माधुरी राठौर रूनीजा जिला उज्जैन की गाँव प्रधान है पाँचवे दर्जे तक पढ़ी है। वे रूनीजा रियासत के वंशजों के घर में ब्याह कर आई हैं और बातचीत करने पर उनमें रियासती अंदाज का आभास नहीं होता है। वे कहती हैं, ''अब जमाना बदल गया है और सभी लोगों को हक बराबर का है। मैं गांव के सभी लोगों के पास जाकर उनकी समस्याएँ सुनती हूँ और उन्हे हल करने के भरसक प्रयास करती हँ.... हाँ पर्दा प्रथा से एकदम मुक्ति तो संभव नहीं हैं लेकिन उसमें भी बदलाव आ रहे हैं.... मेरी सास ने ही मुझे इस पद हेतु प्रोत्साहित किया था और आज में यहाँ हूँ....।''
बहुत ज्यादा पूर्वाग्रह लेकर यदि गाँवों में जाया जाय तो कभी भी हम यथार्थ से परिचित नहीं हो सकते हैं। यदि हम संस्कृति की ढली-ढलाई परिभाषा से बाहर निकलें तो हमें पता चलेगा कि सामान्यत: ज्यादातर ग्रामीण महिलाओं में लीडरशिप की योग्यता नैसर्गिक मिलेगी, जो उन्हे उनकी सांस्कृतिक विरासत के बतौर मिली थी। उनके पास जो लीडरशिप है वह हमारे बनाए कथित नेता वाले मॉडल पर फिट चाहे नहीं बैठती हों परंतु तमाम विरोधाभासों के चलते वे प्रशासन में अपनी संख्या बढ़ा रही हैं। पहली पंचवर्षीय में जहाँ संदेह था और महिलाएँ भी सहमी हुई थी, दूसरी पंचवर्षीय में सक्रिय महिलाओं की संख्या बढ़ी और तीसरी पंचवर्षीय में तो वे सारे प्रक्रम को समझते हुए आगे आई हैं। निसंदेह रूप से आज भी यह संतोषजनक स्तर से बहुत ही नीचे है लेकिन हम भी कौन से पैदा होते ही लिखना, बोलना, पढ़ना सीख गए थे।
अब आप क्या कहेंगे जब आपको पता चले कि भील आदिवासियों के मध्य लड़के वालों को दहेज देना होता है और इस दहेज को अदा करने के चक्कर में लड़के का पूरा घर काम या मजदूरी में लगा रहता है। इसलिए इस समाज में लड़कियाँ वैसे ही आदरणीय है। दूसरा लड़कियाँ अपनी पसंद के लड़के के साथ ब्याह रचा सकती हैं और इसके लिए बाकायदा भगोरिया पर्व होता है, इसे प्रणय पर्व भी कहा जाता है। महिलाओं को पति यदि नहीं समझ में आता है तो उन्हे बाकायदा छोड़ने का अधिकार है। और भी कई ऐसे पहलू इनमें विद्यमान हैं जो हमारे कथित पढें-लिखे समाज में भी नहीं है। ऐसी पृष्ठभूमि की कर्मठ महिलाएँ समाज में हैं और पूछने पर बताती हैं कि जब ग्राम सभा होती हैं तो कई बार तो जगह कम पड़ जाती है।
जाबड़ा ग्राम पंचायत जिला धार की सरपंच राजकुंवर तो सौ लोगों के दल के साथ चीन यात्रा भी कर आई हैं, इस यात्रा में पंचायत मंत्री श्री मणीशंकर अययर भी थे। अपनी पंचायत के लिए कई विकास कार्य करवाने वाली राजकुँवर इन दिनो अखबारों की सुर्खियों में हैं। सारंगी ग्राम पंचायत की फुन्दी आई तो स्कूल वाली बाई के नाम से ही खेत्र भर में विख्यात हैं। यह उनके द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में करवाए गए प्रयासों का ही नतीजा है। ऐसा नहीं है कि सभी महिलाएँ जागरूक हो गई है परंतु यह संख्या तेजी से बढ़ रही है।
अध्ययन से पता चला है कि प्रदेश में महिलाओं के पंचायतों में आरक्षण से एक स्पष्ट क्रांति सामने आने लगी है। पंच के रूप में निर्वाचित ज्यादातर महिलायें अनपढ़ थी, दो वर्ष बाद वें अपनी बेटियों को शिक्षा देने की मांग करने लगी है। चौफाल पंचायत जिला सीधी की सरपंच सुनीता यादव के स्वयं के चार बच्चे हैं और वे सभी को पढ़ा रही हैं। उन्हे लगता है कि पढ़ाई में ही परिवार और समाज के विकास के दर्शन हो सकते हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री उनकी पंचायत से होकर जा चुके हैं और उनसे मिलकर वे अभीभूत हैं। पाँच-छ: किलोमीटर की दूरी में फेली उनकी पंचायत की भी कई समस्याएँ हैं और वे बेझिझक कहती हैं कि स्कूलों में जो बच्चे मध्यान्ह भोजन करते हैं उनका पेट नहीं भर पाता है। यह बात वहाँ के बच्चे भी स्वीकार करते हैं। कारण पूछने पर वे इतना भर कहती हैं कि इधर बच्चे परिवार का मेहनती कार्य करते हैं इसलिए उनकी खुराक ज्यादा है।
प्रदेश में पंचायती राज के पूरे बारह-तेरह वर्षों के दौरान महिलाओं ने अपनी शक्ति को पहचाना है और उनने किसी हद तक राजनैतिक चेतना का भी प्रसार हुआ है। एक स्पष्ट तथ्य उभरकर सामने आता है कि ग्रामीण महिलाओं कें जनप्रतिनिधियों के रूप में मैदान में आने से सार्वजनिक विषयों तथा निर्णयों पर विचार-विमर्श का दायरा अब रसोई घर तक पहुंच गया है जबकि एक समय यह चौपालों तक सीमित था। महिलाओं की पंचायतों में भागीदारी भले ही संकोच एवं विरोधाभासों के साथ प्रारंभ हुई, लेकिन इस भागीदारी ने लोकतंत्र के कुछ उज्जवल पक्षों को भी उभारा। उदाहरणस्वरूप सार्वजनिक मामलों में पुरूषों की जोड़-तोड़ को महिलायें समझ नहीं पाती है और इसे गोपनीय नहीं रख पाती है। इसके फलस्वरूप कार्यप्रणाली में स्वत: ही स्पष्टवादिता एवं पारदर्शिता आ रही है। इसका एक सुखदायी प्रतिफल और भी मिल रहा है कि भ्रष्टाचार के मौके भी कम हो रहे है।
लोकेन्द्र सिंह कोट
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