कौशल्या बाई ने तय किया है कि वे किसी भी सूरत में ग्रामसत्ता को भ्रष्टाचार का केन्द्र नहीं बनने देंगी। इसके चलते उन्हें प्रशासनिक स्तर पर नियोजित साजिशों का सामना करना पड़ रहा है। नौबत ये है कि गत एक साल से उनकी पंचायत मे अतिरिक्त विकास कार्यों के लिये संसाधनों का टोटा है, जबकि इसी पंचायत को विकास कार्यों के लिये दस लाख रूपये तक के बजट आवंटित हो चुके हैं। आज यहां गरीबी चरम पर है और काम के अभाव में लोग दिक्कतों से जूझ रहे हैं। दुविधा में पड़ी कौशल्या बाई कहती हैं कि भ्रष्टाचार से लड़ने के कारण मेरी पंचायत के लोग भुखमरी की कगार पर हैं। अब समस्या यह है कि मैं कौन सा विकल्प चुनूं?
गौरतलब है कि कौशल्या बाई 1994 में जब मध्यप्रदेश में शहडोल जिले के भाटाडांड पंचायत की सरपंच बनीं, उन्हें कतई अहसास नहीं था कि ग्रामसत्ता में इतनी सुनियोजित भ्रष्टाचार आधारित व्यवस्था का सामना करना पडेग़ा। तब से अब तक वे पंचायत सचिव से जिले के आला अधिकारियों तक कमीशनखोरी से लेकर पंचायती राज कानून की विसंगतियों तक पर जूझ रही हैं। लंबी, थकाऊ लड़ाई के बावजूद वे दुबारा मैदान में उतरीं और गांव ने उन्हें विश्वास के साथ पंचायत की जिम्मेदारी सौंप दी। इस बार उन्होंने चार प्रतिद्वंदियों को हराकर सत्ता संभाली है।
इस आदिवासी महिला सरपंच के कटु अनुभवों की लम्बी फेहरिस्त है। उन्होंने पंचायत सचिवों के कारण खुद को सबसे ज्यादा संकट में पाया है। अब तक उनकी पंचायत के तीन सचिवों में से दो भ्रष्टाचार कर उन्हें जिम्मेदार ठहराने की कोशिश कर चुके हैं। हाल के सूखे में भाटाडांड पंचायत को काम के बदले अनाज योजना में संसाधन मिले। लेकिन पंचायत सचिव ने मजदूरों को मिलने वाले 76 क्विंटल चावल हड़पने की पूरी तैयारी कर ली थी। पहले भी सचिव खाद्य निगम प्रबंधक के सेवाशुल्क, ट्रैक्टर के भाड़े आदि के नाम पर सरपंच से पैसे हड़पता रहता था। इस बार कौशल्या बाई ने खुद चावल लाने की जिम्मेदारी ली। लेकिन सचिव बिना उसे बताए चावल ले आया और उसे पंचायत की बजाय कहीं और रखवा दिया। साथ ही बिना सरपंच को बताए तालाब का काम भी शुरू करवा दिया। मजदूरी बांटने के समय मजबूरन उसे सरपंच के पास आना पड़ा। तब कौशल्या बाई ने चावल और तालाब संबंधी जानकारी के अभाव में मजदूरों से कहा कि पहले पूरा अनाज पंचायत में पहुंचना चाहिये। सचिव पर दबाव बना और उसे अनाज पंचायत में पहुंचाना पड़ा। तब तक 16 क्विंटल चावल भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुका था। सरपंच ने भी लिखित में 60 क्विंटल अनाज स्वीकार किया।
कौशल्या बाई बताती हैं कि पुराने भ्रष्टाचारी सचिव को जांच कर हटवाने के बाद ग्रामसभा के जरिये सचिव चुनने का प्रावधान रखा गया। नए सचिव इसी माध्यम से आए, जिनसे उन्हें बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन उसने महिला सरपंच को और संकट में डाल दिया। सचिव ने दो कैश बुक बना रखी थी, जिनका उपयोग वह अपने हिसाब से करता था। एक कैश बुक में कौशल्या बाई पर 95 हजार रुपये की देनदारी दिखाई गई थी जबकि दूसरी में 1350 रूपये की। वह कहती हैं कि सचिव ने तो मेरा घर-बार बिकवाने की व्यवस्था कर दी थी। तब मैंने कलेक्टर और मुख्य कार्यपालन अधिकारी से शिकायत की।
जिले की प्रशासनिक व्यवस्था पर उनके अनुभव हैरत भरे हैं। उन्हें जनपद पंचायत और महिला-बाल विकास विभाग के ब्लाक अधिकारियों के भ्रष्टाचार से दो-चार होना पड़ा। कौशल्या बाई कहती हैं, 'पंचायत विकास के लिये राशि मंजूर कराने और किश्तें जारी करवाने के लिये दस फीसदी कमीशन मांगा जाता था। मैंने तय किया कि कमीशन नहीं दूंगी, इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। पंचायत भवन निर्माण के लिये 1.10 लाख रूपए मिले, भवन बन भी गया, पर निरीक्षण के लिए आए अधिकारी और इंजीनियर ने नौ नुक्स निकाल कर कहा, अगर जेल जाने से बचना हो तो कल 15 हजार रुपये दे देना। यह मेरे लिये सम्मान का ही नहीं, परिवार के अस्तित्व का भी सवाल बन गया। मैंने अधिकारियों से कहा कि आप भले इसे तोड़कर जांच करा लें, लेकिन मैं कमीशन नहीं दे सकती हूं क्योंकि पूरी राशि खर्च हो चुकी है। उसी दिन मैंने गांव वालों और पंचों के साथ बात की, गांव वालों ने मुझे डटे रहने की सलाह दी। इसके बाद प्रशासन ने मुझे परेशान करना शुरू कर दिया। बार-बार रिकार्ड लेकर जनपद बुलाया गया। भ्रष्टाचार के प्रति उनकी प्रतिबध्दता से तंग आकर मैं कलेक्टर से मिली। वहां ठोस कार्यवाही की संभावना न दिखने पर तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से मिलने भोपाल जा पहुंची। पूरा वाकया सुनने के बाद उन्होंने मुझे मदद देने का वायदा किया।
उनका वादा साथ लिए कौशल्या बाई तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा और प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंहराव के निजी सचिवों को भी अपने दस्तावेज सौंप आईं। वे कहती हैं, नीति और कानून बनाने वाले लोगों को भी पता चलना चाहिए कि जमीनी स्तर पर विकेन्द्रीकृत व्यवस्था में काम करने वालों को अभी वास्तव में अधिकार नहीं मिले हैं। अधिकार अब भी लाल फीते की गठानों में बंद हैं। पंचायती राज व्यवस्था प्रषासन-अफसरों की मर्जी से चलते हैं। जब कौशल्या बाई भोपाल और दिल्ली यात्रा से लौटीं तब तक रिश्वत मांगने वाले अफसर का तबादला हो चुका था। इससे उनका हौसला तो बढ़ा, पर वे कहती हैं कि 'बार-बार मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री से मिलना तो संभव नहीं हैं। मेरा सवाल है कि क्या हमें वास्तव में केवल अपनी पंचायत की सत्ता नहीं मिल सकती, गांव के काम के लिये मुख्यमंत्री की दखल क्यों हो?
गौरतलब है कि नेतृत्व संघर्ष की इस प्रक्रिया में उन्होंने स्थानीय मुद्दों को भरपूर तवज्जो दी है। भाटाडांड में पानी का संकट है। कोयला भंडार के कारण भू-जल का सीधा उपयोग आसान नहीं है। अक्सर गांव के पांच में से चार हैंडपंप वक्त-बेक्त दम तोड़ जाते हैं। साल में छह माह उन्हें चार-छह किलोमीटर की पैदल जलयात्रा करना पड़ती है। इस संकट से निपटने के लिये उनकी कोशिशें जारी हैं। पानी सहेजने के लिये उन्होंने 14 पौड़ियां बनवाई हैं, राहत काम में तालाब का निर्माण हुआ है। पंचायत निधि का पैसा चुक जाने पर सांसद निधि से 40 हजार रूपये मंजूर करा कुयें बनाए। हर दिन किसी न किसी बाधा से जूझने वाली यह सरपंच कहती है कि यूं तो आप सारे काम हाथ की उंगलियों पर गिन लेंगें, पर उन्हें करवाने के लिये जितने चक्कर हमने जनपद पंचायत (कोतमा) और जिला मुख्यालय शहडोल (अब अनूपपुर) के लगाये हैं उनकी गिनती असंभव है। बच्चों की शिक्षा के लिये दो प्राथमिक स्कूल उन्हीं के कार्यकाल में खुले। हालांकि 30 अगस्त 1994 को पंचायत संभालने के समय वे लगभग निरक्षर थीं। लेकिन काम के दौरान उन्हें लगा कि निगरानी, पारदर्शिता और आत्मनिर्भरता के साथ काम करने के लिए शिक्षित होना जरूरी है। तब उन्होंने अपने बेटे के साथ स्कूल जाना शुरू किया। पहले पांचवी और फिर ओपन स्कूल से दसवीं की परीक्षा पास की। अब पंचायत के हिसाब-किताब, बैठक के प्रस्ताव और सरकारी आदेशों की भाषा समझने में उन्हें आसानी होती है।
वे ईमानदारी से मानती हैं कि मध्यप्रदेश में ग्राम स्वराज की तरह ग्रामसभा भी पूरी तरह सफल नहीं है। गांव की समस्याओं पर चर्चा कर उनका हल ढूंढने के लिये अब भी गांव वाले एक साथ नहीं बैठते। वे पूछते हैं कि हम गरीबों को ग्रामसभाओं से क्या मिलता है। जिन अधिकारों के दिये जाने का दावा किया जाता है उनका दूर तक पता नहीं है। तमाम योजनाओं का लाभ शक्तिशाली हथिया लेते हैं। ऐसे में ग्रामसभा से हमारी एक दिन की मजदूरी का नुकसान भर होता है। इसके अलावा भेदभावपूर्ण पंचायती राज और ग्राम स्वराज अधिनियम के चलते भी कई दिक्कतें हो रही हैं। उन्होंने 30 प्रस्ताव जनपद पंचायत को भेजे, जिनके बारे में कोई सूचना पंचायत को नहीं मिली। वे प्रशासन पर गैर-जवाबदेह होने का आरोप लगाते हुए कहती हैं कि वह चाहे तो ग्रामसभा के प्रस्ताव का जवाब दे, चाहे न दे। सरकार ने पंचायतों और जन प्रतिनिधियों को भ्रष्ट और गैर जिम्मेदार तथा अधिकारियों को ईमानदार-जवाबदेह मानकर पंचायती राज कानून बनाया है। उनकी अपनी पंचायत में कुछ परिवार भुखमरी की स्थिति में हैं, ऐसे 13 परिवारों को सामाजिक सुरक्षा पेंशन दिलाने के लिये डेढ़ साल पहले एक प्रस्ताव जनपद को भेजा गया था। उन गरीबों ने मरना शुरू कर दिया है लेकिन प्रस्ताव पर कोई कार्यवाही नहीं हुई।
आज कौशल्या बाई में नेतृत्व की महत्वाकांक्षी भावना पैदा हो चुकी है। 1998 में निर्दलीय के रूप में विधानसभा का चुनाव लड़ने और हारने के बावजूद वे अपना दायरा बढ़ाने में सफल रही हैं। संघर्ष को अपनी नियति मान चुकी इस सरपंच के मुताबिक केवल 150 रुपये की पेंशन या 25 किलो गेहूं से गांव में भूख की समस्या हल नहीं होगी। इसीलिए उन्होंने लोगों को स्वावलंबी बनाना षुरू कर दिया है। भाटाडांड में सबसे गरीब 15 महिलाओं का स्वयं सहायता समूह बनाया गया, जिसकी अध्यक्ष कौशल्या बाई हैं। शुरुआती दिक्कतों के बाद महिलायें समूह के लिए तैयार हुई। शुरू में इसे महिला एवं बाल विकास की ओर से 10 और 15 हजार रूपये का दलिया बांटने का काम मिला। इससे उनमें ऊर्जा आई। समूह ने गेहूं खरीदकर दलिया बनवाया और गांव में लाकर पैक किया। लेकिन विभाग ने बार-बार इसमें नुक्स निकाले। उनसे दलिया बनाने की मशीन (ग्राइन्डर) खरीदने और अपना भवन बनाने को कहा गया, यह असमंजस की स्थिति थी क्योंकि इसके लिये बड़ी धनराशि जरूरी थी, जो समूह के पास नहीं थी।
लेकिन कौशल्या बाई की पहल पर समूह के सदस्यों ने दो-दो सौ रूपये जमा करने शुरू किए। बैंक में खाता खुलवाया। वहां भी उन्हें कटु अनुभव हुए। ग्रामीण बैंक के कई चक्कर लगाने के बाद उन्हें मशीन लगाने के लिये 80 हजार रूपये का कर्ज मिला। लेकिन दो माह तक दलिया का काम नहीं मिला। उधर ब्याज तेजी से बढ़ने लगा। मामला यह था कि प्रशासन और विभाग के अधिकारी दलिये में से अपना हिस्सा चाहते थे जबकि कौशल्या बाई का समूह किसी तरह का भ्रष्टाचार पालना नहीं चाहता था। समस्यायें थीं कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं।
बहरहाल मशीन लगाने के बाद उन्होंने जनपद पंचायत और बाल विकास परियोजना कार्यालय पर दबाव बनाया। नतीजतन समूह को हर माह 38 क्विंटल दलिया आपूर्ति का आदेश मिला। कौशल्या बाई बताती हैं कि 41800 रूपये की राशि में से दस फीसदी कमीशन के लिये उन्हें परेशान किया गया। इसके लिए निराले तरीके अपनाये गये हैं। वे कहती हैं कि हमें हर माह 38 क्विंटल दलिया तैयार करके देना होता है, पर इसके लिये पर्याप्त समय नहीं मिलता। आमतौर पर आखिरी तारीख से दो दिन पहले आदेश मिलता है। अनुमान लगाया जा सकता है कि दो दिन में 38 और कभी-कभी 76 क्विंटल दलिया किस तरह बनाया जा सकता है। यूं भी इस उठापटक के बाद एक सदस्य को माह में केवल पांच सौ रुपये का लाभ मिलता है। लेकिन समूह का सिध्दांत के अनुसार लाभ भले ही कम मिले, संतोश की बात यह है कि क्षेत्र के बच्चों को हम अच्छा दलिया खिला पा रहे हैं।
कौशल्या बाई की कहानी में एक और सवाल छिपा हुआ है। क्या उन्हें परिवर्तन के लिये केवल इसलिये संघर्ष करना पड़ रहा है क्योंकि वह एक सरपंच हैं या फिर एक महिला सरपंच होने के कारण उनकी राह में बाधायें खड़ी की गई हैं। जाहिर है कि महिला नेतृत्व का प्रश्न इतनी आसानी और सद्भावना के साथ स्वीकार नहीं होगा। सत्ता पर संपन्न के नियंत्रण की मानसिकता आज की नहीं है। हमेशा से ही इसके पक्ष में तर्क दिये जाते रहे हैं और जहां तर्क से काम नहीं चला वहां दमन-उत्पीड़न को हथियार बनाकर राजनैतिक सत्ताा में महिलाओं को दरकिनार कर दिया गया। कौशल्या बाई बेहद सहनशीलता के साथ तमाम विपरीत हालात का सामना कर रही हैं उनके परिवार और गांव के लोगों के विश्वास ने उनकी क्षमता को बढ़ाया है। इस बात की पूरी संभावना है कि सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में कौशल्या बाई की भूमिका से एक नया गांव पैदा हो सकता है।
सचिन कुमार जैन
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