सामान्य तौर पर हम मीडियाकर्मी जब किसी समारोह, कार्यशाला या फिर किसी भी आयोजन में जाते हैं, तो हमारे मन में कोई न कोई विचार या बात अवश्य ही होता है। मीडिया संवाद में शामिल होने से पहले मेरे मन में भी कुछ बातें रही हैं। हम मीडिया संवाद का संजोग भी इसीलिए संजोते हैं कि हम सब अपनी मन की बातें कर सकें। पर यह भी तभी संभव होता है, जब हम यह मान कर चलें कि हम किसी मित्रवत् समारोह में हैं जहां जो कुछ भी होता है सब कुछ अपना होता है। यदि यहां कुछ पाते हैं, तो बांटे और यदि खो दें तो अफसोस न करें। अब मैं अपनी बात शुरू करूं।
हम सब लोग एक खास प्रजाति के लोग हैं, जो रचने का कार्य करते हैं। यूं तो हर कोई कुछ न कुछ रचता है और सभी में रचनाशीलता होती ही है, किन्तु हमारी रचनाशीलता केवल हमारे अपने आस-पड़ोस को प्रभावित नहीं करती है बल्कि समाज के चित्र में रंग भरने का काम करती है। शायद इसीलिए आज अपने आप से यह सवाल पूछते रहना जरूरी है कि क्या हम चैतन्य हैं? कहीं हम चेतना शून्य तो नहीं हो रहे हैं?
आश्चर्यजनक है कि जब निठारी में छोटे-छोटे बच्चों के शोषण, हत्या और निर्मम मानव भक्षण के चित्र टेलीविजन पर दिखाये गये, तो एक त्वरित प्रतिक्रिया समाज में हुई और फिर शांत हो गई। उफ! अब हम ऐसे समाज में रहते हैं, जहां 70 फीसदी बच्चों का शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक शोषण होता है। कहां हैं ये बच्चे? क्या बहुत दूर कहीं?? बच्चों की स्थिति के बारे में हम लगातार निश्चित समयांतराल पर कोई न कोई रिपोर्ट पढ़ते या देखते रहते हैं। ऐसे में एक पाठक या एक दर्शक के रूप में हम क्या सोचते है? .................?
शायद यहीं कि अच्छा, बच्ची का बलात्कार करके हत्या कर दी गई!! ..................? यह तो होता ही रहता है। और फिर हम अपने काम में जुट जाते हैं। वह काम, जो शायद हमारे जीवन का लक्ष्य तो नहीं ही है। एक अघ्ययन बताता है कि अमेरिका में जब एक बच्चा 18 वर्ष का होता है तब तक वह जनमाध्यमों के जरिये 64000 हत्यायें देख चुका होता है। ऐसे में यदि हम यह मानते हैं कि मीडिया का प्रभाव मन पर पड़ता है, तो सवाल यह है कि 64000 हत्याओं के दृष्य बच्चों के मन का क्या रूप बनाते होंगे? सवाल यह भी है कि यदि समाज में इतनी हत्यायें होती हैं तो क्या मीडिया को उन्हें छिपाने का दायित्व निभाना चाहिये; शायद नहीं। किन्तु क्या मीडिया आज अपराध से जुड़े सवालों को सजगता के साथ न्यायपूर्ण तरीके से पेश कर रहा है? क्या बलात्कार या हत्या से जुड़ी घटनाओं का नाटय रूपान्तरण करना जरूरी है। यदि ऐसा किया जाता रहा तो बालीवुड की फिल्मों और इलेक्ट्रानिक मीडिया के चरित्र के बीच भेद करने वाली महीन सी दीवार भी टूट ही जायेगी।
बच्चे!! कौन बच्चे!! बच्चे वे जीव होते हैं जो वोट नहीं देते हैं इसलिये इनके ऊपर सरकार खर्च करने में रुचि नहीं रखती है। देश की 16 प्रतिशत आबादी 6 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की है और इतनी बड़ी आबादी के लिये सरकार अपने बजट का कुल जमा 0.88 प्रतिशत (वर्ष 2006-07) ही खर्च करती है। बच्चे ऊंट गाड़ी से जुते हुये हैं जिन पर प्रतिस्पर्धा के कोड़े बरसाये जा रहे हैं ताकि वे बाजार के चरित्र को अच्छे से समझ सकें, खासतौर पर इसके आतंकी चरित्र को। बाजार सिखाता है कि जब तक प्रतिस्पर्धा की भावना पालते हुये लड़ना नहीं सीखोगे तब तक तुम्हारे बचे रहने की कोई संभावना नहीं होगी।
आमतौर पर अखबारों में काम करना व्यावसायिक रूप से आखिरी विकल्प रहा है; किन्तु अब यह अतीत की बात है। आज यह क्षेत्र बाजार का सबसे बड़ा खिलाड़ी है जो न केवल सूचनाओं का प्रसारण करता है बल्कि लाभ का भी विस्तार कर रहा है। बहरहाल दो बाते महत्वपूर्ण हैं - पहली तो यह कि इस लाभ का हितग्राही एक खास वर्ग है। ताजा अध्ययन बताते हैं कि बाजार के अनैतिक विस्तार से भारत में 4 करोड़ 37 लाख लोगों को फायदा हुआ है किन्तु दूसरी तरफ 30 करोड़ लोगों के जीवन, आजीविका और कौशल पर आघात हुआ है। अकेले फुटकर बाजार में संगठित बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रवेश के फलस्वरूप चार करोड़ लोगों की आजीविका छिनती नजर आ रही है।
बहुत ही पेचीदा मामला होता जा रहा है विकास का। आजीविका जीवन का अहम आधार है और इसके लिये राजनैतिक-सामाजिक जनसंघर्ष होते रहे हैं। तब जाकर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी कानून बना और सरकार-गैर सरकारी संगठन इसके बेहतर क्रियान्वयन में जुट गये। ऐसे में ही आजीविका के सिक्के के दूसरे पक्ष पर किसानी एक जानलेवा सौदा बनती जा रही है। किसानों की आत्महत्या और बढ़ती भुखमरी के मामले एक स्थाई रूप लेते जा रहे हैं। यदि ग्रामीण रोजगार गारन्टी योजना और कृषि की स्थिति को ध्यान में रखें तो पता चलता है कि अलग-अलग स्तरों पर दोनों विषयों पर चर्चा चल रही है परन्तु दोनों के बीच परस्पर संबंध स्थापित नहीं हो पाये हैं। और यही परस्पर संबंध आज की सबसे बड़ी आर्थिक राजनीति को स्पष्ट करते हैं। रोजगार गारन्टी कानून तो स्पष्ट रूप से देश की बड़ी आबादी को मजदूर का दर्जा दे चुका है और कृषि क्षेत्र के बर्बाद हालात पर पर्दा डालने का जरिया यह कानून बनता जा रहा है। यह एक कड़वा सच है कि हम रोजगार और आजीविका के बीच के अंतर को मिटाने पर तुले हुये हैं। किसानों का मजदूर बनते जाना खतरनाक है और इस मसले पर मौन तोड़ना बहुत जरूरी है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में अब शायद ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता है जिस दिन कोई सरकारी योजना की शुरुआत या समाप्ति न होती हो। और संभवत: नई बीमारियों की खोज की खबरें प्रसारित करना मीडिया के कार्यदायित्वों का अहम् अंग बन चुका है। बीमारी आती है और सरकार कहती है कि एक नई योजना इसके लिये लागू की जायेगी परन्तु यह सवाल नहीं उभरता कि ये बीमारियां पैदा कहां से और क्यों हो रही हैं? यह जानकारी बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है कि हर सरकार एक साल में एड्स पर दो हजार करोड़ रूपये खर्च करती है, क्या यही सबसे महत्वपूर्ण जानकारी है जो देश के लोगों को जानना चाहिये। एड्स पर बहुत काम हो रहा है परन्तु तपेदिक (जो कि गरीबी और पोषण असुरक्षा से जुड़ी हुई बीमारी है) बीमारी न केवल बजट की कमी से जुझ रही है बल्कि भारत सरकार और राजनैतिक हलकों में बहुत महत्वपूर्ण स्थान नहीं रखती है। बावजूद इसके कि हर साल 1 लाख लोगों की मौत का कारण यह बीमारी बनती है।
पोषण और स्वास्थ्य के मानको के अनुसार हर व्यक्ति को अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिये 2400 कैलोरी की ऊर्जा भोजन से मिलना चाहिये। परन्तु क्या आपको पता है कि 76 प्रतिशत जनसंख्या यानी लगभग 85 करोड़ लोगों की अलग-अलग कारणों से इतनी न्यूनतम जरूरत पूरी नहीं होती है। अगर भोजन और पोषण को गरीबी का आधार माना जाये तो 76 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन करते हैं।
परन्तु सरकार अपने अध्ययनों के आधार पर कहती है कि 26 प्रतिशत यानी 30 करोड़ लोग ही गरीबी की रेखा के नीचे है और गरीबी की रेखा का मतलब है 11 रूपये या उससे कम प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन खर्च करने वाले लोग। आज के दौर में जब सब कुछ मुद्रा स्फीती (इन्फ्लेश) दर से मापा जाता है वहां केवल गरीबी की रेखा से इसका कोई संबंध नहीं रखा गया है। पिछले 17 सालों में एक कोशिश भरपूर ढंग से हुई है और वह कोशिश है गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों की संख्या (न की वास्तविक गरीबी) को कम करने की। उद्देश्य साफ है कि यदि कागजों में गरीब परिवारों की संख्या कम होगी तो सरकार को गरीबी मिटाने वाले कार्यक्रमों पर अपना खर्च (सब्सिडी और जनकल्याण कार्यक्रम चलाने के लिये होने वाला व्यय) कम करने का अवसर मिलेगा और इस राशि का उपयोग बाजार को विकसित करने में किया जा सकेगा।
ऐसे ही कई सवाल हैं जो सतह पर नजर नहीं आते किन्तु जड़ों के साथ चिपटे पड़े हैं। कुछ घुन की तरह जड़ों को खोखला कर रहे हैं तो कुछ विष फैला रहे हैं। यह सच है कि हम राजनीति, समाज और अर्थव्यवस्था को एक अलग नजरिये से देखते है। हमारे लिये केवल लाभ महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि उसमें शुभ का तत्व भी महत्वपूर्ण है। शुभ लोकाधिकारों की मान्यता और उसकी राजनैतिक स्वीकार्यता से जुड़ा हुआ है। यह दौर विरोधाभासों का भी दौर है जहां हमारे मूल्यों और व्यवहारों में व्यापक अंतर नजर आता है पर करते क्या हैं, यह सवाल हमेशा खड़ा रहा है!!
अकसर जब हम कुछ शुध्दात्म पत्रकारों (ये वे पत्रकार हैं जिन्होंने अपनी सार्थक भूमिका तलाशने की खूब कोशिशें की हैं) के साथ मीडिया पर गंभीर चर्चा पर आगे बढ़ते हैं तो वे बहद संजीदगी से उस चर्चा पर यह कहकर विराम लगा देते हैं कि यार, बस अब मीडिया के मूल चरित्र पर कोई बात मत करो!! गुस्सा आता है। यह प्रतिक्रिया अनायास ही नहीं होती है। वे पत्रकार साथी बड़े ही सजग होते हैं कि जब भी कोई ऐसी चर्चा होंगी तो वे उसे रोक देंगे। उनका मंतव्य दूषित नहीं है, उनके भीतर एक किस्म की उदासी आ गई है, वे उस उदासी को उधेड़ना नहीं चाहते हैं, उस पर परतें डाल देन चाहते हैं। अब अखबार संजीदा और गंभीर नहीं होते हैं, वे बड़े होते हैं और बड़े होने का पैमाना बेहद बेतरतीब है- प्रतियों और पाठकों की संख्या, न कि उसका संजीदापन, गंभीरता और प्रभावोत्पादकता। हम उस मीडिया से क्या अपेक्षा रख सकते हैं जिसकी मूल मान्यता आज यह है कि पाठकों के पास अब समय नहीं है। अखबारी संस्थानों के भीतर अखबार बेचने ( जिसे मार्केटिंग और प्रसार कहा जाता है) वाले विभाग ज्यादातर संपादकों की कक्षा लेते हैं और बताते हैं कि मार्केटिंग अध्ययनों के अनुसार अब पाठक ढाई या साढ़े तीन मिनट में अखबार पढ़ने का दायित्व पूरा कर लेना चाहते हैं इसलिये आप भी अपना दायरा उन्हीं साढ़े तीन मिनटों तक सीमित रखें। कुल मिलाकर बात यह होती है कि लोग अखबार देखें, न कि उसे पढ़ें; ऐसा चलन अब चल पड़ा है। विचारों को खत्म कर देने की एक सुनियोजित प्रक्रिया चल रही है। जब अखबार में काम करने वाला संजीदा पत्रकार एक माह तक किसी गंभीर विषय पर शोध करके, अपनी खबर तैयार करके संपादक को सौंपता है तो उसे बताया जाता है कि आपकी खबर ढाई सौ शब्दों से ज्यादा न हो।
खोजपरक खबर के लिये ढाई सौ शब्दों का स्थान!! कितने पत्रकार जिन्दा रह पायेंगे इस वातावरण में। पत्रकार आता है अपनी खबर जमा करके आश्वासन पाता है कि अगले दिन के अखबार में उसे बेहतरीन जगह मिलेगी। रात उम्मीदों के सहारे खुशगवार गुजरती है, किन्तु सुबह पूरी दुनिया सूनी हो जाती है और लगता है कि खून का बहाव रुक गया है। बाद में पता चलता है कि विज्ञापन आ गया था, कोई दूसरी खबर आ गई थी या फिर प्रतिस्पर्धा की चौसर में कोई दूसरा अपनी चाल चल गया। अब तो जनमाध्यमों के भीतर भी हिंसक प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई और यहां तलवारें नहीं बल्कि खबरों पर डीलिट (गायब) बटन से वार किया जाता है। कहीं खून भी नहीं दिखता और दुश्मन लहुलुहान हो जाता है। लोग निराश होते हैं और फिर एक नई कोशिश में जुट जाते हैं परन्तु इस गुत्थी को नही सुलझा पाते हैं कि विज्ञापन के कारण हमेशा खबरें अपना रूप, रंग, आकार और अस्तित्व खोती रही है; कभी भी खबर के कारण विज्ञापनों के सामने बैरिकेट्स लगे क्या? शायद नहीं। इसका मतलब यह है कि आज खबरों के अपने आप में कोई मायने नहीं हैं। खबरों को केवल विज्ञापन के बदले में बिकने वाली सामग्री माना जाना चाहिये। अब हर रोज जन माध्यमों की मंडी में दुकानें इस खोज के साथ खुलती है कि क्या बिकेगा? ऐसी खबर कौन सी होगी जिसके साथ कोई न कोई प्रायोजक नही जुड़ा होगा। इतना ही नहीं अब तो संवेदनाओं का भी व्यापार होता है और एमएमएस के जरिये फायदा कमाया जा रहा है।
अखबार अब सकारात्मक और आकर्षक दिखने चाहिये, इसके लिये छायाचित्रों का उपयोग बढ़ा है। स्वाभाविक है कि गरीबी, कुपोषित, महिला हिंसा और घास की रोटी के छायाचित्र तो सकारात्मक माने ही नहीं जाएंगे (भले ही एक बड़ी आबादी का यह सच्चा चित्र हो) इसलिये उन्हें स्थान नहीं मिलेगा। बहरहाल नई मोटर बाईक, नई कार और हीरों के जेवरात की प्रदर्शनी को जरूर स्थान मिलेगा, क्योंकि वह स्थान विज्ञापन के रूप में खरीदा जाता है। अब गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी के लिये कौन स्थान खरीदेगा? मीडिया का ताजा सिध्दांत यह है कि अखबार हर रोज सुबह पढ़ा जाता है, और सुबह-सुबह पाठक के सामने कुछ नकारात्मक नहीं जाना चाहिये। वह कुछ ऐसा देखना चाहता है जिससे ताजगी का अहसास हो। परन्तु क्या यह सही सोच है। वस्तुत: हर सुबह हर पाठक या दर्शक के सामने यह सच पेष किया जाना चाहिये कि समाज में भूख और गरीबी का जाल कितना व्यापक स्तर पर बिछा हुआ है और हिंसा केवल कुछ लोगों का जीवन नहीं बल्कि हमसे इंसानी चरित्र छीन रही है। इस सच्चाई को छिपाने का काम मीडिया न ही करे, तो बेहतर है क्योंकि इसका असर परमाणु बम से ज्यादा घातक और गहरा होगा। पत्रकार भले ही सामाजिक कार्यकर्ता का आवरण न ओढ़े किन्तु उसकी भूमिका कहीं न कहीं जन मुद्दों के पक्ष में खड़े होने की होगी, अन्यथा उसकी फिर कोई विश्वसनीयता शेष न रहेगी ?
हमारा अनुभव यह बताता है कि अब पत्रकार भी जब किसी खबर पर काम करता है तो वह यह नहीं देखता कि इससे कितने जन सरोकार जुड़े हुये हैं, बल्कि उसके भीतर रोप दी गई ''उत्पादक खबर'' बनाने वाली ग्रंथी यह मापती है कि यह खबर बिकेगी या नहीं। और यह तय हो जाने के बाद ही कि खबर बाजार में टिक पायेगी, उस पर कोई श्रममूलक प्रक्रिया शुरू होती है। कुछ पत्रकार अब भी जिंदा हैं जो सरोकारों की खबरें करते हैं और स्थान पाते हैं; पर कोई उनसे पूछे कि क्या कोई ऐसा दिन है जब वे अपने इस सरोकारी काम के लिये लड़ते-झगड़ते नहीं हैं। ऐसे ही पत्रकारों को खोजकर उनके दिलो-दिमाग को खोलकर रख देने की जरूरत है ताकि उनकी पीड़ा मर न जाये, उनकी तड़प को सब देख सके और जान सके कि सरोकारी संघर्ष अभी भी पूरी तरह से मरा नहीं है। वह लहुलुहान है। एक दिन वह उठ खड़ा होगा और बाजारवादी मीडिया के सामने इतनी चुनौतियाँ खड़ी कर देगा कि तमाम फायदे के सिध्दांत ध्वस्त हो जाएंगे।
व्यक्तिगत रूप से हम बहुत से पत्रकार-लेखक साथियों को जानते रहे हैं, उनसे चर्चा करते रहे हैं पर एक मौके पर आकर हमें लगा कि बहुत से पत्रकार-लेखक साथी जनमुद्दों पर लगातार सोच-विचार करने के साथ ही लेखन करते रहे हैं तो शायद एक मंच पर सबका आना और ज्यादा सार्थक हो सकता है। तब 25 से 27 अगस्त 2006 को 25 साथी पचमढ़ी में इकट्ठा हुये। पत्रकारों को तीन दिन के लिये इकट्ठा करना भी एक चुनौती ही होती है। हर क्षेत्र का एक ढांचा होता है, मीडिया का भी एक ढांचा है जहां हर रोज सूचनाओं को संजोकर विश्लेषण रचा जाता है, बिना किसी नागे के। अब सामग्री की कमी नहीं है बल्कि सामग्री के ढेर में से क्या उपयोग में आयेगा यह तय करने में सबसे ज्यादा ऊर्जा लग रही है। इसका मतलब है कि जो यह तय कर रहे हैं कि क्या सामग्री प्रसारित होगी उनके नजरिये पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। ऐसे में एक छोटे से समूह ने पचमढ़ी में तीन बहुमूल्य दिनों का योगदान दिया। जहां बहुत ही खुल कर मन की बातें हुई। बिना किसी समयबध्द कार्यक्रम के हम सब मिले बैठे, घूमे, हंसे-गाये और एक निष्कर्ष पर पहुंचे कि कम से कम हमें नियमित रूप से मिलना और बात करना चाहिये। केवल राज्य स्तर पर ही नहीं बल्कि क्षेत्रीय और जिला स्तरों पर भी। यह जरूरत भी महसूस हुई कि क्या जनमुद्दों से जुड़ी हुई जानकारियां, तथ्य आकड़े बांटे जा सकते हैं क्या? इन्हीं तयशुदा बिंदुओं के आधार पर विकास संवाद ने एक प्रक्रिया शुरू की अलग-अलग स्तरों पर पत्रकारों से मिलने, बात करने और विचारों को बांटने की। यहीं से हम सब एक मंच पर आने लगे। लगभग 14 माह बाद एक बार फिर इसी प्रक्रिया के तहत हम थोड़े व्यापक स्तर पर चित्रकूट में इकट्ठा हुये हैं। मकसद यह जानलेना भर है कि हम जो कुछ करते है, जो कुछ सोचते हैं, जो कुछ लिखते हैं, उसमें हम अकेले नहीं है। हमारे कई साथी हैं जो पास में बैठे हैं, वरिष्ठजन हैं जिन्होंने एक लंबा अरसा प्रयोग करने में गुजारा है और कई ऐसे साथी हैं जिनमें संभावनायें हैं। इसी सोच के आधार पर एक प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए फिर संवाद में शामिल हुए हैं।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह तो स्वीकार करना ही होगा कि मीडिया-जनमाध्यमों को एक मूल्यगत विश्लेषण की दरकार है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि वह(मीडिया) आज भी एक स्वतंत्र रचनात्मक भूमिका निभाने वाला स्तंभ है या फिर वह ज्यादातर राजनीति और अर्थ व्यवस्था के प्रवक्ता की भूमिका निभा कर समाजनीति के मूल्यों को दरकिनार कर रहा है। यह कठिन दौर है फिर भी जन माध्यमों में सक्रिय ऐसे कई संवादकर्मी हैं, जो वास्तव में स्थान और प्रोत्साहन का अभाव होने से बावजूद कहीं न कहीं से रास्ते निकाल रहे हैं क्योंकि अब भी उनके जीवन में ऐसे मूल्य बचे हुए हैं, जिनका समझौता करने के लिए वे तैयार नहीं हैं और संभवत: यह हमारी सबसे बड़ी संभावना भी है।
हम यह जरूर बताना चाहते हैं कि तमाम गतिरोधों के बावजूद हम सबके इकट्ठा होने के क्या मायने हैं? हम मानते हैं कि जो दिशा और सोच हम साथ लेकर चल रहे हैं वह सही है और हम इस प्रक्रिया में अकेले नहीं हैं। हमारी राजनीति बिल्कुल साफ है कि मीडिया जनमुद्दों को अपनी भूमिका में स्पष्ट रूप से परिभाषित करे। यह सही है कि बाजार और राजस्व के दबाव हैं किन्तु समाज के दबाव से ज्यादा सघन तो इसका प्रभाव नहीं ही होना चाहिये।
यह गठबंधन की राजनीति का दौर है जहां तमाम मतभेदों के बावजूद अलग-अलग समूह एक मंच पर आकर एक लक्ष्य के लिये आगे बढ़ते हैं। क्या यह संभव है कि मीडिय और स्वैच्छिक जगत के बीच में लोकअधिकार आधारित गठबंधन हो? मीडिया की पहुंच लोगों तक है, इसलिये बाजार उसकी पहुंच का उपयोग करता है। हमें यह तो मानना ही होगा कि जितनी दूरी लोगों से मीडिया की बनती जायेगी उतना ही मीडिया भी प्रभावहीन होता जायेगा और उसकी विश्वसनीयता पर भी आंच आती जायेगी। क्या तब भी बाजार मीडिया का उतना ही सम्मान करेगा? सवाल अब हर संस्था पर दागे जा रहे हैं। परन्तु एक सिरे से पूरे समूहों या क्षेत्रों के अस्तित्व और वैचारिक चरित्र पर सवाल खड़े करके नकार दिया जाना व्यावहारिक नहीं है। कहीं न कहीं इस संदर्भ में हम वास्तविकता को नजरअंदाज करते हैं। और जब हम गठबंधन की बात करते हैं तब इसका मतलब है कि हम कुछ मौजूदा संभावनाओं और अवसरों को ऊर्जा देना चाहते हैं। इसका निहितार्थ यह कतई नहीं है कि स्वैच्छिक जगत मीडिया का प्रचार तंत्र के रूप में उपयोग करने के लिये तत्पर है। यह सही है अधिकांशत: संस्थायें मीडिया की जरूरत एक अदद प्रेस विज्ञप्ति के प्रकाशन तक ही सीमित मानती है। परन्तु हम इस मिथ को तोड़ना चाहते हैं। आज यह खुलकर कहा जाने लगा है कि पत्रकार सामाजिक कार्यकर्ता नहीं है। बिल्कुल सही, परन्तु क्या इसका मतलब यह है कि मीडिया के व्यक्ति निश्पक्षता के नाम पर सच से दूर हट कर खड़े हो जायेंगे? यदि यह सही है तो फिर इस निश्पक्षता का कोई सम्मान नहीं है।
किसी बड़े पत्रकार ने कहा था कि मीडिया एक ऐसा मंच है जिस पर हर कोई आकर अपना नाच दिखा सकता है, यही मीडिया का आज का रूप है। इस तरह के वक्तव्य गहरे व्यक्तिगत अनुभवों के बाद उभरकर आते हैं यूं ही नहीं। थोड़ा तो यह देखना ही होगा कि हम अपनी पक्षधरता को स्पष्ट करें और यदि पक्षधरता स्पष्ट करने के लिये स्थान नहीं है तो स्थान बनायें। हम जिस प्रक्रिया की चर्चा कर रहे हैं वह प्रक्रिया बहुत ही व्यक्तिगत स्तर पर शुरू होती है न कि संस्थाओं के स्तर पर। यदि यह संस्था के स्तर पर होती तो संभवत: बहुत से साथी यहां नहीं होते, और कुछ होते तो वो औपचारिकता पूरी कर रहे होते। हम भली-भांति परिचित हैं कि हमारे सामने कौन खड़ा है, कहीं-कहीं तो वे लोग जिनका हम बहुत सम्मान करते हैं। शायद यही संघर्ष सबसे बड़ी चुनौती है। यह एक किस्म की राजनीतिक लड़ाई है जिसमें पत्रकार उपयोग किये जा रहे हैं और उसकी छवि पर प्रहार हो रहा है। ऐसे में व्यक्तिगत स्तर से मंथन की शुरूआत अत्यंत महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि आपकी मौजूदगी के मायने बहुत व्यापक है।
प्रश्न यह भी है कि जिस दौर से हम गुजर रहे हैं, उसमें हम क्या हस्तक्षेप कर सकते हैं, क्या मूल्यविहीन एवं सरोकारविहीन होते जा रहे मीडिया का हिस्सा बनकर रहेंगे या फिर इसे मूल्य एवं सरोकार आधारित बनाने में अपनी भूमिका की तलाश करेंगे। एक बात तो तय है कि जब हम एक मंच पर आकर इन प्रश्नों से जूझने को तैयार है, तो हम अपनी रचनाधर्मिता एवं मीडिया के चरित्र को लेकर भी चिंतित हैं। यह चिंता बूझती लौ पर अफसोस जताने के लिए नहीं है बल्कि चिंगारी की तलाश के लिए है। हमारा यह प्रयास मुल्यों एवं संवेदनाओं से परे होती जा रही मीडिया के बीच से ही मूल्यों एवं संवेदनाओं की तलाश करेगा।
विकास संवाद द्वारा आयोजित राष्ट्रीय मीडिया संवाद के लिए तैयार वक्तव्य के संपादित अंश
सचिन कुमार जैन |