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  दलितों पर बढ़ता उत्पीड़न  
     
 

हाल के दिनों में प्रदेश में कानून-व्यवस्था की स्थिति में बहुत ही गिरावट आई है, खासतौर से दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है। नेता प्रतिपक्ष जमुना देवी ने एक पत्रकार वार्ता में प्रदेश में बढ़ रही दलित उत्पीड़न की घटनाओं को उजागर किया। भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री उमाशंकर गुप्ता ने भी कानून-व्यवस्था की बदतर स्थिति पर चिंता जाहिर की है। वे इस मुद्दे पर अनशन पर बैठने वाले थे, पर मुख्यमंत्री से चर्चा के बाद उन्होंने अपने विचार बदल लिए। बाद में इसी मुद्दे पर कांग्रेस नेता पी.सी. शर्मा अनशन पर बैठे। विधान सभा के पावस सत्र में प्रदेश में दलित उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं का मुद्दा विपक्ष ने उठाया था। इस आरोप का पुरजोर विरोध सता पक्ष ने किया था। विपक्ष ने इस मुदे पर सरकार को घेरने की कोशिश की थी पर उन्हे सफलता नहीं मिली थी। विपक्ष एक बार फिर इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा हैं।

यद्यपि यह सही है कि प्रदेश मे दलित उत्पीड़न एक गंभीर मुद्दा है, खासतौर से उस स्थिति मे जब सरकार ने आम जन से भय, भूख एवं भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने का वायदा किया है।

वर्तमान सरकार ने अपने कार्यकाल के साढे तीन वर्षो से ज्यादा का सफर पूरा कर लिया है और प्रदेश में अगले वर्ष 2008 में विधानसभा के चुनाव भी होने वाले हैं। पर उत्तारोतर प्रदेश में भय का वातावरण बढ़ता जा रहा है। यदि सिर्फ दलित उत्पीड़न की घटनाओं को देखा जाए तो पिछले दो तीन वर्षो में दलितों का समाजिक बहिष्कार, दलित महिलाओं के साथ बलात्कार, उनकी बेदखली आदि कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जो बहुत ही शर्मनाक हैं। ऐसी घटनाओं का सिलसिला थमा नहीं है और प्रदेश के कर्इ्र हिस्सों में दलितो पर अत्याचार होने की जानकारी मिल रही है। ऐसी घटनाओं की जानकारी भी हमें तभी होती है जब उत्पीड़ित दलित किसी तरह जिला प्रशासन तक पहुँच पाते हैं या उनके बारे मे किसी स्रोत से देर-सवेर जानकारी मिलती है। घटनाएं जब हमारे सामने होती हैं तब वह कई दिन पुरानी भी हो चुकी होती है।

कुछ दिन पूर्व ही सागर जिले के रहली थाना क्षेत्र के भैसा गांव मे एक दलित परिवार के घर कन्याभोज आयोजित किया गया था। गांव के हनुमान मंदिर मेें भोज का भोग लगाने गए दलित समुदाय के साथ ऊॅची जाति के दबंगो ने मारपीट की और उन्हे धमकी देकर गांव से भगा दिया। इस घटना में गांव से 15 महिलाओं सहित 43 दलित बहिष्कृत हो गए। गांव के हैण्डपंप से उन्हें पानी भरने से भी रोक दिया गया। इसी तरह की घटनाक्रम में उज्जैन जिले के झरनावदा गांव में सवर्णों ने एक दलित युवक को खम्बे से बांधकर पिटाई की। उज्जैन के ही चापानेरा गांव में सवर्णों ने एक दलित महिला को अर्ध्दनग्न कर गदहे पर बैठाकर घुमाया। गुना जिले के उमरियाखुर्द गांव के एक दलित परिवार को गांव के दबंगों ने गांव से खदेड़कर उनके घर मे आग लगा दी। इस घटना में दलित परिवार को पट्टे में मिली जमीन पर दबंगों ने कब्जा करने की कोशिष की थी। इसी तरह दबंगों ने एक दलित महिला के साथ कुकृत्य करने के प्रयास से मारपीट की और उसे बचाने पहुंची अन्य महिलाओं को भी दबंगों ने पीटा। घटना के बाद से उस महिला का पूरा परिवार गांव से बाहर है और डर से गांव नहीं लौट रहा है।

इन घटनाओं के पीछे जो कारण उभरकर सामने आते हैं, वे यह दर्शाते हैं कि समाज में अभी भी सामंती मानसिकता कायम है और दलित समुदाय बहिष्कृत जीवन जीने को विवश है। दलिताें को शेष समाज के साथ भेदभाव रहित जीवन जीने के लिए किए जा रहे सरकारी एवं गैर सरकारी प्रयासों के बावजूद उनके सामाजिक बहिष्कार के नए नए रूप देखने को मिल रहे हैं। अब दलितों पर सीधे प्रहार नहीं किया जाता, बल्कि उन पर कई आरोप लगा दिए जाते हैं, मसलन - दलित युवा ने सवर्ण महिलाओं से छेड़छाड़ की है या करने का प्रयास कर रहा था, वह शराबी था जिससे गांव का माहौल खराब हो रहा था, सवर्णों का दलिताें द्वारा विरोध किया जा रहा था आदि और फिर उसके बाद उन पर हमला किया जाता है। ऐसे आरोपों का निराधार होना अचरज की बात नहीं, क्याेंकि ऐतिहासिक रूप से हाशिये पर पड़े दलितों की सामाजिक हैसियत अभी भी निम्न है और प्रशासन, पैसा और सत्ताा के गठजोड़ में सवण्र्ाो की तुलना मे वे कहीं नहीं टिकते।

प्रदेश में घट रही इन घटनाओं को रोकने के लिए किए जा रहे प्रयास नाकाफी दिखते हैं। एक ओर दलित सामाजिक एवं राजनीतिक रूप से बहिष्कृत हैं और दूसरी ओर उन पर हुए अत्याचारों की कोई सुनवाई नहीं हो रही हैं। स्थानीय पुलिस प्रशासन से उन्हें मदद नहीं मिल पा रही है, उल्टे उन्हें वहां से झिड़कियां मिल रही हैं। कुछ ऐसे भी मामले सामने आए हैं, जिनमें दलितों एवं कमजोर तबके के लोगों को झूठे केसों में फंसाने की धमकी दी जा रही है।

ऐसे मामलों में वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा सख्ती नहीं किये जाने से अपराधियों के हौसले बढ़ रहे हैं।

उपरोक्त परिस्थितियों को देखकर लगता है कि राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति गंभीर है पर सरकार इन मामलों में उदासीन रवैया ही अपना रही है। सरकार यह दावा तो कर रही है कि प्रदेश को भयमुक्त बनाना है पर सरकार द्वारा ली गई इस जिम्मेदारी का परिणाम दिख नही रहा है और दलितो का उत्पीड़न जारी है। स्थानीय पुलिस प्रशासन को दलितों के उत्पीड़न पर अंकुश लगाने के लिए कठोर निर्देश नहीं दिए जाने एवं ऐसी घटनाओं में प्रशासन की जवाबदेहिता तय नहीं होने के कारण ही यह देखने में आता है कि किसी उच्च अधिकारी द्वारा बिना दखल दिए, थानों में दलितों एवं कमजोर तबकों की सुनवाई नहीं होती उल्टे उन्हे वहां से भी प्रताड़ना ही मिल रही है।

राजु कुमार

 
     
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