मध्यप्रदेश में 2 फरवरी 2006 से मध्यप्रदेश रोजगार गारण्टी योजना शुरू हुई थी। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के न्यूनतम हितों को संरक्षण देने वाले राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून के अन्तर्गत यह योजना बनाई और लागू की गई है। रोजगार की गारंटी देने वाली इस सोच की सबसे खास बात यह है कि अब गांव में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को रोजगार की मांग करने का अधिकार है और सरकार की यह जिम्मेदारी तय की गई है कि वह गांव के निवासियों की रोजगार की मांग को पूरा करे; इस मांग के पूरा न होने पर उसे बेरोजगारी भत्ते का भुगतान करना होगा। यह कानून और योजना ग्राम सभा को अपने विकास की रूपरेखा और जरूरत के अनुरूप निर्णय लेने का अधिकार प्रदान करती है। उल्लेखनीय बिन्दु यह भी है कि इसमें सतत् चौकसी और निगरानी की जिस तरह व्यवस्था की गई है उससे कर्तव्य निर्वहन नहीं करने वाले प्रतिनिधियों और सरकारी अफसरों को स्पष्ट रूप से पहचान की जा सके।
रोजगार गारण्टी योजना कितनी सार्थक हो पायेगी इसका दारोमदार बहुत हद तक ग्राम पंचायतों और जनपद पंचायतों की सक्रियता पर निर्भर है। यह सही है कि योजना और कानून बनाने का काम राज्य एवं केन्द्र स्तर पर हुआ है और संसाधनों का बहाव भी ऊपर से नीचे की ओर है; परन्तु गांव के तंत्र में कितना गुरूत्वाकर्षण है उससे ही तय होगा कि वह कितने संसाधन केन्द्र और राज्य से खींच कर अपनी झोली में डाल पाता है।
यह कानून पंचायतों और ग्रामसभा को बहुत से अधिकार तो देता ही है परन्तु क्रियान्वयन के स्तर पर अब तक की सीखों को देखते हुये जनप्रतिनिधि खासतौर पर इसे एक जोखिम भरी हुई योजना मान रहे हैं। जिस तरह से इस योजना को महत्वाकांक्षी बनाया गया है उससे सरकार को भी इसे सफल बनाने के लिये ठोस प्रयास करने होंगे। इसके लिये बहुत जरूरी है कि पंचायत प्रतिनिधियों में सबसे पहले यह विश्वास जगाया जाये कि अब उनके साथ विश्वासघात नहीं होगा। और यह कानून अधिकारों की मृगमरीचिका नही है बल्कि अब उन्हें वास्तव में ताकत मिली है अपने विकास की परिभाषा तय करने की। लगभग डेढ़ दशकों की पंचायतीराज व्यवस्था में गांव के विकास की परिभाषा तय होती रही है और ग्राम सभाओं ने उसे केवल रटने का काम किया है। जिसका यह सीधा परिणाम है कि तमाम कोशिशों के बावजूद गांव और गांव के लोग वहीं के वहीं खड़े नजर आते हैं - गरीब, कमजोर, नाऊम्मीद और ऊर्जाविहीन। रोजगार गारण्टी योजना इस महौल में एक ऐसी कोशिश है जो व्यवस्था और समाज को बदल सकती है। क्योंकि इसमें लक्ष्य से भटकाने वाले व्यक्ति (केवल पद नहीं) के लिये सजा के भी प्रावधान हैं।
इन परिस्थितियों में जबकि छोटे किसान कृषि की लागत बढ़ने और सरकार का संरक्षण न मिलने के कारण मजदूर बनने के लिये मजबूर हुये हैं तो वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों पर से पारम्परिक अधिकार छिनने के कारण भुखमरी और गरीबी के जाल में फंसने वाले आदिवासियों की तत्कालिक जरूरतें भी इससे पूरी होने की संभावना है। यह बात जरूर है कि रोजगार गारण्टी योजना के अन्तर्गत हाड़तोड़ मेहनत करने वाले मजदूर को 61.37 रूपये की मजदूरी ही मिल रही है परन्तु अंतिम लक्ष्य यह है कि उसकी मेहनत से गांव में मिट्टी, पानी, जंगल और सामाजिक विकास की एक धारा बहेगी। और फिर आने वाले समय में वह न्यूनतम मजदूरी पर निर्भर नहीं रहेगा बल्कि उसके लिये आजीविका के नये अवसर गांव में ही पैदा हो पायेंगे।
यह एक कल्पना है और यह तब तक वास्तविकता में नहीं बदल सकती है जब तक की जनप्रतिनिधियों और ग्रामसभा का योजना के संबन्ध में सशक्तिकरण नहीं किया जायेगा। इस योजना से जुड़ी समझ के अभाव में यह भी आशंका है कि वे राजनैतिक रूप से तो बदनाम होंगे ही, कानून के प्रावधानों की भी गिरफ्त में होंगे।
इसी जरूरत को महसूस करते हुये मध्यप्रदेश में सरकार ने प्राथमिक स्तर पर पंचायतों के सचिवों और सरपंचों के सघन प्रशिक्षण की एक प्रक्रिया शुरू की है। अपेक्षा यह है कि इस प्रक्रिया में न केवल प्रशिक्षण कार्यक्रमों का औपचारिक आयोजन होगा बल्कि रोजगार गारण्टी योजना के क्रियान्वयन में आ रही व्यावहारिक दिक्कतों को भी हल करने की कोशिश की जायेगी। मूलत: प्रशिक्षण शब्द से शुरू हुई इस यात्रा का अगला मकसद संवाद का माहौल तैयार करना होना चाहिये। अन्यथा सरपंच आगे भी सरकारी आदेशों के टेढ़े-मेढ़े क्रियान्वयन के काम में लगे रहेंगे। और जब तक उन्हें अधिकारों के साथ-साथ अधिकारों का उपयोग करने की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी तब तक वे रोजगार गारण्टी योजना के परिणामों की जिम्मेदारी भी लेने के लिये तैयार नहीं होंगे।
उमरिया जिले में मध्यप्रदेश शासन के सहयोग से करकेली विकास खण्ड की 107 पंचायतों के 214 सरपंच और सचिवों के लिये एक सघन प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। यूं तो कार्यक्रम में रोजगार गारंटी कानून और मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के प्रावधानों पर चर्चा हुई ही परनतु सबसे अहम् रहे पंचायत प्रतिनिधयों और सचिवों के साथ संवाद में निकल आये अनुभव:
पंचायतों में स्थानीय सरकार को सुचारू रूप से संचालित करने की जिम्मेदारी सरपंच और सचिवों की है और रोजगार योजना में भी उन्हीं की अधिकार आधारित जिम्मेदारी भी तय की गई है। मरदरी पंचायत के सरपंच कबीरसिंह यह विश्वास नहीं कर पा रहे हैं कि पंचायतों और ग्रामसभा को उनकी मांग के अनुरूप संसाधन और स्वतंत्रता दी जायेगी। वे कहते हैं कि अब तक उनकी पंचायत से तालाब, सड़क, पुलिया और मिट्टी के काम के लिये 40 बार प्रस्ताव जनपद पंचायत को भेजे गये है। किन्तु हर बार संसाधन किसी दूसरे ही काम के लिये आवंटित हुये। उन्होंने कभी भी ग्रामसभा के प्रस्तावों और निर्णयों का सम्मान होते नहीं देखा है। इस स्थिति में अब जबकि वास्तव में एक मांग आधारित विकास योजना शुरू हुई है तो पंचायत प्रतिनिधि उसमें सहज ही विश्वास नहीं कर पा रहे हैं।
करकेली पंचायत में 675 व्यक्तियों का रोजगार गारण्टी योजना में पंजीयन किया गया है परन्तु वहां अभी तक केवल तीन लाख रूपये के काम ही स्वीकृत किये गये हैं। अभी पंचायत को यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि वह पंजीकृत मजदूरों (या मजदूरी की मांग) के अनुरूप कार्य शुरू करायें या फिर जो राशि उन्हें उपलब्ध करवाई गई है उसके हिसाब से मजदूरों को काम दें। हालांकि योजना के प्रावधान स्प्ष्ट करते हैं कि यदि 675 मजदूर काम की मांग करते हैं तो सभी को 15 दिन के भीतर रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाये जायेंगे। यदि ऐसा नहीं होता है तो यह योजना के प्रावधानों का उल्लंघन माना जायेगा। विडम्बना यह है कि जिला पंचायत के वरिष्ठ अफसर ने भी उसे यही बताया कि वे आवंटित राशि के अनुरूप ही मजदूरी उपलब्ध करवायें।
मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के क्रियान्वयन का आधार सरकार द्वारा तैयार करवाये गये पर्सपेक्टिव प्लान है। इसके अन्तर्गत जिले के हर गांव में विकास की जरूरत, समुदाय की क्षमतायें, वहां उपलब्ध सरकार और सामुदायिक संसाधनों का विश्लेषण कर आने वाले पांच साल की योजना बनाई गई है पर हर प्रतिनिधि यह सुन कर चौंकता नजर आता है कि उनके गांव और पंचायत की इतनी विस्तृत कार्ययोजना बन चुकी है पर उन्हें पता ही नहीं है। अब जब यह बात होती है कि रोजगार योजना के अर्न्तगत पंचायतें पर्सपेक्टिव प्लान के आधार पर काम की मांग करें तो वे पसोपेश में पड़ जाते हैं क्योंकि न तो इस कार्ययोजना को बनाने में उनकी सहभागिता रही है न ही यह दस्तावेज उनके गांव तक पहुंचा है।
जब हम यह सवाल पूछते हैं कि पंचायतों में अब तक रोजगार गारण्टी योजना के अन्तर्गत कार्य शुरू क्यों नहीं हुये हैं तो कबीर सिंह कहते हैं कि पंजीकरण तो हो गया है परन्तु रोजगार कार्ड नहीं बांटे गये हैं क्योंकि यदि कार्ड बांटे जायेंगे तो लोग काम मांगेंगे। और वास्तविकता यह है कि अब तक उनको काम के लिये जनपद से सहमति नहीं मिली है। योजनाओं के प्रावधान यह है कि पंचायतें अपनी कार्ययोजना बनाकर कार्य शुरू कर सकती हैं और जनपद पंचायतों को उनके काम को स्वीकृति देना होगी। पर सरपंच इसे जोखिम का काम मानते हैं। वे कहते हैं कि मुख्य कार्यपालन अधिकारी मौखिक आदेश दे रहे हैं जिन पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। जब तक लिखित आदेश और खाते में राशि नहीं आ जायेगी तब तक पंचायतें काम शुरू नहीं करेंगी।
उमरिया जिले में 12 हजार कार्ड सरपंच और सचिवों के पास रखे हुये हैं। इसी तरह टीकमगढ़ जिले में 20 हजार कार्ड सरपंच और सचिवों के पास है, इन्हें वितरित नहीं किया गया है। अमूमन यह स्थिति हर जिले की कहानी है। इस मामले में सरपंच और सचिवों को अपराधी ठहराने की कोशिश की जा रही है ताकि वे भ्रष्टाचारी सिध्द हों। परन्तु सच्चाई कुछ और ही है। रोजगार गारण्टी योजना के अन्तर्गत काम मांगने के बाद यदि मजदूरी नहीं मिली तो आवेदक को बेरोजगारी भत्तो का भुगतान करना होगा। वास्तव में बेरोजगारी भत्ता दिये जाने का मतलब ही यह होगा कि योजना का क्रियान्वयन नियमानुसार नहीं हो रहा है। ऐसी स्थिति में राज्य से लेकर जनपद पंचायत के अधिकारी तक यह बात ठान ली गई है कि वे किसी भी स्थिति में बेरोजगारी भत्तो का भुगतान नहीं होने देंगे; फिर चाहे काम दिया गया हो या न दिया गया हो। ऐसे में दो रास्ते निकाले गये हैं। पहला रास्ता है जनपद स्तर पर बिना लिखा-पढ़ी के काम करना और दूसरा रास्ता है सरपंच-सचिवों पर जिम्मेदारी डालना। जरहा पंचायत के ग्राम सहायक कृपाशंकर पाण्डेय कहते हैं कि पंचायत में 348 कार्ड बंटे हैं; लोगों ने काम के लिये आवेदन पत्र भी दिये। इसी आधार पर हमने काम का प्रस्ताव जनपद पंचायत को भेजा परन्तु इसकी पावती हमें नहीं दी गई और जब इसके बारे में एक सप्ताह बाद जनपद में चर्चा की गई तो पता चला कि पूरी फाईल ही गुम हो गई है। अब जब लोगों को 15 दिन में रोजगार नहीं मिलेगा तो जिम्मेदारी तो हम पर ही आ रही है।
जहां तक सरपंच और सचिवों द्वारा जॉब कार्ड अपने पास रखे जाने का सवाल हमें उसकी सरकारी राजनीति को समझना होगा। जब राज्य और जिले से उन्हें संसाधन नहीं मिल रहे हैं तो वे काम भी शुरू कर पाने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे में यदि उन्होंने जॉब कार्ड गांव के लोगों में बांट दिये तो रोजगार की मतांग आना शुरू हो जायेगी और संसाधन या राशि के अभाव में वे काम शुरू नहीं कर पायेंगे तो बेरोजगारी भत्ताा देना पड़ेगा। जिसकी फिर जांच पड़ताल होगी और पंचायत दोषी सिध्द होगी। अब आत्मरक्षा का यही बेहतर तरीका है कि जॉब कार्ड ही न बांटे जायें।
मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के प्रावधान कहते हैं कि मजदूरों को एक सप्ताह से दो सप्ताह के बीच मजदूरी का भुगतान कर दिया जाना चाहिये। यदि 15 दिन से ज्यादा मजदूरी का भुगतान लम्बित रहा तो फिर पंचायतों पर कार्रवाई होगी। अब पंचायतों के प्रतिनिधि दुविधा में हैं। यह दुविधा उन्हें फिर सरकार की मंशा पर शंका करने के लिये प्रेरित करती है। कानून के अनुसार ग्राम पंचायत साप्ताहिक आधार पर मजदूरी का भुगतान कर देगी परन्तु सरकारी व्यवस्था यह है कि काम के पूरा होने के बाद तकनीकी अमले का उपयंत्री उस काम का मूल्यांकन करके तय करेगा कि उस काम की लागत कितनी आई? इसी मूल्यांकन के आधार पर पंचायत का व्यय स्वीकृत होगा। अब विरोधाभास यह है कि यदि तमाम मजदूरी का भुगतान कर देने के बाद उस काम की लागत कम निकली तो अंतर की राशि किसके मत्थे जायेगी। पंचायत प्रतिनिधि मानते हैं कि स्वाभाविक रूप से पंचायतों को ही यह सजा भी भोगना पड़गी। प्रशासनिक अधिकारी मानते हैं कि यदि पंचायतें नियम के अनुसार 12 रजिस्टर ठीक ढंग से भरेंगी तो वास्तविक व्यय और मूल्यांकन की लागत में अंतर नहीं आयेगा। पर वे भूल जाते हैं कि रजिस्टर में वास्तविक व्यय ही भरा जाता है मूल्यांकन तो उपयंत्री की मंशा और नजर पर भी निर्भर करेगा। अत: दोनों में अंतर होने की संभावना है। ऐसे में तय है कि काम की लागत को कम बताकर इंजीनियर अपना हिस्सा सुरक्षित कर लेगा। रिष्वत का यह भार फिर पंचायत पर ही आयेगा।
सिंहपुर पंचायत के सरपंच प्रेमसिंह कहते हैं कि हम भगवान को खोज सकते हैं परन्तु गांव के पटवारी नहीं। रोजगार गारण्टी योजना में जब पंचायतें प्रस्ताव बनाती हैं तो उन्हें उस पस्ताव की फाईल में खसरे-नक्शे की नकल अनिवार्य रूप से लगानी होती है और यह नकल पटवारी के अलावा कोई नहीं देता है। तमाम सरपंच यही कहते हैं कि जब प्रस्ताव ही पूरा नहीं बन पायेगा तो मांग के 15 दिन के भीतर रोजगार कैसे उपलब्ध करवाया जायेगा। जब सरपंचों ने तहसीलदार से इसकी शिकायत की तो तहसीलदार ने उन्हें अपने ही स्तर पर समस्या से निपट लेने का सुझाव सरपंचों को दिया। सरपंचों का सुझाव है कि पटवारी का रिकार्ड पंचायत में रखा जाना चाहिये और यह आदेश होने चाहिये कि वह हर हफ्ते कम से कम एक दिन पंचायत में मौजूद रहे।
जिला प्रशासन यह आंकड़े जरूर दे रहा है कि उमरिया जिले को चार करोड़ और 14 करोड़ रूपये आवंटन हो चुका है और हर पंचायत के खाते भी खुलवा दिये गये हैं; परन्तु आवर्श्चजनक रूप से सरपंचों को यह जानकारी ही नहीं है कि उनकी पंचायत के ग्रामीण रोजगार योजना नये खाते खुल चुके हैं और राशि जारी कर दी गई है।
महुआ पंचाचत की सरपंच चंचला साहू यह सूचना देती हैं कि जो चेक रोजगार योजना के लिये आये हैं उनका एक से दो माह तक भुगतान नहीं हो रहा है। बैंक यह राशि अपना व्यवसाय बढ़कर दिखाने के लिये उपयोग कर रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि सम्बन्धित बैंको के भी निर्धारित समय पर भुगतान करने के लिये शासन के निर्देश जारी हों।
ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में पक्के निर्माण कार्यों (सीमेंन्ट-कांक्रीट के काम) पर रोक लगाई गई है। धरातल पर काम करने वाले जनप्रतिनिधि कहते हैं कि यदि सड़क निर्माण का कार्य करते समय बीच नाला आया तो पुलिया का काम होगा या नहीं। यदि पुलिया का काम नहीं होगा तो सड़क कैसे पूरी हो पायेगी?
जरहा पंचायत के सचिव ने कहा कि पंजीयन भी हो युका है और जॉब कार्ड भी बंट चुके हैं परन्तु मजदूरी इतनी कम मिल रही है कि ग्रामीण इस योजना को बेरोजगारी के हल के रूप में नहीं देख रहे हैं। चूंकि इस योजना में ज्यादातर अत्यंत गरीब लोग काम कर रहे हैं जो शारीरिक रूप से कमजोर हैं। वे सरकार द्वारा तय किया गया टास्क पूरा नहीं कर पा रहे हैं। इसलिये उन्हें 30 से 40 रूपये ही मजदूरी मिल रही है। गांव के लोगों की अपेक्षा है कि न्यूनतम मजदूरी कम से कम 100 रूपये होना चाहिये।
जिला प्रशासन मजदूरी और सामग्री पर होने वाले व्यय को लेकर दुविधा में है। योजना के अनुसार 60 फीसदी राशि मजदूरी पर और 40 फीसदी राशि सामग्री पर व्यय होना चाहिये; परन्तु जिलस दर से खुले बाजार में सीमेन्ट और निर्माण सामग्री की कीमते बढ़ रही हैं, उसे देखते हुये अनुपात का पालन कर पाना संभव नहीं है।
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