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  घोषणा पत्रों में बंद रह गये सरोकार!!  
     
 

ऐसा नहीं है कि 15वीं लोकसभा के चुनावी घोषणा पत्रों में देष-समाज के सरोकारों के मुद्दे नहीं हैं पर वास्तविक परिदृष्य यह है कि इन चुनावों-घोषणाओं के पीछे छिपे यथार्थ, नजरिये और सामने नजर आ रही संभावनाओं पर बहस, चर्चा या संवाद नहीं है। राजनैतिक दल भी विकास के विचार को लेकर रैलियों के मंच पर खड़े नहीं है। वे तो छिछली भाषा और दोयम दर्जे के व्यवहार को ही प्रचार का सर्वक्षेष्ठ साधन मान रहे हैं। कांग्रेस ने खाद्य सुरक्षा कानून बनाने का वायदा किया तो वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने पानी को व्यक्ति का मौलिक अधिकार बनाने की घोषणा की है। बच्चों और षिक्षा के मामले में चुनावी घोषणापत्र बेहद निराषाजनक है।

भाजपा ने जैव संषोधित (जीएम) खाद्यान्न उत्पादन से पहले इसकी जांच करने की बात के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन पर भी विचार किया है परन्तु वह बच्चों के अधिकारों को भूल भी गई। ऐसा लगता है कि मध्यप्रदेष के मुद्दे  दिल्ली तक नहीं पहुंच पाये। सबसे ज्यादा कुपोषण, सबसे ज्यादा षिषु मृत्युदर होने के बावजूद इतने बड़े मसले चुनावी घोषाणाओं के केन्द्र में नहीं आ पाये।

कमल ने विकास के लिये अधोसंरचनात्मक विकास पर 25 लाख करोड़ रूपये खर्च करने की बात कही है तो कांग्रेस ने आर्थिक और सामाजिक मसलों के बीच संतुलन बनाने की कोषिष की है। नजरिया कुछ भी हो किन्तु 15वीं लोकसभा के चुनावों में विकास का एक विचार तो नजर आता है जो बात दोनों में साझा है। वह यह कि नई सरकार कृषि को अब एक खुले बाजार का व्यापार बनाने की कवायद करेगी, यह अब केवल सामाजिक अर्थव्यवस्था नहीं होगी। कांग्रेस ने कृषि की विविधता के नाम पर ग्रामीण औद्योगिकीकरण की मंषा जताई है जिससे कम्पनियों का दखल बढ़ेगा और अनुबंध खेती भी।

विकास के लिये भूमि अधिग्रहण जारी रहेगा, बस एक नीति बनेगी कि भूमि धारक को कीमत ठीक से मिले। विस्थापन का मसला लगातार बना रहने वाला दीखता है क्योंकि सत्ता में कोई भी दल हो, सड़क, बांध, उद्योगों के लिए सरकार जमीनें लेकर विकास की योजनायें बनाती रहेगी।

भाजपा ने कहा कि अधिग्रहण के नाम पर लोगों से भूमि छीनी नहीं जाना चाहिये और जीएम खाद्यान्न तब तक नहीं आ जायेगा, जब तक प्रकृति, पर्यावरण और इंसानों पर इसके प्रभावों का पूरा अध्ययन न हो जाये। यह अच्छी सोच है किन्तु वह बच्चों के समग्र अधिकारों को कैसे भूल गई यह आष्चर्यजनक है। जलवायु परिवर्तन इस बार के चुनावी घोषणाओं का हिस्सा बन गया है क्योंकि इसका असर पूरे मानव अस्तित्व को प्रभावित करने वाला है। मध्यप्रदेष में जलवायु परिवर्तन के कारण खाद्यान्न उत्पादन में 15 से 20 फीसदी की कमी आई है, मलेरिया बढ़ रहा है और जल संकट चरम स्तर पर पहुंच गया है। देखना यह है कि इससे निपटने के लिये जिस समाज-समुदाय आधारित व्यवस्था की जरूरत है उसे बनाने के लिये कांग्रेस-भाजपा पूंजीवादी बाजार को किस हद तक अपनी गोद से दूर रख पायेंगे। 

चुनाव चल रहा है पर बिजली संकट से अंधेरा अब भी छाया हुआ है। मध्यप्रदेष आमतौर पर एक से लेकर ढाई हजार मेगावाट ऊर्जा की कमी का सामना करता है यहां बड़े शहरों में 4 से 6 घंटे अंधेरा रहता है तो गांवों में 16 से 20 घंटे बिजली गुल रहती है। इससे कृषि, स्वास्थ्य, षिक्षा, व्यापार और रोजगार सबकुद पर गहरा असर पड़ रहा है। परमाणु ऊर्जा समझौता करने के बाद भी कांग्रेस कहती है कि 12 से 15 हजार मेगावाट ऊर्जा का हर वर्ष उत्पादन बढ़ायेंगे परन्तु भाजपा ने कम से कम बिजली उत्पादन के मामले में वायदा तो दिल खोलकर किया है, वह कांग्रेस से दो गुना ज्यादा ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने का दावा कर रही है।

खाद्य सुरक्षा और कृषि के संकट को भारतीय जनता पार्टी ने एक दूसरे के साथ जोड़कर देखने की कोषिष की है। भाजपा ने एक ओर खाद्य सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के बराबर तवज्जो देने की बात कही है तो वहीं दूसरी ओर सामाजिक-आर्थिक असमानता और शोषण के कारण देष के भीतर बढ़ रही नक्सली हिंसा को सलवा-जुडूम सरीखे दमनकारी तरीकों से दबाने की बात कही है। बहरहाल भाजपा ने कृषि मजदूरों की आय की जरूरत को स्वीकार करते हुये किसानों के लिये भी सुनिष्चित आय की बात कही है परन्तु भाजपा इस मसले पर कितनी गंभीर है इसका आंकलन इस तथ्य से लग जाता है कि भाजपा शासित मध्यप्रदेष और छत्तीसगढ़ उन पांच राज्यों में शुमार हैं जहां सबसे ज्यादा किसानों ने आत्महत्यायें की हैं। मध्यप्रदेष में कर्जे, सिंचाई और बिजली के संकट से विगत 8 वर्षों में दस हजार किसानों ने अपना जीवन खत्म किया है।

खाद्य सुरक्षा के संदर्भ में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही 2 से 3 रूपये किलो गेहूं- चावल के जाल में फंसे हुये हैं और मानते हैं कि केवल राषन की दुकान से ही खाद्य सुरक्षा का रास्ता निकलता है लोकोन्मुखी भूमि सुधार कार्यक्रम की बात न तो भाजपा ने की है न ही कांग्रेस ने। भाजपा ने राष्ट्रीय भूमि उपयोग प्राधिकरण की स्थापना की बात कही है, पर ज्यादातर ऐसे प्राधिकरण बाजार की गोद में जा बैठते हैं। भूमि के वितरण में असमानता को दूर करने के लिये लैण्ड सीलिंग एक्ट के पालन की बात भी छोड़ दी गई है।

कांग्रेस ने खाद्य सुरक्षा कानून बनाने का वायदा किया है पर उसमें केवल सार्वजनिक वितरण प्रणाली का श्वेत-ष्याम ख्वाब दिखाई दे रहा है। ऐसा लगता नहीं है कि खाद्यान्न उत्पादन, उत्पादक यानी किसान को संरक्षण उनकी नीति के हिस्से है। इस मसले पर यही लगता है कि सन् 2020 तक वे सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 6 प्रतिषत के निचले स्तर तक ले ही आयेंगे। मध्यप्रदेष में कभी भी कांग्रेस पिछले पांच वर्षों में किसानों के हक में राजनैतिक आंदोलन नहीं छेड़ सकी क्योंकि बड़ी गलतियाँ केन्द्र में विराजमान कांग्रेस ही कर रही थी। विगत दस वर्र्षो में मध्यप्रदेष में खाद्य उत्पादन और उत्पादकता दोनों में कमी आई है पर इस संकट पर ध्यान देने के बजाये पक्ष-विपक्ष ने औद्योगिकीकरण और रियल एस्टेट को भारी बढ़ावा दिया है। मध्यप्रदेष में 20 सेज (विषेष आर्थिक प्रक्षेत्र) पर काम चल रहा है। जिनमें से 3 नोटिफाई हो चुके हैं और 5 को औपचारिक स्वीकृति मिल चुकी है। इन पर 40 हजार एकड़ से ज्यादा जमीन जाने वाली है परन्तु सिंगरौली के जन-संग्राम से भी राज्य सरकार ने कोई सबक नहीं लिया। भाजपा और कांग्रेस दोनों थोड़े-मोड़े बदलाव के साथ सेज की नीतियों-कानून को लागू करती रहेंगी। बस वामपंथी दल इसकी खिलाफत कर रहे हैं। सेज जैसे मुद्दों पर भाजपा-कांग्रेस का मौन खतरनाक है।

बीमा योजनाओं से कांग्रेस ने सबके स्वास्थ्य की गारण्टी लेने की बात कही है और भाजपा ने भी ऐसा ही वायदा किया है पर दोनों ने ही स्वास्थ्य के अधिकार को संवेैधानिक मूलभूत अधिकार बनाने में कोई रूचि नहीं दिखाई है। ये निजी क्षेत्र के विस्तार का समर्थन करती हुई दिखी है। अब स्वास्थ्य का क्षेत्र पूरी तरह से बीमा कम्पनियों के साथ में जायेगा, चुनावी घोषणा पत्रों से यह तय नजर आ रहा है। स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च न बढ़ने के संकेत भी दे दिये गये।

बच्चों के अधिकार को लगभग छोड़ ही दिया गया है। भाजपा ने गाय-गोवंष को तो तवज्जो दी है किन्तु बच्चों को एक विषेष वर्ग का दर्जा नहीं दिया है। उन्होंने केवल षिक्षा को बच्चों की जरूरत माना है जबकि उनके पोषण, स्वास्थ्य, विकास के अधिकार बेहद महत्वपूर्ण है। मध्यप्रदेष देष का वह राज्य है जहां बच्चों के खिलाफ सबसे ज्यादा ंहिंसा होता है और यहां 11 लाख बाल-श्रमिक हैं पर भाजपा मौन रही। कांग्रेस ने एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम को सुदृढ़ बनाने की बात कही है। कुपोषण पर केवल एक-एक वाक्य भाजपा और कांग्रेस ने लिखकर अपने कर्तव्य पूरे कर लिये।

कांग्रेस और भाजपा ने उच्च षिक्षा के लिये हजारों करोड़ रूपये के ऋण देने के वायदे किये हैं किन्तु बच्चों को समान और गुणवत्ता पूर्ण षिक्षा नहीं दी जायेगी, यह भी बता दिया। स्कूलों की ढांचागत स्थिति बेहद दर्दनाक है, उसमें मूलभूत बदलाव के वायदे किसी ने नहीं किये। स्कूलों की छतें चिचाती रहेंगी, लड़कियों के लिये शौचालय-पीने का पानी न होगा, इमारतें दूटी-लड़खड़ाती रहेगी। समझ नहीं आता कि मौलिक अधिकार बना दिये जाने के बावजूद षिक्षा की उपेक्षा क्यों? रोजगार और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के बारे में कांग्रेस ने रोजगार गारण्टी कानून में मजदूरी बढ़ाकर 100 रूपये करने और युवाओं की क्षमतावृध्दि के लिये 30 हजार करोड़ रूपये खर्च करने का वायदा किया। परन्तु भाजपा ने राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी योजना का कोई उल्लेख तक नहीं किया क्योंकि वह मानती है कि नरेगा भारत का नहीं कांग्रेस का कानून है। यह बात अलग है कि भाजपा शासित मध्यप्रदेष ने ही इस योजना के तहत तीन साल में कांग्रेस की केन्द्र सरकार से 8 हजार करोड़ रूपये झटक के अपना आधार मजबूत किया।

एक तरफ तो तटीय इलाकों में निजी क्षेत्र की कम्पनियों को कानूनन बढ़ावा देकर कांग्रेस ने मछुआरों के लिये संकट पैदा किया तो दूसरी ओर वह मछुआरों, बुनकरों, ताड़ी निकालने वालों, चर्म कर्मकारों, बागान मजदूरों, निर्माण कर्मियों, बीड़ी मजदूरों, अकेली महिला, बुजुर्ग, अपाहिज, शहरी बेघर, बंधुआ मजदूर और आदिम जनजातियों के लिये सामाजिक सुरक्षा सुनिष्चित करने की बात कही है। भाजपा ने विकलांगों की आय बढ़ाने और उनके लिये सुविधाओं को सुनिष्चित करने और वृध्दों के लिये आर्थिक सहायता की व्यवस्था करने का भाजपा ने वायदा किया है। वर्ष 2002 से गरीबी की रेखा की बहस ने सरकार की मंषाओं तक पर सवाल खड़े कर दिये। केन्द्र सरकार (फिर वहां पार्टी कोई भी हो) हमेषा गरीबी के आंकड़ों को बुहारकर लाल कालीन के नीचे रखने वाली नीति की हिमायती रही है ताकि गरीबों पर कम खर्च करना पड़े पर राज्य सरकारें उन कालीनों को उघाड़ती रही है। मध्यप्रदेष को भारत सरकार ने बताया कि यहां 42 लाख गरीब परिवार है पर राज्य सरकार ने कहा ये परिवार 70 लाख हैं। इसी बहस ने कई राजनैतिक युध्द भी करवाये पर चुनावी घोषड़ा पत्र में किसी भी राजनैतिक दल को मानवीय बनाने जैसे बड़े और संवेदनषील मसले को हाथ नहीं लगाया। हालांकि उन्हें पता है कि उनका आधे से ज्यादा घोषणा पत्र उन्हीं लोगों के लिये है जो गरीबी की रेखा के नीचे हैं।

सचिन कुमार जैन

 
     
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