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  क्यों हार गई सुमित्रा!  
     
 

देवास। जी हां, यह इस सदी की सच्ची कहानी है। अमानवीय पीड़ा, असहनीय अस्पृश्यता की कहानी। हम में से बहुतों को एक छोटे बच्चे का मल उठाने में भी कोफ्त होती है लेकिन हमारे प्रदेश में आज भी हजारों की संख्या में हिंदुओं में वाल्मिकी और मुस्लिमों में हेला समुदाय के लोग मैला (ey) ढोने का काम कर रहे हैं। प्रदेश के अनेक जिलों की तरह देवास में भी मैला ढोने का काम आम बात है। वाल्मिकी समाज इसे अपनी जागीर कहता है। जो वास्तव में सवर्णो द्वारा किए गए ब्रेनवॉश का ही परिणाम है, जिसके पास जितनी ज्यादा जागीर वह उतना ही प्रतिष्ठित! इसकी जड़े इतनी गहरी हैं कि इसके खिलाफ जाने वालों को समाज हाशिए पर डाल देता है। पढ़िए ऐसे ही एक महिला की कहानी जिसके हौसले समाज की जिद, कुंठाओं से हार गए।

देवास के बरोठा गांव में वाल्मिकी समाज की सुमित्रा ने सदियों से चली आ रही जागीरी को चुनौती देते हुए इस कुप्रथा को खत्म करने के लिए चलाए जा रहे गरिमा अभियान के सहयोग से दशकों इस काम को करने के बाद अंतत: अपनी डलिया जिसे सिर पर रखकर मैला उठाया जाता है इस आत्मविश्वास के साथ जला दी थी कि अब वह कभी मैला ढोने का काम नहीं करेगी। उसने बैंक से बीस हजार का लोन लेकर गांव वालों ंके भारी विरोध के बाद भी कपड़े की दुकान खोल ली।

सुमित्रा के साथ ही सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी लगा कि यह पहल अब प्रदेशभर के लिए मिसाल का काम करेगी। लेकिन यह लोग भारतीय सामाजिक संरचना को पढ़ने में गलती कर बैठे। जहां किसी काम के लिए जज्बे और योग्यता की जगह जाति अहम है। इसीलिए सुमित्रा की दुकान से छह माह तक एक साड़ी तो दूर एक ब्लाउज, पेटीकोट तक नहीं बिका। सुमित्रा पर दोहरी मार पड़ी एक तो उसने जिन घरों में मैला ढोने का काम बंद किया, उन्होंने गांव में उसका सामाजिक बहिष्कार शुरू करवा दिया। उसे रोजमर्रा की चीजों के लिए गांव से सामान मिलना बंद हो गया। दूसरी ओर बैंक का कर्जा उस पर चढ़ता जा रहा था। सुमित्रा ने डबडबाई आंखों को पोछते हुए कहा , दबंगों ने फरमान जारी कर दिया था कि इसकी दुकान से कपड़े नहीं खरीदे जा सकते क्योंकि यह श्मशान से चुरा कर लाई है। दुकान में 100 से लेकर 300 रुपए तक की साड़ियां थीं। जिनको गांव के लोग आसानी से खरीद सकते थे। बरोठा में वाल्मिकी समाज के ही लगभग 50 घर हैं, लेकिन इसके बाद भी एक भी कपड़ा नहीं बिकने का मतलब स्पष्ट था कि सुमित्रा को गांव के जमींदारों, अगड़ों के साथ ही वाल्मिकी समाज के लोग भी दोषी मानते थे। परंपरा, समाज के कायदे तोड़ने का कुसूरवार! उस पर अगड़ी जाति को नीचा दिखाने के नाम पर गालियों की बौछार होने लगी। गांव में असल नाराजगी सुमित्रा के उस हौसले के खिलाफ है, जो उसने विधवा होने के बाद भी दिखाई।

सुमित्रा के मैला ढोने के इंकार के केंद्र में बच्चे थे। क्योंकि उनको ही तेरी मां मेहतरानी जैसे ताने सुनने पड़ते थे। लेकिन दुकान बंद होने के बाद फिर से मैला ढोने के फैसले के पीछे भी बच्चे ही थे। रुआंसी होकर उसने कहा मेरे सामने दुकान बंद करने और डलिया उठाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। मैं एक मां हूं और बिना बाप के बच्चों को नाराज गांव वालों का सामना करने के लिए नहीं छोड़ सकती थी। इस तरह सुमित्रा की हिम्मत टूट गई। छह महीने के बाद उसने इंदौर जाकर दुकानदार से किसी तरह से गुहार लगाकर साड़ियां बीस प्रतिशत कम कीमत पर लौटाईं। अब बैंक के कर्ज का मर्ज। किसी तरह से पांच हजार चुकाए और फिर बैंक जाकर अधिकारियों को दुकान बंद होने की बात बताई। इसे अफसरों की दरियादिली मानिए कि उन्होंने कर्ज की किस्तों को उसे अपनी सहुलियत से अदा करने की छूट दे दी। पचास बरस की सुमित्रा शाजापुर जिले से यहां ब्याहकर आई थी। हालांकि मैला ढोना उसके लिए नई बात नहीं थी। अंतर इतना था कि मायके में कभी-कभी इस काम के लिए जाना होता था, जबकि यहां तो आते ही सास ने जागीर थमा दी। जिसे उसने 1990 से लगातार निभाया। अब एक बार फिर उसने अपनी जलाई गई डलिया की स्मृतियों को भुलाकर अपनी जागीरदारी संभाल ली है। सुमित्रा के पास इस समय पांच घरों की जागीरदारी है। जरा उसकी कमाई भी देखें। एक घर के उसे पचास रुपए मिलते हैं। यानि महीने भर पांच घरों का मैला उठाने के बदले में दो सौ पचास रुपए। सुमित्रा को पचास रुपए अब इस डर से लोग देने लगे हैं कि कहीं वह दुबारा काम बंद न कर दे। पहले तो उसे दस रुपए महीने के मिलते थे। चलते-चलते हमने सुमित्रा से पूछा कि क्या उसे पता है कि हमारा देश आजाद की साठवीं सालगिरह मना रहा है और कानूनन मैला ढोने जैसी प्रथाओं पर पूरी तरह से पाबंदी है, तो उसने कहा, कैसी आजादी, हम तो अभी भी गुलाम हैं। यह अकेली सुमित्रा के हौसलों के टूटने की कहानी नहीं है। पूरे प्रदेश में मैला ढोने से विद्रोह करने वालों की कमोबेश यही दशा है। मानवाधिकार आयोग के एक सर्वे में प्रदेश में मैला ढोने वालों की संख्या सात हजार तक बताई गई है। सरकार, उसके अफसर ऑफ द रिकार्ड तो इसे स्वीकार करते हैं, लेकिन ऑन द रिकार्ड नहीं। क्योंकि यह संविधान प्रदत्त अधिकारों का खुलेआम उल्लंघन है। इसलिए जब वह मानती ही नहीं कि मैला ढोया जाता है, तो वह इनके लिए करेगी क्या। सीहोर, होशंगाबाद, पन्ना, हरदा, शाजापुर, मंदसौर, राजगढ़ के साथ ही भिंड, टीकमगढ़, उज्जैन समेत 13 से अधिक जिलों में मैला ढोने का काम करने वाला समाज बड़ी संख्या में है। इनकी अपनी आबादी इतनी अधिक नहीं है, जो किसी वोट बैंक के दायरे में आती है। यही कारण है कि वाल्मिकी और हेला दोनों ही समुदाय के लोग सामान्य नागरिक अधिकारों से भी वंचित हैं। उन्हें प्रतीक्षा है, संविधान के उस वादे के यकीन में बदलने की जिसमें लोक कल्याणकारी राज्य का वादा किया गया है।

वाल्मिकी समाज पर थोपे गए काम

1.परंपरागत रूप से मैला ढोने का काम। पक्के शौचालय बनने पर सफाई का काम।
2.गांव में हुई मौत की चिट्ठी लेकर उसके रिश्तेदारों के यहां जाना।
3.मरे हुए कुत्ते, बिल्लियों को गांव से बाहर फेेंकना।
4.सफाई के काम की अनिवार्य जिम्मेदारी। जिससे इंकार करने पर जमकर पीटा जाता है। सामाजिक बहिष्कार कर दिया जाता है।

भेदभाव का आलम

1. दूसरी जाति के लोग साथ बैठकर भोजन नहीं करेंगे।
2. स्कूलों में इनके बच्चे सबसे पीछे बैठते हैं। स्कूल की सफाई भी करते हैं।
3 अनेक स्थानों पर मध्यान्ह भोजन के लिए घर से बर्तन लाना जरूरी।

सरकारी छल एक ओर सरकार का 1993 का मैला ढोने से रोकने वाला कानून कहता है कि जो भी इस काम को करवाएगा, उसे इसकी सजा मिलेगी। जिसके अंतर्गत एक साल की कैद और 2000 रुपए का जुर्माना होगा। ऐसे ही दूसरे कानून भी हैं, जो मैला ढोने पर पाबंदी लगाते हैं।

तो दूसरी ओर सरकार ने कुछ समय पहले ही उन बच्चों की छात्रवृत्ति बंद करने का निर्णय लिया है, जिनके माता-पिता ने यह काम बंद कर दिया है। इससे उन लोगों में भारी असमंजस है, जो यह काम छोड़ चुके हैं या फिर छोड़ना चाहते हैं। क्योंकि ऐसा करते ही उनके बच्चों की पढ़ाई का आधार समाप्त हो जाएगा। यह विचित्र विरोधाभास है, जिसका किसी अफसर के पास कोई जवाब नहीं है।

मेरी जानकारी में मैला ढोने की प्रथा देवास में नहीं है। यदि कहीं से भी शिकायत आएगी, तो उसकी जांच की जाएगी।

- डॉ. नवनीत मोहन कोठारी, कलेक्टर देवास

 
     
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