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मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिला मुख्यालय से 78 किलोमीटर दूर बसे गावों के इस संगठित क्षेत्र में प्रमुख रूप से रातेड़, चिमटीपुर, गुज्जा डोंगरी, सहरापछगोल, हर्रा का छार, सूखाभंड, धोरनीमालिनी, झिरन, पालनी, गैलडुब्बा, घटलिंगा, गुड़ी छतरी, गैलडुब्बा-करियाम, घाना आदि गांव बसे हुये हैं।
यह आज भी मौजूद आदिवासी सभ्यता का प्रमाण है जिससे पता चलता है कि भारिया और गोंड आदिवासियों ने किस तरह जीवन की तकनीक को प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के साथ बुना है।
उनका घर, भोजन, आजीविका, संस्कृति, परम्परा और स्वास्थ्य पूरी तरह से जंगल और प्राकृतिक संसाधनों से संचालित होते हैं। अब इस समाज पर आधुनिक विकास की प्रकृति विरोधी प्रक्रियाओं के कारण नये संकट छाते हुये दीख रहे हैं।
पूरी दुनिया पिछले डेढ़ सालों से आर्थिक मंदी के प्रकोप से ऐसी डगमागाई कि विश्व भर में भूखे पेट सोने वाले परिवारों की संख्या में 3 करोड़ नये परिवार जुड़ गये। लोगों के पास न पैसा रहा, न पैसा आने के साधन और जिनके पास मुद्रा रही भी, उसका मूल्य बेहद कम होता चला गया। पहले जो लोग 20 रूपये में भरपेट खाना खा पाते थे, उनके लिये मंदी का मतलब था थाली का आधा खाली हो जाना। इसी दौर में पातालकोट के 2800 से ज्यादा भारिया और गौड आदिवासी यह सिध्द कर रहे हैं कि इस मंदी का प्रभाव उनकी प्रकृति और सामाजिक समन्वय आधारित अर्थ व्यवस्था पर नहीं ही पड़ रहा है।
दुनिया भर में पूरी तरह भूखे पेट सोने वाले 100 करोड़ लोगों में आज भी पातालकोट का आदिवासी शामिल नहीं है। मतलब यह है कि आज भी इन आदिवासी परिवारों की जिन्दगी की दो-तिहाई से ज्यादा बुनियादी जरूरतें स्थानीय संसाधनों से पूरी हो जाती हैं तो फिर बाजार के जाल में हम क्यों फंसे!! इतना ही नही मानव जीवन एवं पर्यावरण के परस्पर समन्वय का यह सजग उदाहरण है।
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