हम जब तक आधुनिक विकास पर प्रश्न नहीं करेंगे तब तक संभवत: हम विस्थापन पर भी प्रश्न करने के हकदार नहीं होंगे। अगर हमें अपने बच्चों को या दूसरे शब्दों में कहें तो यदि हमें अपने भविष्य को बचाना है तो आवश्यक है कि हम अब बजाए और सवाल करने के जवाब ढूंढने को तत्पर हो जाएं। जवाब हमारे पास ही है सिर्फ ऑंख खोलकर देखना होगा। यदि इन विस्थापित बच्चों को पूरे स्नेह से देखें तो जवाब उनकी ऑंखों में मिल जाएगा सिर्फ ईमानदारी से उसे पढ़ने की कोशिश करना होगा।
विस्थापन की त्रासदी पढ़ने का एक ऐसा ही मौका देती है किताब बचपन से विस्थापन। चिन्मय मिश्र इसके लेखक हैं। चिन्मय का जनांदोलन और विकास पत्रकारिता से लंबा रिश्ता रहा है। अपनी यात्रा में उन्होंने जमीनी सच्चाईयों को बहुत करीब से देखा है। इस किताब का लेखन उनके अनुभव, कौषल और संवेदनाओं को भलीभांति प्रतिंबिबित भी करता है। किताब में विस्थापन के सभी प्रकारों मतलब जंगल, बांध, उद्योग और शहर के एक-एक नमूने को जमीनी अध्ययन किया गया है। विस्थापन पर भले ही पहले से बहुत किताब मौजूद हैं, लेकिन यह इस मायने में अलग है कि इसमें पहली बार बच्चों को केन्द्र में रखा गया है। इस पूरे दौर में जबकि बच्चों के मुद्दे मुख्यधारा के मुद्दे ही नहीं हैं तब यह एक सार्थक प्रयास कहा जा सकता है।
लेखक : चिन्मय मिश्र |