संगठित क्षेत्र के मजदूरों के न्यूनतम हितों को संरक्षण देने वाले राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी कानून के अन्तर्गत मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना बनाई और लागू की गई है। रोजगार की गारंटी देने वाली इस सोच की सबसे खास बात यह है कि अब गांव में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को रोजगार की मांग करने का अधिकार है और सरकार की यह जिम्मेदारी तय की गई है कि वह गांव के निवासियों की रोजगार की मांग को पूरा करे; इस मांग के पूरा न होने पर उसे बेरोजगारी भत्ते का भुगतान करना होगा। यह कानून और योजना ग्राम सभा को अपने विकास की रूपरेखा और जरूरत के अनुरूप निर्णय लेने का अधिकार प्रदान करती है। उल्लेखनीय बिन्दु यह भी है कि इसमें सतत् चौकसी और निगरानी की जिस तरह व्यवस्था की गई है उससे कर्तव्य निर्वहन नहीं करने वाले प्रतिनिधियों और सरकारी अफसरों को स्पष्ट रूप से पहचान की जा सके।
आज की परिस्थितियों में जबकि छोटे किसान कृषि की लागत बढ़ने और सरकार का संरक्षण न मिलने के कारण मजदूर बनने के लिये मजबूर हुये हैं तो वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों पर से पारम्परिक अधिकार छिनने के कारण भुखमरी और गरीबी के जाल में फंसने वाले आदिवासियों की तत्कालिक जरूरतें भी इससे पूरी होने की संभावना है। यह बात जरूर है कि रोजगार गारण्टी योजना के अन्तर्गत हाड़तोड़ मेहनत करने वाले मजदूर को 61.37 रूपये की मजदूरी ही मिल रही है परन्तु अंतिम लक्ष्य यह है कि उसकी मेहनत से गांव में मिट्टी, पानी, जंगल और सामाजिक विकास की एक धारा बहेगी। और फिर आने वाले समय में वह न्यूनतम मजदूरी पर निर्भर नहीं रहेगा बल्कि उसके लिये आजीविका के नये अवसर गांव में ही पैदा हो पायेंगे।
मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के प्रावधान कहते हैं कि मजदूरों को एक सप्ताह से दो सप्ताह के बीच मजदूरी का भुगतान कर दिया जाना चाहिये। यदि 15 दिन से ज्यादा मजदूरी का भुगतान लम्बित रहा तो फिर पंचायतों पर कार्रवाई होगी। अब पंचायतों के प्रतिनिधि दुविधा में हैं। यह दुविधा उन्हें फिर सरकार की मंशा पर शंका करने के लिये प्रेरित करती है। कानून के अनुसार ग्रा्रम पंचायत साप्ताहिक आधार पर मजदूरी का भुगतान कर देगी परन्तु सरकारी व्यवस्था यह है कि काम के पूरा होने के बाद तकनीकी अमले का उपयंत्री उस काम का मूल्यांकन करके तय करेगा कि उस काम की लागत कितनी आई? इसी मूल्यांकन के आधार पर पंचायत का व्यय स्वीकृत हाहेगा। अब विरोधाभास यह है कि यदि तमाम मजदूरी का भुगतान कर देने के बाद उस काम की लागत कम निकली तो अंतर की राशि किसके मत्थे जायेगी। पंचायत प्रतिनिधि मानते हैं कि स्वाभाविक रूप से पंचायतों को ही यह सजा भी भोगना पड़गी। प्रशासनिक अधिकारी मानते हैं कि यदि पंचायतें नियम के अनुसार 12 रजिस्टर ठीक ढंग से भरेंगी तो वास्तविक व्यय और मूल्यांकन की लागत में अंतर नहीं आयेगा। पर वे भूल जाते हैं कि रजिस्टर में वास्तविक व्यय ही भरा जाता है मूल्यांकन तो उपयंत्री की मंशा और नजर पर भी निर्भर करेगा। अत: दोनों में अंतर होने की संभावना है। ऐसे में तय है कि काम की लागत को कम बताकर इंजीनियर अपना हिस्सा सुरक्षित कर लेगा। रिश्वत का यह भार फिर पंचायत पर ही आयेगा।
उमरिया की करकेली पंचायत में 675 व्यक्तियों का रोजगार गारण्टी योजना में पंजीयन किया गया है परन्तु वहां अभी तक केवल तीन लाख रूपये के काम ही स्वीकृत किये गये हैं। अभी पंचायत को यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि वह पंजीकृत मजदूरों (या मजदूरी की मांग) के अनुरूप कार्य शुरू करायें या फिर जो राशि उन्हें उपलब्ध करवाई गई है उसके हिसाब से मजदूरों को काम दें। हालांकि योजना के प्रावधान स्प्ट्रा करते हैं कि यदि 675 मजदूर काम की मांग करते है। तो सभी को 15 दिन के भीतर रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाये जायेंगे। यदि ऐसा नहीं होता है तो यह योजना के प्रावधानों का उल्लंघन माना जायेगा। विडम्बना यह है कि जिला पंचायत के वरिष्ठ अफसर ने भी उसे यही बताया कि वे आवंटित राशि के अनुरूप ही मजदूरी उपलब्ध करवायें।
मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के क्रियान्वयन का आधार सरकार द्वारा तैयार करवाये गये पर्सपेक्टिव प्लान है। इसके अन्तर्गत जिले के हर गांव में विकास की जरूरत, समुदाय की क्षमतायें, वहां उपलब्ध सरकार और सामुदायिक संसाधनों का विश्लेषण कर आने वाले पांच साल की योजना बनाई गई है पर हर प्रतिनिधि यह सुन कर चौंकता नजर आता है कि उनके गांव और पंचायत की इतनी विस्तृत कार्ययोजना बन चुकी है पर उन्हें पता ही नहीं है। अब जब यह बात होती है कि रोजगार योजना के अर्न्तगत पंचायतें पर्सपेक्टिव प्लान के आधार पर काम की मांग करें तो वे पसोपेश में पड़ जाते हैं क्योंकि न तो इस कार्ययोजना को बनाने में उनकी सहभागिता रही है न ही यह दस्तावेज उनके गांव तक पहुंचा है।
सिंहपुर पंचायत के सरपंच प्रेमसिंह कहते हैं कि हम भगवान को खोज सकते हैं परन्तु गांव के पटवारी नहीं। रोजगार गारण्टी योजना में जब पंचायतें प्रस्ताव बनाती हैं तो उन्हें उस पस्ताव की फाईल में खसरे-नक्शे की नककल अनिवार्य रूप से लगानी होती है और यह नकल पटवारी के अलावा कोई नहीं देता है। तमाम सरपंच यही कहते हैं कि जब प्रस्ताव ही पूरा नहीं बन पायेगा तो मांग के 15 दिन के भीतर रोजगार कैसे उपलब्ध करवाया जायेगा। जब सरपंचों ने तहसीलदार से इसकी शिकायत की तो तहसीलदार ने उन्हें अपने ही स्तर पर समस्या से निपट लेने का सुझाव सरपंचों को दिया। सरपंचों का सुझाव है कि पटवारी का रिकार्ड पंचायत में रखा जाना चाहिये और यह आदेश होने चाहिये कि वह हर हफ्ते कम से कम एक दिन पंचायत में मौजूद रहे। ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में पक्के निर्माण कार्यों (सीमेंन्ट-कांक्रीट के काम) पर रोक लगाई गई है। धरातल पर काम करने वाले जनप्रतिनिधि कहते हैं कि यदि सड़क निर्माण का कार्य करते समय बीच नाला आया तो पुलिया का काम होगा या नहीं। यदि पुलिया का काम नहीं होगा तो सड़क कैसे पूरी हो पायेगी? जिला प्रशासन मजदूरी और सामग्री पर होने वाले व्यय को लेकर दुविधा में है। योजना के अनुसार 60 फीसदी राशि मजदूरी पर और 40 फीसदी राशि सामग्री पर व्यय होना चाहिये; परन्तु जिस दर से खुले बाजार में सीमेन्ट और निर्माण सामग्री की कीमते बढ़ रही हैं, उसे देखते हुये अनुपात का पालन कर पाना संभव नहीं है।
यह तय है कि जब तक सचिवों और सरपंचों को अधिकारों के साथ-साथ अधिकारों का उपयोग करने की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी तब तक वे रोजगार गारण्टी योजना के परिणामों की जिम्मेदारी भी लेने के लिये तैयार नहीं होंगे।
सचिन कुमार जैन
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