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  दलित समाज में स्त्री  
     
 

मप्र के रायसेन जिले में चार सिंतबर को एक दलित ने अपने ही छोटे भाई की पत्नी को उसे छोड़कर अपने साथ रहने के कथित प्रस्ताव के इंकार के बाद जिंदा जला दिया। पहली नजर में सामान्य सा लगने वाला विवाद, अपने भीतर गहरे स्त्री विमर्श, चिंताएं समेटे हुए है। असल में यह स्त्री को उस निर्णय की सजा है, जो उसने अपने अस्तित्व के लिए अपनी आत्मा की आवाज से लिया था। प्राय: जब दलित, अंत्यज समाज के बारे में बात की जाती है, तो इस बात को विस्मृत कर दिया जाता है कि अंत्यज समाज के भीतर जो स्त्री है, वह महज दलित नहीं। वह दोहरी दलित है। वह दुख, उपेक्षा, शोषण के गहरे चक्रव्यूह में है। क्योंकि वह न केवल सवर्णो का कोप और उनकी यौन कुंठाएं झेलने के लिए विवश है, बल्कि साथ ही उसे अपने ही समाज की अतृप्त वासनाओं, पुरुष के अहंकार से भी निरंतर संघर्ष करना होता है। सामान्य जाति की स्त्री को कम से कम अपने ही समाज के पुरुष अहंकार को झेलना पड़ता है। इसलिए दलित स्त्री के साथ होने वाले दुर्व्यवहारों को अभिनव समाजषास्त्रीय अध्ययन की दृष्टि से समझने के प्रयास करने होंगे।

रायसेन के महेश्वर गांव की इस घटना के पीछे का मूल कारण समाज की यही पारंपरिक धारणा कि स्त्री पुरूष की ही बपौती, उसका मूलधन है। और इस मायने में सवर्णों और अंत्यजों के बीच कोई विभाजक रेखा नहीं है। स्त्री को उपनिवेश की तरह मानने का ऐतिहासिक दुराग्रह है, जिसका स्वामित्व शक्तिशाली, समर्थ पुरूष के पास है। वह हस्तांतरणीय है, लेकिन आदेश के अनुरूप ही। इन आदेशों की अवहेलना होते ही उसका जीवन दांव पर लग जाता है। जिस सुमित्रा बाई को कंछेदीलाल ने रात को सोते समय पेट्रोल से आग लगाकर जिंदा जला दिया, उसका कसूर केवल इतना ही था कि वह कंछेदीलाल के ही भाई की पत्नी थी। जिसने पति के विक्षिप्त होने के बाद अपने देवर से शादी कर ली थी। और इसी कंछेदीलाल की पत्नी की मौत के बाद सुमित्रा ने उसके साथ शादी करने से इंकार कर दिया था। कंछेदीलाल सुमित्रा के पति से आर्थिक रूप से संपन्न था, सो उसने इस इंकार को तमाम प्रलोभनों से 'हां' में बदलवाने के प्रयास किए। कंछेदी कभी पंचायत से तो कभी दूसरे दबंगों के माध्यम से निरंतर जुगत भिड़ाता रहा कि किसी तरह सुमित्रा उसकी पत्नी बनने को राजी हो जाए, लेकिन सुमित्रा ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। जिसके बाद से आए दिन मारपीट होती रही और और अंतत: सुमित्रा को अपने निर्णय की कीमत जान देकर चुकानी पड़ी।

सुमित्रा की हत्या वास्तव में यह उस अंत्यज समाज का प्रतिबिंब है, जो खुद ही शोषित, पीड़ित है, बावजूद इसके अपनी कुंठाएं स्त्री पर उतारता है। इस तरह से परत दर परत दलित स्त्री की स्वतंत्रता और उसके सिमटे हुए दायरे की बानगी इस घटना के बहाने मिलती है। जिसका सार यह है कि औरतों को चाहे वह किसी भी समुदाय या धर्म से हों, उन्हें अपने निर्णय पुरुष के अनुकूल ही लेने होंगे। हमने कुछ समय पहले इमराना के मामले में भी यही देखा था। दरअसल दुनियाभर में स्त्री को समाज ने अपने पैमानों में ढाल दिया है और वह जब चाहे और जैसा चाहे उसका इस्तेमाल करता है। हम आजादी की साठवीं सालगिरह का डंका पीट रहे हैं और आज भी 'सती माताएं' कभी गुजरात में तो कभी मप्र में प्रकट होती रहती हैं। क्योंकि ऐसी परंपराएं व्यवस्था को रुढिवादी बनाए रखने में कारगार होती हैं। लेकिन जैसे ही इमराना, गुड़िया और सुमित्रा के मामले हमारे सामने आते हैं। जिनमें स्त्री देह पर पुरुष की लंपटता उजागर होती है, समाज के ठेकदारों की बेचैनी बढ़ जाती है। वे अपने फतवे, एजेंडों से लैस होकर स्त्री के चरित्र हनन के पूरे प्रयास करने लगते हैं।

इसी तरह की एक कहानी देवास के गांव पीपल्या की दलित महिला तेजुबाई की भी है। जिसे उसके ही समाज ने देह को वस्तु नहीं समझने और उसे दबंगों के क़ायदों के अनुसार नहीं रेंगने पर खानाबदोश जीवन के लिए विवष कर दिया है। तेजूबाई की शादी एक विकलांग युवक से हुई थी। पहले कुछ साल तो सब ठीक चला, लेकिन धीरे-धीरे तेजुबाई के जीवन में यह कहावत चरितार्थ होने लगी कि ...गरीब की मेहरारू गांव की भौजाई। तेजुबाई को उसके ही समाज के सरपंचों और रिश्तेदारों ने एक विकलांग का साथ छोड़ने और अपने साथ रहने के पहले तो प्रलोभन दिए और जब इस प्रपंच में कामयाब नहीं हुए तो उन्होंने उसके पति बाबूलाल की सवर्णो के सहयोग से हत्या करवा दी। यकीन करना मुश्किल है, लेकिन यह सच है कि इस समय गांव के दबंग सवर्णो के साथ ही दलित-दबंग भी तेजूबाई को सबक सिखाना चाहते हैं। गांव के ठाकुरों के साथ ही दलित दबंगों का कहना है कि वह तेजू का मान-मर्दन इसे बलात्कार पढेंध्द करना चाहते हैं। ताकि उसे सबक मिल सके। इस पूरे फसाद की जड़ यह है कि तेजूबाई ने एक बार किसी दलित युवक के बलात्कारी इरादों से एक मासूम को छुड़वाया था। जिसके बाद से उस युवक और उसके साथियों ने उसे सबक सिखाने की ठानी और गांवभर में तेजू के खिलाफ समाज का ब्रह्मास्त्र संदिग्ध चरित्र होने का प्रचार चला दिया। जिसके बाद उसके पति की हत्या तो और भी आसान हो गई। पुलिस तेजू की सुरक्षा के मामले में कुछ नहीं कर सकती, क्योंकि वह मानती है कि इस स्त्री के चरित्र में ही खोट है। अधिकारियों का मानना है कि यह गांव का मामला है, इसे गांव में सामाजिक आधार पर ही निपटाया जाना चाहिए। यह पुलिसिया कुतर्क समझ से परे है कि एक स्त्री को उस गांव के सहारे छोड़ दिया जाए, जिसकी नियत ही है, स्त्री को उसके साहस का कथित सबक सिखाने की।

ये प्रकरण हमें समाज के उस रूप को दिखाने में मददगार होते हैं। जो आमतौर पर पर्दे के पीछे होते है। सामान्यत: सामाजिक विमर्श में हम समाज को धर्म और जाति के आधार पर ही विभाजित रा हैकरते हैं, जो कि अधूं। स्त्री की बात करते समय हमें उसके उस वर्गीकरण की अंतर्यात्रा के बारे में भी सोचना होगा। वैसे तो संसार में धर्म भले ही कितने हों लेकिन जातियां तो दो ही होती हैं, स्त्री और पुरूष। पुरूष जो सत्ता के मठाधीश हैं। वे निर्णय की बपौती लेकर संसार में अवतरित हुए हैं, जबकि स्त्री उनके अनुसरण और वीर्य के संरक्षण के लिए है। लेकिन जब यही स्त्री तेजूबाई या सुमित्रा के रूप में अपने निर्णय स्वयं करने लगती है, तो वह पुरूष सत्ता के लिए चुनौती बन जाती है। मप्र का सामाजिक दायरा सामान्यत: सामंती है। गांव वही गांव हैं, जो दलितों के लिए अंतिम सजा उनकी स्त्रियों के साथ सहवास मानते हैं। चूंकि दलित बच्चे, किशोर भी सवर्णों की संगत में ही पले-बढे होते हैं, भले ही वे तिरस्कृत होते हैं, सवर्णों की शारीरिक, मानसिक हिंसा झेलते हैं, लेकिन ऐसा करते हुए वे अपने से कमतर, कमजोरों और विशेषकर स्त्रियों के प्रति वैसे ही सामाजिक संस्कारों के साथ जवान होते हैं, जो सवर्ण समाज के होते है। इस तरह दलित पुरूष और सवर्ण पुरुष की मानसिकता में सिवाए जातीय बोध के कोई अंतर नहीं होता है।

इस अंतर का न होना दलित स्त्री के जीवन, उसकी दशा में गहरा अंतर पैदा करता है। दलित महिलाओं विशेषकर ग्रामीण महिलाओं को दोहरा शोषण झेलना होता है। वे सवर्णो के सामंती आचरण की शिकार होने के साथ ही दलितों की पुरूषवादी आचारसंहिता को भी झेलने के लिए विवष होती हैं। इसके अनेक उदाहरणों में एक है, सहरिया आदिवासियों में महिलाओं को गांव की सीमा के अंदर चप्पल नहीं पहनने का फरमान देना। इस नियम को तोड़ने पर उनको जुर्माना देना होता है। यह किसी सवर्ण समाज का निर्णय नहीें , बल्कि उसी समाज का है जो कि खुद शोषित, वंचित है। सुमित्रा और तेजूबाई के प्रकरण मप्र, उप्र, बिहार के गांवों के साथ ही देशभर में बहुतायत हैं। जो हमारे लोकतंत्र, प्रगतिशीलता का दंभ भरने वाले समाज के साथ ही उन लोगों के लिए भी चुनौती हैं, जो वंचितों के हितों के पैरोकार हैं।

दयाशंकर मिश्र

 
     
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