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  चुनावी पर्यावरण में जलवायु परिवर्तन के सवाल  
     
 

पश्चिम बंगाल के सुन्दरबन भारत के सबसे सघन वनों और जैव विविधता वाले वन रहे हैं, वहां विगत 10 वर्षों में जमीन समुद्र के बढ़ते जल स्तर के कारण खारेपन की शिकार हो गई और खेती बर्बाद। राजस्थान में एक रेगिस्तानी गर्म इलाके की व्यवस्था है, वहां बाड़मेर में लगातार वर्षा के कारण बाढ़ आ रही है। मध्यप्रदेश में खाद्यान्न उत्पादन में 10 से 20 फीसदी और उत्पादकता में 20 फीसदी तक कमी आयी है। और पिछले 15 वर्षों से हर साल सूखा पड़ रहा हे। मुछआरों की आजीविका लगभग खत्म हो रही है। हड़प्पा-मोहन जोदड़ो की सभ्यता जलवायु परिवर्तन के कारण ही खत्म हुई है।

मौसम में बढ़ती गर्मी, सूखते बादल और हवाओं का बदलता रूख अब हमारे अस्तित्व का सवाल बन रहा है। जलवायु परिवर्तन का असर महज शोध और अध्ययन का विषय नहीं माना जाना चाहिये। यह हमारी जिन्दगी पर सीधा असर डाल रहा है। इससे बीमारियां, मंहगााई और मौतें बढेंगीे, फिर धरती का सौंदर्य खत्म हो जायेगा। हालांकि आज के चुनावी दौर में प्रचार मंचों पर राजनैतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोपों और छिछले वक्तव्यों के बीच कुछ बेहद अहम् और बुनियादी मसले खो से गये हैं। परन्तु 15वीं लोकसभा का चुनाव एक मायने में महत्वपूर्ण माना जायेगा कि इस मर्तबा भारत की तमाम राजनैतिक विचारधाराओं ने पहली बार जलवायु परिवर्तन के संकट को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया है। अब छिछलापन अभिव्यक्ति के अधिकार में औपचारिक रूप से शामिल होता नजर आ रहा है। पहले कुछ विषेष मामलों में घर्षण नजर आता था, अब यह राष्ट्रीय चरित्र बन रहा है। अब इससे सकल धरेलू उत्पाद वृध्दि में 7 से 11 प्रतिषत कमी आ रही है। खैर फिर भी उम्मीद है, इसके संकेत हमें मिल चुके हैं। अब से कुछ समय पहले तक पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन का सवाल केवल संयुक्त राष्ट्र संघ, कुछ विद्वानों या फिर गिनी चुनी संख्याओं का शगल माना जाता रहा किन्तु 15 वीं लोकसभा के राष्ट्रीय पर्व में यह एक चुनावी मसला तो बन ही गया।

भारतीय जनता पार्टी एक वैचारिक धरातल पर बात करते हुये कह रही है कि वह विकास के लिये स्थाई पारिस्थितिकीय मार्ग का अनुसरण करेगी जो जलवायु परिवर्तन के लिये जिम्मेदार ग्रीन हाउस गैर उत्सर्जन कम करते हैं। और एक, निम्नकार्बन वाली अर्थव्यवस्था का निर्माण करके इस संकट का शमन करने का अवसर है।

भाजपा ने जलवायु परिवर्तन के नियंत्रण को समुचित महत्व देने का वायदा किया। इसके लिये ऊर्जा पद्वतियों पर काम, पारम्परिक वर्ष सिंचित फसलों को बढ़ावा देने वाली बाते हैं। इसमें दो संकट हैं पहला तो वे इस नीति में विष्वास करते हैं कि हम विकसित देषों से आर्थिक मदद लेकर कार्बन ट्रेडिंग करें और जंगलों से वन्यप्राणी संरक्षण के नाम पर माव समाज की बेदखली को ज्यादा बढ़ायेंगे। आष्चर्य है कि भाजपा ने जीवनषैली में बदलाव पर जोर नहीं दिया है। वह जलवायु परिवर्तन के बहाने सामाजिक वानिकी, निजी भागीदारी को बढ़ावा देने की पहल करना चाहेगी। इससे संसाधनों पर राज्य-निजी क्षेत्र का नियंत्रण बढ़ेगा। भाजपा ने हिमालय के ग्लेषियर को संरक्षण करने की बात की है परन्तु वह चूंकि बढ़े बांधों की हिमायती है इसलिये संभव है कि गंगा के उद्गम से ही बांधों की प्रक्रिया को वह तेजी से बढ़ायेगी इसमें वहां से निकलने वाली नदियाँ, जैसे - गंगा, मर जायेंगी। कांग्रेस अपने विकास के उस मामले को किसी भी तरह से बदलना नहीं चाहती है, जिससे जंगल और प्राकृतिक संसाधनों का विनाष तो हो ही रहा है, बदलते जीवन व्यवहार से उष्मीकरण (गर्मी) बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के लिये बनी राष्ट्रीय कार्ययोजना को आगे बढ़ायेगी। इसमें लोगों की आकांक्षायें और आर्थिक विकास दोनों को तवज्जो दी जायेगी। मुष्किल यह है कि समाज के व्यवहार को भी हमारी सरकारों ने बदल दिया है, और विलासिता आधारित सेवायें ही लोगों की आकांक्षाओं के रूप में परिभाषित की जा रही हैं, खासतौर पर कांग्रेस द्वारा। बस माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी इस मसले पर शांत दिखी।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कुल 7 पंक्तियाँ इस मसले पर लिखी हैं परन्तु सबसे गहरी और बुनियादी बातें इसमें ही हैं। वह कहती है कि हमें अपने और दुनिया के हितों में घातक उत्सर्जन को कम करना चाहिये पर भारत को दुनिया के कुछ अन्य देषों द्वारा पर्यावरण को पहुंचाये गये ऐतिहासिक नुकसान की भरपाई करने के दबाव से मुक्त होना चाहिये। विकसित और पूंजीवादी देष चाहते हैं कि भारत आर्थिक मदद देकर यहां कार्बन का व्यापार किया जाये, इस तरह की योजनाओं को समूल नष्ट करना होगा। तमिलनाडु की द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टी होते हुये भी राष्ट्रीय राजनीति को हमेष प्रभावित करती रही है। इनके घोषणा पत्र में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन पर हम काम को और आगे बढ़ायेंगे। वन एवं पर्यावरण के विषय संविधान की समवर्ती सूची मे हैं इसलिये राज्य सरकार इसमें कानून नहीं बना सकती है, ऐसे में केन्द्र सरकार यदि कोई कार्यक्रम बनाती है या अनुबंध करती है तो उसे राज्य सरकार से सहमति-संवाद के बाद ही उन्हें अंतिम रूप देना चाहिये, बहरहाल हम केन्द्र सरकार पर दबाव बनाते रहेंगे।

जयललिता की एआईएडीएमके ने इस विषय पर एक भी शब्द नहीं कहा है। बहुजन समाज पार्टी घोषणा पत्र जारी नहीं कर रही है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने जिन्हें देष के लिये अहम् मुद्दे माना है उनमें से आधे से ज्यादा केवल आर्थिक और आर्थिक मंदी से जुड़े हैं पर्यावरण, सामाजिक न्याय और जलवायु परिवर्तन नहीं।

समग्रता में देखा जाये तो जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में विचारों और व्यवहारों में बड़ा अंतर देखा जा सकता है। लगातार ऐसी वस्तुओं और साधनों को सस्ता बनाया गया है जो हमें आराम तो देती हैं पर पर्यावरण्ा का सत्यानाष करती हैं। उन्हें सीमित करने के बजाये सरकारें उन्हें बढ़ावा देती रही। औद्योगिकीकरण और शहरीकरण ने जैव विविधता और प्राकृतिक व्यवस्था को लगभग ध्वस्त कर दिया है और पिछले 9 वर्षों में भारत का ग्रीन हाउस उत्सर्जन में योगदान दुगुना हो गया है, हांलाकि अब भी यह अमेरिका से 76 फीसदी कम उत्सर्जन करता है। वर्तमान विकास की परिभाषा और नीतियों से जलवायु परिवर्तन होगा ही जो अब कैंसर, मलेरिया, कोलेरा, तपेदिक, तनाव और श्वांस की बीमारियों में बेतहाषा वृध्दि क़रेगी। इससे समाज पर दोहरा बोझ बढ़ेगा क्योंकि अब स्वास्थ्य सेवाऐं भी खुले बाजार में हैं सरकारें इन बीमारियों को पैदा करके स्वास्थ्य सेवाओं के व्यापारियों के लिए नये षिकार पैदा कर रही है। बहरहाल दुखद यह है कि जो विचार और वायदे कांग्रेस, भाजपा, वामपंथी सहित कुछ दलों ने अपने घोषणापत्रों में दर्ज किये हैं उन्हें लोगों (जिन्हें हम मतदाता कहते हैं) तक पहुंचाने की कोई जद्दो-जहद नजर नहीं आई।

जलवायु परिवर्तन के मसले पर गंभीर काम करने की अगर मंषा है तो जरूरत थी कि तमाम राजनैतिक दल पहले विकास की परिभाषा की समीक्षा करते क्योंकि खदानों, तकनीकों के असीमित विस्तार, जंगलों की कटाई, कार्बन पैदा करने वाले यंत्रों के बढ़ते उपयोग (फ्रिज, एसी, कम्प्यूटर, मोबाइल आदि) ने पर्यावरण के चक्र को झकझोर कर रख दिया है परन्तु किसी दल ने हम पर बात नहीं की। ऐसा साफ दिखता है कि सत्ताा में कोई भी राजनैतिक दल आये, नीतियाँ और विकास की योजनायें वहीं रहेंगी जो पिछले 20 सालों से चल रही है। यह केवल राजनैतिक व्यवस्था पर ही सवाल नहीं है बल्कि लोकतंत्र के कमजोर होने का संकेत है। इसका मतलब यह भी है कि वास्तव में प्राथमिकताये तो सरकार मे वही महत्वपूर्ण मानी जाती है जो सत्ताा को प्रभावित करने वाले वर्ग बना रहे हैं। इसमें बहुराष्ट्रीय कम्परियाँ और पूंजी के प्रबंधक अहम् भूमिका में हैं। जिन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता है कि कौन सत्ताा में आ रहे हैं। देष की पूंजीपतियों की सस्ंथा सीआईआई ने कहा भी कि भारत के चुनावों का 50 फीसदी खर्च तो हम उठाते है। जो वह नहीं कहें कि इसका मतलब यह है कि सरकारें वही करेंगी जो हमें चाहिये। मुष्किल यह भी है कि इस मुद्दे को सामाजिक न्याय का मुद्दा नही माना जा रहा है। बेहद जरूरी है कि जलवायु अंकेक्षण (क्लाइमेट आडिट) की व्यवस्था को राष्ट्रीय कार्ययोजना का हिस्सा बनाया जाये और हर वर्ष इसके कारणों पर श्वेत-पत्र जारी किया जाये। और इस संकट की अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को समझ कर कदम उठायें जायें।

सचिन कुमार जैन

 
     
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