जब भी महिला नेतृत्व की बात होती है तब हम बड़े गर्व से कहते हैं कि हमारे देष की बागडोर एक महिला राष्ट्रपति माननीया सुश्री प्रतिभा पाटिल के हाथों में है। जब इस नेतृत्व की परिभाषा को सबसे निचले स्तर के ढांचे के साथ जोड़कर बात करते हैं तो हम देखते हैं कि भले ही हमने पंचायतों में 50 फीसदी आरक्षण कर दिया हो, परन्तु आज भी हम उनके द्वारा किये गये अच्छे कामों का जिम्म्ेदार उन्हें नहीं, बल्कि उनके पति या ससुर को ही मानते हैं।
लोकतंत्र की सबसे छोटी लेकिन महत्वपूर्ण ईकाई है पंचायत। वर्तमान में मध्यप्रदेष में पंचायती राज व्यवस्था में पंच और सरपंचों के आधे पद महिलाओं के लिये आरक्षित कर दिये गये हैं। राजनैतिक दृष्टि से महिलाओं को बराबरी का हक मिलना एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है जबकि इस कदम पर बारीकी से विष्लेषण करना जरूरी हैं। हाल ही में प्रदेष की महिला एवं बाल विकास मंत्री रंजना बघेल ने बताया कि महिला सषक्तिरण में मध्यप्रदेष अन्य राज्यों से आगे है। एक ताजा विष्लेषण यह सिध्द करता है कि मध्यप्रदेष में महिलाओं को आरक्षण (या कहें कि अवसर) उन्हीं स्तरों पर मिला है जहां उन्हें तयषुदा नीतियों और कार्यक्रमों का बिना किसी सवाल-जवाब के अनुसरण्ा करना होता है। उन स्तरों एवं मंचों से महिलायें गायब हैं जहां से नीतियां और कार्यक्रमों का जन्म होता है। राज्य में विष्लेषण के लिये चिन्हित किये गये 550 अहम् पदों (जिनमें विधानसभा, संसद, आयोग और निगम-मण्डलों, विष्वविद्यालय, के सभी सर्वोच्च पद शामिल हैं) में से 488 पदों पर पुरूषों का आधिपत्य है। एक कड़वा सच सामने आता है कि मध्यप्रदेष में 89 फीसदी सर्वोच्च पदों से महिलाओं को पूरी तरह से वंचित रखा गया है। एर्तराष्ट्रीय महिला दिवस के 100 वर्ष पूरे हो गये हैं लेकिन आज भी आधी आबादी की सत्ता में भागीदारी सुनिष्चित नहीं हो पाई है।
प्रदेष के आयोगों में महिला
राज्य में सामाजिक न्याय एवं समतामूलक विकास के लिये स्थापित किये गये आयोगोें, निगमों और मंड़लों के सर्वोच्च पदों पर अभी भी पुरूषाें का ही कब्जा है। मध्य प्रदेष में सरकार द्वारा स्थापित 17 आयोगों/निगमों व मंडलों में से 15 अध्यक्ष पदों पर पुरूष का ही कब्जा हैं। इनमें से केवल राज्य महिला आयोग और राज्य अनूसूचित जाति/जनजाति आयोग में ही महिलाओं को अवसर दिया गया है। इनमें से महिला आयोग ही ऐसा आयोग है जहां पर अध्यक्ष व सभी पदों पर महिलाओं को ही अपनी क्षमता दिखाने का अवसर दिया गया है। इसे यकीनन सरकार की मजबूरी ही कहा जाना उचित होगा, क्योंकि महिला आयोग महिलाओं से संबंधित प्रकरणों की सुनवाई करता है, अतएव यह राज्य की प्रतिबध्दता हो जाती है कि वह इन आयोगों में महिलाओं को ही तवज्जो दे। इस तरह हम आयोगों के अध्यक्ष और सदस्यों के पदों पर नजर ड़ालें तो हम पाते हैं कि 17 आयोगों/निगम व मंडलों के 51 पदों में से 10 पदों पर ही महिला सदस्यों को मौका दिया गया है।
यही नहीं प्रदेष में मानवाधिकारों के संरक्षण के लिये बनाये गये राज्य मानवाधिकार आयोग में एक भी महिला को न तो अध्यक्ष पद पर रखा गया है और न ही सदस्य पद पर। जबकि राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो 2007 के अनुसार प्रदेष में महिलाओं एवं किषोरियोें के साथ हो रहे अपराधों में प्रदेष चौथे स्थान पर है, फिर भी महिलाओं को मौका नहीं दिया जा रहा है। और ऐसी स्थिति में इन आयोगों के कामकाज और कार्यशैली में महिला मुद्दों को देखने के नजरिये से पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण अहम् होता है। सरकार के कार्यों में पारदर्षिता और जवाबदेहिता लाने के उद्देष्य से पारित सूचना के अधिकार के अंर्तगत् बनाये गये कानून राज्य सूचना आयोग में आयुक्त पदों में महिलाओं को कोई स्थान नहीं दिया गया है। निजीकरण के इस दौर में प्रदेष में विद्युत ऊर्जा के निर्णय के लिये राज्य नियामक आयोग बना है, इनमें भी महिलाओं को कोई भी स्थान नहीं दिया गया है।
विश्वविद्यालयों में महिला
प्रदेष में महिलाओं के मुद्दों पर शोध, प्रषिक्षण एवं षिक्षा के लिये अध्ययन केन्द्र एक अहम भूमिका निभा सकता हैं, परन्तु प्रदेष में एक या दो विष्वविद्यालयों ने ही इसे महत्वपूर्ण मानते हुये इसके ऊपर विचार किया। मध्यपद्रेष के कुल 15 विष्वविद्यालयों में से किसी में भी न तो कुलपति और न ही कुलसचिव के पद पर किसी भी महिला को मौका नहीं दिया गया है।
सत्ता में महिलाओं की स्थिति
महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण की बात पंचायत में तो सुनिष्चित कर दिया गया है, लेकिन संसद/विधानसभा में आज भी स्थिति वही है। आज भी प्रदेष में सवा तीन करोड़ महिलाओं के पक्ष को रखने के लिये कुल 25 महिला विधायक ही विधानसभा में है, जबकि पुरूष विधायकाेंं की संख्या 205 है। लोकसभा की 29 सीटों मे से केवल तीन सीटों पर ही महिलाओं की सत्ता है। राज्यसभा के हाल भी इससे अलग नहीं है, प्रदेष की 11 सीटों में से कुल तीन पर ही महिलायें हैं। मध्यप्रदेष सरकासर के कुल 22 मंत्रियों में से 2 मंत्री ही महिला हैं। इसका विष्लेषण यह कहता है कि जहां पर केवल क्रियान्वयन का भार है वहां पर तो महिला नेत्त्व के पचास फीसदी पद आरक्षित कर दिये गये हैं लेकिन जहां से सत्ता का वास्तविक संचालन किया जाता है, वहां पर आज भी चुप्पी है। यह चुप्पी सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही ओर दिखाई देती हैं । तो क्या इससे यह माना जाना चाहिये कि सरकार निचले स्तरों पर आरक्षण का प्रतिषत बढ़ाने से ही महिला नेत्त्व को बढ़ावा देंना मानती है ?
व्यापार और विकास के निगमों में महिलायें
प्रदेष में कुछ वर्षों से विकास के नाम पर बडी-बड़ी कंपनियों को निवेष के लिये आमंत्रण दिया जा रहा है। इस प्रक्रिया में सरकार निजी कंपनियों को शामिल करने के फेर में अपनी जिम्मेदारियों से हटती जा रही हैं। इन्हीं कम्पनियों को नियंत्रित करने के लिए सरकार द्वारा कुछ निगम बनाये गए हैं। इसके अलावा सरकारी कार्यक्रमों को ठीक तरह से संचालित करने के लिए कुछ परिषदों का गठन किया गया है। दुर्भायपूर्ण बात यह है कि इन 91 निगम/ मण्डल/ संस्थान/ बोर्ड/ परिषद में से केवल 6 में ही महिलाएँ सर्वोच्च पदों पर नियुक्त हैं। इन 6 महिलाओं में से 3 महिलाएँ प्रषासनिक सेवाओं, 2 राजनीतिज्ञ और 1 मंत्री पद पर मौजूद है। अब सवाल यह उठता है कि क्या महिलाएँ कम्पनियों पर लगाम लगाने व कार्यक्रमों और नीतियों को सही तरह से चलाने के लायक नहीं है ?
न्याय पालिका और महिलायें
लोकतंत्र में न्यायपालिका की एक अहम् भूमिका है। न्यायपालिका संविधान के संरक्षण के रूप में कार्य करती है। यह संविधान के अंतर्गत दिये गए मूल अधिकारों के संरक्षण हेतु काम करती है। परन्तु प्रदेष में लगातार मानव अधिकारों के हनन् के मसले बढ़ते जा रहे हैं। प्रदेष के तीन उच्च न्यायालय में महिलाओं की स्थिति पर नजर डालें तो 40 पदों (मुख्य न्यायाधिपति एवं न्यायाधिपति) में से केवल 5 पर ही महिला को स्थान दिया गया है।
कार्यपालिका और महिलायें
प्रदेष को चलाने वाली कार्यपालिका के सामने मातृ मृत्यु, षिषु मृत्यु, महिला हिंसा इत्यादि जैसी अनेकों समस्याएँ हैं परन्तु इनसे निपटने के लिए उनके पास कोई ठीक तरह की नीति एवं योजनाएं नहीं है। इसका सबसे मुख्य कारण यह है कि प्रदेष के 26 प्रमुख सचिवों के पदों में से 4 एवं 35 सचिवों के पद में से भी सिर्फ 4 महिलाओं को मौका दिया गया। शेष विभागों से इन सभी को बहिष्कृत रखा गया है। यह बहिष्कार अनजाने से नहीं हुआ है बल्कि नये दौर की व्यवस्था में महिलाओं को सत्ताा से अलग रखा गया है। जिससे कि नीतियाँ बनाने और सामाजिक न्याय के निर्णय में उनकी भागीदारी सुनिष्चित न हो पायें। मध्यप्रदेष के त्रिस्तरीय पंचायती राज के आंकड़ों के अनुसार कुल 396877 सीटें में से 134368 सीटों में ही महिला प्रतिनिधित्व कर रही हैं। यानि की मात्र 33.8 प्रतिषत। भले ही मध्यप्रदेष सरकार स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिषत का आरक्षण हो परन्तु उन महिलाओं को आज भी पितृ सत्ताात्मक और पारम्परिक सामंतवादी मानसिकता की वजह से कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
निष्कर्ष
आज आरक्षण का मुद्दा केवल राजनीतिक मुद्दा बन गया है। निष्चित तौर पर स्थानीय निकायों के आरक्षण से महिलाओं की भागीदारी की वजह से मानव विकवास ज्यादा हुआ है। साथ ही उनके योगदान से महिला, बच्चों और किषोरियों पर विषेष प्रभाव पड़ा है। यू.पी.ए. सरकार द्वारा दिये गये राष्ट्रीय न्यूनतम साझा कार्यक्रम में महिला आरक्षण बिल को पास करने की बात कही गयी थी। पिछले महिला दिवस में प्रधानमंत्री महोदय के द्वारा यह विष्वास दिलाया गया था कि इस वर्ष वह बिल पास कर देंगे परन्तु आज तक जबकि सरकार का कार्यकाल समाप्त हो चुका है तब भी ये घोषणायें केवल घोषणायें ही रह गयी हैं।
इस परिदृष्य में देखने पर इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि मध्यप्रदेष में दलीय राजनीति में तो महिलाओं की उपस्थिति दोयम स्तरों पर दिख रही है किन्तु नेतृत्व के विकास के लिये उन्हें निर्णयात्मक भूमिका देने की पहल अभी राज्य में नहीं हुई है। विषेष या सामान्य निगम-मण्डलों से लेकर विभिन्न वर्गों के अधिकारों की संरक्षण के लिए स्थापित आयोगों में अब भी महिलाओं के पक्ष में माहौल नहीं बना है और वहां महिलाओं की अनुपस्थिति के कारण न्याय की उम्मीद तलाषती महिलायें भी नाउम्मीद हो रही हैं। महिला सषक्तिकरण का दावा आज सर्वव्यापी है किन्तु नेतृत्व की कुर्सी के ठीक नीचे एक ऐसी पारदर्षी परत बिछा दी गई है जिससे महिलाओं के लिये सत्ताा के ऊंचे पदों पर पहुंचने की साफ संभावना तो नजर आती है किन्तु उनहें उस परत को पार नहीं करने दिया जाता है। शोषणकारी सामाजिक व्यवस्था में बदलाव लाने के लिये हमने लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार किया था। लोकतांत्रिक व्यवस्था में समाज की दषा और दिषा राजनीतिक निर्णयों से ही तय होती है किन्तु आज राजनीति का रूप इतने विकृत ढंग से पेष किया जाता है कि यह महिलाओं के लिये एक अनैतिक और प्रतिबंधित क्षेत्र बनता जा रहा है।
रोली शिवहरे |