PovertyMedia and Rights Food Security Livelihood Disability Women Rights Globalisation Health Social Exclusion Education Child Rights Environment Right to Information and Governance

 

     
 
| Print this Page
 
     
  YOU ARE HERE: Home > Livelihood > Sambhaliye ... Rozgar Guarantee Yojana Bhatak Rahi Hai  
     
  संभालिये.... रोजगार गारण्टी योजना भटक रही है !  
     
 

मध्यप्रदेश में ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के क्रियान्वयन के शुरूआती चरणों में रोजगार के इस कानूनी अधिकार की विसंगतियां नजर आने लगी हैं। और इन्हीं व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर यह कहा जाना किसी तरीके से अनुचित नहीं है कि इन विसंगतियों पर ध्यान देकर रोजगार के कानूनी अधिकार दिलाने वाली प्रक्रिया को भटकने से रोका जाना चाहिये। शिवपुरी के सहरिया बहुल कोलारस विकासखण्ड के सिंघराई गांव के सीताराम अपने परिवार के साथ पिछले दस वर्षो से चैत काटने के लिये पलायन करके गांव से बहुत दूर झांसी और आगरा के सम्पन्न किसानों के यहां रोजगार की तलाश में जाते रहे हैं। यह एक तथ्य है कि पलायन की मजबूरी ने एक हद तक स्थाई व्यवस्था का रूप ले लिया है। जहां एक ओर सम्पन्न किसानों को सस्ते श्रम की जरूरत होती है तो वहीं दूसरी ओर सरकार और समाज के शोषण के शिकार सहरिया आदिवासियों को किसी भी कीमत पर मजदूरी की जरूरत रही हैं। इन दो सर्वथा भिन्न वर्गो की जरूरतों को मानव श्रम का कारोबार करने वाले बिचौलिये पूरी करते रहे हैं। वे एक किस्म से आदिवासी श्रम की सम्पन्न किसानों के खेतों तक आपूर्ति करते हैं। जिसके एवज में वे खुद भी मुनाफे का व्यापार करते हैं। परन्तु इस मर्तबा सीताराम को सिंघराई के सरपंच ने पलायन पर न जाने की गुजारिश की। सीताराम को बताया गया कि अब रोजगार पाना उसका कानूनी अधिकार है और वह अब रोजगार की मांग कर सकता है और यह अधिकार केवल उसे ही नहीं बल्कि गांव के सभी साठ परिवारों को मिलेगा। यह सहरियाओं के लिये एक किस्म की आश्चर्यजनक प्रसन्नता वाली सूचना थी। कारण यह है कि मूलत: सहरिया अपने गांव से पलायन नहीं करते थे परन्तु पहले जंगलों और फिर रोजगार के स्थानीय अवसरों के खत्म होने के कारण मजबूरी में उन्हें पलायन की प्रवृत्ति अपनानी पड़ी थी।

जनसंघर्ष के परिणाम स्वरूप जब ग्रामीण इलाकों के परिवारों को रोजगार का अधिकार देने वाला राष्ट्रीय कानून बना तब सरकार ने भी यह कहा था कि अब इन्हें पलायन नहीं करना पडेगा और इस अधिकार से सतत् भुखमरी की समस्या से भी निपटा जा सकेगा। सीताराम को यही लगा कि यह कानून तो जैसे उसी का जीवन बचाने के लिये बनाया गया है। सिंघराई गांव के किसी भी परिवार ने इस वर्ष चैत के मौसम में रोजगार के लिये पलायन नहीं किया। परन्तु उनका यह अहसास बहुत सुखद नहीं रहा। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून के अन्तर्गत बनी राज्य की रोजगार गारण्टी योजना में यूं तो यही कहा गया है कि शारीरिक श्रम करने के इच्छुक परिवार को साठ रूपये की न्यूनतम मजदूरी पर कम से कम एक सौ दिन का रोजगार दिया जायेगा। परन्तु जब सीताराम सहित सिंघराई गांव के 50 परिवार मोहरा से सिंघराई तक बनने वाली सड़क योजना में काम करने पहुंचे तो उन्हें यह बता दिया गया कि उन्हें न्यूनतम मजदूरी तभी मिलेगी जब वे 10 फिट लम्बे 10 फिट चौड़े और एक फिट गहरे गड्डे खोंदेगे। इस शर्त के अनुरूप जब सीताराम ने काम किया तो पता चला की पथरीली जमीन में वे इस माप का गङ्ढा दो दिन में खोद पाये। इसके बाद सीताराम के परिवार से अनारकली और रामश्री ने भी उन्हें मदद करना शुरू किया। तब कहीं जाकर तीन लोग मिल कर इस सरकारी लक्ष्य को पूरा कर पाये और फिर भी उन्हें एक व्यक्ति की ही न्यूनतम मजदूरी मिली।

यह सीताराम की पहली उम्मीद टूटने का वक्त था क्योंकि तीन लोगों की 11 घंटे की हाड़तोड़ मेहनत के बाद उन्हें केवल 40 रूपये की मजदूरी मिल रही थी। आज गांव के पचास साला बुजुर्ग सेवाराम जब पलायन की व्यवस्था का विश्लेषण करते हैं तो पता चलता है कि एक माह की फसल कटाई के एवज में उन्हें छह क्विंटल अनाज की कमाई होती है और उसमें कड़क चट्टानें तोड़ने जैसी मेहनत भी नहीं होती। वे पूछते हैं कि मुझे कौन सा अधिकार मिला है? लगातार उपेक्षा और शोषण से जूझते हुये सहरिया शारीरिक रूप से इतने कमजोर हो चले हैं कि चालीस की उम्र में उनको अस्सी साल के व्यक्ति के रूप में ही जांचा जाता है। यही कारण है कि सेवाराम की छाती थोड़ा काम करते ही तड़कने लगती है पर नियम और प्रावधान बनाने वाली सरकार को इस दर्द से कोई मतलब नहीं है। सरकार ने कभी व्यवस्था को दीमक की तरह खोखला कर रहे ऊंची तनख्वाह पाने वाले अफसरों और बाबुओं के काम की मापतोल नहीं की कि वे अपने वेतन के एवज में कितना काम करते हैं, समाज और राज्य के विकास में क्या योगदान देते है। ये तो 180 दिन काम करके 365 दिन का वेतन पाते हैं पर जब सिंघराई के आदिवासी सूरज की झुलसा देने वाली धूप में दिन भर काम करके जब बैठते हैं तो हर शाम उनके काम की इंचों में माप की जाती है और दो इंच कम गहराई निकलने पर उनकी 10 रूपये की मजदूरी काट दी जाती है।

सरकार ने कहीं न कहीं रोजगार गारन्टी कानून में स्पष्ट प्रावधान करने की कोशिश की है परंतु इसे लागू करने वाले तंत्र ने उस स्पष्टता को नकार भी दिया है। कानून कहता है कि सात घंटे श्रम करने वाले व्यक्ति को न्यूनतम मजदूरी (यानी 60 रूपये) तो दिये ही जायेंगे परन्तु जब हम इस कानून के अन्तर्गत चल रही परियोजनाओं पर एक नजर डालते हैं तो पता चलता है वहां मजदूर सुबह आठ बजे काम शुरू करते है और शाम छह बजे तक सरकारी लक्ष्य पूरा करने की कोशिश करते हैं यानी हर रोज 10 घंटे काम करके भी न्यूनतम मजदूरी नहीं पाते हैं। इसी गांव के अंगद और उसकी पत्नी गुड़िया ने 23 मार्च को दिनभर काम किया पर उनके जॉब कार्ड में आधे-आधे दिन की मजदूरी चढ़ाई गई।

ग्राम स्वराज को सुदृढ करने की मंशा के तहत इस कानून में ग्रामसभा और पंचायतों को अधिकारों से मालामाल कर किया गया है। गांव में किस तरह का विकास होगा, क्या निर्माण कार्य होंगे यह योजना भी ग्राम सभा और पंचायतें बनायेंगी परंतु सिंघराई में आज जो काम चल रहा है उसका ग्राम सभा ने नहीं बल्कि प्रशासन ने निर्णय लिया था। इतना ही नहीं गांव में किसी व्यक्ति को यह नहीं पता है कि इस दो किलोमीटर लम्बी कच्ची सडक के निर्माण के लिये 4.05 लाख रूपये की राशि स्वीकृत है। जब उन्हें यह लागत बताई गई तो अधिकांश यही रहते रहे कि सड़क तो इससे आधी लागत में बन जायेगी, आखिर यह लागत तय किसने की? यह स्थिति केवल एक पंचायत की नहीं है बल्कि शिवपुरी में अब तक शुरू हो चुके 667 रोजगार देने वाले कार्यो की कहानी भी इससे जुदा नहीं है।

योजना में ग्रामसभा को वास्तव में निर्णय लेने के अधिकार दिये जाने चाहिए। गांव में सहरिया आदिवासियों के पास छोटे-छोटे खेत हैं परन्तु जमीन का उपचार करने और सिंचाई की व्यवस्था करने की जरूरत है। इस जरूरत को रोजगार गारण्टी कानून में तय किये गये पानी-मिट्टी के काम से जोड़कर पूरा किया जा सकता है। परन्तु गांव के लोगों का खुद यह तय करने का अधिकार नहीं है कि कौन से काम रोजागार योजना में हमारे गांव में होना चाहिए।

योजना का क्रियान्वयन करने वाली एजेंसियों को इस नजरिये से ऊपर उठना पड़ेगा कि केवल मजदूरी उपलब्ध करवाकर सहरिया को सतत् भुखमरी और गरीबी से मुक्ति कराया जा सकता है। जब तक आदिवासियों की आजीविका के संसाधनों को विकसित करने वाले प्रयास नहीं होंगे तब तक गरीबी के संदर्भ में यह योजना बहुत योगदान दे नहीं पायेगी।

इसके बाद यह नजर आता है कि गर्मी की तपती दुपहरी में निर्माण कार्य स्थल पर थोड़े न बहुत 56 छोटे-छोटे बच्चे अपने मां बाप के साथ खुले आसमान के नीचे समय गुजार रहे हैं। सिंघराई के लिये रोजगार सीधे सीधे जीवन-मरण के सवाल से जुड़ा हुआ है। इस गांव के सभी 140 बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और महिलाओं की स्थिति खराब है। कानून कहता है कि जहां पांच बच्चे रोजगार योजना में अपने मजदूर मां-बाप के साथ आयेंगे, वहां एक व्यक्ति उनकी देखभाल के लिये नियुक्त किया जायेगा परन्तु सरपंच गुरप्रीत चीमा ऐसे किसी भी कानून को मानने से इंकार करते हैं। इतना ही नहीं जब वहां पीने के पानी की उपलब्धता पर नजर डाली गई तो निर्माण कार्य की निगरानी कर रहे मैट हरिवल्लभ ने कहा कि यहां पानी रखो जो हर मजदूर मालिक बनकर अपनी जगह पर ही जल सेवा चाहता है इसलिये यहां पानी नहीं रखा है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि अपनी सहूलियत के अनुसार कानूनी प्रावधानों के छिलके नहीं उतारे जाने चाहिये।

गांव की सभा रोजगार गारण्टी योजना के हर काम का परीक्षण कर सकती है परन्तु सिंगराई में 27 दिन से ज्यादा का काम हो चुका है और दुनिया का सबसे अहम दस्तावेज मस्टररोल पंचायत के सचिव महोदय के घर में सुरक्षित रखा गया है। इन मस्टर रोल में मैट को निर्देश है कि भले ही काम परिवार के तीन व्यक्ति कर रहे हों पर मस्टर रोल में एक व्यक्ति की मजदूरी ही चढ़ाई जायेगी और मस्टर रोल केवल उन्हीं की मौजूदगी मे बाहर आने चाहिये। सवाल यह है कि क्या इन सामंतवादी परिस्थितियों में सामाजिक अंकेक्षण की प्रक्रिया को चरितार्थ कर पाना संभव है। नि:संदेह जिस तरह छोटे छोटे राजनैतिक स्वार्थों की बेदी पर रोजगार गारण्टी कानून जैसे सकारात्मक अवसरों की बलि चढ़ाई जा रही है उससे तो यही लगता है कि सतत भुखमरी के संकट से जूझ रहे आदिवासी इस कानून की अपेक्षा पलायन के अवसर और शोषण की व्यवस्था को ही स्वीकारना ज्यादा पसंद करेंगे क्योंकि वहां उन्हें शोषण ही नही संरक्षण भी मिलता है।

इसी विकासखण्ड के एक गांव बेरखेड़ी में रोजगार गारन्टी योजना में सामाजिक सुरक्षा की सोच के साथ कितना भद्दा खेल खेला गया है इसका उदाहरण जरूर सामने आता है। यहां बामुश्किल अपने पैंरों पर खड़ी हो पा रही बलिया बाई और अज्जो बाई के नाम पर भी रोजगार कार्उ जारी किये गये हैं। विडम्बना यह है कि इन वृध्द महिलाओं को अपनी संतानों से कोई सहयोग नहीं मिलता है और नाउम्मीदी पर ही टिका है उनका जीवन। फिर चूंकि उनकी संतानें हैं इसलिये वे सरकार की सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना के पात्र नहीं रह जाती है। इसलिये उसका लाभ भी उन्हें नहीं मिल रहा है। ऐसी परिस्थिति में यहां यह सवाल जरूर उठता है कि मध्यप्रदेश में रहने वाले ऐसे 18 लाख निराश्रित वृध्दों की सामाजिक सुरक्षा का मापदण्ड कहीं रोजगार कानून का जॉब कार्ड न बन जाये। संकट तो उन परिवारों पर भी गहरा है जो पलायन करके जाते हैं। बेरखेड़ी की कौसा बाई सशक्त अंदाज में इसका विश्लेषण करती हैं। वह कहती है कि जब गांव के लोग पलायन कर जाते हैं तो बुजुर्गो को गांव में ही छोड़ जाते हैं। उनके लिये राशन की व्यवस्था तो कर दी जाती है परन्तु पकाने के लिये लकड़ी का बोझ तो उन्हीं ढोना पड़ता है। और फिर यदि सब कुछ मिल भी जाये तो भी समाज का संरक्षण तो उन्हें नहीं मिलता है। ऐसे यदि वे प्राण भी त्याग देते हैं तो अंतिम संस्कार भी एक बड़ी चुनौती का काम बन जाता है, क्योंकि यह करेगा कौन?

इस साल जो अनुभव सामने आये हैं उससे तो यही लग रहा है कि जिस तरह से रोगजार योजना का गैर जिम्मेदारी के साथ क्रियान्वयन हो रहा है, उससे जल्दी ही इस पर अविश्वसनीयता के बादल छा जायेंगे। लोग जल्दी ही पलायन को बेहतर विकल्प मानने लगेंगे। और जहां तक सरकार के नजरिये का सवाल है बिना राजनैतिक प्रतिबध्दता के इसका क्रियान्वयन संभव नहीं है। बहुत शुरूआती दौर में ही सरकार ने आंकड़ों की बाजीगरी शुरू कर दी है। वह व्याख्या करने लगी है कि 42 लाख लक्षित परिवारों में से 35 लाख को जॉब कार्ड और 11 लाख को रोजगार दे दिया गया है परन्तु वह यह भूल गई कि रोजगार गारन्टी कानून केवल आंकड़े पर नहीं बल्कि पारदर्शिता, सहभागिता और संवेदनशीलता की बुनियाद पर ही टिका रह पायेगा।

रोजगार गारण्टी योजना का जनोन्मुखी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिये एक सघन प्रशिक्षण और संवाद कार्यक्रम चलाने की जरूरत थी। परन्तु विडम्बना यह है कि प्रशिक्षण का काम औपचारिकता में पूरा किया गया है। ज्यादातर जगहों पर प्रशिक्षित अफसर प्रशिक्षकों की अन्य कार्यो में व्यस्तता के कारण बाबुओं ने प्रशिक्षक के रूप में आमद दर्ज कराई और एक घंटे में अपना काम पूरा कर दिया। इसका परिणाम सिंगराई और बेरखेड़ी जैसे गांवों में सीधे नजर आ रहा है जहां केवल रोजगार कानून का ही नहीं बल्कि न्यूनतम मजदूरी कानून और संविधान के बुनियादी अधिकारों का भी उल्लंघन हो रहा है।

(यह आलेख भोजन एवं काम के अधिकार अभियान, मध्यप्रदेश के ताजा जमीनी अध्ययन पर आधारित है)

सचिन कुमार जैन

 
     
  Next Article  
  Livelihood Main Page  
  Livelihood Archives