राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 और इसकी अंदरूनी विसंगति

कोविड19 काल में खाद्य सुरक्षा

कोरोना संघर्ष में भारत की दो सबसे बड़ी ताकतें राशन व्यवस्था और किसान

भारत की खाद्य नीति का संक्षिप्त इतिहास 

आधुनिक विश्व के इतिहास में द्वितीय विश्‍व युद्ध के गहरे असर दिखाई देते हैं. भारत की खाद्य सुरक्षा की स्थिति पर भी इसका बहुत गहरा असर था. उन स्थितियों में तत्कालीन गवर्नर जनरल की परिषद20200613 201855 में शामिल वाणिज्य सदस्य के अंतर्गत खाद्य विभाग की स्थापना की गई. इस मसकद का प्रस्ताव 30 नवंबर 1942 को रखा गया कि 1 दिसंबर 1942 से खाद्य विभाग काम करना शुरू करे. इसके बाद 10 दिसंबर 1942 को भारत की सभी प्रांतीय सरकारों और केंद्र से संचालित प्रदेशों को सूचना दी गई कि  "मुझे यह कहने का निदेश हुआ है कि भारत सरकार के खाद्य विभाग ने कार्य शुरू कर दिया है और इसने चीनी और नमक (लेकिन चाय अथवा कॉफी नहीं) सहित खाद्य पदार्थों के मूल्‍य और संचालन को नियंत्रित करने से संबंधित सभी मुद्दे अपने हाथ में ले लिए हैं. खाद्य पदार्थों से संबंधित निर्यात व्‍यापार नियंत्रण संबंधी प्रशासन इस विभाग को हस्‍तांतरित करने के संबंध में अधिसूचना जारी की जा रही है. सेना के लिए खाद्य पदार्थों की खरीद, जो इस विभाग का एक कार्य होगा, एतद्पश्‍चात् घोषित की जाने वाली तारीख तक आपूर्ति विभाग द्वारा जाती रहेगी." इसका आशय यह है कि खाद्य विभाग का शुरूआती काम मूल्य और उनका वाणिज्यिक उपयोग को संचालित करना था.

वास्तव में 1960 का दशक स्वतंत्र भारत के इतिहास में खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के नज़रिए से बहुत महत्वपूर्ण रहा है. पडौसी देशों से युद्धों और सूखे की स्थितियों ने भारत के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी कीं. वर्ष 1965 में देश में खाद्यान्न की कमी को ध्यान में रखते हुए खाद्य निगम अधिनियम, 1964 लागू किया गया, और स्थापना हुई भारतीय खाद्य निगम की. 

हम सब जानते हैं कि 1965 के बाद के वर्षों में भारत ने हरित क्रान्ति की नीति अपनाई. जिससे देश में खाद्यान्नों का उत्पादन बढ़ा. तब उत्पादकों को बाज़ार की उठक-पुथल से बचाने, खाद्यान्न की जमाखोरी रोकने, कीमतों के नियंत्रण और विपरीत परिस्थितियों में देश की खाद्य सुरक्षा को सुरक्षित रखने की व्यापक नीति बनने की प्रक्रिया शुरू हुई. 1983 में खाद्य और कृषि मंत्रालय दो अलग-अलग मंत्रालय बना दिए गए. इससे खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्रालय का गठन हुआ.

भारत की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में वर्ष 1965 से यह व्यवस्था है कि भारत सरकारें, राज्य सरकारों के साथ सामंजस्य बना कर रबी और खरीफ़ उत्पादन मौसम के दौरान उत्पादकों से खाद्यान्न (मुख्य रूप से गेहूं और धान) की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी करती हैं. इसी व्यवस्था के तहत भारत में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की नीव रखी गई. इस प्रणाली के माध्यम से भारत सरकार सस्ती दरों पर नागरिकों को खाद्यान्न उपलब्ध करवाती रही है. आज इस व्यवस्था को सबसे अधिक सम्मान देने की है. अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि को भारत की राजनीतिक अर्थव्यवस्था के केंद्र में लाया जाना चाहिए.

प्रकाशक - विकास संवाद

लेखन एवं संयोजन,  सचिन कुमार जैन

प्रकाशित- जून, 2020

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