मध्य प्रदेश के बैतूल जिले का आदिवासी हर्रा वनग्राम किसी भी सड़क से जुड़ा हुआ नहीं है। सतपुड़ा के घने जंगलों में बसे इस गांव में पिछले पांच वर्षों में विकास का एक भी काम नहीं हुआ है। लोग कच्चे झोंपड़ों में रहते हैं और मजदूरी के लिए पलायन करते हैं। वनग्राम होने के कारण विकास की राशि वन विभाग के खाते में चली जाती है परन्तु गांव में कोई निवेश नहीं हुआ है। 1997-98 में गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों की सूची में इस गांव के तीस परिवार थे परन्तु इस बार के सर्वेक्षण के सूचकों और प्रक्रिया के आधार पर केवल एक परिवार को गरीब माना गया है वहीं दूसरी ओर जब स्वशासन के लिये जनतांत्रिक अभियान ने गांव में सघन रूप से सहभागी अध्ययन किया तो पता चला कि इस गांव के 51 परिवार निर्धनतम स्थिति में होने के बावजूद सूची में नहीं आ पाये हैं।
यह उदाहरण केवल हर्रावनग्राम का ही नहीं है प्रदेश के हर गांव में दस से पंद्रह फीसदी परिवार गरीब होने के बावजूद गरीबी की पहचान से वंचित रह गये हैं। अर्थशास्त्रियों के अध्ययनों के इस निष्कर्ष के बावजूद कि मध्यप्रदेश में गरीबी कम नहीं हुई है बल्कि बढ़ी है, जब योजना आयोग द्वारा यह तय किया गया कि पिछले पांच वर्षों में मध्यप्रदेश में गरीबी 5 फीसदी घटकर 37.35 प्रतिशत हो गई है तो इस आंकलन पर व्यापक सवाल खड़े हो गये। सर्वोच्च न्यायालय ने भी 8 मई 2003 को दिये अपने एक आदेश में यह निर्देश देकर गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों की सूची पर सवालिया निशान लगा दिया कि सभी आदिम जनजातियों, एकल महिला परिवार, मानसिक एवं शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति वाले परिवारों का नाम गरीबी की सूची में हो चाहे न हो, उन्हें गरीबों की अन्त्योदय अन्न योजना का लाभ तत्काल दिया जाना चाहिए। इसके मायने यह है कि गरीबतम् स्थितियों में रहने वाले इन वर्गों के पांच लाख से ज्यादा परिवार अभी गरीबी की सूची में शामिल नहीं हैं। बहरहाल सरकार ने इतना तो मान लिया है कि 1997-98 में हुआ सर्वेक्षण चरम स्तर पर विसंगतिपूर्ण था। उस समय सुनियोजित प्रक्रिया और निगरानी के अभाव में ज्यादातर अपात्र लोग गरीबों की सूची में अनाधिकृत रूप से प्रवेश कर गये इस कारण गरीबों को जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाया।
अनुभव बताते हैं कि गरीबी की पहचान की इस प्रक्रिया में अब भी कई विसंगतियां रह गई हैं। जनतांत्रिक अभियान ने 230 से ज्यादा संस्थाओं के सहयोग से दस हजार गांवों में सर्वेक्षण की प्रक्रिया की निगरानी की और सहज बनाने की कोशिश की। अभियान अपनी उपस्थिति के कारण ही यह स्पष्ट कर पाया कि मण्डला जिले के झालपानी गांव के चमरू सिंह को इसलिये बीपीएल सूची से बाहर हो जाना पड़ा क्योंकि सर्वेकर्ता ने उससे बिना पूछे ही अपनी मर्जी से फार्म भर लिया। इस बात को नजरअंदाज किया गया कि वह बंधुआ मजदूर है। इसी तरह पन्ना जिले में सर्वे के नाम पर गरीब परिवारों से दो सौ रूपये का सेवा शुल्क लिया गया। समाजशास्त्री मानते हैं कि हमारे समाज के 7 से 10 फीसदी लोग छिपी हुई गरीबी और भुखमरी का हर रोज सामना करते हैं। परन्तु उन शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग, मैला ढोने वाले समुदाय, भीख मांगकर गुजारा करने वाले लोगों से जुड़े सवालों को कहीं स्थान नहीं दिया गया।
सर्वेक्षण के आधार पर दिये गये अंकों (13 प्रश्नों के अधिकतम् कुल 52 अंक निर्धारित किये गए हैं) में से सबसे कम अंक वाले ही इस सूची में शामिल होंगे। अत: सही लोगों का चयन हो, इसके लिये गांव में किसे कितने अंक प्राप्त हुये हैं इसकी सूची ग्रामसभा में पढ़कर सुनाये जाने की व्यवस्था की गई थी। ग्रामसभा को ही यह सैध्दान्तिक अधिकार दिया कि वह गांव में रहने वाले वास्तविक गरीबों की सूची का अनुमोदन करे। परन्तु इस प्रक्रिया में बहुत दुविधा की स्थिति बनी रही। प्रावधान यह किया गया कि पहली ग्राम सभा में सूची पढ़े जाने के बाद उस पर आये दावों और आपत्तिायों का निराकरण किया जायेगा, तत्पश्चात्, दूसरी ग्रामसभा में संशोधित सूची का अनुमोदन कराया जायेगा। सरकार के ऊंचे अधिकारी तो हर बैठक में यही कहते रहे कि दो ग्राम सभायें होंगी परन्तु जनपद पंचायत के अधिकारियों ने पहली ग्रामसभा को ही अंतिम घोषित कर दिया, पेटलावद में जनपद पंचायत के कार्यपालन अधिकारी ने बाकायदा लिख कर यह निर्देश दिये। इसके बावजूद अभी तक कोई स्पष्ट आदेश जारी करके राज्य शासन ने दुविधा दूर नहीं की है। कोतमा जनपद पंचायत के अधिकारी ने तो सूची को सार्वजनिक करने से ही यह कह कर इंकार कर दिया कि यह एक गोपनीय दस्तावेज है। दूसरी ओर बैतूल जिले की भीमपुर जनपद पंचायत के अधिकारी ने स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा किये जा रहे प्रयासों को गैर-कानूनी घोषित कर उन्हें रोकने के निर्देश दिये। 100 पंचायतों में हुये अध्ययन के अनुसार 67 में सूची अनुमोदन के लिये दूसरी ग्रामसभा की बैठक ही नहीं हुई और जहां सूची पढ़ी गई वहां गांव वालों को यह नहीं बताया गया कि उन्हें मिलने वाले अंकों का अर्थ क्या है? कितने अंक मिलने पर वे गरीबी की रेखा के संरक्षण में होंगे और कितने अंक मिलने पर बाहर। एक तरह से अगर अब भी इस प्रक्रिया मेें ग्रामसभा को शामिल नहीं किया गया तो एक बार फिर गरीबों की सूची में सम्पन्न और प्रभावशाली लोगों का वर्चस्व होगा।
राजनैतिक निहितार्थों के चलते सरकार ने वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों सुन्दरम और तेन्दुलकर के अध्ययन के उन निष्कर्षों को झुठला दिया है जो यह सिध्द करते हैं कि सामान्य वर्ग बहुल जिलों की अपेक्षा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति बहुल इलाकों में गरीबी के कम होने की दर बहुत कम होती है। सरकार के अनुसार पिछड़े हुए बालाघाट जिले में गरीबी का प्रतिशत 63.82 से कम होकर 53.63 प्रतिशत हो गया यानि वहां 10.19 प्रतिशत की कमी हुई। इसी तरह आदिवासी बहुल मण्डला और डिण्डोरी भी सबसे तेजी से गरीबी से मुक्त हुये वहां गरीबी क्रमश: 9.43 और 9.11 प्रतिशत कमी आई। 90 फीसदी आदिवासी जनसंख्या वाले झाबुआ जिले में गरीबी 54. 37 प्रतिशत से घटकर 45.69 प्रतिशत रह गई है। इसके विपरीत सम्पन्न और सामान्य वर्ग बहुल जिलों में गरीबी उन्मूलन की दर सबसे कम रही है, दतिया में 2.72 इन्दौर में 3.18, उज्जैन में 4.69, ग्वालियर में 4.9 और होशंगाबाद में 5.64 प्रतिशत गरीब कम हुए हैं।
यह मानने के बाद भी कि 1997-98 का सर्वेक्षण विसंगतिपूर्ण, अतार्किक और अन्यायपूर्ण था, एक बार फिर सरकार ने उसे ही नये सर्वे का आधार बनाया है। उसी अनुपात को आधार बिन्दु मानकर राज्य और जिलों का गरीबी का मानकीकरण किया गया है। इस अर्थशास्त्र का राजनैतिक नजरिये से विश्लेषण करने की जरूरत है। मध्यप्रदेश की राजनीति में जिन जिलों और समुदायों का वर्चस्व रहा है उन जिलों में गरीबी का प्रतिशत भी उन्हीं की मंशा के आधार पर तय किया गया। नरसिंहपुर कृषि भूमि और उत्पादकता के मामले में अग्रणी है फिर भी वहां 46.58 फीसदी गरीब हैं, होशंगाबाद भी कृषि उत्पादन का बड़ा केन्द्र बना परन्तु वहां केवल 5.64 प्रतिशत गरीबी कम हुई है। वहीं दूसरी ओर जहां लोग भूख से मर रहे हैं ऐसे सहरिया आदिवासी बहुल शिवपुरी और श्योपुर जिले में केवल 24.89 और 26.14 प्रतिशत ही लोगों को गरीबी की रेखा के नीचे रखा गया है। बालाघाट, मण्डला और बड़वानी में गरीबों की संख्या अभी ज्यादा जरूर है पर पिछले सर्वेक्षण की तुलना में वहां सबसे ज्यादा संख्या कम की गई है।
जिले में गरीबी का प्रतिशत बीपीएल का कटऑफ बिन्दु (वह बिन्दु या न्यूनतम अंक जिसे पाने वाले सूची में स्थान पायेंगे) तय करने की प्रक्रिया में बहुत महत्वपूर्ण माने जायेंगे। जिले में जितने बीपीएल परिवारों का प्रतिशत तय किया गया है उतने परिवार न्यूनतम जितने अंक पायेंगे, उन्हें गरीब मान लिया जायेगा। वही अंक जिले का कटआफ बिन्दु होगा। सिवनी के कूड़ो डोबरी गांव के गुलाब आदिवासी के परिवार को 20 अंक मिले हैं। आठ सदस्यों वाले रोज 35 रूपये कमाने वाले इस परिवार का नाम सूची मेें नहीं आ पायेगा क्योंकि सिवनी जिले में सरकार के हिसाब से 34.79 प्रतिशत परिवार ही गरीब की सूची में आ सकते हैं और 13 अंक के स्तर पर यह आंकड़ा पूरा हो रहा हैं इसलिये जिले के लिए यही कटआफ बिन्दु तय कर दिया गया फिर चाहे गुलाब भूखों ही क्यों न मर जाये।
आंकड़ों के नजरिये से देखा जाये तो बालाघाट में 53.63 प्रतिशत बीपीएल परिवार तय किये गये हैं और इतने परिवार 14 अंक प्राप्त कर रहे हैं, तो वहां का बिन्दु 14 घोषित किया गया। इसी तरह मण्डला (15), बड़वानी (15) से लेकर मुरैना (12), दतिया (13), शिवपुरी (12) और ग्वालियर (13) के कटऑफ बिन्दु तय हुये हैं। यहां एक विसंगति यह है कि इस तरह कटऑफ बिन्दु तय करने से यह सिध्द होगा कि हर जिले में गरीबी के मापदण्ड अलग-अलग हैं और सरकार केवल आंकड़ों से मेल बिठाने की कोशिश कर रही है। हालांकि अभी यह सुझाव भी आया है कि जिलों के बजाये राज्य के स्तर पर सर्वे प्रपत्रों को एक सूची में दर्ज कर लिया जाये और उसमें यह देखा जाये कि किस अंक तक 37.43 प्रतिशत लोग आ रहे हैं। उस अंक को कटऑफ माना जाये और फिर उस सूची में शामिल लोगों को जिलावार सूची में बांट दिया जाये। अभी सरकार समरूपता से ज्यादा आसान रास्ते को तबज्जो दे रही है।
यह मानते हुये कि तकनीकी प्रक्रिया और तय किये गये सूचकों से वस्तुपरक सर्वेक्षण नहीं हो पायेगा, मध्यप्रदेश सरकार ने अगस्त 2002 में केन्द्र सरकार की विशेषज्ञ समिति को कुछ व्यावहारिक सुझाव देते हुये कहा था कि अपात्र लोगों को सूची से बाहर करने और सही लोगों को चुनने के लिये गांव में सहभागी पध्दति से आर्थिक वर्गीकरण (वैल्थ रैंकिग) की प्रक्रिया अपनाई जाये। साथ ही ग्रामसभा अपने यहां के गरीबों की सूची तय करे और हर राज्य को अपनी जरूरत और गरीबी के स्वरूप के अनुरूप सर्वे प्रपत्र में बदलाव करने की स्वतंत्रता दी जाये राज्य के इन सुझावों को केन्द्र ने नहीं माना क्योंकि उसका निर्णय पत्थर की लकीर था। इसके बाद राज्य सरकार ने न तो स्वयं यह मुद्दा फिर उठाया न ही अपने अधिकार क्षेत्र में कुछ रचनात्मक पहल करने की कोशिश की। यही कारण है कि सर्वेक्षण में ग्रामसभा की सीमित सहभागिता के सवाल उठने लगे हैं। कुछ अनुभवों से साफ हो रहा है कि दावे-आपत्तिायां लगने के बाद भी सूचियों में संशोधन नहीं किये जा रहे हैं क्योंकि इससे सर्वेकर्ता संदेह के दायरे में आ जायेंगे। ऐसी स्थिति में गरीबी की रेखा की सूची में कई वास्तविक लोग नहीं आ पायेंगे।
एक आंकलन अब मूर्तरूप लेने लगा है कि व्यवस्था नहीं चाहती है कि गरीब वास्तव में गरीबी से मुक्त हों। परन्तु वह यह भी चाहती है कि कोई यह न कहे कि प्रदेश में गरीबी और भुखमरी है। इस विचार के यह मायने हो सकते हैं कि गरीब को उस सीमा तक गरीब रहने देना चाहिए, जहां तक उसमें प्रतिक्रिया करने की भावना न जागे। इसके लिए उसे इतना भोजन (पोषण नहीं) उपलब्ध कराना चाहिये जितने से उसे शरीर की भोजन की थैली के भरे होने का अहसास होता रहे, रोजगार या सहायता भले न मिले पर उम्मीदें बरकरार रहे। वह भी रोटी, कपड़ा और मकान की चिंता से मुक्त न हो सके ताकि कहीं वह समाज की चिंता न करने लगे। अब यह भी एक सच है कि गरीब और गरीबपना किसी के लिये लाभदायक सौदा हो सकता है। निश्चित रूप से गरीबी में जीवनयापन करने वाला यह समुदाय मजदूर के रूप में सबसे कम मूल्य पर सबसे ज्यादा उत्पादक भूमिका निभाता है और राजनीतिज्ञों के लिये वह सत्ताा सुख का साधन है। गरीब अधिकारों के मामले में किस हाशिये पर खड़ा है उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह गरीब है या नहीं, वह भूखा है या नहीं यह तय करने का अधिकार भी उसका नहीं है।
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