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सूखे में गुम हो गये; टीला के बैंगन और लौकियां

 
     
 

40 बीघा उपजाऊ और सिंचित जमीन के मालिक रामपाल सिंह घोष के बारे में क्या आंकलन करेंगे? यही न कि वह एक फले-फूले सम्पन्न किसान हैं और आनंद से अपनी जिंदगी बिताते होंगें!! यह आकलन चार साल पहले जरूर सच होता पर आज एक आधारहीन कल्पना है। रामपाल का गांव टीला मध्यप्रदेश में बेहतरीन बैंगन और लौकी के उत्पादन के लिए जाना-पहचाना जाता रहा है। टीला पंचायत के 387 परिवारों में से 302 परिवारों के जीवनयापन का सबसे अहम् साधन सब्जी उत्पादन रहा है। अकेले टीला गांव से तीन साल पहले हर रोज 17 से 18 ट्रक सब्जी लादकर निकला करते थे और जबलपुर, भोपाल, इंदौर, झांसी, आगरा जैसे बड़े शहर उनके गंतव्य हुआ करते थे। पर आज दो दिन में 1 ट्रक जा पा रहा है। इन शहरों की मण्डियों में टीकमगढ़ के निवाड़ी विकासखण्ड के टीला जै से गांवों के बैंगन और लौकी की जबरदस्त मांग हुआ करती थी, किसानों का आकलन बताता है कि सब्जियों (लौकी, आलू, शिमला मिर्च और बैंगन) के उत्पादन में 70 से 80 फीसदी की गिरावट आई है और 80 फीसदी किसानों (जिनमें और सीमांत किसान हैं) ने सब्जी का उत्पादन बंद कर दिया है। अब खेत की मिट्टी से गेंहू नही ईटें उगाई जा रही हैं।

गरीब और छोटे किसानों के साथ खेतीहर मजदूरों पर सूखे की मार ज्यादा गहरी पड़ी है। टीला गांव की उर्मिला योंदेरिया का परिवार बहुत सम्पन्न नहीं है। दो एकड़ की अपनी खेती की जमीन पर वे अपने परिवार की जरूरत पूरा करने लायक गेहूं, चना और मटर पैदा कर लेते थे। इसी खेत की मेड़ और एक हिस्से पर वे इतनी सब्जी उगा लेते थे कि पिछले 20 सालों में उन्हें आलू, लौकी, षिमला मिर्च खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी उर्मिला का परिवार तो छोटे से किसान का परिवार है और तीन साल के महीनों से मजदूरी करने के लिये दिल्ली में रह रहे हैं और उर्मिला अपने तीन बच्चों के साथ गांव में ही है। उसे अपने ही गांव में न तो मजदूरी का काम मिल रहा है न ही रोजगार गारण्टी का; क्योकि खेत में पानी नहीं है और राजनीतिक द्वेश ने रोजगार गारण्टी की धार को कुंद कर दिया है। क्षेत्र में पानी के संकट के कारण सब्जी की फसल नेस्तनाबूत हुई है और इसका प्रभाव बच्चों के स्वास्थ्य पर साफ तौर पर देखा जा सकता है। अब मध्यान्ह भेजन योजना और आंगनबाड़ी कार्यक्रम को विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

इस इलाके में सोयाबीन का उत्पादन मूलत: बड़े किसान करते हैं परन्तु अखाद्य फसल होने के कारण कृषि मजदूरों को वैसा सीधा फायदा नहीं मिलता है जिस तरह का फायदा सब्जी और अनाज के उत्पादन से मिला है। इसके अलावा नकद फसलों और रासायनिक उर्वरकों-कीटनाशकों के प्रयोग के कारण भी सब्जी का उत्पादन खासा प्रभावित हुआ है। केन्द्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक टीकमगढ़ उन जिलों में शामिल है जहां पिछले एक दशक में 35¬32 प्रतिशत कुओं का जल स्तर 2 मीटर और 8¬86 प्रतिशत कुओं का पानी 4 मीटर और नीचे खिसक गया है।

झांसी के करीब होने के कारण निवाड़ी विकासखण्ड में सब्जी उत्पादन को जबरदस्त प्रोत्साहन मिला है परन्तु आज निवाड़ी भारत के उन चुनिंदा विकासखण्डों में शामिल है जहां भूजल स्तर तेजी से नीचे गया है। रामपाल सिंह कहते हैं कि निवाड़ी और गांव में तो सब्जी का इतना भण्डार होता था कि स्थानीय लोगो के लिये उसकी कोई मौद्रिक कीमत ही नहीं होती थी और गांव के हर परिवार की थाली में गेहूँ, चना, मटर और सब्जियों की हमेषा मौजूदगी रही किन्तु आज की स्थिति यह है कि हमारे 40 बीघे के खेत में लौकी की एक बेल नहीं है और न ही जमीन में एक भी आलू। रामपाल सिंह ने किसान क्रेडिट कार्ड पर इस उम्मीद के साथ पिछले साल कर्ज लिया था कि वे जल्दी ही अपनी फसल से फायदा कमा कर चुका पायेंगे किन्तु अब तक एक भी किश्त बैंक तक नहीं पहुंची है। कैना-टीला बैंगन के इस गढ़ के 280 कुओं में से एक में भी पानी नहीं है और दोनों तालाब पूरी तरह सूख चुके हैं। यहां 60 फीसदी दलित और कशवाहा परिवार पलायन करके दिल्ली, हरियाणा और आगरा जा चुके हैं।

यहीं के परसराम घोष ने भी बीते साल नलकूप और मोटरपंप सेट खरीदने के लिये 1¬60 लाख रूपये का कर्ज लिया था। उन्होंने तीन बार बोरिंग करवाई पर पानी खोजने में असफल रहे। मोटर पंपसेट अब भी उनके घर में रखा हुआ है बेकार, पर कर्ज लगातार ब्याज का उत्पादन कर रहा है। जीवन में पहली बार लिया गया कर्ज गले की फांस बन गया है। आज संस्थागत और गैर-संस्थागत ऋण की राशि यहां 85 लाख रूपये का आंकड़ा पार कर चुकी है। इस इलाके में ज्यादातर परिवार, फिर वे चाहे कुशवाहा हों, घोष हों, ब्राम्हण हों या फिर अहिरवार, सब्जी के उत्पादन का काम करते रहे हैं। बेहतर पानी की उपलब्धता और उपजाऊ मिट्टी ने उन्हें एक बेहतर जीवन स्तर दिया किन्तु आज इनमें से ज्यादातर परिवार संकट में हैं। कारण यह है कि 20, 25 और 30 एकड़ कृषि भूमि के मालिक अब ''अपने सम्मान'' को हर पल तौलते हैं और इसके परिणामस्वरूप रोजगार गारण्टी योजना के कामों में मजदूरी करने के लिये तैयार नहीं हैं। इससे उनका सामाजिक कद घटता है। सड्क पर मालिक की तरह चलने वाले प्रभावशाली स्थानीय किसान सतानंद घोष मानते हैं कि छोटे मजदूरों के लिये तो फिर भी विकल्प है परन्तु मझोले किसान तो मझधार में फंसे हैं। केवल 10 किसानों कें कुछ वर्गफिट क्षेत्रफल में सब्जी की बुआई हुई है और जीवन में पहली बार हमने टमाटर, बैंगन और लौकी खरीदी है। झांसी के बेहद करीब होने के कारण निवाड़ी के टीका, निवाड़ी भाटा और कैना सरीखे 25 गांवों में इस साल सब्जी का 15 फीसदी उत्पादन भी नहीं हुआ है। इसी का परिणाम है कि कैना में लौकी 16 रूपये किलो, टमाटर 10 रूपये और आलू 8 रूपये किलो की कीमत पर बिक रहा है।

परसराम यादव एक एकड़ में 150 से 200 क्विंटल आलू पैदा करते थे, उनके यहां से 10 टन बैंगन जबलपुर भेजा जाता था पर आज एक इंच जमीन पर भी कोई फसल नहीं है और बेहद निराश हैं यह जानकर कि सरकार अब किसानों को 1200 रूपये प्रति एकड़ के हिसाब से मुआवजा राशि देने वाली है, इसे रामपाल सिंह सांत्वना राशि की संज्ञा देते हैं, जो उन्हें मृत्यु से पहले मिल जाने वाली है।

निवाड़ी के गांवों में बिजली के संकट ने सब्जी उत्पादकों के दुख को और ज्यादा बढ़ा दिया है। विक्रम सिंह कहते हैं कि उन्होंने यह सोचकर पिछले साल कर्ज पर मोटर पंप खरीदा था कि शायद इससे पानी की कमी दूर हो पायेगी पर गांव में केवल एक घंटे ही बिजली मिल पा रही है, इतनी देर में तो घर के उपयोग का ही पानी भर पाता है, सिंचाई का तो सवाल ही नहीं उठता।

केनगांव के रतिराम के पास कुल जमा ढाई एकड़ जमीन है और पिछले तीन सालों से गांव में बिजली नहीं है, छह माह पहले तो बिजली के तार भी निकाल लिये गये पर उनके घर पर 42142 रूपये का ताजा बिजली का बिल आया है। कैलाश के घर एक बत्ती कनेक्शन है पर उनके बिजली के बिल की राशि 15254 रूपये है। विश्वास करना कठिन है पर बिजली के बिलों की माफी के झूठे वायदों के चक्कर में आज यह गांव 41¬51 लाख रूपये के विद्युत बिलों के बोझ तले दबा हुआ है। इस दबाव ने खेती की संभावनाओं को लगभग खत्म करके भुखमरी और गरीबी को रोजमर्रा जिन्दगी का हिस्सा बना दिया है।

सिंदूर सागर गांय रामप्रकाश रैकवार (ढीमर) के लिये ग्यारह सौ साल पुराने सिंदूर सागर तालाब के सूख जाने का मतलब केवल पानी खत्म हो जाना नही है। इस तालाब की तलहटी के उभरने और सूख कर दरक जाने का मतलब है भुखमरी और असुरक्षा का गहरे तक जड़ें जमाते जाना। मध्यप्रदेश में मछली पकड़ने और जलीय व्यापार पर निर्भर रह कर जीवनयापन करने वाले ढीमर समुदाय की नौ लाख की जनसंख्या में से एक बड़ा हिस्सा बुंदेलखण्ड के टीकमगढ़ जिले में कई सदियों से निवास करता आया है। रामप्रकाश रैकवार के पूर्वजों का बुंदेलखण्ड से रिश्ता इस इलाके की जलसंरक्षण, संवर्धन और तालाबों की समृध्द परंपरा के कारण गहरा होता गया। ऊपरी सतह पर लाल भुर-भुरी और थोड़े गहरे में द्य चट्टानें होने के कारण बुंदेलखंड के इस जिले में 1500 से ज्यादा तालाबों और पारंपरिक जल संरचनाओं का उल्लेख मिलता है। यह विश्वास करना जरा कठिन है कि टीकमगढ़ जिले के प्रमाणिक 995 तालाबों में से 421 का ही अस्तित्व नजर आता है किंतु आज की स्थिति में केवल 10 तालाबों में पानी रह गया है और 76 तालाब जमीन के लालच में नष्ट कर दिये गये। इनमें से 121 तालाबों में आज खेती की जा रही है।

उनका परिवार कई दशकों से सिंदूर सागर तालाब से मछलियां पकड़ कर जीवनयापन करता रहा। लगभग 700 हैक्टेयर क्षेत्रफल के इस विशाल जलक्षेत्र के आस-पास रहने वाले 240 परिवार कभी भूखे नही सोये किन्तु 72 वर्षीय सिंय गणेश ढीमर हफ्ते में दो किमी दूर सागर को राते तो भूखे ही गुजारना पड़ती हैं, क्योंकि उनके तीनों बेटे पलायन करके एक साल पहले दिल्ली जा चुके हैं और वे अपनी पत्नी के साथ 275 रूपये की सामाजिक सुरक्षा पेंशन पर पूरा महीना गुजारते हैं। वहीं रामप्रकाश रैकवार को इस साल अपनी बेटी वंदना की शादी तय हो जाने के बाद भी अगले साल के लिये टाल देना पड़ी क्योंकि सिंदूर सागर की ढीमर बस्ती के 10 परिवार भी मिल कर शादी का खर्चा वहन कर पाने की स्थिति में नही हैं। पिछले तीन वर्षों में इस गांव के ढीमरों ने एक भी मछली नहीं पकड़ी है और हर साल उनकी उम्मीदों के टुकड़े छोटे होते जा रहे हैं क्योंकि जिस पारंपरिक व्यवसाय पर वे निर्भर रहे हैं वह अब उनके हाथ से निकल चुका है। वर्ष 1999 में बाद मध्यप्रदेश सरकार ने सिंचाई प्रबंधन में किसानों की सहभागिता के लिये कानून बनाया था और तभी से कृषि क्षेत्र में जल उपभोक्ता संगठनों की भूमिकायें सामने आना शुरू हुई। इसी दौरान राज्य में मछली पालन के क्षेत्र में सरकार के नियंत्रण को बढ़ाने के मकसद से सहकारिता की व्यवस्था को विस्तार दिया गया। मकसद यह था कि यदि मछली पालक (जैसे-ढीमर और केवट) संगठित और संस्थागत रूप से मछली व्यवसाय करेगें तो उन्हें मछली के बीजों सहित कुछ अनुदान और तकनीकी उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित की जायेगी। यह भी कहा गया कि इससे मछुआरे ठेकेदारों के चुंगल से निकल पायेंगे; परंतु जमीनी सच्चाई अब कुछ ओर है । सिंदूर सागर के पंचायत के मौजा (भू-भाग) में आने वाले सिंदूर सागर तालाब पर मछली पकड़ने ओर फायदा कमाने का अधिकार ढीमरपुरा गांव के लोगों की सहकारी समिति को दे दिया गया; क्योंकि वे प्रभावशाली थे और उन्होंने दस्तावेजों में यह सिध्द कर दिया कि सिंदूर सागर में कोई ढीमर परिवार ही नही रहता है। आज एक ही समुदाय के दो गांव आपसी दुश्‍मनी की धार तेज कर रहे हैं। टीकमगढ़ जिले में आज 98 पंजीकृत समितियां है पर राजनैतिक दखल अंदाजी और बढ़ते पर्यावर्णीय संकट के फल स्वरूप अब लगभग कर समिति टकराव और विवाद के दायरे में फंसी हुई है। बुंदेलखंड में तालाबों की परंपरा जीवन यापन के साधनों की श्रंखला से बंधी हुई है। इससे कृषि, मछली पालन और पशुपालन जैसे सबसे अहम आजीविका के स्रोत जुड़े हुये हैं। तालाब से नहरों या नालियों के जरिये बहने वाले पानी का उपयोग सिंचाई के लिये और तालाब के मुख्यक्षेत्र में रूके हुये पानी का उपयोग मछली पालन और पशु उपयोग के लिये सिध्दांतत: किया जाता है किंतु सूखे के संकट ने किसान, पशु पालक और मछली पालकों को एक दूसरे के सामने दुश्मनों की तरह ला खड़ा किया है। अब सिंदूर सागर के ही किसान ढीमर समुदाय के हकों की लड़ाई में उनके साथ खड़े होने को तैयार नहीं हैं तो वहीं दूसरी ओर आक्रामक और कभी-कभी हिंसक तेवर दिखाकर अब ढीमरपुरा के 25 परिवारों ने तालाब की जमीन को ही जोतना शुरू कर दिया है। बुजर्ग गैबू रैकवार कहते हैं कि ''तालाब की जमीन पर जब किसी का हल चलने लगता है तो फिर उसकी मंशा उस पर कब्जा कर लेने की होती है; तब तालाब कभी पुर्नजीवित हो पाये, इसकी संभावना जरा कम ही होती है।'' धनीराम ढीमर कहते हैं कि हमने किताबें कभी नही पढ़ी है पर यह जरूर समझ पाये हैं कि पहले राजवंश (यानी राज्य) जल स्रोतों का निर्माण और संरक्षण करते थे। वे जानते थे कि दुश्‍मन के आक्रमण से तो निपटा जा सकता है परंतु पानी और अनाज का संकट राज्य के भीतर अशांति पैदा कर देगा जिसे संभाला नही जा सकता है। पर आज का राज्य इस ताने-बाने को समझ ही नही पा रहा है और भुखमरी के हालात पैदा हो रहे हैं। पांच साल पहले जब खुले बाजार में 25 रूपये मजदूरी मिलती थी तब ढीमर परिवार मछलियां पकड़ कर 60 से 75 रूपये कमा लेते थे किंतु अब उनके पास कोई विकल्प नही बचा है। पहले सरकार ने समितियों के जरिये कुछ परिवारों को फायदा दे दिया तो फिर बाद में सूखे ने उन्हें भी तोड़ दिया। टीकमगढ़ जिले में 7600 ढीमर और केवट परिवार पूरी तरह से मछली पालन पर निर्भर रहे है पर यदि सिंदूर सागर और ढीमरपुरा पर नजर डाले तो पता चलता है कि हर परिवार के युवा और सहारा दे सकने वाले सदस्यों को पलायन का रास्ता इख्तियार करना पड़ा। धनीराम लंबी सां भर कर कहते हैं कि दिल्ली, आगरा कौन जाना चाहता है, वहां हमारी अनर्ज़ो जिदी हैपी बर्थ-डे। हम तो यहां रोजगार से ज्यादा कोई उम्मीद नहीं रखते। गांव के पचास रूपये दिल्ली के दो सै रूपये से ज्यादा होते हैं। वहां की गंदी बस्तियों, शेषण और पुलिस की दुत्कार से तो मुक्ति की तो कोई कीमत ही नही हो सकती है।

पिछले चार पांच सालों में ऐसा लगता है कि सब कुछ बदल गया है। सवा पांच सौ की जनसंख्या में से बस्ती के ढाई सौ लोग रोजगार की तलाश में गांव से चले गये हैं; कुछ तो लौटकर ही नही आते हैं। पूर्व सरपंच नत्थू रैकवार के भाई दुर्गाप्रसाद अपना परिवार लेकर गये थे पर तीन साल से लौटकर ही नहीं आये क्योंकि यहां अब जीवन कठिन हो गया है। ढीमर मछली पकड़ने के जाल का धागा भी खुद बनाते हैं और बुनते भी खुद हैं, आल्हा और ढ़िमरिया राग गाते हुये; पर तीन साल से अब न तो आल्हा गाया जाता है और न ढ़िमरिया, क्योंकि ये तो खुशी के गाने होते हैं, अब तो बस्ती में खुशी के अवशेष भी नही रहे। खान-पान भी बदल गया है; मछली के पहाड़ खड़े कर देने वाले नत्थू अब दो-तीन महीने में मछली खाने के बारे में सोचते हैं। वे कहते हैं कि आज अगर जाल फैलाने का मौका मिले तो जिन्दगी बदल जाये क्योंकि जो मछली पांच साल पहले 20-25 रूपये किलो बिका करती थी आज सवा सौ से डेढ़ सौ रूपये किलो बिक रही है। और हम तो यह जानते हैं कि दस किलो की मछली कैसे पैदा की जाती है परंतु अब यह संभव नही दिखता है।

ढीमरपुरा गांव के लोगों को सहकारी समिति के जरिये भले ही तालाब मिल गया हो परंतु इससे गांव में झगड़े भी बढ़े हैं और सूखा पड़ने के बाद सरकार से कोई अनुदान भी नही मिला। लोग कहते हैं कि दिल्ली में काम मिल जाता है पर सीताराम के अनुभव बेहद दर्दनाक रहे। हरियाणा के बालगढ़ में उनके परिवार के 12 सदस्यों ने मजदूरी की परंतु ठेकेदार ने उनकी 18 हजार रूपये मजदूरी में से केवल 2000 रूपये दिये और काम से निकाल दिया। तीन दिन तक आंसू नहीं थमें इस परिवार के। जब कोई जाता है तो पता नही चलता कि कहां है, पलायन बिल्कुल मौत जैसा होता है। रामदास रैकवार के भाई लक्ष्मण पूरे परिवार के साथ पांच महीने से निकले हैं पर किसी को पता नही है कि वे कहां हैं? जब आयेंगे तब ही पता चलेगा कि जिंदा भी हैं या नहीं? गांव के 170 परिवारों के पास 2 से 10 बीघा जमीन है पर एक भी परिवार उन 29 लाख परिवारों में शामिल नही है जिन्हें किसान क्रेडिट कार्ड मिले हैं और जिन्हें पिछले 3 सालों में 7585 करोड़ रूपये के ऋण बांटे जाने का मध्यप्रदेश सरकार दावा करती है। ऐसे में रतन लाल को जब टीकमगढ़ में कहीं कर्ज नही मिला तो वे उत्तरप्रदेश के नोहटा गांव से अपने रिश्तेदारों की गारंटी पर 7 फीसदी मासिक ब्याज दर पर दिल्ली जाने के लिये दस हजार रूपये लेकर आये थे; दिल्ली गये और 8 दिन रहे भी और काम न मिलने पर वापस आ गये। अब कर्ज का बोझ दोहरा हो गया है।

किशोरी लाल रैकवार आज की परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुये कहते हैं कि हमारे गांव के पास ऐतिहासिक गढ़ कुढ़ार का किला पहाड़ पर होने के बावजूद घने जंगलों के कारण नजर नही आता था; पर अब उसे 5 किलोमीटर दूर से देखा जा सकता है; मतलब यह है कि जंगलों के खत्म होने और पानी का सम्मान नही होने के कारण यह स्थिति है। हम इसे सूखा नही अकाल कहते हैं क्योंकि संकट केवल पानी का नही है बल्कि रोटी और सुरक्षा का भी है। ऐसा कोई कदम उठता नजर नही आता है जो सूखे और अकाल के संकट में ढीमर समुदाय तक पहुंचता हो।

बुनदेंलखण्ड के छतरपुर जिले के लौंडी की चौरसिया बस्ती में रहने वाले छेदीलाल चौरसिया के लिये भूमण्डल का बढ़ता हुआ तापमान (ग्लोबल वार्मिंग) महज एक किताबी सिध्दान्त नहीं रह गया है। अब से पाँच साल पहले वे पान उत्पादन के अपने पारम्परिक पेशे के जरिये 60 डेसीमल जमीन के छोटे से टुकड़े से पचास हजार रूपये कमा लिया करते थे परन्तु पर्यावरण के तेजी से बढ़ते तापमान और चार साल के लगातार सूखे ने छेदीलाल सहित बुदेलखण्ड के छतरपुर जिले के चार हजार पान उगाकर होठों को लाल करने वाली एक पूरी जमात के अस्तित्व पर वार कर दिया है। अब अंचल के 3000 लोग इस काम को छोड़ चुके हैं और हर घर के 1 या 2 सदस्य पलायन कर चुके हैं।

मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के लौंडी नगर में रहने वाले 220 परिवार वर्ष 2002 तक अपनी जिन्दगी के खुद मालिक हुआ करते थे, वे केवल ब्राम्हण होने के कारण ही समाज में उल्लेखनीय नहीं रहे बल्कि उनके द्वारा पैदा किया जाने वाला बंगाली पान पूरे देश भर में मुँह में जाते ही घुल जाने ओर एक खास तीते स्वाद के लिये विख्यात रहा। परन्तु आज छेदीलाल के परिवार के युवा 3 सदस्य मजदूरी की तलाश में जीवन में पहली बार पलायन करके दिल्ली जैसे महानगर की भीड़ में खो गये। जिन्दगी में असुरक्षा और पलायन की स्थिति को उन्होंने इस साल पहली बार देखा है। धर का बहुत सा सामान बेचने के बाद आज उन पर 25000 रूपये का कर्ज है।

30 डिग्री के तापमान में होने वाली पान की फसल को शुरूआती तीन महीनों तक हर रोज सुबह 9 बजे के बाद तीन-तीन घंटे पानी देना होता है, परन्तु लौंडी में इस आत्मा को रूप देने के लिये एक-एक व्यक्ति को मान सागर तालाब में गङ्ढे खोदकर 100 से 400 मटके भरकर पानी लाना पड़ रहा है और वे एक-एक बूंद छिड़ककर पान की एक-एक बेल को जिन्दा रखने की कोशिश कर रहे हैं। इसी इलाके में महाराजपुर पान की एक बड़ी मण्डी भी है और उत्पादन का इलाका भी, पर यहां भी 60 फीसदी परिवार इस काम को छोड़ चुके हैं और मजदूरी जैसे विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। पान को कच्चा धंधा माना जाता है, उन्हें न तो कर्ज मिलता है न ही आज वे सूखा प्रभावितों की तरह मुआवजे के हकदार है। वर्ष 2002 में 200 रूपये प्रति किलो बिकने वाला देशी पान आज 60 से 70 रूपये किलो बिक रहा है।

गौरीशंकर ने भी 18 पारियाँ लगाई हैं, परन्तु यह एक जुआ है, जो वे हार चुके हैं। उनके मुताबिक पान की कलम हर साल 20 फरवरी से 20 मार्च के बीच रोपी जाती है, और जरूरी है कि कलम के रोपण के तीन माह की अवधि तक वातावरण का तापमान 30 डिग्री से ज्यादा न जाये। इसके लिये बांस और पूस से फसल के इलाके को घर बनाकर ढक कर रखा जाता है परन्तु गौरीशंकर कहते हैं कि जब हमने पान लगाया था तब तापमान 35 डिग्री तक जा चुका था, ऐसा पहले तो हमारे बुजुर्गों ने कभी नहीं देखा। पान के ये उत्पादक सूरज की रौशनी में हाथ रखकर या जमीन पर पैर का पंजा रखकर यह बताने में सक्षम हैं कि वातावरण का तापमान कितना है। एक बार रोपा गया पौधा तीन साल तक पान का उत्पादन करता है किन्तु बढ़ते तापमान और पानी की कमी के कारण उनहें उस साल भी बचा पाना अब लगभग नामुमकिन हो गया है। पिछले कुछ वर्षों से यहां के देशी पान में सूखा रोग भी लगने लगा है जिससे तमाम कोशिशों के बाद बढ़ने वाली फसल सूख जाती है, परन्तु अब तक कोई उनकी मदद के लिये आगे नहीं आया है। सरकार के कहने पर एक दशक पहले बंगली पान उत्पादकों ने भी फसल में रासायनिक उर्वरकों, यूरिया और डीएपी का उपयोग शुरू कर दिया था, इस प्रयोग ने भी उनकी जमीन की चारित्रिक विशेषताओं और उत्पादकता को गंभीर रूप से प्रभावित किया।

छतरपुर जिले के गजेटियर के अनुसार यहाँ सबसे ज्यादा गर्मी मई में महसूस की गई जब अधिकतम तापमान 41¬.1 डिग्री होता था किन्तु इस साल 12 अप्रैल को ही पारा 42 डिग्री को पार कर गया, इस अगन ने पान पैदा करने वालों को उम्मीदों को झुलसा दिया है। पान की सिंचाई के लिये लौंडी में छतरपुर महाराज के द्वारा बनवाया गया मान सागर तालाब सबसे अहम् स्रोत रहा है इस बार के सूखे की मार इतनी भयानक रही कि चार सौ साल में पहली बार इस बड़े तालाब में एक बूंद पानी नहीं है।

छतरपुर जिले में चार हजार से ज्यादा चौरसिया परिवार जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों पर ढाई फिट चौड़ी और ढाई सौ फिट लम्बी पारियाँ (यानी पान की क्यारियाँ) लगाकर पान का उत्पादन करते रहे हैं। जमीन के एक टुकड़े पर सामान्यत: 25 से 100 पारियाँ लगाकर 5 से 10 परिवार एक साथ संयुक्त रूप से उत्पादन करते हैं। इनमें से ज्यादातर परिवार खुद जमीन के मालिक नहीं होते हैं बल्कि गांव के दूसरे किसानों-जमीदारों से बटाई पर जमीन लेकर अपनी आजीविका चलाते रहे हैं। एक पारी के लिये हरीशचंद्र चौरसिया 185 रूपये सालाना किराया चुका रहे हैं और एक क्यारी लगाने में उन्होंने इस साल 3200 रूपये खर्च किये हैं किन्तु फसल की आज की स्थिति का वास्तविक आंकलन उन्हें बता रहा है कि उन्हें उत्पादन से 1800 रूपये से ज्यादा वापस नहीं मिलने वाले हैं, यानी 10 पारियों पर 14000 रूपये का घाटा, वह भी लगातार तीसरे साल।

40 साल से खुद पान पैदा कर रहे बद्रीप्रसाद अहिरवार बताते हैं कि पिछले पांच सालों में देशी पान के उत्पादन की लागत 800 रूपये से बढ़कर 4000 रूपये तक पहुँच गई है परन्तु सूखे, बीमारी और पूंजीगत सहयोग के अभाव में हम बाजार में लगातार अपने पान नहीं भेज पाये, जिससे दूसरी किस्मों के बाहरी पानों ने बाजार में जगह बना ली। एक ओर तो लागत बढ़ी तो वहीं दूसरी ओर हमारा बाजार भी कम होता गया और अब तो पान मसालों के पाउच ने पैर रखने की जगह नहीं छोड़ी है। पश्चिम बंगाल में तो पान की फसल पैदा करने वालों को किसान भी माना जाता है और संरक्षण भी दिया जाता है यही कारण है कि भरपूर फसल होने के कारण मिदनापुर का बंगला पान छतरपुर में 30 पैसे में मिल जाता है पर स्थानीय स्तर पर ही बंगली (देशी पान) की लागत 60 पैसे पड़ने लगी है क्योंकि रूपये में मिलने वाला बांस अब 10 रूपये का मिल रहा है, मजदूरों की दिहाड़ी भी दोगुनी हो गई है और बिजली के मामले में तो शोषण का कोई ठिकाना ही नहीं है।

ऐसा नहीं है कि देश में केंद्र और राज्य की सरकारें क्या कर रही हैं, वह इन पान उत्पादकों को पता नहीं है। हाल ही में छोटे और मझोले किसानों की कर्जा माफी ने उन्हें और ज्यादा उपेक्षित होने का अहसास कराया है। छेदीलाल चौरसिया राज खोलते हुये बताते हैं कि हमें तो किसान ही नहीं माना जाता और जिले के 95 प्रतिशत पान उत्पादकों के पास किसान क्रेडिट कार्ड नहीं है न ही उन्हें कर्ज ही दिया जाता है क्योंकि हमारी जमीन का आकार इतना छोटा है कि हम उनके पात्रता मापदण्डों से बाहर निकल जाते हैं। अब से चार साल पहले हमें साहूकार कर्ज दे सकते थे पर तब हमें कर्ज की जरूरत पड़ी नहीं और अब जबकि जरूरत है तो इतने संकट में देखकर कोई कर्ज देने को भी तैयार नहीं है।

पानी की फसलों से जीवनयापन करने वाले समुदाय इस हद तक उपेक्षित रहे हैं कि व्यापार और अर्थव्यवस्था में उनका स्थान नगण्य माना जाता है। यहां तक कि सरकार के सबसे अधिकृत और ऐतिहासिक दस्तावेज जिला गजेटियर में भी इनका जिक्र और विश्लेषण बड़ी फसलों और व्यापार की भीड़ में गुम हो गया। आज भी किसी योजना एवं नीति के तहत पान उत्पादकों से संरक्षण की कार्य योजना दर्ज नहीं है। जबकि प्रत्यक्ष रूप से 4000 एवं पान की दुकानों के जरिये 25 हजार परिवार आजीविका कमाते रहे हैं।

 
     
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