गरीबी की रेखा एक ऐसी रेखा है जो गरीब के ऊपर से और अमीर के नीचे से निकलती है। यह परिभाषा किसी भी मायने में सैद्वान्तिक नहीं हो सकती है परन्तु व्यावहारिक और जमीनी परिभाषा इससे अलग नहीं हो सकती है। वास्तव में गरीबी की रेखा के जरिये राज्य ऐसे लोगों के चयन की औपचारिकता पूरी करता है। जो इससे ज्यादा अभाव में जी रहे हैं कि उन्हें रोज खाना नहीं मिलता है, रोजगार का मुद्दा तो सट्टे जैसा है, नाम मात्र को दप्प्र मौजूद है या नहीं है, कपड़ों के नाम पर कुछ चीथड़े वे लपेटे रहते हैं। ये वे लोग हैं जिन्हें विकास की प्रक्रिया में घोषित रूप से सबसे बड़ी बाधा माना जाने लगा है। हालांकि विकास का यह एक अहम् मापदण्ड भी है कि लोगों को गरीबी के दायरे से बाहर निकाला जायें इस दुविधा की स्थिति में लगातार संसाधन झोके जाते हैं। दो दशकों में ग्रमीणों पर इस ग्राम के लिये 45 हजार करोड़ रूपये व्यय किये गये है। परन्तु अध्ययन बताते हैं कि निर्धारित लक्ष्यों का 20 प्रतिशत हिस्सा ही हासिल किया जा सका है।
राज्य में रहने वाले विपन्न तबके की उन्नति के उद्देश्य से हर पंच वर्षीय योजना के अन्तर्गत गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का सवेक्षण (बीपीएल सर्वे ) कराया जाता रहा है। इस सर्वे के मूलत : दो व्यावहारिक उद्देश्य होते हैं। एक विगत पांच वर्षों में राज्य में कितनी गरीबी कम हुई है? कौन अब गरीब नहीं रहा और कौन हैं जिनके नाम इस सूची में नये सिरे से जोड़े जाने हैं। यह सूची बहुत महत्वपूर्ण इसलिये होती है क्योंकि इसी के आधार पर गरीब और आर्थिक रूप से अति कमजोर लोगों, निराश्रित वृध्दों और विधवा महिलाओं को जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलता है। वर्तमान में 12 योजनायें ऐसी हैं जो बीपीएल परिवार को ध्यान में रखकर ही संचालित की जा रही हैं जबकि 9 जनकल्याणकारी कार्यक्रम उनके हितों की रक्षा के लिए संचालित हो रहे हैं।
एक बार फिर 12 से 31 मई 2003 तक मध्यप्रदेश में बीपीएल सर्वेक्षण का महा आयोजन किया जाने वाला है परन्तु जमीनी अनुभवों और सर्वेक्षण में तय किये गये मापदण्डों, एवं प्रक्रिया के सम्बन्ध में कई स्तरों पर विवाद की स्थिति है। सबसे अहम् बिन्दु तो यही है कि विगत पांच वर्षों के दौरान प्रदेश में कितनी गरीबी या गरीब कम हुये इसका आंकड़ा नेशनल सेम्पल सर्वे द्वारा कुछ चुने हुये क्षेत्रों का सर्वेक्षण करके अन्तर्राष्ट्रीय मापदण्डों के आधार पर तय किया जाता है। इस प्रक्रिया की शुरूआत 1960 में घरेलू उपभोग व्यय के आधार पर हुई। 1960-61 में एक विशेषज्ञ समूह द्वारा यह तय किया गया कि गामीण क्षेत्रों में 20 रूपये और शहरी क्षेत्र में 25 रूपये का उपभोग करने वाले लोग बीपीएल सूची में होंगे। 1973-74 में तय किया गया कि ग्रमीण क्षेत्र में 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्र में 2100 कैलोरी जीवन के लिये जरूरी है आर क्रमश : 49 और 55.6 रूपये प्रतिमाह खर्च करके यह ऊर्जा हासिल की जा सकती है। भारत के सन्दर्भ में 1993 -94 पुन : संशोधन करते हुये बीपीएल का नया सूचक 1968 कैलोरी ( 205.84 रूपये ) का ग्रमीण स्तर पर और 1890 कैलोरी ( 281.35 रूपये ) का शहरी स्तर पर तय किया गया।
विश्लेषण से यह पता चलता है कि 1962 से 1997 तक गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की सूची में निरन्तर नये नाम जुड़ते ही रहे है। और गरीबी का स्तर कम नहीं हुआ। तब 1997 में यह तय किया गया कि अब नये नाम सूची में नहीं जोड़े जायेंगे और यदि जोड़े जाते हैं तो पुराने नाम काट कर ही ऐसा किया जा सकेगा। सबसे अहम् विवाद तो यही है कि रामपुर गांव में 120 परिवारों में से कितने प्रतिशत परिवार गरीब हैं या देवास जिले के कितने प्रतिशत परिवार गरीब हैं, यह पहले योजना आयोग के सौजन्य से नेशनल सेम्पल सर्वे द्वारा तय किया जाता हैं तब हर राज्य और जिले को उनके 'टारगेट' के बारे में सूचित कर दिया जाता है ओर उसी के आधार पर बीपीएल सर्वे की प्रलिया होती है जैसे ही निधा्ररित प्रतिशत पूर्ण हो जाता है, लोगों को सूची से बाहर किया जाने लगता हैं होन तो यह चाहिये कि गांव के स्तर से गरीबों की पहाचन की प्रक्रिया शुरू हो और जिले से राज्य तक पहुंचे ताकि सही हितग्रहियों की पहचान की जा सके।
विकासशील देशों में गरीबों का प्रतिशत विश्व बैंक द्वारा बिना किसी सर्वे के तय कर दिया जाता है। वह सम्बन्धित देश में कोई अध्ययन नहीं करता है। उसके अनुसार एक डालर प्रतिदिन से कम अर्जित करने वाला परिवार गरीबी की श्रेणी में आता है, इससे ज्यादा आय अर्जित करने वाला व्यक्ति अमीर होगा। कई अनुभवों से यह पता चलने के बावजूद कि 2 से 5 डालर प्रतिदिन में भी जीवन की बुनियादी जरूरतें पूर्ण नहीं हो सकती है। विश्व बैंक के मापदण्ड नहीं बदले हैं। मानव विकास प्रतिवेदन की अवधारणा लाने वाला संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम मानता है कि आय के साथ बुनियादी शिक्षा, लोक संसाधनों तक पहुच का अभाव और आय का मापदण्ड गरीबी को मापने के लिए जरूरी है।
उदारीकरण और खुले बाजार की प्रतिस्पर्धा को सार्थक सिध्द करने के लिये सरकार पर हमेशा विकसित देशों, विश्वबैंक और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का दबाव रहा है कि वह अपने देश की गरीबी को या तो कम करें या कम दिखायें। इस दबाव में भारत में गरीबी की रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या में पांच वर्ष में 9. 06 प्रतिशत कम कर दी गई हैं जबकि जम्मू एवं कश्मीर में 21.69 प्रतिशत, बिहार में 12.36 प्रतिशत, राजस्थान में 12. 13 प्रतिशत मध्यप्रदेश में 5. 09 प्रतिशत कम कर दी गई है।
गरीबी का अनुपात
| क्र |
राज्य |
ग्रामीण |
शहरी |
कुल |
1973-74 |
1993-94 |
1999--2000 |
1973- 74 |
1993- 94 |
1999- 2000 |
1973- 74 |
1993- 94 |
1999- 2000 |
1 |
आंध्र प्रदेश |
48.41 |
15.92 |
11.05 |
50.61 |
38.33 |
26.63 |
48.86 |
22.19 |
15.77 |
2 |
बिहार |
62.99 |
58.21 |
44.30 |
42.96 |
34.50 |
32.91 |
61.91 |
54.96 |
42.60 |
3 |
गुजरात |
46.35 |
22.18 |
13.17 |
52.57 |
27.89 |
15.59 |
48.15 |
24.21 |
14.07 |
4 |
हरियाणा |
34.23 |
28.02 |
8.27 |
40.18 |
16.38 |
9.99 |
35.36 |
25.05 |
8.74 |
5 |
जम्मू तथा कश्मीर |
45.51 |
30.34 |
3.97 |
21.32 |
9.18 |
1.98 |
40.83 |
25.17 |
3.48 |
6 |
मध्यप्रदेश |
62.66 |
40.64 |
37.06 |
57.65 |
48.38 |
38.44 |
61.18 |
42.52 |
37.43 |
7 |
महाराष्ट्र |
57.71 |
37.93 |
23.72 |
43.87 |
35.15 |
26.81 |
53.24 |
36.86 |
25.02 |
8 |
उड़ीसा |
67.28 |
49.72 |
48.01 |
55.62 |
41.64 |
42.83 |
66.18 |
48.56 |
47.15 |
9 |
राजस्थान |
44.76 |
26.46 |
13.74 |
52.13 |
30.49 |
19.58 |
46.14 |
27.41 |
15.28 |
10 |
उत्तर प्रदेश |
56.53 |
42.28 |
31.22 |
60.09 |
35.39 |
30.89 |
57.07 |
40.85 |
31.15 |
11 |
दिल्ली |
24.44 |
1.90 |
0.40 |
52.23 |
16.03 |
9.42 |
49.61 |
14.69 |
8.23 |
|
भारत |
56.44 |
37.27 |
27.09 |
49.01 |
32.36 |
23.62 |
54.88 |
35.97 |
26.10 |
स्रोत : योजना आयोग
मध्यप्रदेश की स्थिति इस मामले में चौकाने वाली है। इस वर्ष होने जा रहे सर्वे के अन्तर्गत मध्यप्रदेश में तय किया गया है कि 298.54 लाख लोग गरीबी की रेखा के नीचे हैं और यह प्रतिशत 1997 - 98 में 42.52 से घटाकर 37.43 प्रतिशत कर दिया गया है जबकि प्रदेश में बेरोजगारों की संख्या निरन्तर बढ़ रही है। यहां एक दशक की में रोजगार वृध्दि ग्रमीण क्षेत्रों में 2.51 प्रतिशत सालाना से घटकर 0.69 प्रतिशत हो गई है। इसके साथ ही यहां सीमांत एवं लघु किसानों के जोत क्षेत्रों का अनुपात 1997-71 में 9.6 प्रतिशत था जो 1995-96 में बढ़कर 21.5 प्रतिशत हो गया। आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि 61 फीसदी जमीन के मालिक छोटे और समीमांत किसान है। जिनके जोत का रकबा 0. 91 हैक्टेयर था। यह आर्थिक रूप से पूरी तरह से अनुपयोगी था और जीवनयापन के लिये पूरी तरह अपर्यापत था। आंकड़ों की बाजीगरी के बीच इस तथ्य का उल्लेख बहुत महत्वपूर्ण है कि मध्यप्रदेश में 70 फीसदी बच्चे कुपोषण और 50 फीसदी महिलायें खून की कमी की शिकार हैं, जिसका सीधा सम्बन्ध भोजन की अनुपलब्धता से है।
सर्वेक्षण पर सवाल
गरीबी के सूचक - वर्तमान सन्दर्भों में गरीबी को आंकना भी एक नई चुनौती है क्योंकि जल, जंगल और जमीन पर सरकार और सरकार समर्थन पूंजीवादी ठेकेदारों का नियंत्रण लगातार बढ़ रहा हैं उनकी नीतियां मशीनीकृत आधुनिक विकास को बढ़ावा देती है, औद्योगिकीकरण उनका प्राथमिक लक्ष्य हैं बजट में वह जीवन रक्षक दवाओं और खाद्य के दाम बढ़ाकर विलासिता की वस्तुओं के दाम कम करने में विश्वास रखती हैं किसी गरीब के पास आंखें रहे न रहें परन्तु घर में रंगीन टीवी की उपलब्धता सुनिश्चित करने में सरकार पूरी तरह से जुटी हुई है। इस वर्ष गरीबों की पहचान के लिये सरकार ने कुल 13 सूचक तय किये हैं :-
1. परिवार द्वारा धारित भूमि, 2. मकान का प्रकार, 3. प्रति व्यक्ति पहनने के कपड़े की उपलब्धता, 4. खाद्य सुरक्षा, 5. स्वच्छता, 6. उपभोक्ता वस्तुओं का स्वामित्व, 7. शिक्षा, 8. श्रम, 9. जीविकोपार्जन के साधन, 10. बच्चों का स्तर, 11. देनदारी, 12. पलायन, 13. सहायता की प्राथमिकता।
इन तेरह सूचकों और उनकी परिभाषाओं को देखने पर पता चलता है कि विगत 40 वर्षों में इस प्रक्रिया में गरीबी को देखने का नजरिया पहले से ज्यादा मानवीय हुआ है परन्तु सूचकों के निर्धारा में अभी कई विवाद है। इस बार स्वच्छता को पुन: विकास का कारण माना गया है। बीपीएल सूचक के हिसाब से यदि व्यक्ति खुले में शौच के लिये जाता है या अनियमित जल आपूर्ति के साथ गांव में सामूहिक शौचालय का उपयोग करता है तो उसके उत्तीर्ण (गरीब होने) की ज्यादा संभावनायें हैं यह सूचक स्पष्ट रूप से ठेकेदारी विकास और विश्वबैंक के दबाव का परिणाम है। क्योंकि इससे लोगों की भुखमरी ओर निम्नतम जीवन स्तर का प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है फिर भी विगत दो पंचवर्षीय योजनाओं में कर्ज लेकर 9124534 शौचालय सरकार ने बनवाये हैं सर्वे के नजरियें से इतने लोग तो चार अंक पाकर रेखा में प्रवेश की संभावना से दूर हो जायेंगे। कर्ज का मापदण्ड यह कहता है कि यदि व्यक्ति िने साहूकार से कर्ज लिया है तो वह गरीब है यदि बैंक से लिया तो नहीं। मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के पेटलावद ब्लाक के सन्दर्भ में उल्लेखनीय है कि वहां भील आदिवासी विगत चार वर्षों में बैंक से 12 करोड़ का कर्ज, ले चुके हैं। पर सब कुछ बेचकर भी नहीं चुका पा रहे हैं और बैंक कानूनी कार्रवाई पर उतारू है। इसी तरह पहनने के कपड़ों की संख्या के बारे में जानने की कोशिश की जा रही हैं परन्तु मौसम की जरूरत के अनुरूप और ओढ़ने बिछाने वाले कपड़े उलब्ध हैं या नही, यह स्पष्ट नहीं किया गया है। उल्लेखनीय है कि दिल्ली में भीषण ठण्ड के कारण इसी वर्ष 800 से ज्यादा लोग फुटपाथ पर ही मर गये। बड़े ही आश्चर्य का विषय है कि 500 रूपये के पंखें, 150 रूपये के रेडियो, 200 रूपये के कुकर और 100 रूपये के सामान्य टीवी की मौजूदगी से व्यक्ति गरीबी रेखा में नहीं आयेगा।
भोजन की सुरक्षा वाले कालम के भरपेट भोजन के बारे में सवाल पूछा गया है लेकिन भरपेट का अर्थ क्या है यह खुलासा नहीं किया गया है। यदि किसी परिवार को रोटी के साथ हरी सब्जी, दाल, गुड़, दूध, दही इत्यादि समय पर या बदलते क्रम में दिन में एक बार भोजन के साथ मिलता है तो वह भरपेट भोजन कर सकता है। यह सवाल प्रत्येक मनुष्य के साथ जुड़ा हुआ है लेकिन सीधा यह सवाल पूछा जाना कि वर्ष भर में अधिकांश दिनों में एक समय या एक समय भी भर पेट भेजन नहीं मिलता, तो इसका सही उत्तर नहीं मिलता। एक अध्ययन से पता चलता कि हरी सब्जी, दाल, दूध, दही, इनमें से कोई भी चीज एक बार मिलती है तो भरपेट भोजन हो जाता है और यदि सूखी लाल मिर्च या केवल प्याज के साथ रोटी खाना पड़ती है तो पेट भराई तो हो जाती है लेकिन भरपेट भोजन नहीं होता और फिर यदि हम कैलोरी की जरूरत सूचक बना रहे हैं तो यह जांचना कैसे भूल गये कि भोजन में मिलता क्या है?
सर्वेक्षण की प्रक्रिया पर सवाल -गरीबी की रेख के नीचे रहने वाले लोगों की पहचान के लिये होने वाले सर्वेक्षण की प्रक्रिया यूं तो शुरू हो चुकी है पर लोगों को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। यह एक हमेशा से प्राथमिक जरूरत रही है कि सर्वे का पहले से व्यापक प्रचार-प्रसार हो ताकि लोग अपने घरों में रहें और पलायन न करें। मध्यप्रदेश में 12 से 31 मई तक यह सर्वे होगा और कार्यक्रम के मुताबिक इसी दौरान सरकार रेडियो, टीवी, समाचार पत्रों के जरिये विज्ञापन करेगी। यह एक निरर्थक काम होगा क्योंकि पहलायन करने जा चुके लोगों के लिये कोई रास्ता ही नहीं बचा होगा। यदि जनवरी-फरवरी से (होली के पहले से) लोगों को जागरूक करना शुरू कर दिया गया होता तो कुछ सार्थक होता।
सर्वे की प्रक्रिया में 45000 सर्वेक्षणकर्ता और 4500 सुपरवाईजर शामिल किये जा रहे है। जिन्हें एक दिन का प्रशिक्षा दिया जायेगा ; अब सवाल यह है कि क्या इस अवधि में उन्हें पलायन, कर्ज, बंधुआ मजदूरी, खाद्य सुरक्षा जेसे शब्दों की परिभाषा के बारे में संवेदशनील बनाया जा सकता है। यह प्रशिक्षण सम्मेलन के रूप में औपचारिकता मात्र होगा। जिससे सर्वे करने वालों की दक्षता बढाने का कोई उद्देश्य नहीं है जबकि दक्षता बड़ी जरूरत है क्योंकि गांव के गरीब आदमी की आय का आकलन करना भी वहां दक्षता का काम है। उसके पास 'पे-स्लिप' नहीं होगी, वह दिन की सप्ताह की या साल की आय बतायेगा पर माह की आय तो कर्मचारी को ही निकालना होगी। स्वाभाविक है कि इस दक्षता के अभाव में वह मर्जी से कुछ भी आंकड़ा भरेगा। व्यावहारिक प्रशिक्षण की भी कोई व्यवस्था नहीं है। बहरहाल सार्थक बात यह है कि इस बार सर्वे के प्रक्रिया में संस्थाओं - संगठनों को भी कहीं न कहीं शामिल किया गया है।
मध्यप्रदेश के सन्दर्भ में एक और चिंतनीय पहलू यह है कि जिस दौर में सर्वे होगा यानी मई माह में, तब प्रदेश भीषण सूखे के चपेट में होगा और रोजगार की तलाश में गरीब लोग गांव से पलायन कर चुके होंगे। स्वाभाविक है कि वे लोग जरूरत मंद होते हुये भी गरीबी की रेखा की सूची से बाहर रह जायेंके। प्रदेश में इस बार आठ लाख से ज्यादा लोग पलायन कर सकते हे। ग्रामसभा और पंचायती राज कोक बड़ी ही शिद्दत के साथ जोड़ा गया है पर उनकी भूमिका उस अवस्था में आयेगी जब फील्ड वर्ग पूर्ण होकर सूची बन चुकी होगी। वासतव में गांव में सर्वे की निगरानी की जिम्मेदारी ही ग्रामसभा को दी जाना चाहिए थी। इसी तरह यह जरूरी है कि ग्रमसभा में 50 फीसरी कोरम की बाध्यता को जरूरी बना देना चाहिए। इसके अभाव में एक बार फिर गलत लोगों को स्थान मिल जायेगा।
सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा ........ ?
पी यू सी एल बनाम् भारत सरकार एवं अन्य, प्रकरण क्रमां 196/2001 के अन्तर्गत
8 मई 2002 को दिया गया अंतरिम आदेश
बिन्दु क्रमांक 14 गरीबी की रेखा के नीचे के परिवारों की पहचान ठीक से से नहीं की जा रही है और इसके लिए मापदण्ड न तो एक से है न ही स्पष्ट है, इस शिकायत के मद्देनजर राज्य ओर केन्द्र सरकार को निर्देशित किया गया हैं कि वे प्रकरण को स्पष्ट करें तथा बीपीएल परिवारों की निश्पक्ष और प्रभवशाली पहचान के लिए नीति बनाये।
दिनांक - 3 मार्च 2003 गरीबों की संख्या कम करने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को नोटिस जारी कर देश में गरीबी की रेख के नीचे जीवन बसर करने वाले परिवारों की सूची में की गई छटनी के आरोपों के बारे में कारण बताये आदेश दिये।
मानव विकास प्रतिवेदन - 2002 और गरीबी
योजना आयोग राष्ट्रीय तथा राज्य स्तरों पर गरीबों की संख्या तथा अनुपात का अनुमान लगाने के लिय गठित विशेषज्ञ समूह की रिपोर्ट पर समावेशित प्रक्रिया के आधार पर गरीबी की स्थिति का आंकलन करता आया हैं वह इस प्रक्रिया को उभोग व्यय के आंकड़ों पर लागून करता रहा है और यह आंकड़े उपभोक्ता व्यय पर किये गये व्यापक सवेक्ष्ज्ञणों पर आधारित हैं, जो राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे संस्थान द्वारा किये जाते है। इस प्रकार शासकीय गरीबी अनुमान के आंकड़े वर्ष 1973-74, 1977-78, 1983, 1987-88, 1993-94 तथा 1999-2000 के लिए उपलब हैं।
इन अनुमानों को राज्य स्तरीय गरीबी का नक्शा बनाने के लिए स्वीकार्य मापदंड माना जा सकता है। कई राज्यों में छोटे अंतराल में अलग गरीबी में बदलाव देखें जायें तो काफी उतार-चढ़ान देखने में मिलते है। यह सही तस्वीर नहीं पेश करते और कई बार तो यह उतार - चढ़ाव अपनायी गयी प्रक्रियाविधि में परिवर्तन के कारण होते है। हालांकि लम्बी अवधि में यह बातें सुलझ जाती हैं और सम्पूर्ण स्थिति उभरक सामने आती है। राज्यों की पारस्परिक तुलना के लिए तीन दशकों की एक लम्बीी अवधि उपलब्ध है, यदि हम यह अवधि वर्ष 1973-74 के अनुमान को लेकर 1999-2000 के अंतिम अनुमान के साथ मिलाकर विचार करें।
चूंकि यह विश्लेषण मुख्य व्यय से मध्यप्रदेश के सन्दर्भ में है, हमने तुलना के लिए 6 प्रमुख राज्यों को लिया है जो अनुपात और मूल विशेषताओं में सामान्य तौर के राज्य हैं इसके अतिरिक्त् मध्यप्रदेश मूलत: एक ग्रामीण राज्य है, इसलिए हमने ग्रामीण गरीबी के आंकड़ों को किलया है ताकि गरीबी की स्थिति की बेहतर रूप से तुलना हो सके।
आर्थिक विकास का गरीबी कम करने पर पड़ने वाले प्रभाव के सम्बन्ध में दो विचारधाराएं है। एक दृष्टिकोण यह है कि विकास की वृध्दि से गरीबी कम करने पर प्रभाव पड़ता है। और उसी आधार पर यह आशा बनती है कि तेजी से बढ़ रहे राज्यों में गरीबी तेजी से तथा अन्य राज्यों में धीमी गति से घटेगी। इस विचारधारा के अनुसार विकास की दर को काफी गति पकड़नी पड़ेगी तभी आय में उल्लेखनीय वृध्दि होगी तथा गरीबी कम करने के लिए आय के अवसरों की उपलब्धता बढ़ेगी।
दूसरा दृष्टिकोण यह है कि यद्यपि आर्थिक प्रगति में गरीबी कम करने की संभावना है, किन्तु वृध्दि या विकास को गरीबी कम करने के बराबर समझना सही नहीं हैं प्रभावशाली सार्वजनिक नीति के हस्तक्षेपों की आवश्यकता है जिससे वृध्दि या विकास की दर को गरीबी के स्तर में कमी लाने के लिए अनुदित किया जा सके। यह हस्तक्षेप इस प्रकार के होने वाहिए कि वे भौतिक एवं सामाजिक अधोसंरचना में सुधार कर सके। इनके प्रभाव से एक तरफ लोगों के लिये समाजिक अवसर बढ़ोगें और दूसरी तरफ हर वर्ग और बसाहट के व्यक्ति की उत्पादक सम्पत्तियाँ बढ़ सके तथा इसके साथ ही उत्पादक अस्तियों तक समान रूप से पहुच हो सके। अन्यथा, विकास से होने वाला, लाभ, गरीब और पिछड़े इलाकों के लोगों को कदाचित नहीं मिलेगा और हो सकता है कि असमानता और भी गंभीर हो जाये।
राज्यों की लम्बी अवधि के चलन में कुछ राज्यों में विकास की दर तथा गरीबी में कमी आने के मध्य धनात्मक सम्बन्ध होना प्रतीत होता है। ग्रामीण क्षेत्रों की गरीबी में कुल मिलाकर 33 प्रतिशत से 40 प्रतिशत की उल्लेखनीय गिरावट महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, आन्ध्रप्रदेश जैसे राज्यों में देखने को मिली है, और इन प्रदेशों में तेज विकास दरें भी पाई गई हैं। मध्यप्रदेश के प्रकरण में साधारण विकास दर के साथ लम्बी अवधि में गरीबी के स्तर में भी कमी साथ-साथ दिखायी पड़ती है। बिहार तथा उड़ीसा दोनों राज्यों ने अपेक्षाकृत कम आर्थिक वृध्दि दर्ज की है और अपेक्षाकृत उस विकास वृध्दि का प्रभाव उन राज्यों में गरीबी में कमी होने पर कम ही पड़ा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे लोगों का प्रतिशत
राज्य केन्द्र शासित प्रदेश |
व्यक्तियों का प्रतिशत
1973-74 |
व्यक्तियों का प्रतिशत
1977-78 |
व्यक्तियों का प्रतिशत
1983 |
व्यक्तियों का प्रतिशत
1987-88 |
व्यक्तियों का प्रतिशत
1993-94 |
व्यक्तियों का प्रतिशत
1999-2000 |
बिहार |
62.99 |
63.25 |
64.37 |
52.63 |
58.21 |
44.30 |
उड़ीसा |
67.28 |
72.38 |
67.53 |
57.64 |
49.72 |
48.01 |
उत्तर प्रदेश |
56.53 |
47.6 |
46.45 |
41.10 |
42.28 |
31.22 |
मध्य प्रदेश |
62.66 |
62.52 |
48.90 |
41.92 |
40.64 |
37.06 |
राजस्थान |
44.76 |
35.89 |
33.50 |
33.21 |
26.46 |
13.74 |
आन्ध्र प्रदेश |
48.41 |
38.11 |
26.53 |
20.92 |
15.92 |
11.05 |
स्रोत : योजना आयोग, भारत सरकार
गरीबी की रेखा
प्रो, एम रीन लिखते हैं कि ''लोगों को इतना गरीब नहीं होने देना चाहिए कि उनसे घिन आने लगे या वे समाज के नुकसान पहुचाने लगें। इस नजरिये में गरीबों के कष्ट और दुखों का नहीं बल्कि समाज की असुविधाओं और लागतों का महत्व अधिक प्रतीत होता है। गरीबी की समस्या उसी सीमा तक चिंतनीय है जहां तक कि उसके कारण, जो गरीब नहीं हों, उन्हें भी समस्यायें भुगतनी पड़ती हैं।'
शायद इस विचार का अर्थ यह है कि गरीब को उस सीमा तक गरीब रहने देना चाहिए जहां तक उसमें प्रतिक्रिया करने की भावना न जागे। इसके लिए उसे इतना भोजन (पोषण नहीं) उपलब्ध करा दिया जाना चाहिए जिससे उसके शरीर में मौजूद भोजन की थैली भरी रहे, हो सके तो तन को कपड़े से ढांका जा सके और वह भीगे न, इसके लिये छप्पर का इंतजाम हो जाये। एक प्रश्न यह भी है कि उसका गरीब रहना भी क्या किसी के हित में हो सकता है ? निश्चित रूप से गरीबी में जीवन यापन करने वाला यह समुदाय मजदूर के रूप में सबसे ज्यादा उत्पादक समुदाय की भूमिका निभाता है और सत्ता के लिये यह मतहीन समुदाय मतदाता के रूप में सत्ता प्राप्ति का साधन है। इनकी गरीबी से मुक्त होने का मतलब बहुत ही खतरनाक है। जिस दिन गरीब, गरीबी से मुक्त हो जायेगा उस दिन वह निर्णय लेने लगेगा और अपने अधिकार हासिल करने की प्रक्रिया में शामिल होना चाहेगा ; उसे मालूम चल जायेगा कि शोषण की उत्पत्तिा उसी के लिये हुई है। मध्यप्रदेश में गरीबों की पहचान का मुद्दा विशेष मायने रखता है क्योंकि यहां 42. 52 जनसंख्या गरीबी की रेखा के नीचे रहती है और यह प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है। वहीं दूसरी ओर यहां सामाजिक मुद्दों के प्रति संवेदनशील रवैया अपनाने वाली सरकार होने के नाते मध्यप्रदेश में एक बार फिर किसी नवाचार की अपेक्षा तो की ही जानी चाहिए। हालांकि अब तक संस्थाओं और मीडिया की सक्रियता के मद्देनजर प्रदेश में सर्वेक्षण से पहले 1997 - 98 में हुये सर्वेक्षण की कमजोरियां सामने आई और अपात्रों के सूची में नाम होने के 9000 से ज्यादा ऐसे मामले सामने आये जिनसे पता चला कि गरीबों की पहचान के लिये भी अभी संकट कम नहीं है।
यह बात किसी राज्य विशेष के संदर्भ में नहीं है बल्कि हर उस व्यवस्था के संदर्भ में है जो गरीबी को केवल आर्थिक मापदण्डों या न्यूनतम जरूरतों की पूर्ति के परिप्रेक्ष्य में परिभाषित करती है। भारत में विगत 30 वर्षों से गरीबी की पहचान करने की प्रक्रिया चल रही है परन्तु विगत एक दशक में हुये दो सर्वेक्षणों ( गरीबी की रेखा का सर्वेक्षण) में इस प्रक्रिया से जुड़ाव बढ़ता गया है। यानी अब यह मामला केवल सरकार और गरीब के बीच का नहीं रहा बल्कि व्यापक नागर समाज (सिविल सोसायटी) को भी इस मुद्दे से अपने सरोकार खोजने पड़े। हर अवस्था की एक निश्चित उम्र होती है और गरीबी भी एक अवस्था के रूप में भुखमरी के रूप में अपने चरम पर पहुच रही है। यह वही अवस्था है जहां से समाज मेंं प्रतिक्रिया के रूप में संघर्ष और टकराव की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। समुदाय अपने संगठन बनाकर व्यवस्था को चुनौती देने उठ खड़ा होता है। यही कारण है कि अब गरीबी केवल गरीब से सम्बन्धित नहीं रही है बल्कि इसका गहरा प्रभाव लोकतांत्रिक व्यवस्था पर नकारात्मक रूप में नजर आना शुरू हो गया है।
गरीबी के विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सरकार की समझ, मान्यताओं और नीतियों ने निभाई है। इस अवस्था का हमेशा आर्थिक विपन्नता की मानसिकता से विश्लेषण किया गया, इसे केवल गरीबों से सम्बन्धित माना गया और इसे दूर करने के लिये आय (मजदूरी के अवसर बढ़ाने) में अस्थाई वृध्दि के प्रयासों की नीति अपनाई गई। जिसका परिणाम यह हुआ कि इस अवस्था ने समाज में स्थाई रूप से जड़ें जमा ली। इसकी गंभीरता को ज्यादा से ज्यादा नजर अंदाज करने की कोशिश की गई है।
1997 के बाद एक बार फिर इस वर्ष गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की पहचान करने के लिये तकनीकी प्रक्रिया आधारित सर्वेक्षण किया जाने वाला है। उम्मीद तो इस बात की थी कि 1993-94 और 1997-98 में हुये सर्वेक्षणों की खामियों को गरीबों ने जिस तरह भोगा है, उससे इस बार उन्हें मुक्ति मिलेगी परन्तु सरकार के स्तर पर हो रहे प्रयासों से ऐसे कोई आसार नजर आते नहीं हैं। इस सर्वेक्षण की प्रक्रिया को लागू करने से पहले जरूरी है कि सरकार और विशेषज्ञ इस सवाल का संतोषजनक उत्तार खोजने की पहल करें कि क्या गरीबी को वास्तव में केवल आर्थिक विपन्नता के रूप में चिन्हित किया जाना चाहिए ? पिछले सर्वेक्षण के दौरान मानकों के आधार पर यह तय किया गया था कि 1700 रूपये प्रतिमाह या एक वर्ष में 20 हजार रूपये से कम आय आर्जित करने वाला परिवार गरीबी की रेखा के नीचे माना जाता है और इस आय का आकलन इस आधार पर किया जाता है कि वह परिवार औसत रूप से भोजन पर कितना व्यय करता है, उसके घर की बनावट कैसी है, वह किन सुविधाओं का उपयोग करता है जैसे - रेडियो, साइकिल या पंखा। परन्तु इस बार 'कट ऑफ प्वाइंट' अभी तक तय नहीं हुआ है। यह आर्थिक सूचक भी विसंगतियों से भरे हुए हैं। गरीबी की इस श्रेणी में केवल उन 22 लाख परिवारों को रखा गया है जिनके पास आधा हैक्टेयर से कम भूमि है। जबकि हकीकत यह है कि पिछले चार वर्षों के सूखे ने सीमान्त कृषक समूहों को दोहरी मार मारी है। मध्यप्रदेश के 9.54 लाख एक हेक्टेयर भूमिधारियों को अति गरीब की श्रेणी मे नहीं रखा गया है।
आर्थिक पहलू से हटकर यदि नजर डालें तो पता चलता है कि गरीबी को मापने में स्वास्थ्य के अधिकार को कहीं कोई तवज्जो ही नहीं दी गई है। वहीं दूसरी ओर सामाजिक संरचना के आधार पर भी इस मुद्दे को पहचानने की अभी तक कहीं कोई कोशिश नहीं की गई है। मध्यप्रदेश में कुल जनसंख्या का 15 प्रतिशत भाग अनुसूचित जाति और 20 प्रतिशत भाग अनुसूचित जनजाति का है। ये दोनों वर्ग सामाजिक स्तर पर गरीबी की अनछुई परिभाषा से जूझने के लिए बाध्य है। काफी संघर्ष के बाद सरकार ने सहरिया आदिवासियों को इस सूची में रखने पर सहमति जताई है। मध्यप्रदेश में दलित अपने दलितपन के कारण नहीं बल्कि लगातार बढ़ती गरीबी के कारण शोषण का सबसे बड़ा शिकार बना है। नये-नये सामाजिक सिध्दान्तों और विश्लेषणों ने उसकी स्थिति को ज्यादा खराब बना दिया है। इसी समुदाय के लोग गरीबी के कारण मैला ढोने, कचरा बीनने और देह व्यापार के काम में संलग्न हैं और विडम्बना देखिये कि इन कामों से यदि कोई प्रभावित होता है तो महिलायें या फिर बच्चे। ये वही समस्यायें हैं जो गरीबी के कारण पैदा होती हैं और प्रथा के रूप में समाज की पहचान बन जाती हैं।
वहीं आदिवासी समुदाय सरकार की नीतियों और नव धनाढयों की रणनीतियों से लगातार असफल संघर्ष करता रहा है। इस असफलता का परिणाम यह हुआ कि प्राकृतिक संसाधनों पर से उसका पारम्परिक नियंत्रण खत्म होता गया और अपनी जड़ों से कटकर वह गरीबी के चंगुल में फंसता गया। यदि हम कुछ भूल रहे हैं तो यह ऐतिहासिक तथ्य फिर से याद कर लेना चाहिए कि गढ़ा मण्डला के गौंड राजाओं का राज्य मध्य भारत के सबसे बड़े क्षेत्र में सबसे लम्बे समय तक फैला रहा। परन्तु स्वतंत्र भारत में भी अंग्रेजों की वही नीति लागू की गई जिसमें प्राथमिकता के साथ आदिवासी को जंगल से बेदखल करना शुरू कर दिया गया। उनकी गरीबी का मूल्यांकन भी उसी आधार पर किया जाता रहा है जिस आधार पर किसी महानगर में किया जाता है यानी वह माह में कितने दिन मांस और शराब का सेवन करता है? जब जंगल में सहजता से उपलब्ध मांस या शराब का मूल्यांकन शहर के मूल्य के आधार पर किया जायेगा तब स्वाभविक परिणाम यही होता है कि गरीबी के भीषण चक्र में फंसते हुये भी वह अपनी दरिद्रता को सिध्द नहीं कर पाता है।
कौन तय करता है गरीबी ?
भारत में गरीबी की परिभाष तय करने का अधिकृत दायित्व योजना आयोज को सौंपा गया है। योजना आयोज इस बात से सहमत है कि किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन की आवश्यकतओं की पूति के लिए न्यूनतम रूप से दो वस्तुयें उपलब्ध होनी ही चाहिए :-
- संतोष जनक पौष्टिक आहार, सामान्य स्तर का कपड़ा एक उचित ढंग का मकान और अन्य कुछ सामग्रियाँ जो किसी भी परिवार के लिए जरूरी हैं।
- न्यूनतम शिक्षा, पीने के लिये स्वच्छ पानी और और साफ पर्यावरण।
यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह इन बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिय जो कुछ भी कर सकती हैं करे।
गरीबी का एक मापदण्ड कैलौरी उपभोग भी है। ग्रामीण क्षेत्रों में 2410 कैलोरी (प्रति व्यक्ति व्यय 324.90 रूपये) और शहरी क्षेत्रों में 2070 कैलोरी (प्रति व्यक्ति व्यय 380.70 रूपये) न्यूनतम जरूरत है। योजना आयोग के अनुसार अगर व्यक्ति के पास इतनी आय है कि वह अपनी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेता है, और इससे अगो कुद नहं तब योजना आयोग के अनुसार गरीब है। योजना आयोज ने गरीबी को दो कसौटियों पर देखा है। पहली - कैलोरी का कउपभोग, दूसरी- कैलोरी पर खर्च होने वाली न्यनतम आय। इसे दो अवधाराणों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। गरीबी की रेखा और गरीबी की रेखा के नीचे।
गरीबी की रेखा- आय का वह स्तर जिससे लोग अपने पोषण स्तर को पूरा कर सकें, गरीबी की रेखा है।
गरीबी की रेखा के नीचे - वे व्यक्ति जो मनुष्य की पहली बुनियादी आवश्यकता अर्थात् रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्थ नहीं कर सके, वे गरीबी की रेख हैं योजना आयोज गरीबी का प्रतिशत जानने के लिये नेशनल सेम्पल सर्वे के सर्वेक्षण का सहारा लेता हैं नेशनल सेम्पल सर्वे लोगों के सात दिन के उपभोग को मापकर यह तय करता है कि लोगों को कितनी कैलोरी और आय का उपभोग कर रहे हैं। हय एक विवादास्पद तरीका है।
- सवोच्च न्यायालय के आयुक्त एन. सी. सक्सेना की रिपोर्ट
सूखे एवं जनकल्याणकारी योजनाओं के अप्रभावी क्रियान्वयन के मुद्दे पर पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है। इसके आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर ठोस और स्पष्ट अंतरिम आदेश जारी किये है। 8 मई 2002 को जारी एक आदेश में अदालत ने राष्ट्रीय स्तर पर योजनाओं और सरकार के प्रयासों की निगरानी कर उसे अवगत कराने की जिम्मेदारी निभने के किलये एन.सी. सक्सेना और एस. आर. शंकरन की नियुक्ति की थी। योजना आयोग के पूर्व सचिव एन. सी. सकैसेना ने पूरी जिम्मेदारी के साथ अपने दायित्वों को निभाया है। 3 मार्च 2003 को उन्होंने सवोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को अपनी दूसरी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट में आयुक्त ने उल्लेख किया है कि -
सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद कई स्थानों पर उचित प्रक्रिया का पालन कर गरीबों की पहचान का काम नहीं हुआ है।
- गरीबों की पहचान की प्रक्रिया में पारदिर्शता का अभाव है।
- सर्वे करने वाले सूची में नाम दर्ज कराने के लिये गरीबों से रिश्वत मांगते हैं।
- जगहों पर सवेक्षण की सूचना का प्रचार-प्रसार नहीं हुआ। और सर्वे हो जाने के बाद भी वास्तविक हितग्राहियों के नाम सूची में दर्ज नहीं हैं।
- पंचायत प्रतिनिधियों ने बताया कि इतने कम समय में सर्वे का काम करके सूची नहीं बनाई जा सकती है।
- रीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को पहचान पत्र सर्वे के कई महीनों बाद तक नहीं मिल पाते हैं। अत: अब जरूरी है कि पहचान पत्र (राशन कार्ड) तुरन्त जारी हों।
- यह जरूरी है कि बीपीएल सर्वेक्षण की असफलता के लिए जिम्मेदारी तय की जायें और उनकी जांच हो।
- पलायन करके जाने वाले और घर विहीन लोगों (जो कि सर्वाधिक जरूरत मंद हैं) को ही सूची में शामिल नहीं किया जा रहा है।
गरीबी रेखा के निर्धारण में गैर- सरकारी पहल
मध्यप्रदेश में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की पहचान हेतु सर्वेक्षण कार्य मई 2003 में प्रारंभ होने वाला है। हालांकि केन्द्र सरकार (योजना आयोज( ने पहले से ही एक आंकड़ा (37.06 प्रतिशत) निर्धारित कर दिया है। अब इस बात से कुछ लेना-देना नहीं होगा कि प्रदेश के वास्तविक गरीब कितने हैं बल्कि यह बात ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई हे कि प्रदेश के किस कोने से ढूंढकर प्रदेश सरकार 37.06 प्रतिशत का आंकड़ा योजना आयोग को परोसेगी।
एसे और भी कई सवालों जैसे –
गरीबों की पहचान की प्रक्रिया क्या होगी (उल्लेखनीय है कि वर्ष 1997-98 के सर्वेक्षण के दौरान गरीबों को कानों कान भान नहीं हुआ था कि उनकी पहचान का सर्वेक्षण होने जा रहा है जबकि कमोबेश सभी अमीरों की चौपालों पर बैठकर सर्वेक्षण होकर सूची तैयार हो गई थी। क्या स्थानीय लोगों का जुड़ाव होगा, सूचकांक क्या होंगे और गरीबों की वास्तविक पहचान के कलिए कितने सहायक होंगे इत्यादि सवालों के मुद्दे नजर इस बार गैर सरकारी संगठनों ने प्रक्रिया की शुरूआत के समय से ही अपने हस्तखेप का मन बना लिया हैं
ऐसे कई अवसर स्वैच्छिक जगत कोक प्राप्त हुए जिनका लाभ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से स्वैच्छिक संगठनों को मिला जैसे - सूखा और जनकल्याणकारी योजनाओं के लाभ के सन्दर्भ में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका की सुनवाई के तहत यह बात सिध्द हो गई कि सूखा की सबसे ज्यादा मार गरीब को झेलनी पउ रही है और सरकार पर ऐसा कुछ करने को नहीं है, जिससे वह लोगों की जान बचा पाये। (विगत दिनों मध्यप्रदेश में भूख से लगभग 100 लोगों की अलग-अलग जिलों में जान गई और इस संख्या से कहीं ज्यादा बच्चे महिलाएं कुपोषण की शिकाकर हुई हैं और अगर जन कल्याणकारी योजनाओं की बात करें तो इन योजनाओं का लाभ भी गरीबों तक नहीं पहुंच पा रहा है यह उन्हीं को मिलता है जिनकी पहुच जनकल्याण करने वालों (अधिकारी वर्ग) तक सीधी है।
ये तमाम बातों को करने का पुख्ता आधार भी है जो अलग-अलग घटनाओं कार्यषालाओं और क्षेत्र भ्रमण के दौरान लोगों से सीधे संवाद के बाद उभरकर आये और ये प्रयास स्वैच्छिक जगत के इकट्ठा प्रयास का नतीजा था। 25-26 फरवरी 2002 को प्रदेश स्तरीय महिला पंचायत प्रतिनिधियों का एक दो दिवसीय सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें लगभग सभी प्रतिनिधियों ने एक स्वर से कहा कि गांव के स्तर पर बस एक ही भयावह समस्या है जो गरीबों को और ज्यादा गरीबी की ओर ढकेल रही है कुछ अति गरीबों को ना तो योजनाओं का लाभ मिल रहा है और ना ही उन्हें लाभ के कार्यों में शामिल किया जा रहा है। कारण बस एक ही है कि उनका नाम गरीबी रेखा की सूची में नहीं है जिसमें पंचायत प्रतिनिधि भी कुछ कर पाने में अक्षम हैं। जब इस सम्मेलन में गरीबी रेखा और सूखी के सम्बन्ध में बात की गई तो स्पष्ट हुआ कि सूची सरकारी स्तर पर बनी थी अर्थात् जिन लोगों के नाम पंचायत ने, सूची में दर्ज करवाये थे उनमें से कुछ ही नाम अंतिम प्रकाशित सूची में दिखाई दिये। लगभग दो वर्ष बाद जब इस बात को पंचायत प्रतिनिधियों ने उच्चस्तर पर लगातार उठाया। । (एक वर्ष तो सूची बनकर आने में लगा और एक वर्ष गरीबों को उनका लाभ ना मिलने के बाद ज्ञात हुआ कि सूची में उनका नाम नहीं, तब उन्होंने शोर मचाया)। तब सरकार ने तय किया कि सूची में गरीबों की कुल संख्या में कोई घट-बढ़ नहीं होनी चाहिए इसमें नाम बदल सकते है। (अर्थात् जितने नाम जोड़े, उतने ही काट दें) और ये जिम्मेदारी सरकार ने ग्रामसभाओं को सौंपी दी। ग्रामसभाओं ने अपने तरीके से घटाने बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन जिन दबंगों के नाम सूची में वर्ग से, एक गरीब को अपनी सुरक्षा की दृष्टि से हटा पाना असम्भव बन गया और नतीजा-पूरे पांच साल गरीब बाट जोहता रहा कि कहीं से कोई उसका लाभ दिलाए। स्वैच्छिक संगठन जिन क्षेत्रों में कार्यरत हैं, उनका प्रयास भी दबंगों की मूंछों के सामने बौना साबित होकर रह गया। ये पीड़ा लोगों ने (जहां-जहां गरीबों को मंच मिला या स्वैच्छिक संगठनों को अपनी बात कहने का अवसर) हर स्तर पर उठाई।
इसके बाद स्वैच्छिक संगठनों ने 10-11 जुलाई 2002 को दो दिवसीय कार्यशाला आयोजित की, जो केवल इसी मुद्दे को ध्यान में रखकर की गई थी। इस कार्यषाला में जनहित याचिका के वादीपक्ष मे वकील श्री कोलिन गोन्जालविस भी उपस्थित हुए और प्रख्यात पत्रकार श्री भरत डोंगरा ने भी शिरकत की। इस कार्यशाला में प्रदेश की उपमुख्यमंत्री श्रीमति जमुना देवी सहित अन्य बड़े औहदे वाले सरकारी नुमाइन्दे भी शामिल थे सबने सुना, समझा और अपने-अपने तरीके से समस्या केक हल की व्याख्या की, किन्तु उपस्थित वकील और पत्रकार ने मुद्दे की गहराई ओर महत्ता को मानते हुए भविष्य में गरीबों के हितों पर लगातार लड़ाई लड़ने का ओज उपस्थित प्रतिभागियों के मन में भर दिया और संगठनों ने भी एक स्वर से इस मुद्दे को अपने कार्य योजना का सधन हिस्सा बना लिया।
फिर तो कार्यशालाओं, उन्मुखीकरण, कंसलटेशन्स का एक दौर शुरू हो गया, 24 अगस्त 2002, 7 जनवरी 2003, 19-20 फरवरी 2003 इत्यादि कार्यषालाएं इसी मुद्दे पर विभिन्न संगठनों द्वारा आयोजित की गई और तय हुआ कि
- प्रदेश स्तर पर स्वैच्छिक संगठनों का इस मुद्दे पर कोकर समूह बनना चाहिये। प्रदेश के लगभग 9 प्रदेश स्तरीय संगठनों ने मिलकर कोर समूह (एन जी. ओ. एलाइन्स) गठन किया।
- गरीब परिवारों की पहचान के लिए जो 13 सूचकांक निर्धारित किये हैं उन पर आपत्ती उठाई जाए। यूंकि केवल इन सूचकांकों से गरीब की पहचान कठिन है और साथ ही सभी सूचकांकों को समान महत्व )अंक) नहीं दिये जा सकते हैं - जैसे जो व्यक्ति पलायन कर रहा है या उसके पास खाने की उपलब्धता नहीं है वह अपने बच्चे को स्कूल तो भेज ही सकता है। (चूंकि शिक्षा गारंटी योजना में सभी जगह स्कूल खुले हैं) या फिर उसके घर में शौचालय तो हो ही सकता है (चूंकि सेक्टर रिफार्मल के दौरान बडत्रे पैमाने पर लगभग 8 लाख शौचालयों का निर्माण हुआ है)।
- स्थानीय स्तर पर गरीबी रेखा सूची निर्धारण के सर्वेक्षण की सूचना और जानकारी बड़े पैमाने पर फेलाई जाए ओर इसकी प्रक्रिया के बारे में लोगों को एवं ग्रामसभा को जागरूक किया जाए।
- जगरूकता अभियान में शेक्षणिक संस्थानों (स्कूल, कॉलेज, विश्व विद्यालयों, शोध संस्थाओं आदि) तथा ब्लाक, जिला और राजय स्तरीय मीडिया को शामिल किया जाए।
- स्थानीय स्तर पर यह सुनिश्चित किया जाए कि सवेक्षण के दौरान कोई गड़बड़ी या धांधली बाजी ना हो, खासकर सर्वे मे कोई गरीब ना छूटने पाये। इसके लिए मानिटरिंग समूहों का गठन स्थानीय स्तर पर हो। (उल्लेखनीय हे कि अभी तक सरकार ने मानिटरिंग के लिए केकवल सुपरवाइजरों की नियुक्ति के आदेश दिये हैं जबकि निचले स्तर पर एक व्यक्ति नहीं बल्कि समूह को देखभााल/ मानिटरिंग की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए)।
- सरकार द्वारा तय किये गये गरीबों की पहचान का निर्धारित लक्ष्य सुनिश्चित करने में ब्लाक/ जिलावार आवंटन, आकड़ों का खेल ना बने, बल्कि एक निश्चित मापदण्ड (कट ऑफ) तय हो और यह मापदण्ड समानता के आधार पर ना होकर जरूरत के आधार पर तय हो। इसी प्रकार ब्लाक वार आवन्टन (लक्ष्य) निर्धारण करने के कलिए एक निश्चित इंडेक्स (कम्पोजिट इन्डेक्स) तैयार होना चाहिए इनमें विशेषज्ञों की भी सलाह लेनी चाहिए। कोर समूह को अपने स्तर पर भी यह तैयारी करना चाहिए। और साथ में यह कि स्वैच्छिक संगठन के इन तमाम प्रयासों को सरकार के साथ नियमित रूप से संवाद में रहा जाए इसके लिए जरूरत होगी।
- एक सचिवालय की, जो तुरन्त स्थापित किया जाए। (स्वैच्छिक संगठन कोर समूह का सचिवालय इस समय ई -3/4 बी, अरेरा कालोनी एक्षनएड के क्षेत्रीय कार्यालय में स्थापित हो चुका है। जिसके सम्पर्क में प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष रूप से 230 संस्थाओं का विषाल स्वैच्छिक जगत नेटवर्क है)।
- अभी जरूरत है कि - किसी भी तरह, सरकार को संवेदनशील कर प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने का ओर अन्तिम व्यक्ति, जो वास्तव में गरीब हे, का नाम सूची में दर्ज करवाने का क्योंकि यह सूची ही सरकार का अन्तिम हथियार है जिससे वह गरीबी को भगाने का दम्भ भरती है और हमारे सबसे गरीब का सहारा भी यही है।
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