बालश्रम समाज का एक बड़ा मुद्दा है। हम सभी अपने आसपास होटलों में, कारखानों में, दुकानों में बच्चों का बचपन छिनते देखते हैं। यह उतना ही दुखद है कि हमारा समाज बच्चों को महफूज बचपन उपलब्ध करवा पाने में अक्षम साबित हुआ है। यह सीधे-सीधे बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन करता नजर आता है। आखिर ऐसी क्या मजबूरियां हैं कि पढ़ने-लिखने और खेलने-कूदने की उम्र में बच्चे हाडतोड़ मेहनत करने पर मजबूर हैं।
बाल श्रम पर केन्द्रित सभी सवालों का जवाब देने की कोशिश करती है पुस्तिका बालश्रम। इस पुस्तक में इस गंभीर विषय के कानूनी पहलुओं, सामाजिक-आर्थिक कारण और इससे जुड़े सभी आयामों को पिरोने की कोशिश की गई है। यह एक तरह की प्रशिक्षण पुस्तिका है और जमीनी कार्यकर्ताओं के लिए उपयोगी साबित होगी।
लेखक: रोली शिवहरे एवं प्रशांत दुबे |