मध्यप्रदेश विधान सभा के बजट सत्र में प्रश्नकाल के दरम्यान प्रदेश में पड़े भयंकर सूखे को लेकर पूछे गए एक प्रश्न पर हुए हंगामे के बीच कांग्रेस के सदस्यों ने सदन का बहिर्गमन किया। जद (यू) विधायक श्रीमती सरोज बच्चन नायक के प्रश्न पर कांग्रेस विधायक सज्जन सिंह वर्मा ने जब पूरक प्रश्न किया कि सरकार यह बताएं कि प्रदेश में सूखे के कारण किसानों को कितने रुपए का नुकसान उठाना पड़ा है, तो इसका जवाब नहीं मिलने से हंगामा शुरू हो गया। राजस्व राज्य मंत्री नारायण सिंह कुशवाह ने यह बताया कि प्रत्येक जिलों से सूखा या आपदा पर जो रिपोर्ट आती है, उसके आधार पर राहत दी जाती है, पर वे यह नहीं बता पाए कि प्रदेश में सूखे से किसानों को कुल कितने का नुकसान उठाना पड़ा है।
समाजवादी विधायक सुनीलम् का यह कहना था कि जब सरकार ने केंद्र को सूखा राहत के लिए पत्र लिखा है, तो उसके लिए क्या सर्वे नहीं किया गया। इस बीच सत्ता पक्ष ने कहा कि सूखा राहत में अब तक किसानों को 50 करोड़ रुपए बांटे जा चुके हैं। जब विपक्ष ने कहा कि केंद्र और राज्य के बीच किसान कब तक फुटबॉल बना रहेगा, इस पर संसदीय कार्य मंत्री ने कांग्रेस की ओर इशारा करते हुए यह टिप्पणी की कि आपके कारण किसान कष्ट भोग रहा है। कृषि मंत्री गोपाल भार्गव का कहना था कि राजस्व संहिता की धारा 6 (4) के तहत कलेक्टर की मांग पर जिलों में राशि भेजी जाती है। उन्होंने यह बताया कि वर्ष 2007-08 में आपदा राहत निधि में 185 करोड़ रुपए हैं। इस बीच मार्क्सहवादी कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक रामलखन शर्मा ने यह सवाल उठाया कि सरकार यह बताए कि प्रदेश के सूखा प्रभावित 39 जिलों में कितने रुपए के कितने राहत कार्य खोले गए हैं। गोपाल भार्गव ने सागर का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां 7 करोड़ रुपए का राहत कार्य खोले गए हैं। विपक्ष ने सरकार के जवाबों से असंतुष्ट होकर सदन का बहिर्गमन कर दिया।
उल्लेखनीय है कि कुछ दिन पूर्व प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार से मुलाकात कर मध्यप्रदेश के सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए तत्कालिक सहायता के रूप में राहत कार्यों के लिए 1826 करोड़ रुपए की मांग की थी। मुख्यमंत्री ने बुंदेलखंड में लगातार चार वर्षों से पड़ रहे सूखे से राहत दिलाने के लिए दीर्घकालिक उपायों के लिए 14 हजार 800 करोड़ रुपए की मांग के लिए ज्ञापन दिया।
प्रदेश के 48 जिलों में से 39 जिलों की 164 तहसीलों को शासन ने गंभीर सूखे की चपेट में माना है। बुंदेलखंड के 6 जिले पिछले चार वर्षों से गंभीर रूप से सूखे की चपेट में हैं। प्रदेश के भू-जल स्तर में भी काफी गिरावट आई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के 500 गांवों में पीने की पानी की गंभीर समस्या हो गई है। मवेशियों के लिए चारे और पानी की व्यवस्था करना संभव नहीं हो रहा है। रोजगार के अभाव में बड़े पैमाने पर ग्रामीणों का पलायन हो रहा है। आगामी खरीफ फसल एवं अन्य राहत कार्यों के लिए 1826 करोड़ रुपए की जरूरत पड़ेगी। सरकार ने केंद्र से यह कहा कि रोजगार गारंटी योजना के तहत 100 दिनों के बजाय 180 दिनों तक रोजगार देने की व्यवस्था की जाए।
विपक्ष का कहना है कि सरकार अभी तक न तो सूखे का आकलन कर पाई है और न ही पिछले दिनों पाला से हुए नुकसान का आकलन हो पाया है। एक ओर सरकार अपने को किसानों की हितैशी बता रही है और दूसरी ओर प्रभावित किसानों को समय पर राहत नहीं दी जा रही है। डॉ. सुनिलम् का कहना है कि सरकार ने गन्ना उत्पादक किसानों की घोर उपेक्षा की है। किसानो को गन्ना का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिल रहा है। यदि सरकार ने उन्हें जल्द ही राहत नहीं पहुंचाया तो वे आत्महत्या करने को मजबूर हो जाएंगे। कांग्रेस ने सरकार के इस आरोप को सिरे से नकार दिया कि राज्य सरकार को केंद्र कोई मदद नहीं दे रही है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कहना है कि केंद्र ने पिछले चार वर्षों में प्रदेश को जितनी मदद दी है, उतनी मदद उनके कार्यकाल में केंद्र ने नहीं दी थी।
राजु कुमार
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