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आदिवासियों एवं अन्य जंगलवासियों ने जंगल पर अपने अधिकारों को मान्यता पाने के लिए लंबा संघर्ष किया है। उसी का परिणाम है कि संसद ने दिसम्बर, 2006 में अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून 2006 पास किया। पर अफसोस की बात है कि अभी तक इस कानून को लागू करने के लिए केन्द्र सरकार ने नियमों को नहीं बनाया है। ऐसी परिस्थिति में जंगलों में निवासरत लाखों लोग अपने अधिकारों से वंचित हैं, साथ ही वे अभी भी वन अधिकारियों के प्रताड़ना के शिकार हैं। इस संबंध में केन्द्र सरकार ने घोषणा की थी कि 2 अक्टूबर 2007 को कानून को नोटिफाई करके लागू कर दिया जाएगा। लेकिन ताजा स्थिति यह है कि कानून में संरक्षित क्षेत्र के निवासियों को जो अधिकार है, उसे कमजोर करने के लिए प्रस्तावित नियमों में प्रावधान बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। साथ ही नियमों में ग्राम सभा के अधिकारों को सीमित कर अफसरशाही को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है।
सरकार ने नियमों का जो स्वरूप प्रस्तावित किया है, उसमें कई खामियाँ हैं। नियम में ग्राम सभा की परिभाषा के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में पाड़ा, टोला, फला, फलिया को मान्यता दी गयी है, तो गैर अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत की ग्राम सभा जो बड़ी होती है, उसकी मान्यता दी गयी है, कोरम 66 प्रतिशत कर दिया गया है, एवं मतदाता पत्र में दर्ज नाम होने से ही ग्रामसभा की सदस्य माना जायेगा। कानून में जंगल की सुरक्षा एवं प्रबंधन का अधिकार ग्राम सभा को दिया गया है, लेकिन नियमों में इन अधिकारों को कर्तव्य बताया गया है और कहा गया है कि ग्राम सभा को सिर्फ विभिन्न सरकारी संस्थाओं के योजनाओं का क्रियान्वयन करने का ही अधिकार होगा। नियमों में ठेकेदार, व्यापारी एवं भू-माफिया को जंगल अधिकारों से रोकने के लिए कोई प्रावधान नहीं रखा गया है। आदिवासियों के लिए जाति प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करने का प्रावधान है, तो अन्य जातियों के लिए ऐसे प्रावधान नहीं रखे गए हैं। कानून की मंशा के विरूध्द अभ्यारण्य एवं राष्ट्रीय उद्यान के ''कोर एरिया'' तय करने के लिए वन मंत्रालय को अधिकार दिया गया है। कानून में कहा गया है कि लोगों को विस्थापित करने से पहले उनकी सहमति लेना एवं समुचित पुर्नवास की व्यवस्था करना अनिवार्य है, पर इसे नियमों में नकार दिया गया है। लघु वनोपज पर ग्राम सभा के सम्पूर्ण अधिकार को कमजोर करने की मंशा से लघु वनोपज को इकठ्ठा कर पास के नजदीकी संग्रहण स्थान पर बेचने को कहा गया है, जिसके लिए वनोपज को साईकल, हाथ गाड़ी या सर पर रखकर ले जाया जा सकता है। ग्राम सभा के स्तर पर लोगों के दावों की छान-बीन करने के लिए एक वन अधिकार समिति की व्यवस्था की गयी है, इसमें एक महिला सदस्य होगी पर यह स्पष्ट नहीं किया गया कि वह महिला आदिवासी या अन्य जंगलवासी होगी। जहां गैर आदिवासियों का कोई भी सदस्य नहीं है, वहां गैर आदिवासी प्रतिनिधि की अनिवार्यता भी तर्क संगत साबित नहीं होती है। इसके साथ-साथ इस कानून का सही कार्यान्वयन की मॉनीटरिंग के लिए कोई प्रावधान नहीं है।
उपरोक्त परिस्थितियों को देखते हुए यह लगता है कि सरकार की यह कतई मंशा नहीं है कि कानुन अपने मूल रूप में लागू हो और जंगलवासियों को उनका अधिकार मिल सके। वन माफिया, खदान माफिया के साथ-साथ वन अधिकारियों के अत्याचारों से देश के सभी अंचलों के आदिवासी एवं अन्य जंगलवासी पीड़ित हैं। विभिन्न जनसंगठन इनके अधिकारों के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में संघर्ष कर रहे हैं। जंगल-जीवन अधिकार बचाओ आंदोलन के संयोजक विजय भाई के अनुसार इस कानून को कमजोर करने के पीछे शोषणकारी राजनीतिक एवं आर्थिक शक्तियों का गठजोड़ काम कर रहा है। उनका कहना है कि जंगलों पर पारंपरिक रूप से काबिज लोगों को उनके अधिकारों से किसी भी तरीके से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। आदिवासियों एवं अन्य जंगलवासियों के ऊपर वन विभाग द्वारा कई झूठे केस लगाए जाते रहे हैं, जिन्हें तत्काल हटाए जाने की जरूरत है। कानून पास होने के बावजूद नियमों के अभाव में वन विभाग का अमला अभी भी लोगों को हटाने का कार्य कर रहा है।
जंगलों पर उनके स्वामीत्व और अधिकारों के लिए बनाये गये वन अधिकारों का मान्यता कानून को लागू करने के लिए बनाये जा रहे नियमों में कई सुधार की जरूरत है। नियमों में यह प्रावधान किया जाए कि गांव के वयस्क सदस्यों द्वारा (चाहे वह मतदाता हो या नहीं) ग्राम सभा गठित होगा गैर अनुसूचित क्षेत्रों में भी पाड़ा, टोला, फलिया को ग्राम सभा की मान्यता होगी एवं इसका कोरम 50 प्रतिशत का ही माना जाएगा।
वन प्रबंधन पर ग्राम सभा का अधिकार सर्वोपरि हो, वन के सम्बन्ध में कोई भी बाहरी हस्तक्षेप ग्राम सभा की सहमति से हो। ग्राम सभा द्वारा बनाई जाने वाली वन प्रबंधन योजना से समरसता रखकर सरकारी संस्थाओं की कार्ययोजना बनाई जाएं। ग्रामसभा की सिफारिश से आदिवासी एवं अन्य जंगलवासियों को एक ही अधिकारी से प्रमाण-पत्र दिये जाने का प्रावधान किया जाये। एकल आदिवासी महिला को घर के मुखिया के बराबर अधिकार माना जाये। अभ्यारण्य एवं राष्ट्रीय उद्यानों में कोर एरिया बनाने के समय कानून में दिए गए प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए आदिवासी मंत्रालय के नेतृत्व में समिति गठन की जाये एवं ग्राम सभा की सहमति लेने से पहले खुली सुनवाई करके सहमति द्वारा उपयुक्त पुनर्वास का प्रावधान किया जाए। लघु वनोपज के संबंध में ग्राम सभा को यथार्थ अधिकारी माना जाए। ग्रामसभा की वन अधिकार समिति में आदिवासी पुरुष, आदिवासी महिला एवं अन्य गैर आदिवासी पुरुष एवं महिलाओं को उनकी जनसंख्या के अनुपात से प्रतिनिधित्व दिया जाए। कानून का सही कार्यान्वयन हो इसके लिए सब-डिवीजनल कमेटी द्वारा हर दो महीनों में जन सुनवाई की व्यवस्था की जाए। आदिवासी क्षेत्र को अब तक अनुसूचित नहीं किया गया है, उनको अनुसूचित किया जाए। जंगल को किसी भी हालत में निजी कंपनियों को बायो डीजल, कार्बन ट्रेडिंग या अन्य व्यावसायिक परियोजना के लिए नहीं दिया जाए।
देश की प्राकृतिक संपदाओं पर पर विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नजर है। ऐसे में वन कानून को लागू करने के लिए बनाए जा रहे नियमों को कठोर एवं जंगलवासियों के हित मे बनाए जाने की जरूरत है, अन्यथा न केवल जंगलवासी बेदखल होंगे बल्कि देश की प्राकृतिक संपदा भी लुट जाएगी।
राजु कुमार
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