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तमाम कोशिशों के बाद भी दुनिया में बच्चों की एक बड़ी आबादी मेहनत की भटटी में तपने को मजबूर है। आसमान में पतंग उड़ाने, कहीं दूर तक सैर तक जाने, मजे -मौज और पढ़ाई करने वाले दिनों में अपनी इच्छाओं का दमन करके दुनिया के लगभग एक करोड़ बच्चे कहीं कल -कारखानों में, कहीं होटलों में तो कहीं उंची चहारदीवारियों में बंद कोठियों की साफ -सफाई में लगे हैं। कानून किताबों में पड़ उंघ रहा है। क्योंकि उसे जगाने वाले हाथ देखकर भी कुछ नहीं करते बल्कि कई बार तो वह खुद ही कानून तोड़ते नजर आते हैं। और इस पर भी दर्दनाक बात यह कि बच्चों के मुददे कभी विधानसभा और संसद में गंभीरता और नियमितता से उठाए ही नहीं जाते क्योंकि बच्चों का कोई वोट बैंक नहीं होता, बच्चों के मुददे जनप्रतिनिधियों को चर्चा में नहीं लाते।
देश में बालमजदूरों की संख्या 2001 की जनगणना के मुताबिक लगभग सवा करोड़ है। जबकि स्वयंसेवी संस्थाओं के मुताबिक यह संख्या दो करोड नब्बे लाख है। मप्र में यह आंकड़ा दस लाख के आसपास है। मतलब दस लाख बच्चे स्कूल से बाहर हैं। बेहतर शिक्षा से वंचित हैं और शारीरिक -मानसिक विकास से भी। भारतीय संविधान संशोधन के बाद देश के चौदह वर्ष तक के में हर बच्चे को अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा अधिकार दिया गया है। जाहिर है यह दस लाख बच्चे इस हक से तो महरूम हैं ही पर यह संविधान का सीधे -सीधे मखौल उड़ाने वाला प्रहसन भी है। संयुक्त राष्ट महासभा ने 1989 में बच्चों के अधिकारों से संबंधित एक महत्वपूर्ण घोषणा पत्र जारी किया था। बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण की व्यवस्था, निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा, और बालश्रम को दूर कर संरक्षण की व्यवस्था। यह उस घोषणापत्र के तीन मुख्य बिंदु थे। लेकिन इस घोषणापत्र के लगभग सत्रह साल पूरे हो जाने के बाद भी स्थितियों में कोई खास सुधार नहीं आ पाया है।
दूरदराज की तो बात ही छोड़िये। प्रदेश की राजधानी भोपाल में तमाम व्यवस्थाओं के बीच हजारों बच्चे मजदूरी करने को विवश हैं। इनमें ज्यादातर बच्चे झुग्गी -झोपड़ी में रहने वाले हैं। भोपाल में काम कर रही एक गैर सरकारी संस्था बचपन के अध्ययन में चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल एक साल में तकरीबन पांच सौ बच्चे विभिन्न कारणों से पढ़ाई छोड़ मजदूरी में लगे हैं। संस्था ने शहर की बीस बस्तियों का ही अध्ययन किया है, जो भोपाल की कुल बस्तियों का सात फीसदी है। अध्ययन के बाद कहा गया है कि केवल एक साल में स्कूल नहीं जा पाने वाले बच्चों की संख्या 418 है। इनमें भी लड़कियों की संख्या 219 है। जाहिर है इसमें से एक बड़ा वर्ग या तो मजदूरी की मजबूरी तले दब जाता है या पिफर पैसा हाथ में आने के बाद गलत प्रवत्तियों की तरफ चला जाता है। सभ्य समाज इन्हें भले ही गालियां के साथ हेय सा व्यवहार करे पर इसमें दोश किसका है। वह समाज के एक ऐसे ढांचे में पलने को मजबूर हैं। घरेलू बाल मजदूरी को सख्त कानून को मानने वाले कितने लोग हैं। फिर क्या इन बच्चों को गालियां देने से स्थिति सुधरने वाली है।
राकेश मालवीय
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