कानून लागू होने के पहले महीने में ही वन विभाग ने मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले के पीपलखोरा गांव में आदिवासियों के 100 घरों को जला दिया और जूनाबाड़ी के 12 घरों को तोड़ दिया। कानून की धारा 4(5) में साफ लिखा हुआ है कि जब तक अधिकारों का फैसला नहीं हो जाता, तब तक किसी को जंगल-जमीन से बेदखल नहीं किया जा सकता।
स्थानीय स्तर कोई कार्रवाई नहीं होने से आक्रोषित 250 से ज्यादा आदिवासियों ने भोपाल आकर तीन दिन तक धरना भी दिया। धरने के अंतिम दिन आदिवासी एकता संगठन के गोपाल भाई के नेतृत्व में आदिवासियों ने वन मंत्री कुंवर विजय शाह के बंगले पर मंत्री से मुलाकात की। वहां उन्होंने अपने घरों को जलाये जाने की घटना का विरोध करते हुए दोशियों पर जल्द कार्रवाई की मांग की।
संगठन के गोपाल भाई ने बताया कि जलाने के अलावा वन विभाग के अधिकारियों ने इन आदिवासियों के घरों से 25 से 30 बोरा अनाज, 150 मुर्गियां, 60 बकरियां, गहने, बर्तन, कपड़े व अन्य सामान भी लूट लिया। इस कड़कड़ाती ठंड में भी ये परिवार खुले आसमान तले रहने को विवश हैं।
आदिवासी मुक्ति संगठन के विजय भाई का कहना है कि आदिवासियों एवं अन्य परंपरागत जंगल वासियों के लम्बे संघर्ष के बाद केन्द्र सरकार यह मानने पर मजबूर हुई कि आदिवासियों के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ है और इसी अन्याय को सुधारने के लिए अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून को लागू किया गया। कानून के तहत जब तक जंगल में रहने वाले आदिवासियों एवं अन्य परंपरागत वन निवासियों के अधिकारों का उपरोक्त कानून के तहत सर्वे और सेटलमेन्ट नहीं हो जाता, तब तक किसी को भी उनके जमीन और निवास से विस्थापित नहीं किया जायेगा पर इसके बाद भी लोगों के घरों को जलाया जाना सरकार की असफलता का प्रतीक है। बुरहानपुर की यह घटना कानून लागू होने के बाद संभवत: देश की पहली घटना है, जिसमें आदिवासियों को बड़े पैमाने पर उजाड़ा गया है।
पीपलखोरा के ढेमसिंग ने बताया कि उनका गांव वन विभाग के बीट क्रमांक 120 और 121 में पड़ता है और उनके पास इस बात का साक्ष्य है कि वेलोग वहां 1978-1979 से रह रहे हैं पर वन विभाग इस बात को नहीं मानता। पीपलखोरा के ही ढेडू का कहना है कि वन विभाग के दावे पर क्यों विश्वास किया जा रहा है, जबकि कानून में दावे और सत्यापन की बात की गई है।
राजु कुमार |