दी गई है। वास्तव में स्त्री और पुरूष नेतृत्व के बीच मौजूद अंतर को अब संवेदनशीलता की प्रवृत्ति के आधार पर बखूबी समझा जा सकता है।
स्त्री नेतृत्व के अधीन होने की यह पहल करना इसलिये भी जरूरी है क्योंकि राजनैतिक व्यवस्था में अस्थिरता का दायरा केवल राज्य तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि पंचायतों में भी इसे आमतौर पर देखा जाने लगा है। इसका सबसे बड़ा कारण है राजनीति को जरिया बनाकर निहित स्वार्थों और महत्वाकांक्षा को पूरा करना पुरूष नेतृत्व का लक्ष्य बन गया है, यहीं से भ्रष्टाचार की जड़ें भी तेजी से अपना जाल फैलाती हैं। स्वाभाविक है कि महिलाओं के इस लक्ष्य से सरोकर नहीं ही हैं क्योंकि महिला की नेतृत्व क्षमता का विकास किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम के जरिये नहीं बल्कि परिवार की जिम्मेदारी निभाते हुये होता है। जहां वह किसी निहित स्वार्थ से नहीं बल्कि भावनाओं से नेतृत्व के कर्तव्य का पालन करती है। अत: स्वाभाविक है कि जब वह घर में असमानता का व्यवहार और भ्रष्टाचार नहीं करती है तो उससे सामाजिक संगठनों और सत्ता में भी इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकेगी।
विकास के क्षेत्र में तुलनात्मक रूप से यदि यह देखा जाये कि गांव का नेतृत्व कौन बेहतर ढंग से संभाल रहा है तो नि:संदेह पुरूष नेतृत्व अब पिछड़ता नजर आ रहा है। मध्यप्रदेश को सूखे की मार लगातार चार साल से झेलनी पड़ रही है ऐसी स्थिति में जल संरक्षण के कई आंदोलन भी छेड़े गये परन्तु विगत वर्ष जबं पंचायतों के काम का मूल्यांकन हुआ और सर्वश्रेष्ठ काम करने वाली जिन तीन पंचायतों का चयन हुआ, उन तीनों का नेतृत्व महिला सरपंचों के हाथ में ही था। इसी तरह प्रदेश की 72 में से 49 पंचायतें स्त्री नेतृत्व के अधीन हैं, जहां, सामाजिक न्याय, वन संरक्षण, प्रजनन स्वास्थ्य और लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हुये हैं।
इसके साथ ही केवल पंचायत के कामों या सरकार द्वारा औपचारिक रूप से आवंटित काम को कारवाने की बात नहीं है बल्कि अन्य एजेन्सियों द्वारा उपलब्ध कराये गये संसाधनों का भी महिला बहुल पंचायतों ने बेहतर उपयोग किया है। विश्व खाद्य कार्यक्रम के अन्तर्गत होशंगाबाद की बिछुआ पंचायत की सरपंच अनीना बी अपनी पंचायत में 6 लाख रूपये का काम वास्तव में करवा सकी हैं जबकि मंदसौर जिले की साखतली पंचायत की सरपंच फतेह कुंअर ने अपनी पंचायत के लिए सरकार से एक लाख रूपये की अतिरिक्त राशि आवंटित करवा ली। इतना ही नहीं उन्होंने एक ग्रामसभा का आयोजन केवल पानी की समस्या को हल करने के लिये किया।
प्रदेश में महिला सहभागिता की बाध्यता ने सामाजिक परिवर्तन के कुछ नजारे तो दिखाये ही हैं। यह परिवर्तन जातिगत व्यवस्था से सम्बन्धित है तो कहीं आर्थिक स्थिति इनका आधार बनी हैं यह एक सामान्य बात नहीं है कि 1993 के बाद से दलित महिला सरपंचों को स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराने के अधिकार से वंचित किया गया। टीकमगढ़ जिले की पिपरा बिलारी पंचायत की दलित सरपंच गुंदिया बाई भी उनमें से एक हैं। उन्हें अपने साथ घटी इस घटना पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ और जब उन्होंनें संघर्ष किया तो परिणाम स्वरूप गुंदिया बाई ने जिला पंचायत में तिरंगा फहराया। ऐसा कतई नहीं है कि केवल महिलाओं के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार हो रहा है, यह पुरूष जनप्रतिनिधियों के साथ भी होता रहा है पर अंतर इस बात का है कि उन्होंने अपने साथ होने वाले अन्याय को बड़े मंच पर उठाया ही नहीं। औरत अन्याय की शिकार जरूर है पर वह इसके खिलाफ आवाज भी उठाती रही है।
इसमें कोई दो मत नहीं है कि आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में किसी भी तरह की उन्नति या परिवर्तन की कल्पना संभव नहीं है और पिछले एक दशक में महिलाओं की आर्थिक विकास की जरूरत को महसूस करते हुये स्वयं सहायता समूहों की अवधारणा का व्यापक उपयोग किया गया है। इस संदर्भ में भी यह केवल संयोग मात्र नहीं है कि प्रदेश के सबसे सफल 1000 समूहों में सभी महिलाओं द्वारा संचालित किये जा रहे हैं। मंदसौर जिले में कस्तूरबा पौध रोपणी समूह ने विगत पांच वर्षों से छह लाख पौधे तैयार करके उनका विक्रय किया और 15 परिवार को सम्मान दिलाया, साथ ही खिलचीपुरा पंचायत के समूह ने बचत की प्रवृत्ति से अनाज पीसने की चक्की लगाकर बड़े व्यवसायियों से प्रतिस्पर्धा करके आंगनबाड़ियों को खाद्यान्न की आपूर्ति का दयित्व हासिल कर लिदया। पंचायत के विकास के लिये निर्णय लेने के मामले में भी महिला पंचायत प्रतिनिधियों को ज्यादा स्वीकार्यता मिली है। धुंधड़का पंचायत की सरंपच रहीं अनीता कुंवर सिसोदिया कहती हैं कि महिला जन प्रतिनिधियों की ताकत का असली राज उनकी जोखिम उठाने की क्षमता में निहित होता है। इसी बात के आधार पर पंचायत का राजस्व बढ़ाने के लिए उन्होंने धुंधड़का के प्रसिध्द साप्ताहिक पशु हाट में पशु बिक्री पर कर बढ़ाने का निर्णय लिया जबकि पूर्ववर्ती सरपंचों में से किसी ने ऐसा दुस्साहस नहीं किया था।
एक और प्रवृत्ति भी स्त्री नेतृत्व को स्वीकारने के लिये प्रेरित करती है, वह प्रवृत्ति है सहनशीलता की। लगातार दमन के बावजूद औरत ने नेतृत्व के मामले में असंयम का परिचय नहीं दिया है। सीहोर जिले के इछावर ब्लाक की सिराडी पंचायत के महिला समूह ने कई बार यह प्रयास किये कि गांव के कुंये का पुर्ननिर्माण हो जाये, परन्तु जरूरत होने के बावजूद पुरूष नियंत्रण वाली पंचायत की रूचि उस काम में नहीं रही। तब महिलाओं के समूह ने स्वयं निर्णय लेकर कुंये का पुर्ननिर्माण कर दिया। यह एक ऐसी घटना थी जिसने पुरूष सत्ता के दम्भ को बड़ी दर्दनाक चोट पहँचाई और प्रतिक्रिया स्वरूप महिलाओं दुर्व्यवहार से दो-चार होना पड़ा परन्तु वे गांव को संगठित करने में कामयाब रहीं। ये घटना अपने आप में केवल एक पंचायत की घटना नहीं है बल्कि यह प्रतिबिम्ब है जमीनी सच्चाई का। अम्बा पंचायत की सरंपच मोड़ी बाई को तो अपनी सक्रियता के लिये जीवन दांव पर लगा देना पड़ा। उनके पति बालू राम अपनी पत्नी की प्रगति से खुश नहीं थे, वे स्वयं सत्ता चलाना चाहते थे परन्तु मोड़ी बाई ने यह मंजूर नहीं किया और संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई। महिला नेतृत्व का प्रश्न इतनी आसानी और सद्भावना से स्वीकार नहीं होगा। परिवार समुदाय, प्रशासन और राजनीति हर स्तर पर इसे पुरूष सत्तात्मक समाज अपने अस्तित्व के लिये एक चुनौती मानेगा। यह मानसिकता आज की नहीं है, हमेशा से ही इसके पक्ष में तर्क दिये जाते रहे हैं, जहां तर्क से काम नहीं चला वहां दमन-उत्पीड़न को हथियार बनाकर राजनैतिक सत्ता में औरत को दरकिनार कर दिया जाता रहा। पुरूष सत्तात्मक समाज को अहंकार से मुक्त हो, कुछ अर्से के लिये स्वयं को स्त्री सत्ता के अधीन कर देना चाहिये। यह एक ऐसी पहल होगी जिसमें शायद आत्मावलोकन की ईमानदा कोशिश की जा सकेगी। सामाजिक असमानता के तहत राजनैतिक गलियारों में बड़ी शिद्दत के साथ यह प्रश्न उठाया गया कि पिछले पचास वर्षों में एक भी दलित करोड़पति क्यों नहीं बना? प्रशन उठाने वाले जताना चाहते थे कि उच्च वर्गों ने दलितों का दमन किया इसलिए ऐसा हुआ। अब एक प्रश्न और उठना चाहिए कि मध्यप्रदेश में 40 वर्षों में एक भी महिला मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनी? यह पहल समय की सबसे बड़ी दरकार है क्योंकि भ्रष्टचार, अस्थिरता और राजनैतिक हिंसा जिस तरह व्यवस्था में विस्तार पा चुकी है उससे नेतृत्व में बुनियादी परिवर्तन के बिना मुक्ति नहीं पाई जा सकेगी। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि संख्या में कितनी महिलाओं ने सत्ता में दखल बढ़ाया, जरूरी यह जानना है कि निर्णय लेने और सत्ता के अधिकारों के क्रियान्वयन के लिये उन्हें कितनी राजनैतिक स्वतंत्रता दी जा सकी ?
महिला : संरक्षण की शिक्षिका
स्त्री के संवेदनशील संरक्षण में सामाजिक परिवर्तन-2
समाजीकरण की प्रक्रिया पारिवारिक संस्थाओं से शुरू होती है। यही वे संस्थायें हैं जहां रचनात्मक और संवेदनशील भूमिका निभाने की जिम्मेदारी महिलाओं को सौंपी जाती रही है। कारण बहुत स्पष्ट है कि मूल्य, व्यवहार और जिम्मेदारियां उसके लिए केवल स्वयं तक सीमित रहने वाले व्यवहार नहीं हैं, वह उनका विस्तार भी करती है। वह चाहे परिवार के बच्चे हों, या फिर स्कूल के छात्र और इससे आगे बढ़कर व्यवसाय में काम करने वाला साथी समूह, जहां महिलायें किसी भी भूमिका को निभाने की स्थिति में है वहां वह समाज के प्रति जिम्मेदारियों के भाव को दूसरों को सिखाने की भी पहल करती है। यह सिखाने की प्रक्रिया दो स्तरों पर क्रियान्वित होती है। एक स्तर वहां जहां वह खुद मूल्य आधारित व्यवहार कर रही होती हैं, तो दूसरी तरफ वह संवाद और अनुभवों के जरिये शिक्षाओं का विस्तार करती हैं।
वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में जिस तरह बहुआयामी और बहुपक्षीय परिवर्तन की प्रक्रियायें चल रही हैं , उसमें महिलाओं की भूमिका को ज्यादा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि वर्तमान में परिवर्तन की प्रक्रिया में मानवीय विकास और मानवीय मूल्यों को प्राथमिक जरूरत माना गया है जिसके लिये जरूरी है कि लोग और समुदाय केवल प्रेरक या दृष्टा की बाहरी भूमिका न निभायें बल्कि वह प्रक्रिया और सक्रिय तत्व की भूमिका निभायें। यह भूमिका महिलाओं ने बेहतर ढंग से निभाई है। महिलाओं ने उपेक्षित वर्गों और मानवीय मूल्यों को संरक्षण प्रदान किया है। जब हम मूल्य आधारित, सामाजिक परिवर्तन या विकास की प्रक्रियाओं को परिभाषित करते हैं तो सेवा का क्षेत्र अपने आप में उस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हो जाता है। एक ही समाज में रहते हुये वर्ग या कर्म के संदर्भों में एक समुदाय दूसरे समुदाय के प्रति अपनी भूमिका निभाता है और जब सेवा के क्षेत्र की बात होती है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि स्वास्थ्य के मामले में नर्स की भूमिका महिला ही निभाती है। बच्चों का मुद्दा केवल परिवार के बच्चों तक सीमित नहीं है बल्कि जब समाज में बच्चों के विकास की बात पर रणनीतिक तैयारी की जाती है तब स्वाभाविक रूप से केवल यही विकल्प सामने आता है कि आंगनबाड़ी के संचालन की जिम्मेदारी महिलाओं को ही सौंपी जाती है क्योंकि संरक्षण प्रदान करना उसका बुनियादी चरित्र है। जिस प्रतिबध्दता के साथ वह अपनी भूमिका निभाती है उससे व्यापक स्तर पर जिम्मेदार चरित्र का विस्तार होता है। वह स्वयं एक अध्याय बन जाती है जिसे सीखा जाना चाहिए।
इसी तरह पर्यावरण के सम्बन्ध में संरक्षण की शिक्षिका यानी महिला की भूमिका ने एक अलग आयाम स्थापित किया है। पर्यावरण विनाश का सबसे नकारात्मक असर महिलाओं पर पड़ता है परन्तु उन्होंने पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाया है। महिलायें पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले विकास के माडलों तथा कार्यक्रमों, योजनाओं को चुनौती देने में सबसे आगे हैं और संघर्ष की ध्वज वाहक बनी हुई हैं। वे महिलायें जिन्होंने उत्तार प्रदेश के पहाड़ी जंगलों की कटाई, बार-बार आने वाली बाढ़ और भू-स्खलन के बीच के सम्बन्ध को पहचाना उन्होंने व्यापार के लिये जंगलों की कटाई पर रोक लगाने के लिये चिपको आंदोलन शुरू किया। फिर पश्चिमी मध्यप्रदश और गुजरात की सीमा पर बनने वाले सरदार सरोवर बांध के मानव समाज पर पड़ने वाले नकारात्मक पर्यावरण प्रभावों को महसूस किया उन्होंने जन आंदोलनों की एक लम्बी लड़ाई में न केवल सामान्य रूप से सक्रिय रही बल्कि आंदोलनों का नेतृत्व भी किया। महिलायें पर्यावरण और प्रकृति को मानव संरक्षण दिये जाने की हिमायती रही है। वास्तव में चिपको आंदोलन में पेड़ के तने और ठेकेदार की बिजली की आरी के बीच में अपना शरीर डालकर इन औंरतों ने यह सिध्दान्त स्थापित किया कि वे न सिर्फ जंगलों की मुख्य उपयोगकर्ता हैं बल्कि उनकी सच्ची संरक्षक भी है। इसी प्रकार से महिलाओं ने पारम्परिक फसलों, बीजों और तकनीकों पर समुदायों की अधिकार की सुरक्षा के लिये चलाये जाने वाले अभियान की अगुवाई भी की है।
राजनैतिक संदभों में महिलाओं ने नेतृत्व के अधिकार को एक मानवीय नजरिया प्रदान किया है। एक स्वतंत्र आकलन से पता चला है कि जब महिलाओं को समाज में निर्णय लेने, निर्णय को क्रियान्वित करने और अपनी प्राथमिकतायें तय करने की स्वतंत्रता मिलती है तो समाज में होने वाला परिवर्तन ज्यादा मानवीय होता है। पंचायतों में नेतृत्व के संदर्भ में विगत एक दशक में हमारी सबसे बड़ी उपलब्धि को यदि चिन्हित करना हो तो यह बात उभर कर आती है कि हम स्त्री नेतृत्व के कौशल और महत्व को महसूस कर पाने की प्रक्रिया में प्रवेश कर पाये हैं। जिन पंचायतों में महिला सरपंच और जन प्रतिनिधियों को निर्णय लेने या पहल करने के अवसर मिले हैं वहां गांव की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के प्रयास किये गये हैं, जैसे - वहां मातृत्व सहायता और परिवार सहायता योजना का बेहतर क्रियान्वयन हुआ है, पानी की समस्या को हल करने के प्रयास ज्यादा हुये हैं, लड़कियों की शिक्षा एवं शिक्षकों के व्यवहार पर ज्यादा ध्यान दिया गया है। वहीं दूसरी ओर जहां पंचायतों पर पुरूष मानसिकता का नियंत्रण रहा है, यानी पुरूष सरपंच या पंचों ने निर्णय लिये हैं, वहां आप पायेंगे कि अधोसंरचनात्मक विकास के ज्यादा काम हुये हैं, इमारतें बनाने के काम को ज्यादा प्राथमिकता दी गई है। वास्तव में स्त्री और पुरूष नेतृत्व के बीच मौजूद अंतर को अब संवेदनशीलता की प्रवृत्ति के आधार पर बखूबी समझा जा सकता है।
स्त्री नेतृत्व के अधीन होने की यह पहल करना इसलिये भी जरूरी है क्योंकि राजनैतिक व्यवस्था में अस्थिरता का दायरा केवल राज्य तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि पंचायतों में भी इसे आमतौर पर देखा जाने लगा है। इसका सबसे बड़ा कारण है राजनीति को जरिया बनाकर निहित स्वार्थों और महत्वाकांक्षा को पूरा करना पुरूष नेतृत्व का लक्ष्य बन गया है, यहीं से भ्रष्टाचार की जड़ें भी तेजी से अपना जाल फैलाती हैं। स्वाभाविक है कि महिलाओं के इस लक्ष्य से सरोकर नहीं ही हैं क्योंकि महिला की नेतृत्व क्षमता का विकास किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम के जरिये नहीं बल्कि परिवार की जिम्मेदारी निभाते हुये होता है। जहां वह किसी निहित स्वार्थ से नहीं बल्कि भावनाओं से नेतृत्व के कर्तव्य का पालन करती है। अत: स्वाभाविक है कि जब वह घर में असमानता का व्यवहार और भ्रष्टाचार नहीं करती है तो उससे सामाजिक संगठनों और सत्ता में भी इस तरह के व्यवहार की अपेक्षा नहीं की जा सकेगी।
विकास के क्षेत्र में तुलनात्मक रूप से यदि यह देखा जाये कि गांव का नेतृत्व कौन बेहतर ढंग से संभाल रहा है तो नि:संदेह पुरूष नेतृत्व अब पिछड़ता नजर आ रहा है। मध्यप्रदेश को सूखे की मार लगातार चार साल से झेलनी पड़ रही है ऐसी स्थिति में जल संरक्षण के कई आंदोलन भी छेड़े गये परन्तु विगत वर्ष जबं पंचायतों के काम का मूल्यांकन हुआ और सर्वश्रेष्ठ काम करने वाली जिन तीन पंचायतों का चयन हुआ, उन तीनों का नेतृत्व महिला सरपंचों के हाथ में ही था। इसी तरह प्रदेश की 72 में से 49 पंचायतें स्त्री नेतृत्व के अधीन हैं, जहां, सामाजिक न्याय, वन संरक्षण, प्रजनन स्वास्थ्य और लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हुये हैं।
इसके साथ ही केवल पंचायत के कामों या सरकार द्वारा औपचारिक रूप से आवंटित काम को कारवाने की बात नहीं है बल्कि अन्य एजेन्सियों द्वारा उपलब्ध कराये गये संसाधनों का भी महिला बहुल पंचायतों ने बेहतर उपयोग किया है। मध्यप्रदेश में विश्व खाद्य कार्यक्रम के अन्तर्गत होशंगाबाद की बिछुआ पंचायत की सरपंच अनीना बी अपनी पंचायत में 6 लाख रूपये का काम वास्तव में करवा सकी हैं जबकि मंदसौर जिले की साखतली पंचायत की सरपंच फतेह कुंअर ने अपनी पंचायत के लिए सरकार से एक लाख रूपये की अतिरिक्त राशि आवंटित करवा ली। इतना ही नहीं उन्होंने एक ग्रामसभा का आयोजन केवल पानी की समस्या को हल करने के लिये किया।,
मध्यप्रदेश में महिला सहभागिता की बाध्यता ने सामाजिक परिवर्तन के कुछ नजारे तो दिखाये ही हैं। यह परिवर्तन जातिगत व्यवस्था से सम्बन्धित है तो कहीं आर्थिक स्थिति इनका आधार बनी हैं यह एक सामान्य बात नहीं है कि 1993 के बाद से दलित महिला सरपंचों को स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराने के अधिकार से वंचित किया गया। टीकमगढ़ जिले की पिपरा बिलारी पंचायत की दलित सरपंच गुंदिया बाई भी उनमें से एक हैं। उन्हें अपने साथ घटी इस घटना पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ और जब उन्होंनें संघर्ष किया तो परिणाम स्वरूप गुंदिया बाई ने जिला पंचायत में तिरंगा फहराया। ऐसा कतई नहीं है कि केवल महिलाओं के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार हो रहा है, यह पुरूष जनप्रतिनिधियों के साथ भी होता रहा है पर अंतर इस बात का है कि उन्होंने अपने साथ होने वाले अन्याय को बड़े मंच पर उठाया ही नहीं। औरत अन्याय की शिकार जरूर है पर वह इसके खिलाफ आवाज भी उठाती रही है।
इसमें कोई दो मत नहीं है कि आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में किसी भी तरह की उन्नति या परिवर्तन की कल्पना संभव नहीं है और पिछले एक दशक में महिलाओं की आर्थिक विकास की जरूरत को महसूस करते हुये स्वयं सहायता समूहों की अवधारणा का व्यापक उपयोग किया गया है। इस संदर्भ में भी यह केवल संयोग मात्र नहीं है कि प्रदेश के सबसे सफल 1000 समूहों में सभी महिलाओं द्वारा संचालित किये जा रहे हैं। मंदसौर जिले में कस्तूरबा पौध रोपणी समूह ने विगत पांच वर्षों से छह लाख पौधे तैयार करके उनका विक्रय किया और 15 परिवार को सम्मान दिलाया, साथ ही खिलचीपुरा पंचायत के समूह ने बचत की प्रवृत्ति से अनाज पीसने की चक्की लगाकर बड़े व्यवसायियों से प्रतिस्पर्धा करके आंगनबाड़ियों को खाद्यान्न की आपूर्ति का दयित्व हासिल कर लिदया। पंचायत के विकास के लिये निर्णय लेने के मामले में भी महिला पंचायत प्रतिनिधियों को ज्यादा स्वीकार्यता मिली है। धुंधड़का पंचायत की सरंपच रहीं अनीता कुंवर सिसोदिया कहती हैं कि महिला जन प्रतिनिधियों की ताकत का असली राज उनकी जोखिम उठाने की क्षमता में निहित होता है। इसी बात के आधार पर पंचायत का राजस्व बढ़ाने के लिए उन्होंने धुंधड़का के प्रसिध्द साप्ताहिक पशु हाट में पशु बिक्री पर कर बढ़ाने का निर्णय लिया जबकि पूर्ववर्ती सरपंचों में से किसी ने ऐसा दुस्साहस नहीं किया था।
एक और प्रवृत्ति भी स्त्री नेतृत्व को स्वीकारने के लिये प्रेरित करती है, वह प्रवृत्ति है सहनशीलता की। लगातार दमन के बावजूद औरत ने नेतृत्व के मामले में असंयम का परिचय नहीं दिया है। सीहोर जिले के इछावर ब्लाक की सिराडी पंचायत के महिला समूह ने कई बार यह प्रयास किये कि गांव के कुंये का पुर्ननिर्माण हो जाये, परन्तु जरूरत होने के बावजूद पुरूष नियंत्रण वाली पंचायत की रूचि उस काम में नहीं रही। तब महिलाओं के समूह ने स्वयं निर्णय लेकर कुंये का पुर्ननिर्माण कर दिया। यह एक ऐसी घटना थी जिसने पुरूष सत्ता के दम्भ को बड़ी दर्दनाक चोट पहँचाई और प्रतिक्रिया स्वरूप महिलाओं दुर्व्यवहार से दो-चार होना पड़ा परन्तु वे गांव को संगठित करने में कामयाब रहीं। ये घटना अपने आप में केवल एक पंचायत की घटना नहीं है बल्कि यह प्रतिबिम्ब है जमीनी सच्चाई का। अम्बा पंचायत की सरंपच मोड़ी बाई को तो अपनी सक्रियता के लिये जीवन दांव पर लगा देना पड़ा। उनके पति बालू राम अपनी पत्नी की प्रगति से खुश नहीं थे, वे स्वयं सत्ता चलाना चाहते थे परन्तु मोड़ी बाई ने यह मंजूर नहीं किया और संदिग्ध परिस्थितियों में उनकी मौत हो गई। महिला नेतृत्व का प्रश्न इतनी आसानी और सद्भावना से स्वीकार नहीं होगा। परिवार समुदाय, प्रशासन और राजनीति हर स्तर पर इसे पुरूष सत्तात्मक समाज अपने अस्तित्व के लिये एक चुनौती मानेगा। यह मानसिकता आज की नहीं है, हमेशा से ही इसके पक्ष में तर्क दिये जाते रहे हैं, जहां तर्क से काम नहीं चला वहां दमन-उत्पीड़न को हथियार बनाकर राजनैतिक सत्ता में औरत को दरकिनार कर दिया जाता रहा। पुरूष सत्तात्मक समाज को अहंकार से मुक्त हो, कुछ अर्से के लिये स्वयं को स्त्री सत्ता के अधीन कर देना चाहिये। यह एक ऐसी पहल होगी जिसमें शायद आत्मावलोकन की ईमानदार कोशिश की जा सकेगी। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि संख्या में कितनी महिलाओं ने सत्ता में दखल बढ़ाया, जरूरी यह जानना है कि निर्णय लेने और सत्ता के अधिकारों के क्रियान्वयन के लिये उन्हें कितनी राजनैतिक स्वतंत्रता दी जा सकी ?
सचिन कुमार जैन
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