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  झूठा साबित हुआ दलितों का '' राम मिलन ''!
प्रशासन के सामने हुए दलितों के मंदिर प्रवेश को दूसरे ही दिन गांव के सवर्णों ने नकारा
 
     
 

भील्याखेड़ी, मंदसौर। यदि किसी हिंदू से पूछा जाए कि क्या वह अपने जीवन में कभी मंदिर गया है ? तो बात कुछ अटपटी सी लगती है। लेकिन हमारे समाज में ऐसे लोग हजारों की संख्या में हैं, जिनको पीढ़ियों से मंदिर जाने की इजाजत नहीं है। मंदसौर से 55 किमी दूर भील्याखेड़ी ऐसा ही एक गांव है, जहां दलितों को उनके आराध्य श्रीराम के मंदिर में जाने की मनाही है। यकीन नहीं होता जब सत्तर-अस्सी बरस के बुजुर्ग कहते हैं कि उनने तो दूर उनके दादा-परदादा ने भी आज तक कभी इस मंदिर की दहलीज पर पांव नहीं रखे। कच्ची पगडंडियों और हरे-भरे पेड़ों के बीच बसे इस गांव की आबादी सात सौ के भीतर ही है। बीते 26 जून को यहां दलित नेता जंगीबाबू तवंर और प्रशासन ने भारी पुलिस बल की मौजूदगी में दलितों को मंदिर में प्रवेश दिलवाया था। लेकिन उस दिन के बाद आज तक किसी दलित की हिम्मत नहीं हुई कि भगवान के दर्शन कर सके। प्रशासन ने दलितों को मंदिर में प्रवेश दिलाने के दिन समाज के सवर्ण तबकों को विश्वास में लेने और सामाजिक सद्भाव का कोई प्रयास नहीं किया। इस बात का पता इससे चलता है कि दलितों के मंदिर प्रवेश के दौरान अधिकांश स्वर्ण पुरुष घरों पर नहीं थे। कुछ डर से तो कुछ विरोध के चलते अपने घरों से नदारद थे। स्पष्ट है कि दलितों का मंदिर में प्रवेश महज एक रस्म अदायगी था। उसे सच्चे अर्थों में तामील करने की नीयत किसी की नहीं थी। दलित युवक भंवरलाल ने बताया कि उस दिन तो पुलिस के डर से किसी ने कुछ नहीं कहा , लेकिन पुलिस के जाने के बाद हमारा उत्पीड़न शुरू हो गया। इस गांव में बलाई, सूर्यवंशी और वाल्मिकी समाज के 25 परिवार हैं, जिनके बुजुर्गों को याद नहीं कि उनके पिता ने कभी गांव के मंदिर की सीढ़ियों पर भी पांव रखे हों। लेकिन इनकी नई पीढ़ी यह अन्याय बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है।

भंवरलाल ने सरकार के उक्त प्रयास के पहले भी कई बार मंदिर में प्रवेश का प्रयास किया, जिसके बाद दबंगों द्वारा उसकी जमकर पिटाई भी की गई ,लेकिन वह फिर भी हार मानने को तैयार नहीं है। भंवरलाल ने बताया कि हम हर हाल में मंदिर में पूजा-अर्चना को सुलभ बनाना चाहते हैं। अब चाहे इसकी कीमत कुछ भी हो। दूसरी ओर गांव में माली, जाटव और गायरी समाज के लोग हैं, जो गांव में निर्णायक भूमिका में हैं, दलितों के मंदिर में प्रवेश के सवाल पर बिफर जाते हैं। यह लोग किसी भी कीमत पर इस मामले में बात करने को तैयार नहीं हैं। बड़ी मुश्किल से बात करने को राजी हुए चंपालाल चौधरी कहते हैं '' सारा विवाद झूठा है, कहीं कोई भेदभाव नहीं है। हम लोग क्या अत्याचार करेंगे, हम पर तो खुद ही मंदिर को लेकर मुकदमे चल रहे हैं। '' चंपालाल के पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि जब दलितों के साथ विवाद नहीं है, तो फिर मुकदमे किस बात के चल रहे हैं।

जहिर है मुकदमे मंदिर में प्रवेश को लेकर होने वाले विवाद के ही हैं। जब से गांवों के जन-जीवन में राजनीतिक दलों का सीधा प्रवेश हुआ है। वहां की समस्याओं ने पेचीदा स्वरूप ले लिया है। ऐसे में स्वाभाविक है कि अब कोई विवाद पंच परमेश्वर की तर्ज पर तो सुलझने वाला नहीं है। हां विवादों को उलझाए रखने की प्रवृत्ति बढ़ गई है। दलितों के सदियों बाद इस गांव में मंदिर प्रवेश के बाद आलम यह है कि गांव के सवर्णों ने दलितों के लिए कदम-कदम पर नई परेशानियो की फसल उगा दी है। दलितों के बच्चों को मध्यान्ह भोजन के दौरान घर से ही बर्तन लाना होता है। सबसे बाद में उनके बच्चों को भोजन मिलता है। उनको स्कूल में सबसे पीछे, सबसे अलग बैठने के लिए कहा जाता है। मटके से पानी पीने की इजाजत नहीं है। यहां तक कि उनको सवाल पूछने की अनुमति भी दबंगा के बच्चों के बाद ही होती है। वाल्मिकी समुदाय के लोगों ने यहां पर मैला ढोने का काम काफी समय पहले ही छोड़ दिया था। इससे बाद भी उनके साथ भंगी, मेहतर जैसे अपमानजनक संबोधन हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता को किसी भी रूप में लागू करने को दंडनीय अपराध माना गया है। इसके बाद भी आज आजादी की आधी सदी के बाद भी यह गांव-गांव में मौजूद है। जिंदगी के अंतिम पड़ाव पर अस्सी बरस से अधिक के हो चुके दलित रामलाल का दर्द विचलित करने वाला है मेरा जन्म गुलाम भारत में हुआ, उसके बाद आजादी ने उम्मीद जताई कि शायद भगवान से मिलना संभव हो सके। लेकिन अब अंतिम समय में लग रहा है कि मैं फिर गुलाम हो गया हूं। मेरी अंतिम इच्छा है कि मै भगवान राम के दर्शन करते हुए इस दुनिया से विदा लूं, लेकिन लगता नहीं यह हो सकेगा।

अकेले मंदसौर का किस्सा नहीं यह अकेले भील्याखेड़ी की कहानी नहीं। पड़ोसी जिले नीमच के पीपल्या रावजी गांव में भी वाल्मिकियों को मंदिर में जाने की मनाही है। वाल्मिकी समाज की बच्ची रीना कहती है कि जब हम दूसरे बच्चों को सुबह-सुबह विभिन्न अवसरों पर मंदिर जाते देखते हैं, तो हमारा मन भी करता है, कि हम भी नहा धोकर मंदिर में दर्शन के लिए जाएं। लेकिन गांव की ओर से इसकी अनुमति नहीं है। देवास में भी अनेक स्थानों पर ऐसे प्रकरण हैें। इस तरह देखें तो समूचे मालवा में ऐसे मामले बड़ी संख्या में हैं, जिन पर प्रशासन कभी भी संजीदगी से कार्रवाई नहीं करता है।

सवर्णों से बातचीत के सारे मामले अब तक असफल हुए हैं। हमारी अनेक कोशिशों के बाद भी सवर्ण किसी कीमत पर मंदिर में प्रवेश देने के लिए तैयार नहीं हुए थे। जिसके कारण प्रशासन की मदद से दलितों को मंदिर में प्रवेश करवाया गया था।

जंगीबाबू तंवर, अध्यक्ष हरिजन सेवक संघ मंदसौर

कलेक्टर एम गीता : मैंने कुछ दिनों पूर्व ही जिले का कार्यभार संभाला है। आपसे ही मुझे इस घटना की जानकारी मिली है। इस मामले की पूरी गंभीरता से जांच होगी।

दयाशंकर मिश्र

 
     
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