बोरलाय गांव में रहने वाला 21 साल का सुरेश धनोरा में मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के अन्तर्गत बन रही सड़क को समतल बनाने का काम कर रहा है। उसका नाम भी रोजगार कार्ड में दर्ज है और पिछले सात दिनों से लगातार वह मजदूरी कर रहा है। इस काम के एवज में उसे 61.37 रूपये की मजदूरी हर रोज मिल रही है। वह बड़े जतन से गर्दन झुकाये अपना काम कर रहा है। अब सवाल यह खड़ा होता है कि सुरेश मजदूरी कर रहा है इसमें खास बात क्या है? यह तो मध्यप्रदेश के 43 लाख मजदूर भी कर रहे हैं क्योंकि रोजगार का अधिकार अब एक कानूनी हक बन गया है। परन्तु सुरेश उस 43 लाख की भीड़ में एक खास मुकाम रखता है। सुरेश दोनों आंखों से देख नहीं पाता है। हिरकराय गांव का वेस्तिया आदिवासी पहाड़ी पर चढ़ा हुआ है। उसके हाथ में गेंती है जिससे वह पहाड़ पर पानी को रोकने के उद्देश्य से खंती खोद रहा है। उसे हर रोज रोजगार गारण्टी योजना में न्यूनतम मजदूरी मिल रही है क्योंकि वह हर रोज निर्धारित लक्ष्य भी पूरा कर रहा है। यहां भी सवाल यही है कि वेस्तिया वही कर रहा है जो सामान्य मजदूर कर रहे हैं परन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं। वेस्तिया एक पैर से विकलांग है।
संगठन की भूमिका
बड़वानी जिले में अब ऐसी कहानियों की सूची लम्बी होती जा रही है। मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में यह उल्लेख जरूर कर दिया गया है कि यदि विकलांग व्यक्ति रोजगार की मांग करता है तो उसे यह अधिकार दिया जायेगा। परन्तु इस सच्चाई में भी दो राय नहीं हो सकती है कि विकलांगता को हमेशा अक्षमता के रूप में ही परिभाषित किया गया और यह एक सामाजिक धारणा है कि विकलांग व्यक्ति सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक जीवन में किसी भी तरह की उत्पादक भूमिका नहीं निभा सकते हैं। इतना ही नहीं इस वर्ग पर परिवार, राज्य और समुदाय को न केवल आर्थिक संसाधनों का निवेश करना पड़ता है बल्कि समय और मेहनत भी इनकी देखभाल में बहुत लगती है। विकलांग व्यक्ति अपने शरीर के अंगों की विकलांगता से इतना पीड़ित नहीं होता जितना आर्थिक, सामाजिक दर्व्यवहार उसे प्रताड़ित करता है। ऐसे में संगठन, समुदाय और पंचायतों के प्रयासों से व्यापक सोच में बदलाव आना शुरू हुआ है। मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में रोजगार के अधिकार को शारीरिक श्रम करने की इच्छा के एवज में मिलने वाले रोजगार के अवसर के रूप में परिभाषित किया गया है। यहां विश्लेषक यह विरोधाभास पाते हैं कि एक ओर तो राज्य दैनिक मजदूरी के एवज में कठोर शारीरिक श्रम की मांग कर रहा है, वहीं विकलांगों को भी यही काम का अवसर दिया जा रहा है, जिसे शायद वे कर पाने में सक्षम नहीं होंगे।
परन्तु बड़वानी जिले में अब विकलांगता के संदर्भ में जड़ें जमा चुकी मिथ्या अवधारणाओं की जड़ें हिलना शुरू हो गई है। यहां 26 गांवों में 84 विकलांग मजदूर शारीरिक श्रम करके और योजना में शामिल किये गये अन्य कार्य करके रोजगार हासिल कर रहे हैं। इनमें केवल शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति ही शामिल नहीं है बल्कि कालीबेड़ी में बन रहे चेक डेम पर मानसिक रोग से ग्रसित पप्पू भी खुदाई का काम कर रहा है। पप्पू के अलावा 11 व्यक्ति मानसिक रोगियों के सन्दर्भ में बनी हुई धारणाओं को तोड़ने की इस पहल में सहभागी बने हैं। हमें यह उल्लेख करना होगा कि इस इलाके में विकलांगता के जरिये पैदा हुये सामाजिक वर्ग के प्रति होने वाले भेदभाव से संघर्ष करने के लिये तैयार हुये संगति संगठन ने अहम् भूमिका निभाई है। संगठन के साथ जुड़े बिजय स्वाई विश्लेषण करते हुये स्पष्ट कहते हैं कि कुल जनसंख्या का 7 से 10 फीसदी हिस्सा किसी न किसी किस्म की विकलांगता का शिकार है। कुछ की विकलांगता नजर आती है कुछ की नजर नहीं आती है। फिर विकलांगता को छिपाने की कोशिश होती और इसी छिपाव के कारण विकलांगता का प्रभाव बढ़ता जाता है परन्तु यह भी एक संभावना है कि रोजगार गारण्टी योजना से मिले अवसरों से ऐसे व्यक्ति बाहर निकलेंगे जिससे संभवत: उनका उपचार हो सकेगा। ऐसे में क्या इस वर्ग को समाज से अलग किया जा सकता है? वे कहते हैं कि गरीबी और विकलांगता का बहुत सीधा जुड़ाव है। अगर बड़वानी का ही आंकड़ा लिया जाये तो यह जुड़ाव स्पष्ट हो जाता है। जिले में 17782 व्यक्ति विकलांग हैं जिनमें से 13052 लोग गरीबी की रेखा के नीचे जीवन जी रहे हैं और रोजगार गारण्टी योजना इसलिये बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि 87 प्रतिशत विकलांग गांवों में ही रह रहे हैं।
स्वाभाविक है कि भेदभावपूर्ण सोच के कारण विकलांग व्यक्ति समाज में सम्मानजनक उत्पादक भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। बड़वानी का अनुभव कई नई संभावनायें खड़ी करता है। व्यवस्था में बदलाव लाने के लिये संगति संगठनों ने जबरदस्त भूमिका निभाई है। हिरकराय गांव की आबादी जरूर 2300 से ज्यादा है किन्तु सत्ता राजनैतिक रूप से ताकतवर सरपंच की ही चलती रही है। इतिहास बताता है कि इस गांव में दिन और रात तय करने का अधिकार भी एक ही व्यक्ति के हाथ में केन्द्रित रहा है। ऐसे में जब रोजगार गारण्टी कार्यक्रम शुरू हुआ तब वहां ट्रेक्टरों का भी उपयोग हो रहा था और पथरीली जमीन पर दस घंटे काम करने के बाद आदिवासी मजदूरों को 20 से 25 रूपये की मजदूरी दी जा रही थी। प्रकाश आदिवासी बताते हैं कि तब संगति संगठन ने उपयंत्री और सरपंच से संघर्ष करने का निर्णय लिया। गांव के सारे काम रोक दिये गये, सरपंच को घेर लिया गया। ऐसी स्थिति में वहां पहली बार बराबरी के संवाद की स्थिति बनी। संगठन के दबाव के बाद ग्रामीण यांत्रिकी विभाग के अधिकारियों ने काम की माप में बदलाव किया। तब कहीं उन्हें न्यूनतम मजदूरी मिलना शुरू हुई और ट्रेक्टर का उपयोग बंद हुआ। हिरकराय संगति के चीमू भायला कहते हैं कि इस गांव में पिछले पांच सालों में लोगों के केवल एक दिन का काम मिला था परन्तु आज के दिन 25 लाख रूपये के काम चल रहे हैं; सड़क, पुलिया और वृक्षारोपण की हर जरूरत पूरी करने का अधिकार हमें मिला है। पर सबसे खास बात यह है कि अब हमको यह भी पता चला है कि अपने अधिकार की आवाज कहां-कहां उठाई जा सकती हैं वैसे तो सरकार ने बिना मांग के ही काम शुरू कर दिया था परन्तु हमने तो आवेदन देकर काम मांगा, पंचायत ने नहीं माना तब जनपद तक गये क्योंकि हम जानते हैं कि बिना कागज के अधिकार की लड़ाई संभव नहीं है।
आशाग्राम ट्रस्ट के कार्यकर्ता रामलखन कहते हैं कि विकलांगता को रोजगार के साथ जोड़कर काम करना चुनौतीपूर्ण भी और शायद सबसे सार्थक भी। ज्यादा चुनौतीपूर्ण इसलिये क्योंकि अभी ऐसे व्यक्तियों को बोझ माना जाता है। समाज वहीं निवेश करता है जहां फायदा होता है और मानवता का नजरिया ही इसे बदल सकता है। अपनी रणनीति के संदर्भ में वे कहते हैं कि विकलांग व्यक्ति की पहचान उसके नाम से नहीं होती है; उसे लूला, लंगड़ा, बहरा, अंधा या पागल कहकर पुकारा जाता है। जब सम्बोधन में ही उलाहना, अपमान और तिरस्कार का भाव हो तो यह उम्मीद करना बहुत कठिन है कि उनके अधिकारों को भी पहचाना-स्वीकार किया जायेगा। संगति ने एक संगठन के रूप में यही किया। वास्तविक विकलांगों को सरकारी प्रमाण पत्र दिलवाने से लेकर वन भूमि पर पट्टे दिलाने का काम इन संगठनों ने किया है और विकलांग ही इस संगठन के कर्ताधर्ता हैं। वास्तविकता यह है कि कभी भी ऐसे कामों की पहचान नहीं की गई जो विकलांग व्यक्ति अपनी क्षमता से कर सकें। ऐसे में आशाग्राम और संगति ने मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के अन्तर्गत उन कामों को सूचीबध्द किया जिन्हें विकलांग व्यक्ति सर अंजाम दे सकते हैं। जब इस सूची पर हम नजर डालते हैं तो एक के बाद कई सवाल मन-मस्तिष्क में कौंध जाते हैं। पहला सवाल यही होता है कि क्या वृक्षारोपण का काम दोनों पैरों से विकलांग व्यक्ति नहीं कर सकता है या फिर बैठे-बैठे कुयें के अन्दर मजदूर द्वारा भरी गई मिट्टी की टोकरी को नहीं खींच सकता हैं? इसी तरह जब सुरेश की बात आती है तब पता चलता है कि सड़क निर्माण के काम में वह मिट्टी फैलाने और उसे एक सा करने का काम दृष्टिहीन होने के बावजूद सही ढंग से कर रहा था। हमें यह स्वीकार करना होगा कि विकलांगता का पहला वार शरीर के अंग पर होता है पर अविश्वास व्यक्ति के आत्मविश्वास को तोड़कर रख देता है। मेणीमाता गांव में तेनसिंह पैरो से विकलांग होने के बावजूद कण्टूर खुदाई का काम कर रहा है पर इसके लिये गांव के लोगों ने उसके साथ समानता और सम्मान का व्यवहार करना शुरू कर दिया। पंचायत भी उसके साथ इंसानी व्यवहार करती है और कार्यस्थल पर मौजूद हर व्यक्ति उसकी मदद करता है। बिना आत्म विश्वास और सामाजिक विश्वास पैदा किये विकलांग व्यक्ति के प्रति बनी हुई मिथ्या धारणाओं को नहीं तोड़ा जा सकता है।
पंचायत की भूमिका
इस बदलावकारी प्रयास को बड़वानी विकासखण्ड की तलुनखुर्द और बजट्टाखुर्द पंचायतों ने नई दिशा दिखाई। बजट्टाखुर्द पंचायत के विकलांग पंच जगदीश कुमावत ने बाकायदा ग्रामसभा में यह प्रस्ताव रखा कि पंचायत के सभी 11 विकलांग व्यक्तियों के जॉब कार्ड बनाये जायें और बिना शर्त उन्हें रोजगार दिया जाये। वे कहते हैं कि यह तो सबके लिये गारण्टी की बात है तो फिर विकलांग किस आधार पर वंचित होंगे? समस्या यह है कि समाज हम पर सीधी नजर ही नहीं डालता है, जब भी डालता है तिरछी नजर ही डालता है। मतलब यह है कि जब तक हम खड़े होकर अपने हकों की पुकार नहीं करेंगे तब तक हमारी बात सुनी नहीं जायेगी। बस तभी पंचायत ने विकलांगों को एक इंसान की नजर से देखा और स्वीकार किया। इसी के साथ तलुनखुर्द पंचायत के युवा सरपंच प्यार सिंह ने भी इस प्रक्रिया को औपचारिक रूप से आगे बढ़ाया। इसी गांव के तिलक दोनों पैरों से विकलांग हैं। उसे पहले ट्रायसिकल मिली थी जिसे लेकर वह अपने दोस्तों के साथ घूमता रहता था परन्तु जब उसे रोजगार गारण्टी योजना में काम मिला तो जैसे जिन्दगी को देखने का नजरिया ही बदल गया। मैंने पहली बार महसूस किया कि मैं भी तो घर के लिए रोटी कमा सकता हूं। सरपंच प्यारसिंह कहते हैं कि यह विश्वास करना कठिन है परन्तु सच है कि पिछले दो माह में तिलक ने अपने माता-पिता को बहुत सहयोग दिया है और पंचायत कभी भी उसके काम को कम नहीं आंकेगी। सरकार के नियम इंसान की मदद के लिये हैं न कि उसे प्रताड़ित करने के लिये; इसलिये हमने तय किया है कि तलुनखुर्द पंचायत मजदूरी के मानकों को तिलक के अनुरूप बनायेगी।
अब तक ऐसे 25 कामों की पहचान आशाग्राम कर चुका है जिन्हें शारीरिक रूप से विकलांग और मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति पूरी ऊर्जा से पूर्ण कर सकते हैं। इसमें कार्यस्थल पर बच्चों को संभालना, मिट्टी भरना, जमीन का समतलीकरण करना, पानी पिलाना, वृक्षारोपण का कार्य करना, मेढ़ बंधान करना जैसे कई काम शामिल हैं। यह जरूर है कि इस पहल को व्यापक समाज के स्तर पर चरितार्थ करने के लिये केवल कुछ संरचनायें बनाने की जरूरत नहीं है बल्कि जरूरत है व्यापक समाज की सोच को बदलने की। हर एक को यह विचार जरूर करना होगा कि क्या विकलांग होने का मतलब असक्षम होना है?
केस अघ्ययन
गांव - सुराना
बड़वानी जिले के ठीकरी विकासखण्ड के सुराना गांव में पिछले पांच वर्षों में कुल तीन दिन का रोजगार गांव के लोगों को मिला था। यहां के लोग अक्टूबर से मई तक आठ महीने पलायन करके सूरत, पोरबंदर, जूनागढ़, जाते रहे हैं जहां उन्हें निर्माण कार्य, गिट्टी तोड़ने जैसे काम मिलते रहते हैं पर इसके लिये उन्हें अपना घर बार छोड़ना पड़ता है। बच्चों की शिक्षा के बारे में तो वे सोच ही नहीं सकते हैं क्योंकि जहां पलायन करके जाते हैं वहां वे देर से पहुंचते हैं और गांव में तो वे केवल चार-पांच माह ही रहते हैं। गांव में बेबसी और लाचारी को बेरोजगारी ने अविश्वास का भाव दिया है। गांव में इसका परिणाम यह हो रहा है कि किसी भी व्यक्ति का ग्रामसभा, पंचायत और यहां तक कि अपने साथी-पड़ोसी तक में विश्वास टूटा है। शराब की व्यवस्था तो जैसे एक स्थाई रूप ले चुकी है।
मध्यप्रदेश के इस जिले को भी ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में शामिल किया गया है। इसलिये सुराना गांव में भी रोजगार के काम शुरू हुये। 8 जून 2006 को जब हम यहां समुदाय के साथ चर्चा कर रहे थे तब एक व्यक्ति ने कहा कि यहां हर जगह भ्रष्टाचार हो रहा है। पता चला कि पलायन पर जाने के कारण न तो उसका पंजीयन हुआ है न ही उसे जॉब कार्ड मिला है। तभी मोना बाई ने बोलना शुरू किया कि आप कहते हो कि 15 दिन काम न मिले तो बेरोजगारी भत्ता मिलेगा परन्तु यहां हर पंद्रह दिन में 3-4 दिन काम मिलता है इससे तो हमें बेरोजगारी भत्ते का अधिकार भी नहीं रह जाता और काम भी पूरे दिन नहीं मिलता। यह तो हमारे साथ खेल खेला जा रहा है। तभी कैलाश ने कहा कि सारे जॉब कार्ड तो पंचायत में रखे हुये हैं। एक-एक कर हर व्यक्ति यही कह रहा था कि हमें 5-7 दिन ही काम मिला है। ऐसे में सुराना पंचायत के उप सरपंच मांगीलाल रणछोर अमलचा चर्चा में शामिल हुये और उनके सामने एक-एक कर वही मुद्दे हम सबने रखने शुरू किये। चर्चा थोड़ी व्यापक हुई। वे बताते हैं कि इस पंचायत में 7 लाख रूपये से ज्यादा काम कराया जा चुका है और अब भी चल रहा हैं लोग कह जरूर रहे हैं कि 5-7 दिन का काम मिला है पर इस बात का दूसरा पक्ष यह है कि एक-एक परिवार से 3-4 लोग काम कर रहे हैं। इसका मतलब है कि 15 से 30 दिन तक का काम उन्हें मिलता है। उप सरपंच मानते हैं कि हमारे ऊपर तो ज्यादा से ज्यादा काम करवाने का दबाव है भला हम काम क्यों नहीं देंगे पर लोग शराब पीकर ज्यादा श्रम कर नहीं सकते हैं यह इन्हें जरूर ध्यान रखना होगा।
वे (उप सरपंच) कहते हैं कि इस पंचायत में पांच गांव हैं और 3000 की जनसंख्या। हमें संसाधन भी तो बराबरी से ही बांटने हैं। उनका कहना है कि मैंने 50 कुटीरें बनवाईं, सब आदिवासियों के लिये आंगनबाड़ी ठीक से चलती है, पेंशन समय पर बटती है, तालाब बनवाया है क्योंकि पिछले पांच साल छोड़कर वे 17 साल से उप सरपंच है। उन पर ही पंचायत की जिम्मेदारी है। जब हमने पूछा कि सरपंच साहब कहां हैं, तो उन्होंने कहा बाबू भाई मूणिया आदिवासी हैं, उन्हें तो कुछ करना नहीं है। मैं ही सब काम देखता हूं। सत्ता का यह समीकरण बताता है कि विकास का सामाजिक अंकेक्षण सच्चाई की कई परतें उभारने वाला है।
गांव - हिरकराय
2300 की जनसंख्या वाले हिरकराय गांव में तो 5 सालों में केवल एक दिन ही काम मिला लोगों को। और जो भी काम हुये सब ट्रेक्टर-मशीन से हुये। सरपंच की सत्ता ने समाज में यहां एक असंतुलन का माहौल बनाया। पंचायत चार मुहल्लों (फलियों) में बंटी है और ज्यादातर पंचायती संसाधनों का उपयोग सरपंच जी के फलिये में ही हुआ। रोजगार गारण्टी योजना में भी कुछ-कुछ यही हुआ है। अभी चल रहे 25 लाख रूपये के काम का सिरा भी पंचायत के उसी हिस्से से जुड़ा हुआ है। पांच साल की तो दूर हाल की योजना बनाने में भी ग्रामसभा की कोई सहभागिता पहले नहीं रही। यहां सत्ता केन्द्रीकरण हुआ है।
हिरकराय में ताकत का प्रदर्शन किस तरह होता है इसके तरीके भी साफ नजर आये। पंजीकरण और जॉब कार्ड का काम सरपंच जी के घर से हुआ। वे चाहते थे कि गांव में जितने भी लोग उनके विरोधी राजनैतिक दल के हैं उन्हें उनके दरवाजे पर आना पड़ेगा। यह तो हुआ ही जो नहीं आये उनके जॉब कार्ड अब तक नहीं बंटे हैं क्योंकि यहां मसला राजनैतिक टकराव का है।
ताकत के प्रदर्शन का यह सिलसिला यहीं नहीं थमता है। अब जबकि ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना का क्रियान्वयन शुरू हो चुका है, सरपंच जी ने मजदूरी के भुगतान का केन्द्र भी अपने घर को ही बनाया। शुरूआती दिनों में यह होता रहा किन्तु अंतत: संगति संगठन ने इस व्यवहार का विरोध करना शुरू किया। अब न्याय और अधिकार की लड़ाई शुरू हुई। परिणाम यह हुआ कि आक्रोशित लोगों ने अपनी आवाज और तेवर को हथियार बनाकर सत्ता का परिवर्तन किया यानी सत्ता सरपंच के हाथ से लोगों के साथ आना शुरू हुई। अब मजदूरी का भुगतान गांव के बीचों बीच बने चौपाल से होता है, पहले गलत माप करके मजदूरी दी जाती थी पर अब माप भी सही हुई और सही मजदूरी का भुगतान भी हुआ। नजर आता है कि हिरकराय में अब संगठन सही दिशा ले रहा है और जरूरत इस बात की है कि वे सामाजिक अंकेक्षण को अपने संघर्ष का हथियार बना ले।
अवलोकन
- यह नजर आता है कि संगति संगठन रोजगार गारण्टी योजना के बेहतर क्रियान्वयन के लिये आधार बने हैं ऐसे हमें यह जरूर देखना होगा कि इन संगठनों की सही मायनों में क्षमतावृध्दि हो।
- आशाग्राम ट्रस्ट ने सरपंच, सचिवों और कार्यकर्ताओं का रोजगार गारण्टी योजना के संदर्भ में प्रशिक्षण किया है। इस प्रशिक्षण के फायदे भी नजर आने शुरू हुये हैं।
- प्रशिक्षणों की यह श्रृंखला अभी शुरूआती दौर में है। इसे आगे बढ़ाते हुये संगति संगठन के कार्यकर्ताओं तक भी बढ़ाने की जरूरत है। संस्था के कार्यकर्ताओं और सरपंच-सचिवों का योजना के एक - पक्ष पर प्रशिक्षण होना जरूरी है।
- जागरूकता कार्यक्रमों की जो शुरूआत इस सप्ताह में हुई है इसे सतत् जारी रखने की जरूरत है। दो-तीन दिन के सांस्कृतिक कार्यक्रमों से स्थाई प्रभाव देखा नहीं जा सकता है। हालांकि सप्ताह के दौरान किये गये नुक्कड़ नाटकों का अच्छा प्रभाव रहा।
- अभी यह प्रयास शुरूआती दौर में है। ऐसे में ग्रामसभा, पंचायत, संगठन के सदस्यों को पंचायत से लेकर जिला स्तर तक हमें सहयोग करने की जरूरत है। यह देखना होगा कि केवल जुबानी जानकारी देने तक ही हमारा काम अभी से ही सीमित न हो जाये।
- यह सार्थक है कि विकलांगता जैसे सामाजिक मुद्दे ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना पर सशक्तिकरण जैसे प्रयासों के साथ जोड़कर देखे जा रहे हैं। हमें लगता है कि अब जनकल्याणकारी योजनाओं और रोजगार के अधिकार के साथ इस प्रक्रिया को आगे लेकर जाया जाना चाहिये।
- राज्य स्तर पर कार्य कर रही अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर संवाद और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन हो जिनके आधार विषय, - ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में विकलांगता, महिलायें, बच्चे और वंचित वर्गों के लिये संभावनायें, हों सकते हैं।
- ग्रामसभा, पंचायत प्रतिनिधियों और संगठन के कार्यकर्ताओं तक सूचना-सामग्री पहुंचाने की जरूरत है।
सचिन कुमार जैन |