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रोजगार गारंटी के बाद भी रोजगार नहीं
मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार एवं अनियमितता के चलते रोजगार गारंटी योजना के लाभ से वंचित हैं मजदूर

 
     
 

मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की जमीनी स्थिति बहुत ही चिंतनीय है। इस बात से न केवल प्रदेश के जनसंगठन और स्वयंसेवी संस्थाएं बल्कि सरकारी अधिकारी भी वाकिफ हैं। भोजन का अधिकार अभियान द्वारा जारी एक अध्ययन रिपोर्ट में रोजगार गारंटी योजना की जमीनी पड़ताल की गई है। यह रिपोर्ट प्रदेश के पांच जिलों- छतरपुर, पन्ना, टीकमगढ़, सतना एवं अशोकनगर के 7 विकासखंडों के 72 गांवों में की गई जमीनी अवलोकन के बाद तैयार की गई है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि 16.75 फीसदी लोगों के पास आज भी जॉब कार्ड नहीं हैं, जबकि राज्य सरकार का कहना है कि 2001 की जनगणना के तहत चिन्हित परिवारों ज्यादा यानी 131 फीसदी जॉब कार्ड बांटे जा चुके हैं। 90 फीसदी गांवों में बिना आवेदन के ही काम दिए जाते हैं, जिससे न तो सभी को काम मिल पाता है और न ही काम न मिलने के एवज में बेरोजगारी भत्ता। 45 फीसदी जॉब कार्ड में फर्जी प्रविष्टियां पाई गई हैं। 98 फीसदी गांवों की पंचवर्षीय विकास योजना और वार्षिक कार्य योजना न तो सर्वसम्मति से बनी है और न ही ग्रामसभा के माध्यम से। 77 फीसदी कार्यस्थलों पर बोर्ड नहीं लगा है और 100 फीसदी जगहों पर निगरानी समिमि नहीं बनाई गई हैं। सौ फीसदी मजदूरों को समय पर मजदूरी नहीं मिलती। इन्हें एक माह से छह माह तक मजदूरी पाने के लिए इंतजार करना पड़ता है। वंचित समुदायों को अनिवार्य रूप से काम देने के प्रावधान के बावजूद 86 फीसदी विकलांगों को एवं 50 फीसदी महिलाओं को काम मांगने के बाद भी काम नहीं मिलता। 59 फीसदी कार्यस्थलों पर पीने का साफ पानी नहीं है और 100 फीसदी कार्यस्थलों पर न तो झूलाघर की व्यवस्था है और न ही प्राथमिक उपचार किट। सबसे दु:खद पहलू यह है कि लोगों को आवेदन की पावती नहीं मिलती, जिसकी वजह से वे मजदूरी नहीं मिलने के कारण बेरोजगारी भत्ता के लाभ से वंचित रह जाते हैं।

मध्यप्रदेश शासन में रोजगार गारंटी योजना के संयुक्त आयुक्त ए के सिंह ने एक कार्यक्रम में कहा कि वर्तमान समय में बिना संघर्ष के अधिकार मिलना संभव नहीं है अत: रोजगार के अधिकार के लिए भी संघर्ष करना होगा। उनका कहना है कि सभी पंचायतों में झूले की व्यवस्था की गई है पर कार्यस्थल पर झूला का नहीं होना आश्चर्यजनक है।

भोजन का अधिकार अभियान सहयोगी समूह ने इस मुद्दे पर एक जनसुनवाई का आयोजन किया, जिसमें यह निष्कार्ष आया कि योजना के क्रियान्वयन में अफसरशाही आड़े आ रही है। जनसुनवाई में प्रदेश के कई हिस्सों से आए ग्रामीणों में से खंडवा की संजोरी बाई ने बाताया कि उनके जॉब कार्ड में गलत इंट्री की जा रही है, जबकि काम नहीं मिलता। झाबुआ के पेटलावद विकासखंड के मांगलिया भाई ने कहा कि काम की मांग करने के महीने दिन बाद भी काम नहीं मिला। बड़वानी के कैलाश भाई ने बताया कि मुंडराना, कुकराना सहित कई पंचायतों में काम नहीं मिल रहा है। सीधी के राजेन्द्र कुंवर ने बताया कि वहां 2006 में कराये गये कार्यों का भुगतान अभी भी बाकी है। रीवा एवं अनूपपुर के प्रतिनिधि ने बताया कि विकास योजना बनाने के लिए कभी ग्रामसभा नहीं होती। अशोकनगर चंदेरी के साहूलाल शर्मा ने बताया कि विकलांगों को काम नहीं दिया जा रहा है। रीवा के पप्पु साकेत ने बताया कि सेमरीपिपरा में मशीनों से काम हो रहा है। सतना के खरवाही सरपंच की सरपंच मुन्नी बाई ने बताया कि निर्वाचित होने के तीन वर्षों के बाद भी उसे पंचायत का चार्ज नहीं मिला है।

समाजवादी पार्टी के विधायक कृष्ण कुमार सिंह कहना है कि मूल समस्या भ्रष्टाचार की है। समस्याओं से निजात के लिए नीतियों में भी बदलाव की जरूरत है। जागृत आदिवासी दलित संगठन की माधुरी का कहना है कि देश में बड़वानी ही एकमात्र जिला है, जहां लोगों को काम नहीं मिलने के कारण बेरोजगारी भत्ता मिला है। इस घटना को प्रदेश के पंचायत मंत्री रुस्तम सिंह राष्ट्रीय स्तर पर मिसाल के रूप में प्रस्तुत करते हैं कि प्रदेश में रोजगार नहीं मिलने पर बेरोजगारी भत्ता भी दिया गया है। इस बात पर माधुरी का कहना है कि बेरोजगारी भत्ता सरकारी पहल पर नहीं मिला है बल्कि इसके लिए मजदूरों को संघर्ष के रास्ते से गुजरना पड़ा है।

राजु कुमार

 
     
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