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  ग्रामीण महिलाओं में बढ़ता आत्महत्याओं का जाल  
     
 

हम किसी भी फुर्सत के पल या कभी कहीं भी चलते-चलते या फिर बाथरुम में गुनगुनाने लगते हैं, 'खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाना है, बस प्यार के दो बोल झिलमिलाना है' परंतु इसे एक विडंबना ही कहेंगे कि तमाम हकीकत को समझते-बुझते भी हम में से कई लोग जीवन के इस साधारण से 'फलसफे' को नहीं समझ पाते हैं और जीवन के रहते ही मौत को गले लगा लेते हैं। 'आत्महत्या' एक ऐसा शब्द है जिसका वर्चस्व हमारे आधुनिक समाज में बहुत बढ़ गया है। यह वास्तव में हमारे उस कथित विकसित समाज के मुँह पर करारा तमाचा है। आधुनिक और सभ्य होने का भ्रम और दंभ पाले हम लोग इसी अंधाधुंध और बेतरतीब विकास के 'साईड इफेक्ट' के रुप में कई तनाव, कुंठा, अवसादों को झेलते हैं तथा इन्ही सब की पराकाष्ठा के रुप में आत्महत्या जैसा जघन्य अपराध हमारे समक्ष खड़ा मिलता हैं।

आत्महत्याओं की यह प्रवृत्ति अब शहरों तक केन्द्रीत नहीं रह गई है। अब हमारे गाँव भी जब से सड़कों के सहारे जुड़ गए है तो शहर की सारी न्यामतें भी गाँव में पहुँचने लगी है। एक संस्था द्वारा किए गए अध्ययन इस भयावहता को और अधिक स्पष्ट करते हैं। मध्यप्रदेश के नौ जिलों में कृषि में होने वाली दुर्घटनाओं के संदर्भ में संस्था द्वारा सर्वेक्षण किया गया और उससे चौकाने वाले ऑंकड़े सामने आए कि लगभग पचास प्रतिशत मामलों में महिलाओं द्वारा सम्फास या अन्य कोई कीटनाशक खाकर आत्महत्याएँ की हैं। इसमें जो उम्र वर्ग शमिल था वह 25-35 उम्र वर्ग का था मतलब युवा ग्रामीण महिलाओं में कहीं न कहीं कुछ समस्या जरूर है जो इतनी गहराई तक समाया हुआ है।

थोपे गये तनाव के तहत कई बार तो समाज में रहते हुए लगता है कि हम किसी भी तरह सहज नहीं रह पा रहे हैं या फिर ऐसा लगता है कि तमाम सुख- सुविधाओं के चलते हमारे पास 'किसी चीज़' की कमी है। दोश हमारा नहीं है, जब हमने ऐसी आधुनिकताओं को गले लगाया है जो सुविधाओं के समानान्तर विश भी उगलती है, तो उसका कोपभाजन भी हम में से ही किसी को बनना है। हरित क्रांति और इसके बाद हुए कृषि क्षेत्र में बदलाव ने हमें खाद्यान्न आदि से तो भरपूर कर दिया लेकिन दूसरी ओर हमारे अंदर एक अलग ही तरह की भौतिकता की भूख बढ़ा दी जिसने हमारे पारिवारिक मूल्यों को भी ध्वस्त किया। चकाचौंध ने हमारे चारों ओर एक ऐसा काल्पनिक साम्राज्य रचा-बसा दिया जिससे बाहर निकलना हमारे बस में नहीं है। विकास की गलत परिभाषाओं के परिणाम आज हम भोगने को विवश हैं और ग्रामीण महिलाओं की आत्महत्याएँ इनमें से एक हैं।

आत्महत्याओं की बढ़ती संख्या

इन दिनों हमारे समाज में आत्महत्या 'सारी समस्याओं का सरल एवं सहज उपाय' के रुप में विकसित हो गया है। अब देखिये न एक अन्य सामाजिक संगठन द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार शहरों-कस्बों में आत्महत्याओं की प्रवृत्ति में बेतहाशा वृध्दि हुई है तथा इसके पीछे हताशा, कुंठा, स्टेटस, उच्च महत्वाकाक्षाएँ आदि कारण प्रमुख हैं। कुल मिलाकर देखा जाय तो शहरों एवं गाँवों दोनों में ही अपने-अपने कारणों से आत्महत्याओं की संख्या निरन्तर व खतरनाक ढंग से बढ़ी है।

एक क्षणिक आवेग के हम इतने गुलाम हो जाते हैं कि हमारा सारा ज्ञान-ध्यान, विश्वास-प्रतिविश्वास, अच्छाई-बुराई हाशिए पर रह जाती है और हिस्से आती है मौत। नासमझ, युवा से लेकर तीक्ष्ण से तीक्ष्ण दिमाग वाले लोग भी इस जघन्य और विडम्बनापूर्ण कार्य को करने में नहीं हिचकते हैं। महात्मा गांधी ने भी अपनी आत्मकथा में लिखा है कि ''मैंने भी आत्महत्या करने की ठान ही ली, परंतु मरने के डर ने मुझे डरा दिया था, और मैं फिर से घर भाग आया था।'' पंचायती राज के जरिए जहाँ विकेन्द्रीत कर सरकार निचले स्तर पर ग्रामीणों के हाथ पहुँची है वहाँ भी अब खेल 'स्टेटस' का हो गया है। पारिवारिक प्रतिष्ठा से लेकर व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या फिर धन-दौलत के लिए मारा-मारी जैसे कारण मुख्य कर्ता-धर्ता बन बैठे हैं इन आत्महत्याओं के।

खेती-किसानी में कीटनाशकों ने जहाँ अपने दुष्प्रभाव मिट्टी में दिखाए हैं, वहीं दूसरी ओर वे सहज उपलब्ध साधन भी बन गए हैं आत्महत्याओं के। जरा सा कुछ घटा नहीं कि सल्फास आदि जैसे कीटनाशक गटक लिए जाते हैं। महिलाएँ विशेष रूप से इसलिए भी प्रभावित है कि उन्हे घर और खेत की दोहरी जिम्मदारी निभाना पड़ती है। सारंगी पंचायत जिला झाबुआ की फुन्दी बाई कहती हैं कि अब सब कुछ सहजता से मिल जाता है, चाहे वह रोटी हो या कपड़ा परंतु दूसरी बातें जीवन में आ गई हैं जिससे लोगों में भगदौड़ सी मची रहती है। वे आगे कहती हैं कि पहले सूखी दाल-रोटी खाकर भी संतोष था लेकिन अब ऐसी भागमभग लगी है कि खाने-पहनने से बढ़कर दूसरी चीजें हो गई हैं।

आत्महत्या का मनोविज्ञान

अधिकांशत: आत्महत्याएँ तात्कालिक और क्षणिक परिस्थितियों से उपजे क्रोध की उच्चतम सीमा पर जाकर या फिर लम्बे समय से चल रहे तनाव, कुंठा की वजह से होती हैं, जिसमें मानसिक अंधत्व सवार हो जाता है और कुछ भी नहीं सूझता है। ग्रामीण परिस्थितियों में जहाँ लगातार बढ़ते तनाव ने अपनी जगह बना ली है वहीं उथली परवरिश और घटते मूल्यों के चलते स्थितियाँ कुंठा, क्रोध, अशांति को बढ़ाने वाली हो गई है और परिणति आत्महत्याओं के रूप में हो रही है। निश्चित तौर पर उस समय विशेष के दौरान आत्महत्या करने वाले को आत्महत्या से होने वाले प्रतिफलों के बारे में पता नहीं होता है। लेकिन यदि सिर्फ एक बार कोई आत्महत्या से पूर्व कुछ बातों के बारे में सिर्फ सोच भर ले, तो हो सकता है उसे आत्महत्या करने का विचार त्यागना पडे।

आत्महत्या का प्रयास हमेशा सफल नहीं होते हैं। एक ग्रामीण युवा जो कि पंच भी था एक पंचायत का, स्वयं को बिजली के झटके से मारने का प्रयास किया, वह मर तो नहीं पाया लेकिन आज अपनी दोनों बेकार बाहें लिए घूमता है। उसे संघर्ष के इस दौर में सिर्फ अपनी एक गलती की वजह से और अधिक संघर्ष करना पड़ रहा है। इसी तरह एक पंचायत के तालाब में कूदकर जान देने की सोचने वाली एक महिला उथली जगह से सर टकराकर अपना मानसिक संतुलन, आधी याददाश्त खो चुकी है। आज वह अपनों पर ही लगभग बोझ का कार्य कर रही है। ज्यादा नींद की गोलियाँ खा जाने से एक प्रबुध्द एवं परिपक्व उम्र रखने वाले सज्जन भी बचा लिए गए, परंतु अपने खराब जिगर की वजह से आज वे कई मृत्युतुल्य दु:ख उठा रहे हैं।

निराशा नहीं आशा को समझें

ग्राम पंचायत कालीघाटी जिला झाबुआ की सरपंच पुन्नी बाई के द्वारा कही बातों में भी बहुत दम लगता है कि गाँवों में भी अब संयुक्त परिवार प्रथा कम हो रही है और अकेले दम पर हौसला रखना बहुत ही मुश्किल होता है तथा थोड़े से दबाव से ही वे बिखर जाते है। उनका कहना सही भी है कि क्योंकि वास्तव में परिवार के वट वृक्ष के तले सारी जिम्मेदारियाँ बँट जाया करती थी वही अब अकेले में ही झेलना हो ती है।

ये व ऐसे कई उदाहरण हमारे समक्ष हैं जिनसे एक बात साफ होती है कि आत्महत्या से कोई मतलब हल नहीं होता है बल्कि महज कायरतावश हम अपना सब कुछ छोड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं। आत्महत्या करने की सोचने वाले लोगों को उन लोगों के बारे में सोचना चाहिये जो उनसे भी नाकारा परिस्थितियों में जीवन को जी रहे होते हैं। और उनमें से कई लोग तो उँचाईयों के शिखर पर भी पहुंचे हैं। आत्महत्या करने के विचार करने वाले निराश व्यक्ति को आत्महत्या का असफल प्रयास करने वाले लोगों से सिर्फ एक बार जरूर मिल कर देखना चाहिये। हो सकता है यह कदम उसमें एक नई आशा का संचार कर दे। या फिर उस परिवार से मिलें जिसके एक सदस्य ने आत्महत्या कर रखी हो, उसके मासूम बच्चों से मिलें तो हो सकता है उसे स्वयं भी अपने बाद अपने परिवार का एक आभास मिल जाएगा।

लोकेन्द्र सिंह कोट

 
     
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