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  प्रदेश में सूखे से हाल बेहाल, पलायन जारी
ग्रामीण रोजगार गारंटी में मजदूरों को समय पर नहीं मिलती मजदूरी
 
     
 

मध्यप्रदेश में इस साल हुई अल्पवर्षा से 33 जिलें सूखे की चपेट में आ गए हैं। सूखा प्रभावित जिलों से बड़ी संख्या में पलायन हो रहा है। कई गांवों में अब सिर्फ बड़े बूढ़े ही रह गए हैं। सबसे बड़ी दुखद त्रासदी यह है कि रोजगार गारंटी कानून के तहत जो जिले आते हैं, उनमें भी बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा है। लोगों का कहना है कि रोजगार गारंटी योजना के तहत काम करने पर मजदूरी का भूगतान समय पर नहीं होता, जिसकी वजह से उन्हें भुखमरी का सामना करना पड़ता है। कई जिलों से यह शिकायतें आ रही हैं कि जॉब कार्ड में गलत इण्ट्री दिखाकर भ्रष्टाचार किया जा रहा है। कई गांवों में मजदूरों के जॉब कार्ड या तो सरपंच के कब्जे में है या फिर पंचायत सचिव के कब्जे में। मजदूरो से वे यह कहते हैं कि उस पर मजदूरी का विवरण चढ़ाकर लौटा देंगे। भ्रष्टाचार, परेशानी एवं समय पर मजदूरी नहीं मिलने ग्रामीणो में रोजगार गारंटी योजना के तहत काम करने के प्रति रूझान कम हो गया है और इस योजना के तहत करोड़ों रुपये के आबंटन के बावजूद कई काम नहीं खुल रहे हैं और उपेक्षित रवैये के कारण न ही मजदूरों में इसको लेकर उत्साह रह गया है।

सरकार भले ही अभावग्रस्त जनता के लिए दर्जनों घोषणाएं कर दे, पर जबतक लोगों तक इसका लाभ नहीं पहुंच पाएगा, सब बेमानी नजर आता है। सूखाग्रस्त जिलों के लोगों को अभावों का सामना नहीं करना पड़े और पलायन पर अंकुश लग सकें, इसके लिए राहत कार्यों के लिए करोड़ों रुपये आबंटित किए जा चूके हैं। रोजगार गारंटी योजना के क्रियान्वयन पर भी जोर देने की बात की जा रही है। पर सरकारी आंकड़ों को ही देखें तो पता चलता है कि इस योजना के तहत काम मांगने वालों की संख्या आधी है। जितने लोगों को जॉब कार्ड जारी हुआ है, उसके आधे से भी कम लोगों ने काम की मांग की है। प्रशासन का कहना है कि कम मजदूरी के कारण रोजगार गारंटी योजना में ग्रामीण काम नहीं करना चाहते। झाबुआ के लगभग सभी अधिकारियों का कहना है कि पलायन यहां की परंपरा है और गुजरात में ज्यादा मजदूरी मिलने के कारण झाबुआ से पलायन होता है। भाबरा के विधायक माधो सिंह डावर का कहना है कि झाबुआ जिले में रोजगार गारंटी योजना के तहत करोड़ों रुपये के काम स्वीकृत हैं पर उसे शुरू नहीं किया जा सका है क्योंकि मजदूर ही नहीं मिलते। पर वास्तविकता क्या है और जो मजदूर इस योजना के तहत काम कर रहे हैं, उनके साथ स्थानीय प्रशासन का क्या रवैया होता है, रीवा जिले के सिमरिया तहसील के हरदुआ गांव के ग्रामीणों के संघर्ष से समझा जा सकता है। रोजगार गारंटी योजना के तहत काम की मजदूरी हासिल करने के लिए हरदुआ के सैकड़ों मजदूरों को दो महीने की लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। अपनी मजदूरी की मांग के लिए वे मजदूर तहसील मुख्यालय पर लगाता धरना दिए हुए थे। मजदूरों में लगभग सभी आदिवासी एवं दलित ही थे। सरपंच तो उनके खिलाफ था ही, जिला प्रषासन भी मजदूरों के विपक्ष में था। मजदूरी का भुगतान नहीं करना पड़े, इसके लिए प्रषासन एवं गांव के सरपंच ने कई कोशिशें की, पर मजदूरों ने संघर्ष जारी रखा और अंतत: प्रशासन को मजदूरों के आगे झुकना पड़ा। पर क्या यह सिर्फ एक गांव की व्यथा है या फिर ऐसी ही स्थिति कमोबेश सभी जगहों की है।

भोजन के अधिकार अभियान द्वारा प्रदेश के छह जिलों छतरपुर, भिण्ड, पन्ना, अशोकनगर एवं सतना में रोजी-रोटी यात्रा निकाली गई, जिसमें रोजगार गारंटी योजना की कई विसंगतियां सामने आई। भुखमरी और पलायन रोकने में कारगर मानी जा रही इस योजना के क्रियान्वयन में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है। सूखे की मार झेल रहे ग्रामीणों सही तरीके से लाभ मिल सके, इसके लिए समुचित प्रबंध भी नहीं है।

यह पूरी तरह सही नहीं है कि ज्यादा मजदूरी के कारण ही पलायन हो रहा है, बल्कि गांव में वक्त पर लोगों को रोजागार नहीं मिल रहा है। भोजन के अधिकार अभियान ने अपनी यात्रा में पाया कि अधिकांश लोगों के पास जॉब कार्ड है पर उन्हें रोजगार नहीं मिल रहा है। जब मजदूर काम की मांग करते हैं, तो उनके मांग पत्र लेने में आनाकानी की जाती है। यदि मांग पत्र ले भी लिए जाते हैं, तो उसकी पावती मजदूरों को नहीं दी जाती। इस स्थिति में काम नहीं मिलने पर उन्हें बेरोजगारी भत्ता भी नहीं मिल पाता।

सबसे बड़ा भ्रष्टाचार जॉब कार्ड में इण्ट्री को लेकर किया जा रहा है। मजदूरों को छह से आठ दिन का काम करा कर चौदह से ज्यादा दिवस की इण्ट्री की जा रही है। इसी हेरा-फेरी के लिए उनके जॉब कार्ड सरपंच या सचिव अपने पास रख लेते हैं। मजदूरों द्वारा आवाज उठाए जाने पर उन्हें आगे काम नहीं देने की धमकी दी जाती है। सतना के मझगवां विकासखंड के कई गांवों का दौरा करने पर यह पता चला कि मजदूरों को न तो समय पर मजदूरी दी जा रही है और न ही उनके जॉब कार्ड उनके पास है। इस स्थिति में उनके पास पलायन ही एकमात्र रास्ता बचता है।

शासन द्वारा जिन जिलों एवं तहसीलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है, उससे कहीं ज्यादा क्षेत्र सूखा से प्रभावित है। सूखे के आकलन में हमेंशा कोताही बरती जाती रही है। नए संशोधनों के बाद अब तहसील के बजाय गांव के समूहों को भी सूखाग्रस्त घोषित किया जा सकता है, पर लोगों की शिकायत है कि सूखे का आंकलन सही ढंग से नहीं किया जा रहा है। होशंगाबाद के पिपरिया तहसील के छेरी गांव के ग्रामीणों ने बताया कि उनके गांव में अधिकारी जब सूखा के आंकलन के लिए आए, तो सूखी फसलों के देखने के बावजूद भी उन्होंने सही तरीके से आकलन नहीं किया।

यह आश्चर्यजनक है कि राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के वेबसाइट पर मध्यप्रदेश का जो आंकड़ा दिया गया है, उसमें यह बताया गया है कि जितने लोगों ने काम की मांग की, उनमें से सभी को काम दिया गया। सिर्फ सीधी को छोड़कर किसी भी जिलें की संख्या में एक का भी अंतर नहीं है। यही पर यह भी दर्शाया गया है कि सितंबर के मुकाबले अक्ठूबर में काम मांगने वालों की संख्या में गिरावट आई है। यह आंकड़ा साफ दर्शा रहा है कि गांवों से महानगरों एवं अन्य राज्यों में बड़े पैमाने पर पलायन जारी है।

रोजगार गारंटी योजना के सही क्रियान्वयन के अभाव में न ही पलायन को रोका जा सकता है, न लोगों को भुखमरी से बचाया जा सकता है और न ही पलायन से सामाजिक जीवन पर पड़ने वाले दुष्‍प्रभावों को। सूखाग्रस्त जिलों जिन राहत कार्यों की स्वीकृति हो चुकी है, उस पर यदि तत्काल कार्य शुरू नहीं हुआ, तो ग्रामीणों को पलायन से रोक पाना संभव नहीं होगा।

राजु कुमार

 
     
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