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  विकास की बयार को तेज करती अमासो  
     
 

किसी आदिवासी महिला के बारे में सोचते हुए हमारे जेहन में जो तस्वीर उभरती है, वह एक अनपढ़, साधनहीन अबला के रूप में होती है, जो अपने पेट बच्चे को चिपकाये जंगल में लकड़ी बीन रही होती है। लेकिन अब ऐसी बात नहीं रही। हजारों ऐसे गांव हैं, जहां आदिवासी महिला बने-बनाये फ्रेम से बाहर आकर अपना नया रूप दिखा रही है। अब ऐसी अबला महिलाएं सषक्त होकर दूसरों को सषक्त कर रही हैं, गांव का विकास कर रही हैं और अपने बारे में नये सिरे से विष्लेषण करने के लिए नागर समाज को प्रेरित कर रही हैं। ऐसी ही महिलाओं में से एक का जीवंत उदाहरण है, छिंदवाड़ा जिले के अमरवाड़ा विकासखण्ड के तिंसई पंचायत की आदिवासी महिला सरपंच अमासो बाई। पंचयातीराज व्यवस्था ने ऐसी महिलाओं को समाज की मुख्यधारा में लाने की राह आसान कर दी और ये महिलाएं रहबर बन गई हैं। अमासो के जिस काम से उसके सषक्तिकरण का प्रमाण मिलता है, वह काम है पंचायत में शराबबंदी। आदिवासी पंचायत में शराबबंदी एक कठिन और अकल्पनीय काम है, पर सच यही है कि अमासो ने कुछ नियम बनाते हुए यह कठिन काम कर दिखाया है।

मध्यप्रदेष में 2004 के पंचायत चुनाव में तिंसई पंचायत महिला सीट घोषित होने के  बाद पहली बार किसी चुनावी प्रक्रिया में शामिल होकर गरीब आदिवासी महिला अमासो बाई सरपंच बनी। शुरुआती दिनों में तो पंचायत के सभी लोगों को अपना बनाने में ही अमासो के पसीने छूट गए। जो महिलाएं हार गई थी, उनके गुट के लोग अमासो से नाराज थे और वे चाहते थे कि अमासो एक असफल सरपंच साबित हो। पर अमासो मजबूत इरादो वाली महिला है। उसने बिना भेदभाव के गांव में छोटे-छोटे विकास कार्यों को करना शुरू किया और लोगों के दिल में जगह बनाया। विरोधी भी अमासो के कार्य से प्रभावित होने लगे और साल बीतते ही उन्होंने पंचायत के विकास के लिए अमासो का साथ देना शुरू कर दिया।

अमासो अपने गांव में एक बड़ी समस्या को देख रही थी - गांव में शराब पीकर खुलेआम मारपीट और उसे लेकर थाना एवं कोर्ट का चक्कर। गरीब आदिवासियों के पिछड़ेपन के एक कारण के रूप में देख रही अमासो को इस बात से बहुत दु:ख होता था। मदिरा सेवन आदिवासी परंपरा का अभिन्न अंग है पर अत्यधिक मदिरा सेवन के बाद तिंसई में अक्सर आपसी झगड़ा होता था। थाने में केस दर्ज होने पर मुलजिम के परिवार को पानी पैसे की तरह बहाना पड़ता है, जिसके चलते परिवार की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती थी। शराबबंदी के लिए अमासो बाई ने गांव की महिलाओं और युवाओं के माध्यम से पहल की। धीरे-धीरे गांव के सभी वर्गों को संगठित कर 'आदिवासी श्रमिक संगठन' का निर्माण किया, जिसकी अगुवाई अमासो ने की।

अमासो बाई ने इस बात को लेकर गांववालों को समझाना शुरू किया। अथक प्रयासों के बाद लोग अमासो के बात से सहमत हुए, पर इसके साथ ही उन्होंने इस मामले में कुछ छूट भी मांगी। इस तरह से कुछ शर्तों के साथ तिंसई पंचायत में शराबबंदी हो गई और पंचायत के पांचों शराब की दुकानें भी बंद हो गई। आखिरकार अमासो ने वह कर दिखाया जो वर्षों के सेवारत पुरुष सरपंच और पंच भी नहीं करवा पाए या यूं कहे कि इस बात पर उनका कभी ध्यान ही नहीं गया। अब तिंसई पंचायत में शराब के क्रय-विक्रय पर पूरी तरह पाबंदी है। इस नियम को तोड़ने वाले पर जुर्माना भी किया जाता है। अगर कोई व्यक्ति सरेआम मदिरा का सेवन करते पकड़ा जाए तो उसे दो हजार रुपए जुर्माना अनिवार्य रूप से भरना पड़ेगा और यदि कोई शराब बेचता है तो उसे एक हजार रुपए जुर्माना लगाकर दंडित किए जाने का प्रावधान किया गया है। हां, एक बात और, जो व्यक्ति इसकी सूचना देगा, उसे ईनाम के रूप में में 500 सौ रुपए दिए जाने का नियम भी बनाया गया।

आदिवासी परंपरा के अनुसार केवल त्यौहार, जष्न आदि में अपने घर पर मदिरा बनाए जाने और उसके सेवन करने का छूट ग्रामीणों को दिया गया है। यदि कोई मेहमान आ जाए, तो उसके स्वागत के लिए भी महुआ से बना मदिरा दी जा सकती है, पर वह घर पर ही बना हुआ होना चाहिए और पीने के बाद गांव में गाली-गलौच नहीं होना चाहिए। इसका व्यापक असर इस गांव में हुआ है।

अमासो बाई का यह प्रयत्न सिध्द करता है कि महिलाएं परंपराओं की संरक्षक हैं और सामाजिक परम्पराएं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं किन्तु इनको बनाये रखने मेें अगर अपनों का सुख और भविष्य दांव पर लगने लगे, तो इन्हें बदलने में संकोच नहीं करना चाहिए। साथ ही शराबबंदी के कारण बचत भी बढ़ गई है, जिससे बच्चों का बेहतर देखभाल होने लगा है। पहले गांव के लोगों को शराब के कारण ही थाना का चक्कर लगाना पड़ता था, पर अब लोगों को थाना से मुक्ति मिल गई है। यह लोगों को साफ समझ में आ रहा है, इसलिए ग्रामीणों ने अमासो को इस मसले पर साथ देने का निष्चय कर लिया है।

समाज के विकास कार्यों में संलग्न अमासो बाई पंचायत चुनाव के पहले गांव के मर्दों से बात करने में भी संकोचती थी। पर जब लोगों ने सहयोग कर उस पर विष्वास जताया और उसे संवैधानिक अधिकार मिले तो उसके अंदर सषक्त नारी ने जन्म लिया। महिला सषक्तिकरण का यह उदाहरण साबित करता है कि यदि महिलाओं को आगे बढ़ने का मौका दिया जाए तो महिलाएं हर क्षेत्र में विकास के नए द्वार खोल सकती हैं। 1975 में अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष का भारत में उद््घाटन करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने कहा था, ''ऐसा कोई काम नहीं है, जिसे महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर नहीं कर सकती।'' निष्चय ही अमासो ने इंदिरा गांधी के उक्त कथन को सिध्द कर दिया है।

सीमा जैन

 
     
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