शिक्षा मानवीय विकास का प्रभावशाली साधन रहा है। मनुष्य की सारी कृतियाँ उसके द्वारा प्राप्त शिक्षा पर निर्भर करती हैं। यही नहीं शिक्षा किसी भी राष्ट्र की स्वयंभू स्थिति की संवाहिका होती है, नींव होती है। वास्तव में शिक्षा के महत्व को चंद शब्दों में समेटा नहीं जा सकता है।
कहते हैं न कि किसी चीज की कमी हमें उसके वास्तविक मुल्य का आभास करवा देती है। यही हालात पंचायती राज में राज-पाट संभाल रही महिलाओं का है। जैसे-जैसे उनका कार्यकाल सरपंच, पंच, जनपद अध्यक्ष, सदस्य के रूप में आगे बढ़ रहा है और परिस्थितियोंवश जो कम या बगैर शिक्षा के रह गईं, वे आज महसूस करतीं हैं कि काश वे शिक्षित होतीं तो वे आज कुछ और ही होती। बालाघाट जिले की हट्टा ग्राम पंचायत में एक गोंड़ आदिवासी नायिका लगातार तीन पारियों से सरपंच बन रही भगलो बाई पुरूषों को हराकर अपने पद पर काबिज हुई हैं। तीन गांवों को मिलाकर बनी पंचायत की 'सरदार' भगलो बाई स्वयं पढ़ी-लिखी नहीं हैं और दंभगता से कहती हैं, ''पढे-लिखो ने अच्छाईयों की जगह बुराईयों को ज्यादा अपनाया है।'' यह उनका अपना विश्वास है लेकिन वे शिक्षा के मुद्दे पर कुछ नहीं करती ऐसा नहीं है। उनकी खुद की संताने पढ़ी-लिखी हैं और पंचायत में भी शिक्षा और विशेषकर बालिका शिक्षा के लिए उन्हौने विशेष कार्य किए हैं।
आज शिक्षा की वास्तविक हालत से हम सब वाकिफ है, तथा अब यह प्रश्न उठते हैं कि जब किसी भी देश का वर्तमान व भविष्य वहॉं कि शिक्षा व्यवस्था से ही बनता है, बिगड़ता है फिर भी शिक्षा को शिक्षा की दिशा और स्थान क्यों नहीं दिया जाता है? उसकी प्रतियोगिता की सैध्दांतिक ही अधिक रहने देकर अव्यावहारिकता व औपचारिकता में ही क्यों लपेटा जाता है। ये व ऐसे ही कई प्रश्न आज शिक्षा को अपनी वास्तविक मंजिल से दूर रहने पर उठते हैं। इन सब के प्रमाण-स्वरूप आइए, कतिपय मनीशियों के विचारों की गहराई में उतर कर शिक्षा के अभिप्राय व मानदण्डों की प्रासंगिकता देखते हैं।
गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टेगोर ने अपनी पुस्तक 'माय स्कूल' में लिखा है, 'हम किसी कोतुकालय में रखी हुई निष्प्राण वस्तुओं की भाँति कक्षा में बैठे रहते थे। जिन पर पाठों की उपल वर्षा की जाती थी। जीवन के परिवेश से शिक्षा दूर तक भटक गई थी। प्रकृति के स्वास्थ्यप्रद तथा पूर्णता की ओर अग्रसर करने वाले प्रभावों से उनका संबंध टूट गया था।'
ग्रामीण परिवेश आज भी हमें उस तरह का माहौल पैदा करता है जिसमें शिक्षा का मूल उद्देश्य बाहर निकल कर आ सकता है। शिक्षा को बहुत ज्यादा मशीनीकृत बनाना ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। प्राचीन समय के गुरूकुल की ओर यदि हम दृष्टि डालें तो वहाँ की दी गई शिक्षा संपूर्ण विकास का प्रतीक थी। हमें भी उसी तरह की शिक्षा प्रणाली को अपनाते हुए शिक्षा का ढांचा तैयार करना था। अजगरहा पंचायत की सरपंच मायादेवी कहती हैं कि माहौल के मुताबिक शिक्षा यदि दी जावे तो वह अधिक व्यवहारिक होगी और हमारे सर्वांगीण विकास का मार्ग भी खोलेगी। वे आगे कहती हैं कि उनके चारो बेटे इसी ग्रामीण माहौल में पढ़े हैं और आज उच्च पदों पर रहकर सारी संवेदनशीलता के साथ अपना कार्य कर रहे हैं जो आज के समय में विलोपित होता जा रहा है। यही संवेदनशीलता, कर्मठता, तन्मयता उसी ग्रामीण परिवेश की शिक्षा की देन है जो उन्हे भौतिकता के अथाह समुद्र में भी अलग साबित करती है।
मुंशी प्रेमचंद लिखते हैं, 'विद्यार्थी की परीक्षा जब तक नहीं होती, वह उसी की तैयारी में लगा रहता है, लेकिन परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद भावी जीवन संग्राम की चिंता उसे हतोत्साहित कर दिया करती है। उसे अनुभव होता है कि जिन साधनों से अब तक मैंने सफलता प्राप्त की है, वे इस नए, विस्तृत, अगम्य क्षेत्र में अनुपयुक्त हैं।'
ग्राम्य जीवन को सबसे अच्छे ढंग से प्रेमचंद के अलावा किसी और ने कागजों पर नहीं उतारा है। इटमा तीर, जिला सतना की जुझारू सरपंच कमला बाई स्वयं निरक्षर हैं लेकिन शिक्षा के प्रति उनके सोच सुनकर हेरत होती है कि शिक्षा पाकर भी लोग बेरोजगार बनकर फिर से समस्या बने इससे पहले ही उनके लिए कोई उपाय होना जरूरी हैं। पढ़-लिखकर बच्चे खेती या मेहनत के कार्यों से जी चुराते हैं... वे गांव में रहना ही नहीं चाहते हैं... यह गांवों के लिए सबसे खराब बात है।
स्वामी विवेकानन्द ने युवाओं का आह्यान करते हुए एक जगह लिखा है, 'विदेशी भाषा में दूसरों के विचारों को रटकर अपने मस्तिष्क में उन्हें ठूस और विश्वविद्यालयों की कुछ पदवियाँ प्राप्त कर तुम अपने को शिक्षित समझते हो? क्या यही शिक्षा है? वह शिक्षा जो जनसमुदाय को जीवन-संग्राम के उपयुक्त नहीं बनाती, जो उनकी शक्ति का विकास नहीं करती, जो उनमें प्राणी विषयक दया का भाव, सिंह का साहस पैदा नहीं कर सकती, क्या उसे भी हम शिक्षा का नाम दे सकते हैं?' महर्षि अरविंद ने सच्ची राष्ट्रीय शिक्षा की विवेचना करते हुए कहा कि - सच्ची और 'सजीव' शिक्षा केवल वही कही जा सकती है जो मनुष्य की इस तरह सहायता करे कि उसके अंदर जो भी शक्ति-सामर्थ्य निहित है, वह बाहर अभिव्यक्त होकर उसके जीवन में अपना पूरा लाभ प्रदान करे, तथा मनुष्य-जीवन का जो भी संपूर्ण उद्देश्य और संभावना है उसकी संसिध्दि के लिए उसे तैयार करे।
ये तो थे मनीशियों के विचार जो दशकों पूर्व लिखे गये थे और स्पष्टत: आज के परिदृश्य पर भी उतने ही सार्थक व खरे उतरते हैं। एक और बिंदु इनसे उभरता है वह है कि हम शिक्षा के मूल उद्देश्य, प्रक्रिया, दिशा से भटके हुए हैं। और इसे महसूस भी वे जमीनी स्तर पर कार्यरत नेत्रियाँ कर रही है। वास्तव में माँ ही प्रथम गुरू होती हैं और इसे कम या लगभग निरक्षर महिलाएँ समझ पा रही हैं। मोगा ब्लाक, जिला मंडला की सोनाबाई उईके जनपद सदस्य रहते हुए आंगनवाड़ी और एक प्राथमिक स्कूल अपने बूते पर खुलवाने में सफल हुई और घर-परिवार के सहयोग के चलते वे पढ़ने-पढ़ाने में बहुत उत्साहित हैं।
शिक्षा वस्तुत: वह समाहन समीकरण रहा है जिसकी अवधारणा बार-बार हमारे शास्त्रों में उपजी है, झनझनाई है। कई उपनिशदों में यह प्रार्थना की गई है कि मैं स्पष्ट व पर्याप्त सुन सकूँ तथा देख सकूँ। इस प्रकार बेहतर, पवित्र, सूक्ष्म और गहराई तक देखना, सुनना, आकांक्षा करना भारतीय शिक्षा का प्रथम उद्देश्य रहा है। मतलब यह कि चरित्र मजबूत बने, वासनाओं और दुष्प्रवृतियों पर नियंत्रण हो सके तथा एकाग्रता और संकल्प की शक्ति बढे। यह मात्र हमारी छिपी हुई शक्तियों को उजागर नहीं करती है, अपितु सार्थक जीवन का आधार भी है। यही ग्रीको की भी शिक्षा है। अफलातून के अनुसार एक ऊंची आत्मा है और एक नीची आत्मा। शिक्षा की प्रक्रिया में निरंतर मन को धीर-धीरे उच्चतर मन के नियंत्रण में लाया जाता है। इसके लिए शिक्षा में योग, उद्योग व सहयोग का सिद्वांत निहित है। पाठयक्रम में शिक्षा के इन तीन पहलुओं के अध्ययन हेतु उपयुक्त मन:स्थिति का विकास, रोजगार पाने योग्य व्यावहारिक ज्ञान, सेवा और कर्तव्यनिष्ठा का सामंज्य होना चाहिए। शिक्षण कार्यक्रमों में छात्रों के मूल्यों के निर्माण की क्षमता होनी चाहिए।
धार जिले की जाबड़ा पंचायत की सरपंच राजकुंवर हाल ही में भारत सरकार द्वारा भेजे गए 100 युवाओं के दल के साथ चीन यात्रा कर आ चुकी हैं और वे इसके लिए शिक्षित होने को महत्वपूर्ण बताती है। मध्यप्रदेश उन अग्रणी राज्यों में से एक है जहाँ 29 विषयों को अभिशासन संबंधित राज्य शासन के अधिकार ग्रामसभाओं को प्रत्यायोजित कर दिए गए हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े विषय इन्ही 29 विषयों में सम्मिलित हैं। पंचायत में अब सामान्य प्रशासन, शिक्षा व स्वास्थ्य तथा निर्माण समीति पंचायतों में अस्तित्व में हैं। वैशाली परिहार बयावड़ा ग्राम पंचायत, जिला होशंगाबाद की सरपंच हैं और स्वयं एम.एससी., एल.एल.बी. हैं। उन्हे कभी भी यह प्रेरणा नहीं मिली कि उच्च शिक्षित होने पर वे गांव में रहकर अपना जीवन व्यर्थ कर रही हैं। खुद उच्च शिक्षित होने का परिणाम भी यह रहा कि पंचायत के कई कार्यों में जितनी सहजता उन्हे हुई और किसी को नहीं हो सकती थी। शिक्षा उन्हे एक अध्यापक के रूप में जीवन में सुधार लाने का बुनियादी तरीका लगता है। उनकी ग्राम पंचायत में सिर्फ प्राथमिक स्कूल है और हाई स्कूल वहाँ से तीन किलोमीटर दूर है। अक्सर इस वजह से लड़कियों का स्कूल छुड़वा लिया जाता था। उन्हौने पहल की और परिणाम भी बहुत जल्द मिला कि उनकी अपनी पंचायत में माध्यमिक स्कूल खुलवाया और बड़ी संख्या में अब लड़कियाँ उस स्कूल में पढ़ने जाती हैं। कुल मिलाकर ग्रामीण नेटवर्क में शिक्षा को लेकर श्रेष्ठ भावनाएँ तो प्रक्रिया में आ चुकी है और कई जगह उनका आदर्श रूप में संचालन हो रहा है लेकिन अभी भी संतुष्टि का स्तर आने में समय लगेगा।
शिक्षा की प्राचीन प्रणाली के अपने उच्चतर लक्ष्य थे लेकिन उनमें वे लक्ष्य भी समाहित थे जो आधुनिक शिक्षा पद्वति प्राप्त करना चाहती है। लेकिन असफल रहती है। आज सिर्फ इस बात पर अधिक जोर दिया जाता है कि देश के नौजवान अपनी रोजी-रोटी कमा सके बस। आखिर जब मनुष्य के मानसिक, बौद्विक व उच्च क्षेत्रीय विकास करने से इस शिक्षा का प्राय: कोई सरोकार ही नहीं रहा तो फिर इसे शिक्षा कैसे माना व कहा जाए? जहाँ शिक्षा को एकाग्रता के अभाव, विचलन, असंतोष आदि पर विजय पाने में सहायक होना चाहिए। वहीं आज तीक्ष्ण मन भी इन विकारों से ग्रस्त है। व्यक्ति कुछ मामलों में ऊंची उपलब्धियाँ प्राप्त करने में सफल हो सकता है, बुध्दिमान हो सकता है वह एक अच्छा इंजीनियर, रसायनशास्त्री, साहित्यकार, प्राध्यापक, प्रशासक हो सकता है। पर इसके बावजूद भी उसका मस्तिष्क धुँधला व बिखरा सा रहता है। वहीं एक निरक्षर ग्रामीण महिला जिसके पास शिक्षा नहीं है लेकिन अनुभव के आधार पर न केवल राज-काज चला रही हैं वरन् मौका मिलने पर उसमें बदलाव की प्रक्रिया को भी जोड़ रही हैं। उसके पास उतने अवसाद भी नहीं हैं जितने आज एक पढ़े-लिखे लोगों के पास हैं। उसके पास अपनी एक जीवन शैली है जिसमें रहकर वह अपेक्षाकृत अधिक संतुष्ट है।
लोकेन्द्रसिंह कोट |