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इन दिनों मध्यप्रदेश अपने अस्तित्व का 51वाँ राज्योत्सव मना रहा हैं और फेलोशिप के माध्यम से विभिन्न यात्राओं के जरिए पहली बार ग्रामीण मध्यप्रदेश को देखने-समझने का मौका मिल रहा है। अंचलों में जाने के बाद लगता है कि हम गाँव-गाँव करते-करते शहरों तक सीमित हो गए हैं। पत्रकारिता भी इन दिनों शहरी मामलों में इतनी उलझी हुई है कि यदा-कदा गांव के हालचाल पूछे जाते हैं। अक्सर टीआरपी या फिर बेचनेयोग्य खबरों के चलते हमारी विकास की परिभाषा भी प्रदूषित हो गई है। किसी से भी पूछें कि विकास क्या है तो प्रत्युत्तर कुछ उलझाने वाला ही मिलेगा। अब हर आदमी की अपनी विकास की परिभाषा है। ऐसे में लगभग निरक्षर और विशिष्ट पृष्ठभूमि वाली महिलाओं से पूछें कि तुम विकास चाहती हो, तो उनसे हम क्या जवाब की आशा रखेंगे? आज भी जब इल महिला प्रतिनिधियों के पास जाते हैं तो अचानक लगता है कि हम उपनी बनाई परिभाषाओं को लेकर आए हैं और उन्हे उसमें फिट देखना चाहते हैं। उनकी क्या सोच है इससे हमें कोई मतलब नहीं होता है।
इन दिनों मध्यप्रदेश का अतीत जितना गौरवशाली था उतना ही वर्तमान और भविष्य। अपने गौरवशाली इतिहास, संस्कृति और लोक कलाओं से मध्यप्रदेश का इतिहास विभिन्न सभ्यताओं की कहानी है। वर्तमान 50 वर्षों में मध्यप्रदेश ने संस्कृति और लोक कलाओं को देश और विश्वव्यापी बनाया। उन्हें परिष्कृत किया तो उन्हें उनके सीमित क्षेत्रों से निकाल कर जन-जन तक पहुँचाया। देश के किसी राज्य में इतनी विविध न तो धरोहर है, न ही कला और संस्कृति। सबसे बड़ी बात कि इनमें कहीं कोई विरोधाभास नहीं। अपनी अलग-अलग विशिष्टताएँ और समाज की उन्हें जानने-पहचानने की ललक। मध्यप्रदेश का जन समाज आमतौर पर शांतिप्रिय है। जातिवाद जैसी समस्याएँ नहीं है। विभिन्न जाति, समाज के लोग सद्भावपूर्ण वातावरण के आदी है। पर्यटन, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थलों की, नदियों के कछार और उनकी समृध्दि, उर्वर ज़मीन, आधुनिक विकास की संभावनाएँ, वन और नैसर्गिक सम्पदा वाला शायद ही कोई दूसरा प्रदेश देश में है। मध्यप्रदेश के वर्तमान की चिंता जल, बिजली और सड़कों की है। मालवा का पठार क्रमश: सूख रहा हैं, पर उतना ही विकसित भी हो रहा है। आने वाले 50 वर्षों में मालवा का पठार कठिनाई झेल सकता है। मध्यप्रदेश सड़कों के विकास, पर्याप्त जल प्रदाय और विद्युत प्रदाय की व्यवस्था कर ले तो भविष्य में भी देश का सर्वश्रेष्ठ प्रदेश बन सकता है। वैसे भी 21वीं सदी इतिहास के नहीं भविष्य की आश्वस्तता पर जीना चाह रही है।
राजा भोज की भोजपुर नगरी, महाकाल का सिंहस्थ, विक्रमादित्य और कालिदास की उज्जयिनी, बौध्दों का साँची स्तूप, रानी रूपमती और बाज बहादुर का मांडू का हवा महल, भोपाल का ताल, भीम बैठका की गुफाएँ और भित्ति चित्र, नर्मदा का पवित्र कछार और ओंकारेश्वर, उद्गम स्थल अमरकंटक, जबलपुर का भेड़ाघाट, चौंसठ योगिनी का मंदिर, भेड़ाघाट का बंदर कूदनी, खजुराहो के मंदिर, बाँधवगढ़ के शेर, कान्हा का अभयारण्य, बघेलखंड, बुंदेलखंड की आल्हा, राई नृत्य, भगोरिया मेला, ग्वालियर का किला, तानसेन की मज़ार, अलाउद्दीन खान का मैयर और शारदा देवी, भारत रत्न लता मंगेशकर की जन्म भूमि, इंदौर, दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित कवि प्रदीप का बड़नगर, भोपाल की जामा मस्जिद जैसी धरोहरों की एक लंबी सूची है।
आईये गांधी को याद करें
अपनी झाबुआ जिले की यात्रा के दौरान सोचते-सोचते समय गुजरा कि गांधी का जो देश था वहाँ अचानक आए बदलाव ने सब कुछ मटियामेट कर दिया है। गांधी खुद भी छिटक कर दो-चार दिवसों में सिमट गए हैं। लेकिन झाबुआ के ही एक ब्लॉक पेटलावद में संपर्क नामक संस्था गांधी को चरितार्थ कर रही है। वह पंचायती राज में महिलाओं को भी एडवोकेसी दे रही है। संपर्क में पढ़ने वाले आदिवासी बहुल गांव के 125 बच्चे गांधी की 'नई तालीम' को सफल होता दिखा रहे हैं। काम से पढ़ाई को जोड़कर उनकी उपनी बोली में ही सारी शिक्षा दी जा रही है और दो बेच पढ़कर निकल भी चुके हैं। प्रभाव यह है कि यहाँ से निकले बच्चे आम बच्चों से बिल्कुल ही अलग सोच लेकर निकलते हैं। कुल मिलाकर गांधी को फिलहाल अप्रासंगिक कहने वालों के लिए यह एक करारा तमाचा है। अब यही से प्रारंभ करते हैं कि महात्मा गाँधी ने स्वतंत्र भारत में एक मज़बूत पंचायत राज शासन पध्दति का स्वप्न संजोया था जिसमें शासन कार्य की प्रथम इकाई पंचायतें होंगी। उनकी कल्पना पंचायतों की शासन व्यवस्था की धुरी होने के साथ ही आत्मनिर्भर, पूर्णतया स्वायत्त और स्वावलम्बी होने की थी। स्वतंत्रता के पश्चात् महात्मा गाँधी की इस परिकल्पना को साकार करने के लिए समय-समय पर प्रयास किए गए। कभी ग्रामीण विकास के नाम पर और कभी सामूदायिक विकास योजनाओं के माध्यम से पंचायतों को लोकतंत्र का आधार मज़बूत बनाने के लिए उपयोग किया जाता रहा। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरह के प्रयोग इसके लिए चले। कुछ असफल रहे तो कुछ सफल रहे और अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय बने। लेकिन पूरे देश में लोकतंत्र का विकेन्द्रीकरण करके बुनियादी स्तर पर पंचायत राज की स्थापना और जनता के हाथ सीधे अधिकार देने की शुरूआत संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम के माध्यम से सम्भव हुई।
73वें संविधान संशोधन अधिनियम से जहाँ एक ओर इन संस्थाओं को वैधानिक बनाया गया वहीं दूसरी ओर ऐसे समुचित उपबंध किए गए जिससे कि पंचायतें स्वशासन की स्वतंत्र इकाईयाँ बनकर सरकार के तीसरे स्तर के रूप में कार्य कर सकें। मध्यप्रदेश देश का प्रथम राज्य हैं जिसने 73वें संविधान संशोधन के अनुरूप सर्वप्रथम पंचायत राज विधान बनाया तथा पंचायत राज संस्थाओं हेतु निर्वाचन सम्पन्न कराए। मध्य प्रदेश सरकार ने 1993 से लगातार अब तक विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की दृष्टि से अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए है। मध्य प्रदेश में पचायत राज संस्थाओं के गठन के पश्चात् पंचायतों के कार्यकरण में आने वाली बाधाओं को दृष्टिगत् रखते हुए विधान में अनेक संशोधन किए गए जिससे पंचायतें यथार्थ में स्वशासन की स्वतंत्र इकाईयाँ बन सकें।
आज़ादी के बाद बने भारतीय संविधान और उसमें होते संशोधनों में इस तथ्य को बराबर महसूस किया जाता रहा कि महिलाओं की भागीदारी सार्वजनिक क्षेत्रों में बढ़ाना आवश्यक है। सन् 1959 में बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशों के आधार पर त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई। तब भी यह माना गया कि देश का समग्र विकास महिलाओं को अनदेखा करके नहीं किया जा सकता। इसलिये पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ करने तथा पंचायतों में महिलाओं को एक तिहाई भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 1992 में 73वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम पारित किया गया। संविधान का यह प्रावधान महिलाओं की छिपी शक्ति को उजागर करने का सार्थक कदम था। इसके बाद प्रदेश के ज़िलों में पंचायत चुनावों की घोषणा की गई। इस चुनावों में हज़ारों महिलाओं ने भाग लिया। इस संशोधन अधिनियम के द्वारा ग्राम सभा का गठन होना अनिवार्य हो गया और ग्राम पंचायतों और सदस्यों की कुल संख्या की कम से कम एक तिहाई संख्या महिलाओं की कर दी गई। इस व्यवस्था का प्रभाव यह हुआ कि प्रदेश भर में सैंकड़ों महिलाएं पंचायतों के नेतृत्व हेतु मैदान में आ गई। इस संशोधन के माध्यम से जहां एक ओर पंचायती राज व्यवस्था को प्रदेश में लोकतांत्रिक प्रशासन के तृतीय सोपान के रूप में संवैधानिक स्वीकृति प्राप्त हुई वहीं दूसरी ओर महिलाओं के अस्तित्व और अधिकार को भी स्वीकार किया गया।
लोकेन्द्र सिंह कोट
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