भारत के संदर्भ में ग्रामीण विकास को एक प्रक्रिया या व्यूहरचना तक ही सीमित कर देना भारतीय जन-जीवन के ताना-बाना को सतही धरातल तक ही सीमित रखना माना जा सकता है। ग्रामीण विकास तो आदिकाल से हमारे जीवन का अंग रहा है। हमारे मनीषियों ने इसे एक दर्शन और साधना के रूप में स्वीकार किया। यदि रामराज्य से लेकर चाणक्य तक तथा गुप्त वंश से लेकर मध्य युग तक की ऐतिहासिक रचनाओं रूपी निधि पर हम निगाह डालते है तो ऐसा प्रतीत होता है कि पूरी की पूरी प्रशासकीय व्यवस्था ग्रामीण स्तर से उपर की तरफ जाती थी। चाहे वह कौटिल्य के जमाने का प्रजातंत्र हो या बाद के काल का राजतंत्र सबमें ग्रामीण जीवन की सुख सुविधाओं और सर्वांगीण विकास पर ही बल दिया गया है।
जिस देश में लगभग तीन चौथाई आबादी गांव में बसी हो और कृषि ही अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार हो, उस देश में ग्रामीण विकास के बिना राष्ट्र के विकास की कल्पना ही भला कैसे संभव है? यही कारण है कि योजनाबध्द विकास की प्रक्रिया के प्रथम सोपान यानी पहली पंचवर्षीय योजना से ही ग्रामीण विकास सरकार की मुख्य प्राथमिकताओं में शामिल रहा है। देश की बहुत बड़ी जनसंख्या, विस्तृत क्षेत्रफल तथा सीमित संसाधनों के कारण अपेक्षित परिणाम चाहे नहीं मिल पाए है, परन्तु यह भी सत्य है कि सरकार के अब तक के प्रयासों से ऐसा बुनियादी ढाँचा खड़ा हो चुका है जिसके बल पर ग्रामीण विकास का सपना साकार होने की आशा की जा सकती है।
भारत जैसे विशाल देश में भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक स्थितियों में विभिन्नता के कारण ग्रामीण विकास के लक्ष्य को षीघ्र प्राप्त करना आसान नहीं है। इस परिप्रेक्ष्य में वस्तुत: ग्रामीण विकास को एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखा जाना आवश्यक है। बढ़ती जनसंख्या, गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, बेरोजगारी, भूमि तथा अन्य सभी संसाधनों का असामान्य बंटवारा, सामाजिक अन्याय जैसी अनेक समस्याएं ग्रामीण भारत के विकास में बाधक हैं। महात्मा गांधी ने सच कहा था कि- भारत का आधार और आत्मा गांव हैं। यदि भारत का विकास करना है तो गांवों तथा ग्रामवासियों का विकास करना होगा।
आजादी के बाद बने भारतीय संविधान और उसमें होते रहे संशोधनों में इस तथ्य को बराबर महसूस किया जाता रहा कि महिलाओं की भागीदारी सार्वजनिक क्षेत्रों में बढ़ाना आवश्यक है। सन् 1959 में बलवन्त राय मेहता समिति की सिफारिशों के आधार पर त्रि-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई। तब भी यह माना गया कि देश का समग्र विकास महिलाओं को अनदेखा करके नहीं किया जा सकता। इसलिए पंचायती राज व्यवस्था को सुदृढ़ करने तथा पंचायतों में महिलाओं की एक तिहाई भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्येश्य से 1992 में 73 वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम पारित किया गया। इस संशोधन अधिनियम के द्वारा ग्राम सभा का गठन होना अनिवार्य हो गया और ग्राम पंचायतों, और सदस्यों की कुल संख्या की कम से कम एक तिहाई संख्या महिलाओं की कर दी गई। इस व्यवस्था का प्रभाव हुआ कि देश भर में लाखों महिलाएं पंचायतों के नेतृत्व हेतु मैदान में आ गईं। इस संशोधन के माध्यम से जहाँ एक और पंचायती राज व्यवस्था को देश के लोतांत्रिक प्रशासन के तृतीय सोपान के रूप में संवैधानिक स्वीकृति प्राप्त हुई वहीं दूसरी ओर महिलाओं के अस्तित्व और अधिकार को भी स्वीकार किया गया।
संविधान का यह प्रावधान महिलाओं की छिपी शक्ति को उजागर करने का सार्थक कदम था। इसके बाद देश के विभिन्न राज्यों में पंचायत चुनावों की घोषणा की गई। इस चुनाव में लगभग तीस लाख महिलाओं ने भाग लिया। विश्व के किसी अन्य देश में पंचायत चुनावों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण नहीं किया गया है। वर्तमान संदर्भों में देखा जाय तो बिहार के बाद मध्यप्रदेश में आने वाले पंचायती चुनावों में यह प्रतिशत बढ़ाकर 50 कर दिया है और यह सब इसलिए भी हुआ है कि महिलाओं की शक्ति को अब पहचान मिल चुकी है और उन्हौने कहीं अधिक संवेदनशीलता के साथ अपने पदों पर रहकर न्याय किया है।
ग्रामीण राजनैतिक क्षेत्र में कुछ वर्षो पूर्व तक महिलाओं की भूमिका नगण्य रही है तथा पंचायतों में उनका प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर रहा है। आज ग्राम पंचायत से जिला स्तर की संस्थाओं में महिलाएं निर्वाचित होकर ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। यद्यपि महिलाओं के लिए यह नया क्षेत्र है तथा सामन्ती मनोवृत्ति से जकडे पुरूष प्रधान समाज में उन्हे पुरूषों के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है परन्तु उसका मुकाबला करते हुए महिलाओं ने अशिक्षित होने के बाद भी अपने आप को ज्यादा संवेदनशील और बेहतर प्रशासक, कम समय में ही सिध्द कर दिया है। अब विवश होकर राजनैतिक दलों को भी अधिक से अधिक महिलाओं को सम्मानजनक पद देने पड रहे है।
ग्रामीण विकास के आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक तीन पहलू हैं जो परस्पर एक दूसरे से सम्बध्द हैं। इनमें से आर्थिक विकास में महिलाओं का सर्वाधिक योगदान है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं द्वारा पुरूषों की तुलना में दो गुना अधिक श्रम किया जाता है, जहाँ एक पुरूष प्रतिदिन दस घंटे कार्य करता है वहीं एक महिला प्रतिदिन सोलह घंटे कार्य करती हैं लेकिन चूंकि प्रत्यक्ष आय में उसका योगदान कम होता है। अत: उसके योगदान को वह महत्व प्राप्त नहीं होता जिसकी वह अधिकारिणी है।
जहाँ तक ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक दृष्टि से ग्रामीण महिलाओं की स्थिति का प्रश्न है वह स्थिति दयनीय है फिर भी जनतांत्रिक माहौल व महिलाओं की भागीदारी के चलते स्थितियों में बदलाव आना प्रारंभ हो गया है। कुछ समय में देश के कुछ हिस्सों में ग्रामीण महिलाओं ने अभूतपूर्व जाग्रति का परिचय दिया है। मणिपुर, आंध्र प्रदेश तथा हरियाणा में शराब बंदी लागू करने के पीछे ग्रामीण महिलाओं के आंदोलन की ही एकमात्र भूमिका रही है। मणिपुर में तो ग्रामीण महिलाओं ने न केवल शराब बंदी के लिए आंदोलन चलाया बल्कि शराब पीने वाले पुरूषों का सामाजिक बहिश्कार किया तथा शराब पिए हुए पुरूषों की पिटाई करने तक का आंदोलन चलाया तथा इसमें अपने परिवार के पुरूषों तक को भी नहीं बख्शा। इसके अलावा अन्य राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश के कुछ भागों में इन चुनी हुई महिलाओं ने सामाजिक बुराईयों तथा अन्याय के प्रति संघर्ष का बिगुल बजाकर उन पर काबू पाने में आशातीत सफलताएं अर्जित कर अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किए है।
मध्यप्रदेश में पंचायतों के तीसरे चरण के चुनाव को ढ़ाई-तीन साल होने को हैं और सतना जिले, रामपुर बघेलन तहसील के इटमा गांव की सरपंच श्रीमती कमला बाई की कहानी पूरे पंचायती राज की सटीक व्याख्या के लिए पर्याप्त है। वे एक ऐसा उदाहरण हैं जिसने पंचायती राज को खंगालने का मौका दिया है। 1994 के पहले चरण के चुनाव में जनपद सदस्य चुनी गई और शुरूवाती तमाम दबावों, झिझक के बावजूद अपना कार्यकाल चारों तरफ से सफलता अर्जित कर पूर्ण किया और लगभग एक करोड़ के विकास कार्य विशेष पहल के साथ करवाए। कमला बिल्कुल भी नहीं पढ़ी हैं और आदिवासी समुदाय से हैं। वे बहुत ही दबंगता से कहती हैं कि उस कार्यकाल ने मुझे राज-काज करना सीखा दिया था कि कौनसी बात कहाँ, कैसे और किसके सामने रखना है। मूल समस्याएँ क्या हैं और तमाम तरह के कार्यों से कैसे जल्द से जल्द निपटना है का ज्ञान इस कार्यकाल में हो चुका था। दूसरे चरण के पंचायत चुनाव में वे फिर लड़ीं और जनपद के चुनाव में हार गई, लेकिन तीसरे चरण में जब गांव के लोगों के कहने पर सरपंच का चुनाव लड़ी तो वे फिर जीत गई। लोकतांत्रिक प्रणाली की अभिष्ट विशेषता की ओर यह उदाहरण इंगित करता है जिसके बलबूते पर लोकतंत्र की बंनियाद रखी गई।
पहले कार्यकाल में जहाँ कमला बाई ने बड़े स्तर पर अनुभव और एक तरीके से प्रशिक्षण ले लिया था और दूसरी पारी खेलने में उन्हे कोई परेशानी नहीं आई। पंचायत की जनसंख्या सवर्ण बहुल है और निश्चित जौर पर सामंती पंचायत की जडें ऌतनी गहरी है कि उनसे पार पाना किसी के लिए भी एकदम आसान नहीं होता है। इटमा में भी यही सामंती ताकतें फिर वही कार्य करने लगी जो कि अक्सर उन्हे तानाशाही करने से हटाने पर होता है। आर्थिक दृष्टि से कमला अपेक्षाकृत मजबूत है और पूर्व की तरह ही कमला को कार्य से मतलब तथा दूसरी तरफ सचिव हरिमोहन की कामचोरी की आदत ने एक शीतयुध्द को जन्म दिया जिसकी परिणति आरोप-प्रत्यारोप में बदल गई। प्रशासन ने भी पूरे मसले को सुना और कमला को योग्य ठहराते हुए सचिव को हटाया गया। पंचायती राज में यह बिरले ही होता है। कमला के तर्कों के आगे सब बेबस थे। इस सारे घटनाक्रम में पूरा एक साल पंचायत का कार्य पूर्णत: अवरूध्द रहा और उसी का अफसोस कमला को बहुत है। वे फिर से अपने कार्य में लग गई है और विकास की धारा फिर से बहने लगी है।
सतही स्तर पर पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देकर जहां उनकी भागीदारी को एक हद तक बढ़ावा मिला है, वहीं राष्ट्रीय स्तर पर अभी बहुत कुछ करना शेष है। महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बाद जो महिलाएं संसद और विधान सभओं में चुनकर आएंगी, उनका पंचायत स्तर की महिलाओं तक 'नेटवर्क' होगा जिसके कारण पंचायत में महिलाओं को और अधिक सशक्त होने का अवसर मिलेगा। महिलाओं के स्वतंत्र रूप से अपने अधिकारों का उपयोग करने तथा सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में अपनी निजी भूमिका निभाने में अनेक बाधाएं है। लेकिन जिस समाज में महिलाओं का घर से बाहर निकलना तक अच्छा न समझा जाता रहा है, उस ग्रामीण - परिवेश में निश्चय ही एक नई चेतना का संचार हुआ है।
निरक्षरता, गरीबी तथा अंधविश्वास के बंधनों को तोड़ना मुश्किल होते हुए भी अब जरूरी हो गया है। कम से कम प्रारंभिक चरण में ही सही, शक्तिशाली लोग अपने फायदे के लिए अनमने ढंग से ही सही, महिलाओं को चुनाव में खड़ा तो कर रहे हैं। आरक्षण की इस व्यवस्था से महिलाओं की विभिन्न समस्याओं के निराकरण हेतु एक मौन-क्रांति के युग का प्रारंभ हो गया है, जिससे आने वाले वर्षो में 50 प्रतिशत आरक्षण के बाद और अधिक सकारात्मक परिणम निश्चय ही सामने आएंगे। आज भले ही पंचायतों में महिलाओं की स्थिति को लेकर प्रश्न उठाया जा रहा है, परंतु यह धारणा बिलकुल गलत है कि महिलाएं कोई जिम्मेदारी उठाने को तैयार नहीं है या उनमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं है। वास्तविकता यह है कि अब तक महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया था और सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में बढ़ने के मार्ग में अड़चने पैदा करने का ही प्रयास किया गया। ऐसे प्रत्यक्ष प्रमाण है कि जब भी महिलाओं को आगे आने का अवसर मिला है, उन्होंने इसका पूरा-पूरा उपयोग किया है। यह हमें विभिन्न राज्यों में हुए पंचायत संस्थाओं के चुनावों से ज्ञात होता है। यूं तो पंचायत के हर स्तर पर एक तिहाई महिलाएं निर्वाचित हुई है, पंरतु कुछ राज्यों में इससे अधिक संख्या में चुनी गई है।
लोकेन्द्रसिंह कोट
|