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  लोकतंत्र का विकेन्द्रीकरण और महिला सशक्तिकरण
एक क्रांतिकारी प्रयास
 
     
 

आज मध्यप्रदेश अपने अस्तित्व का 50वाँ राज्योत्सव मना रहा है। मध्यप्रदेश का अतीत जितना गौरवशाली था उतना ही वर्तमान और भविष्य। अपने गौरवशाली इतिहास, संस्कृति और लोक कलाओं से मध्यप्रदेश का इतिहास विभिन्न सभ्यताओं की कहानी है। वर्तमान 50 वर्षों में मध्यप्रदेश ने संस्कृति और लोक कलाओं को देश और विश्वव्यापी बनाया। उन्हें परिष्कृत किया तो उन्हें उनके सीमित क्षेत्रों से निकाल कर जन-जन तक पहुँचाया। देश के किसी राज्य में इतनी विविध न तो धरोहर है, न ही कला और संस्कृति। सबसे बड़ी बात कि इनमें कहीं कोई विरोधाभास नहीं। अपनी अलग-अलग विशिष्टताएँ और समाज की उन्हें जानने-पहचानने की ललक। मध्यप्रदेश का जन समाज आमतौर पर शांतिप्रिय है। जातिवाद जैसी समस्याएँ नहीं है। विभिन्न जाति, समाज के लोग सद्भावपूर्ण वातावरण के आदी है। पर्यटन, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थलों की, नदियों के कछार और उनकी समृध्दि, उर्वर ज़मीन, आधुनिक विकास की संभावनाएँ, वन और नैसर्गिक सम्पदा वाला शायद ही कोई दूसरा प्रदेश देश में है। मध्यप्रदेश के वर्तमान की चिंता जल, बिजली और सड़कों की है। मालवा का पठार क्रमश: सूख रहा हैं, पर उतना ही विकसित भी हो रहा है। आने वाले 50 वर्षों में मालवा का पठार कठिनाई झेल सकता है। मध्यप्रदेश सड़कों के विकास, पर्याप्त जल प्रदाय और विद्युत प्रदाय की व्यवस्था कर ले तो भविष्य में भी देश का सर्वश्रेष्ठ प्रदेश बन सकता है। वैसे भी 21वीं सदी इतिहास के नहीं भविष्य की आश्वस्तता पर जीना चाह रही है।

राजा भोज की भोजपुर नगरी, महाकाल का सिंहस्थ, विक्रमादित्य और कालिदास की उज्जयिनी, बौध्दों का साँची स्तूप, रानी रूपमती और बाज बहादुर का मांडू का हवा महल, भोपाल का ताल, भीम बैठका की गुफाएँ और भित्ति चित्र, नर्मदा का पवित्र कछार और ओंकारेश्वर, उद्गम स्थल अमरकंटक, जबलपुर का भेड़ाघाट, चौंसठ योगिनी का मंदिर, भेड़ाघाट का बंदर कूदनी, खजुराहो के मंदिर, बाँधवगढ़ के शेर, कान्हा का अभयारण्य, बघेलखंड, बुंदेलखंड की आल्हा, राई नृत्य, भगोरों का मेला, ग्वालियर का किला, तानसेन की मज़ार, अलाउद्दीन खान का मैयर और शारदा देवी, भारत रत्न लता मंगेशकर की जन्म भूमि, इंदौर, दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित कवि प्रदीप का बड़नगर, भोपाल की जामा मस्जिद जैसी धरोहरों की एक लंबी सूची है।

इन सबके साथ ही साथ महात्मा गाँधी ने स्वतंत्र भारत में एक मज़बूत पंचायत राज शासन पध्दति का स्वप्न संजोया था जिसमें शासन कार्य की प्रथम इकाई पंचायतें होंगी। उनकी कल्पना पंचायतों की शासन व्यवस्था की धुरी होने के साथ ही आत्मनिर्भर, पूर्णतया स्वायत्त और स्वावलम्बी होने की थी। स्वतंत्रता के पश्चात् महात्मा गाँधी की इस परिकल्पना को साकार करने के लिए समय-समय पर प्रयास किए गए। कभी ग्रामीण विकास के नाम पर और कभी सामूदायिक विकास योजनाओं के माध्यम से पंचायतों को लोकतंत्र का आधार मज़बूत बनाने के लिए उपयोग किया जाता रहा। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग तरह के प्रयोग इसके लिए चले। कुछ असफल रहे तो कुछ सफल रहे और अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय बने। लेकिन पूरे देश में लोकतंत्र का विकेन्द्रीयकरण करके बुनियादी स्तर पर पंचायत राज की स्थापना और जनता के हाथ सीधे अधिकार देने की शुरूआत संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम के माध्यम से सम्भव हुई।

73वें संविधान संशोधन अधिनियम से जहाँ एक ओर इन संस्थाओं को वैधानिक बनाया गया वहीं दूसरी ओर ऐसे समुचित उपबंध किए गए जिससे कि पंचायतें स्वशासन की स्वतंत्र इकाईयाँ बनकर सरकार के तीसरे स्तर के रूप में कार्य कर सकें। मध्यप्रदेश देश का प्रथम राज्य हैं जिसने 73वें संविधान संशोधन के अनुरूप सर्वप्रथम पंचायत राज विधान बनाया तथा पंचायत राज संस्थाओं हेतु निर्वाचन सम्पन्न कराए। मध्य प्रदेश सरकार ने 1993 से लगातार अब तक विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की दृष्टि से अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए है। मध्य प्रदेश में पचायत राज संस्थाओं के गठन के पश्चात् पंचायतों के कार्यकरण में आने वाली बाधाओं को दृष्टिगत् रखते हुए विधान में अनेक संशोधन किए गए जिससे पंचायतें यथार्थ में स्वशासन की स्वतंत्र इकाईयाँ बन सकें।

आज़ादी के बाद बने भारतीय संविधान और उसमें होते संशोधनों में इस तथ्य को बराबर महसूस किया जाता रहा कि महिलाओं की भागीदारी सार्वजनिक क्षेत्रों में बढ़ाना आवश्यक है। सन् 1959 में बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशों के आधार पर त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई। तब भी यह माना गया कि देश का समग्र विकास महिलाओं को अनदेखा करके नहीं किया जा सकता। इसलिये पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ करने तथा पंचायतों में महिलाओं को एक तिहाई भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से 1992 में 73वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम पारित किया गया। संविधान का यह प्रावधान महिलाओं की छिपी शक्ति को उजागर करने का सार्थक कदम था। इसके बाद प्रदेश के ज़िलों में पंचायत चुनावों की घोषणा की गई। इस चुनावों में हज़ारों महिलाओं ने भाग लिया। इस संशोधन अधिनियम के द्वारा ग्राम सभा का गठन होना अनिवार्य हो गया और ग्राम पंचायतों और सदस्यों की कुल संख्या की कम से कम एक तिहाई संख्या महिलाओं की कर दी गई। इस व्यवस्था का प्रभाव यह हुआ कि प्रदेश भर में सैंकड़ों महिलाएं पंचायतों के नेतृत्व हेतु मैदान में आ गई। इस संशोधन के माध्यम से जहां एक ओर पंचायती राज व्यवस्था को प्रदेश में लोकतांत्रिक प्रशासन के तृतीय सोपान के रूप में संवैधानिक स्वीकृति प्राप्त हुई वहीं दूसरी ओर महिलाओं के अस्तित्व और अधिकार को भी स्वीकार किया गया।

विश्व के किसी अन्य देश में पंचायत चुनावों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण नहीं किया गया है। जब पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों के आरक्षण के विषय पर विचार-विमर्श किया जा रहा था, उस समय जहां एक ओर लोगों के मन में एक आशा जग रही थी, वहीं कुछ अन्य लोगों के मन में अनेक शंकाएं भी थी कि क्या पंचायत चुनाव लड़ने के लिए पर्याप्त महिलाऐं मिल सकेंगी? भारत की अधिकांश महिलाऐं तो अनपढ़ है, उनमें तो अधिकांश घर की चारदीवारी से कभी बाहर नहीं निकलती है। यदि ऐसी महिलाएं चुनाव में जीत भी गई तो क्या वे पंचायत का कार्यभार सुचारू रूप से चला पाएंगी? इस प्रकार के अनेक प्रश्न लोगों के मन में उठ रहे थे, किंतु चुनाव के बाद जब बहुत बड़ी संख्या में महिलाएं चयनित होकर पंचायतों के नेतृत्व हेतु आ गई तो ये शंकाएं स्वत: समाप्त हो गई। वर्तमान संदर्भों में देखा जाय तो बिहार के बाद मध्यप्रदेश में आने वाले पंचायती चुनावों में यह प्रतिशत बढ़ाकर 50 कर दिया है और यह सब इसलिए भी हुआ है कि महिलाओं की शक्ति को अब पहचान मिल चुकी है और उन्हौने कहीं अधिक संवेदनशीलता के साथ अपने पदों पर रहकर न्याय किया है।

आज भले ही पंचायतों में महिलाओं की स्थिति को लेकर प्रश्न उठाया जा रहा है, परंतु यह धारणा बिल्कुल गलत है कि महिलाएं कोई ज़िम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं है या उनमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं है। वास्तविकता यह है कि अब तक महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया था और सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र में बढ़ते मार्ग में अड़चने पैदा करने का ही प्रयास किया गया। ऐसे प्रत्यक्ष प्रमाण है कि जब भी महिलाओं को आगे आने का अवसर मिला है, उन्होंने इसका पूरा-पूरा उपयोग किया है।

माधुरी राठौर रूनीजा जिला उज्जैन की गाँव प्रधान है पाँचवे दर्जे तक पढ़ी है। वे रूनीजा रियासत के वंशजों के घर में ब्याह कर आई हैं और बातचीत करने पर उनमें रियासती अंदाज का आभास नहीं होता है। वे कहती हैं, ''अब जमाना बदल गया है और सभी लोगों को हक बराबर का है। मैं गांव के सभी लोगों के पास जाकर उनकी समस्याएँ सुनती हूँ और उन्हे हल करने के भरसक प्रयास करती हूं.... हाँ पर्दा प्रथा से एकदम मुक्ति तो संभव नहीं हैं लेकिन उसमें भी बदलाव आ रहे हैं.... मेरी सास ने ही मुझे इस पद हेतु प्रोत्साहित किया था और आज में यहाँ हूँ....।'' इसी तरह आदिवासी प्रमीला बाई रामपुर नैकिन, जिला सीधी में एक जनपद सदस्य है और सीधे-सीधे सरपंचों से बात कर विकास की बात पर जोर देती हैं। चकड़ौद पंचायत उन्ही की जनपद में आती है और जब वहाँ के पुरूष सरपंच ने उनकी बात सुनने से मना किया तो वे जनपद तक लड़ने को तैयार हो गई। इसी पंचायत में चंद्रवती सिंह भी एक स्वसहायता समूह की अध्यक्ष हैं और सबसे बड़ी विडम्बना तो यह कि उसे स्वयं इस बात का पता पूरे दो सालों बाद चलता है। वास्तव में जहाँ चंद्रवती सिंह पिछले दस-बारह सालों से गुप्ता परिवार के यहाँ बंधा हुआ कार्य कर रही है, उसी परिवार के लोग आरक्षित आदिवासी होने के नाते उसे अध्यक्ष बनाकर हस्ताक्षर करवाते रहे। चंद्रवती को एक स्थानीय गैर सरकारी संगठन से सहयोग मिला तथा सारी जानकारी होने के बाद उसने विरोध प्रारंभ किया और बातचीत करने तक वे लड़ ही रही थी।

एक अध्ययन से पता चला है कि प्रदेश में महिलाओं के पंचायतों में आरक्षण से एक स्पष्ट क्रांति सामने आने लगी है। पंच के रूप में निर्वाचित ज्यादातर महिलायें अनपढ़ थी, दो वर्ष बाद वें अपनी बेटियों को शिक्षा देने की मांग करने लगी है। चौफाल पंचायत जिला सीधी की सरपंच सुनीता यादव के स्वयं के चार बच्चे हैं और वे सभी को पढ़ा रही हैं। उन्हे लगता है कि पढ़ाई में ही परिवार और समाज के विकास के दर्षन हो सकते हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री उनकी पंचायत से होकर जा चुके हैं और उनसे मिलकर वे अभीभूत हैं। पाँच-छ: किलोमीटर की दूरी में फेली उनकी पंचायत की भी कई समस्याएँ हैं और वे बेझिझक कहती हैं कि स्कूलों में जो बच्चे मध्यान भोजन करते हैं उनका पेट नहीं भर पाता है। यह बात वहाँ के बच्चे भी स्वीकार करते हैं। कारण पूछने पर वे इतना भर कहती हैं कि इधर बच्चे परिवार का मेहनती कार्य करते हैं इसलिए उनकी खुराक ज्यादा है।

प्रदेश में पंचायती राज के पूरे बारह-तेरह वर्षों के दौरान महिलाओं ने अपनी शक्ति को पहचाना है और उनने किसी हद तक राजनैतिक चेतना का भी प्रसार हुआ है। एक स्पष्ट तथ्य उभरकर सामने आता है कि ग्रामीण महिलाओं कें जनप्रतिनिधियों के रूप में मैदान में आने से सार्वजनिक विषयों तथा निर्णयों पर विचार-विमर्श का दायरा अब रसोई घर तक पहुंच गया है जबकि एक समय यह चौपालों तक सीमित था।

महिलाओं की पंचायतों में भागीदारी भले ही संकोच एवं विरोधाभासों के साथ प्रारंभ हुई, लेकिन इस भागीदारी ने लोकतंत्र के कुछ उज्जवल पक्षों को भी उभारा। उदाहरणस्वरूप सार्वजनिक मामलों में पुरूषों की जोड़-तोड़ को महिलायें समझ नहीं पाती है और इसे गोपनीय नहीं रख पाती है। इसके फलस्वरूप कार्यप्रणाली में स्वत: ही स्पष्टवादिता एवं पारदर्शिता आ रही है। इसका एक सुखदायी प्रतिफल और भी मिल रहा है कि भ्रष्टाचार के मौके भी कम हो रहे है।

इसमें संदेह नहीं कि प्रदेश में समाज करवट ले रहा है, स्त्रियों में जागृति आ रही है, शिक्षा के प्रति उनका रूझान बढ़ रहा है, पर्दा-प्रथा विदाई के रास्ते पर है और महिलाओं की आवाज सशक्त हो रही है, मगर यात्रा काफी लंबी है। यह तो महिला सशक्तीकरण का पहला अध्याय मात्र ही है। सतही स्तर पर पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देकर जहां उनकी भागीदारी को एक हद तक बढ़ावा मिला है। महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बाद जो, महिलाएं संसद और विधानसभाओं में चुनकर आयेंगी उनका पंचायत स्तर की महिलाओं तक ''नेटवर्क'' होगा, जिसके कारण पंचायत में महिलाओं को और अधिक सशक्त होने का अवसर मिलेगा।

लोकेन्द्रसिंह कोट

विकास संवाद फेलोशिप-2007 प्राप्तकर्ता स्वतंत्र पत्रकार, भोपाल
संपर्क: 6, एम. आई. जी., शॉपींग सेंटर, टीला जमालपुरा, भोपाल- 462001

 
     
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