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बालदिवस और बचपन के सवाल  

 
     
 

हर साल आने वाला बालदिवस बच्चों के लिए नवीन चिंताएं, संकट लाने वाला होता है। हर बाल दिवस एक भयावह तस्वीर के साथ हाजिर होता है। पुराने आंकड़े अधिक डरावने होते जाते हैं और जबकि निठारी जैसे नए सच बच्चों, पालकों के सामने नई चुनौतियां लेकर आते हैं। हमारे देश में शहरी, ग्रामीण और अमीर-गरीब की विभाजक रेखा ने बच्चों के भी दो हिस्से कर दिए हैं। पहली श्रेणी में वे हैं, जो सुबह तैयार होकर, टिफिन लेकर स्कूल के लिए रवाना होते हैं, तो दूसरी कतार में वे हैं, जिनको सुबह से ही दोपहर की एक अदद रोटी की तलाश में निकलना होता है। जाहिर है, बाल दिवस का दूसरी कतार के बच्चों के लिए कोई महत्व नहीं है। बाल दिवस उनके लिए है, जो अपने लंच बॉक्स में फॉस्ट फूड ठूस-ठूस कर ले जाते हैं। महानगरों के मोटियाते बच्चों के लिए बाल दिवस पर चाचा नेहरू के विचारों को रटना अब एक फैशन है। स्टेट्स सिंबल है। सो बाल दिवस इन्हीं बच्चों का है।

आजादी की आधी सदी के बाद और शेयर बाजार के बीस हजार के जादुई आंकडे क़ो छूने, विकास दर के दस फिसदी के नजदीक मंडराने के बाद भी झुग्गियो, असंगठित श्रमिकों के बच्चों के रहन- सहन में कोई बदलाव नहीं आया है। कॉलोनियों के बाहर पड़े कूडेदानों में जूठन तलाशते मासूमों, पन्नी बटोरने वालों की संख्या करोड़ों में है। मां-बाप के प्यार से वंचित, सरकारी अनुदानों, राहतों की छांव से विभिन्न कारणों से दूर इन बहिष्कृत बच्चों को दो वक्त की रोटी तक नसीब नहीं है। इस मामले में पूरी दुनिया की स्थिति गंभीर है।

अंतराराष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट में दुनियाभर में बालश्रमिकों की संख्या 24.6 करोड़ बताई गई है। भारत में यह आंकड़ा 1.7 करोड़ तक जा पहुंचा है, तो मप्र्र्र्र्र में बालश्रमिकों की संख्या 10,65,259 तक पहुंच चुकी है। ऐसे बच्चों के हिस्से में अब भविष्य के सपनों, किताबों की जगह बस एक ही चीज है, हाड़तोड़ मेहनत। मालिकों की प्रतड़ना, उनकी हवस, यौन कुंठाओं की तृप्ति देश के करोड़ों बच्चों की तकदीर है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट तो और भी डराने वाली है। यह रिपोर्ट बताती है कि देश में हर वर्ष 44 हजार बच्चे गायब हो जाते हैं। बच्चों के गायब होने की अगली कड़ी में आते हैं, निठारी कांड जैसे सच! महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का कहना है कि देश के 53.22 बच्चे किसी न किसी रूप में यौन शोषण का शिकार हो रहे हैं। इस शोषण के दायरे में सभी बच्चे आ जाते हैं। उनके बीच किसी तरह की कोई सीमा रेखा नहीं है। बच्चों के यौन शोषण के खतरे जितने तंग बस्तियों में हैं, उससे अधिक कहीं आलीशान इमारतों, बंगलों में हैं। निठारी के नालों से निकले कंकाल इसकी पुष्टि करने के लिए पर्याप्त हैं। निठारी मामले की अब तक की प्रगति और मुख्य अभिक्त के प्रति सीबीआई के ठंडे रवैए से पता चलता है कि बच्चे सरकार के दायरों से बाहर हैं। शिक्षा, बच्चों की सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी नहीं रह गई है। सरकार का सारा गणित पांच साल बाद होने वाले चुनावों के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है। ऐसे में स्वाभाविक है कि आने वाला कल बड़ी संख्या में निरक्षरों, अपराधियों की ज़मात लेकर आएगा। सर्वशिक्षा अभियान जैसे कथित उत्कृष्ट प्रयासों के लिए अपनी ही पीठ ठोंकने वाली मप्र सरकार के राज में 5,93,958 बच्चे स्कूलों से बाहर हैं। इन सब बच्चों के लिए बाल दिवस एक ठीस से अधिक कुछ नहीं है। हमारे यहां कम उम्र में विवाह अति सामान्य घटना रही है। इसका भी बच्चों के विकास, शिक्षा पर बेहद नकारात्मक असर पड़ा है। आज तक मप्र, उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान समेत देश के अनेक गांवों में बैंड-बाजे के साथ बाल-विवाह जारी हैं। गांव की बात तो रहने ही दें। कुछ समय पहले ही मप्र की राजधानी भोपाल में ही अक्षया तृतीया के मौके पर सरकार के एक वरिष्ठ मंत्रीे ही अवयस्क बच्चों के विवाह सामारोह में आशीर्वाद देते देखे गए। प्रदेश के बघेलखंड, बुंदेलखंड और मालवा में हर बरस अक्षय तृतीया को हजारों की संख्या में अवयस्क बच्चों विशेषकर लड़कियों के हाथ पीले कर दिए जाते हैं। भले ही अख़बार, स्वयंसेवी संगठन चिल्लाते-गला फाड़ते रहें। इससे न तो सरकार की नींद खुलती है और न ही रुढ़ियों को परंपरा, संस्कार समझने वालों की। इसकी सबसे बडी कीमत लड़कियों को कम उम्र में मां बनकर चुकानी पड़ती है। प्रदेश में मातृत्व के दौरान बड़ी संख्या में होने वाली माताओं-बच्चों की मौत के पीछे सबसे बड़ा कारण कम उम्र में विवाह ही है। जिस राज्य में विवाह की औसत उम्र अधिक है, वहां पर मातृत्व के दौरान होने वाली मौत के मामलों में भी कमी देखी गई है। इस तरह बच्चों के सामने निरंतर चुनौतियों बढ़ती ही जा रही हैं। उनके बचपन के दुलार, लालन-पोषण की भरपाई जिंदगी के किसी कोने में संभव नहीं है। इसलिए बचपन को संवारने के लिए, सामाजिक रूप से बहिष्कृत होते बच्चों की संख्या में कमी के लिए आवश्यक है कि मीडिया, स्वयंसेवी संगठन और वे तमाम लोग जो बच्चों के हितों की पैरवी में जुटे हुए है, सरकार पर बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास के प्रबंध के लिए और अधिक दवाब बनाएं। ताकि बाल दिवस के सही मायनों में अपने वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त कर सके।

दयाशंकर मिश्र

 
     
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