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  ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना का एक साल - 2 फरवरी 2007
आईना साफ करने की जरूरत
 
     
 

संगठित क्षेत्र के मजदूरों के न्यूनतम हितों को संरक्षण देने वाले राष्ट्रीय रोजगार गारण्टी कानून के अन्तर्गत मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना बनाई और लागू की गई है। रोजगार की गारंटी देने वाली इस सोच की सबसे खास बात यह है कि अब गांव में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को रोजगार की मांग करने का अधिकार है और सरकार की यह जिम्मेदारी तय की गई है कि वह गांव के निवासियों की रोजगार की मांग को पूरा करे; इस मांग के पूरा न होने पर उसे बेरोजगारी भत्ते का भुगतान करना होगा। यह कानून और योजना ग्राम सभा को अपने विकास की रूपरेखा और जरूरत के अनुरूप निर्णय लेने का अधिकार प्रदान करती है। उल्लेखनीय बिन्दु यह भी है कि इसमें सतत् चौकसी और निगरानी की जिस तरह व्यवस्था की गई है उससे कर्तव्य निर्वहन नहीं करने वाले प्रतिनिधियों और सरकारी अफसरों को स्पष्ट रूप से पहचान की जा सके। शुरूआती साल में एक बात तो स्पष्ट हो ही गई है कि केन्द्र सरकार इसमें धन का बहाव अभी बाधित नहीं होने देगी क्योंकि यह एक राजनैतिक मामला भी है। परन्तु दूसरी बात यह भी है कि भ्रष्टाचार और गैर-जवाबदेहिता ने रूप बदलकर अपनी भूमिका निभाना भी शुरू कर दिया है। एक अपेक्षा थी कि शायद इस कानून से पंचायतें भिखारीपन के काम से मुक्त होने की दिशा में बढ़ेंगी और उन्हें अपनी विकास की परिभाषा तय करके उसे क्रियान्वित करने का राजनीतिक अधिकार मिलेगा परन्तु अब हमारे सामने अनुभवों की एक लम्बी श्रृंखला है।

आज की परिस्थितियों में जबकि छोटे किसान कृषि की लागत बढ़ने और सरकार का संरक्षण न मिलने के कारण मजदूर बनने के लिये मजबूर हुये हैं तो वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों पर से पारम्परिक अधिकार छिनने के कारण भुखमरी और गरीबी के जाल में फंसने वाले आदिवासियों की तत्कालिक जरूरतें भी इससे पूरी होने की संभावना है। यह बात जरूर है कि रोजगार गारण्टी योजना के अन्तर्गत हाड़तोड़ मेहनत करने वाले मजदूर को 61.37 रूपये की मजदूरी ही मिल रही है परन्तु अंतिम लक्ष्य यह है कि उसकी मेहनत से गांव में मिट्टी, पानी, जंगल और सामाजिक विकास की एक धारा बहेगी। और फिर आने वाले समय में वह न्यूनतम मजदूरी पर निर्भर नहीं रहेगा बल्कि उसके लिये आजीविका के नये अवसर गांव में ही पैदा हो पायेंगे।

मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के प्रावधान कहते हैं कि मजदूरों को एक सप्ताह से दो सप्ताह के बीच मजदूरी का भुगतान कर दिया जाना चाहिये। यदि 15 दिन से ज्यादा मजदूरी का भुगतान लम्बित रहा तो फिर पंचायतों पर कार्रवाई होगी। अब पंचायतों के प्रतिनिधि दुविधा में हैं। यह दुविधा उन्हें फिर सरकार की मंशा पर शंका करने के लिये प्रेरित करती है। कानून के अनुसार ग्राम पंचायत साप्ताहिक आधार पर मजदूरी का भुगतान कर देगी परन्तु सरकारी व्यवस्था यह है कि काम के पूरा होने के बाद तकनीकी अमले का उपयंत्री उस काम का मूल्यांकन करके तय करेगा कि उस काम की लागत कितनी आई? इसी मूल्यांकन के आधार पर पंचायत का व्यय स्वीकृत होगा। अब विरोधाभास यह है कि यदि तमाम मजदूरी का भुगतान कर देने के बाद उस काम की लागत कम निकली तो अंतर की राशि किसके मत्थे जायेगी। पंचायत प्रतिनिधि मानते हैं कि स्वाभाविक रूप से पंचायतों को ही यह सजा भी भोगना पड़गी। प्रशासनिक अधिकारी मानते हैं कि यदि पंचायतें नियम के अनुसार 12 रजिस्टर ठीक ढंग से भरेंगी तो वास्तविक व्यय और मूल्यांकन की लागत में अंतर नहीं आयेगा पर वे भूल जाते हैं कि रजिस्टर में वास्तविक व्यय ही भरा जाता है। मूल्यांकन तो उपयंत्री की मंशा और नजर पर भी निर्भर करेगा। अत: दोनों में अंतर होने की संभावना है। ऐसे में तय है कि काम की लागत को कम बताकर इंजीनियर अपना हिस्सा सुरक्षित कर लेगा। रिश्वत का यह भार फिर पंचायत पर ही आयेगा।

उमरिया की करकेली पंचायत में 675 व्यक्तियों का रोजगार गारण्टी योजना में पंजीयन किया गया है परन्तु वहां केवल तीन लाख रूपये के काम ही स्वीकृत किये गये थे। अभी पंचायत को यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि वह पंजीकृत मजदूरों (या मजदूरी की मांग) के अनुरूप कार्य शुरू करायें या फिर जो राशि उन्हें उपलब्ध करवाई गई है उसके हिसाब से मजदूरों को काम दें। हालांकि योजना के प्रावधान स्प्ष्ट करते हैं कि यदि 675 मजदूर काम की मांग करते है। तो सभी को 15 दिन के भीतर रोजगार के अवसर उपलब्ध करवाये जायेंगे। यदि ऐसा नहीं होता है तो यह योजना के प्रावधानों का उल्लंघन माना जायेगा। विडम्बना यह है कि जिला पंचायत के वरिष्ठ अफसर ने भी उसे यही बताया कि वे आवंटित राशि के अनुरूप ही मजदूरी उपलब्ध करवायें।

मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के क्रियान्वयन का आधार सरकार द्वारा तैयार करवाये गये पर्सपेक्टिव प्लान है। इसके अन्तर्गत जिले के हर गांव में विकास की जरूरत, समुदाय की क्षमतायें, वहां उपलब्ध सरकार और सामुदायिक संसाधनों का विश्लेषण कर आने वाले पांच साल की योजना बनाई गई है पर हर प्रतिनिधि यह सुनकर चौंकता नजर आता है कि उनके गांव और पंचायत की इतनी विस्तृत कार्ययोजना बन चुकी है पर उन्हें पता ही नहीं है। अब जब यह बात होती है कि रोजगार योजना के अर्न्तगत पंचायतें पर्सपेक्टिव प्लान के आधार पर काम की मांग करें तो वे पसोपेश में पड़ जाते हैं क्योंकि न तो इस कार्ययोजना को बनाने में उनकी सहभागिता रही है न ही यह दस्तावेज उनके गांव तक पहुंचा है। दिशा निर्देशों में स्पष्ट उल्लेख है कि हर वर्ष दिसम्बर में पंचायतों की ओर से वार्षिक योजना पर चर्चा होगी और अनुमोदन के साथ ही यह योजना जनपद को भेजी जायेगी। वक्त बीत चुका है परन्‍तु 10 फीसदी पंचायतों में भी इस तरह की सुनियोजित ग्रामसभाओं का आयोजन नहीं हुआ। सरकार ने भी अपने प्रयासों में यह नहीं सोचा कि कार्य योजना बनाने के लिये ग्रामसभाओं और जनप्रतिनिधियों की क्षमतावृध्दि के लिये विशेश प्रयास किये जाने जरूरी हैं।

यह योजना कितनी सार्थक होगी यह तो पूरी तरह से प्रक्रिया पर निर्भर है। यह सही है कि पंचायतों में मजदूर आवेदन करेंगे और पंचातें एक क्रियान्वयन एजेंसी भी है। शुरू-शुरू में तो उन्हें सुनहरे ख्वाब भी दिखाये गये और पैसा भी जारी किया गया जिनके आधार पर पंचायतों ने मजदूरों को काम दिया परन्तु बाद के दिनों में जनपद और जिला स्तर पर रिश्वत की मांग के चलते पंचायातें के भुगतान लटकने शुरू हो गये। मजदूरों को काम के 15 दिन के भीतर मजदूरी न मिलने का एक बड़ा कारण यह भी रहा है।

सिंहपुर पंचायत के सरपंच प्रेमसिंह कहते हैं कि हम भगवान को खोज सकते हैं परन्तु गांव के पटवारी को नहीं। रोजगार गारण्टी योजना में जब पंचायतें प्रस्ताव बनाती हैं तो उन्हें उस प्रस्ताव की फाईल में खसरे-नक्शे की नकल अनिवार्य रूप से लगानी होती है और यह नकल पटवारी के अलावा कोई नहीं देता है। तमाम सरपंच यही कहते हैं कि जब प्रस्ताव ही पूरा नहीं बन पायेगा तो मांग के 15 दिन के भीतर रोजगार कैसे उपलब्ध करवाया जायेगा। जब सरपंचों ने तहसीलदार से इसकी शिकायत की तो तहसीलदार ने उन्हें अपने ही स्तर पर समस्या से निपट लेने का सुझाव सरपंचों को दिया। सरपंचों का सुझाव है कि पटवारी का रिकार्ड पंचायत में रखा जाना चाहिये और यह आदेश होने चाहिये कि वह हर हफ्ते कम से कम एक दिन पंचायत में मौजूद रहे। ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना में पक्के निर्माण कार्यों (सीमेंन्ट-कांक्रीट के काम) पर रोक लगाई गई है। धरातल पर काम करने वाले जनप्रतिनिधि कहते हैं कि यदि सड़क निर्माण का कार्य करते समय बीच में नाला आया तो पुलिया का काम होगा या नहीं। यदि पुलिया का काम नहीं होगा तो सड़क कैसे पूरी हो पायेगी? जिला प्रशासन मजदूरी और सामग्री पर होने वाले व्यय को लेकर दुविधा में है। योजना के अनुसार 60 फीसदी राशि मजदूरी पर और 40 फीसदी राशि सामग्री पर व्यय होना चाहिये; परन्तु जिस दर से खुले बाजार में सीमेन्ट और निर्माण सामग्री की कीमते बढ़ रही हैं, उसे देखते हुये अनुपात का पालन कर पाना संभव नहीं है।

यह तय है कि जब तक सचिवों और सरपंचों को अधिकारों के साथ-साथ अधिकारों का उपयोग करने की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी तब तक वे रोजगार गारण्टी योजना के परिणामों की जिम्मेदारी भी लेने के लिये तैयार नहीं होंगे।

ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना का एक साल - 2 फरवरी 2007
पंचायत प्रतिनिधियों के सामने दुविघायें - 2

पंचायतों में स्थानीय रोजगार गारण्टी योजना को सुचारू रूप से संचालित करने की अधिकार आधारित जिम्मेदारी सरपंच और सचिवों की है। मरदरी पंचायत के सरपंच कबीरसिंह यह विश्वास नहीं कर पा रहे हैं कि पंचायतों और ग्रामसभा को उनकी मांग के अनुरूप संसाधन और स्वतंत्रता दी जायेगी। वे कहते हैं कि अब तक उनकी पंचायत से तालाब, सड़क, पुलिया और मिट्टी के काम के लिये 40 बार प्रस्ताव जनपद पंचायत को भेजे गये है। किन्तु हर बार संसाधन किसी दूसरे ही काम के लिये आवंटित हुये। उन्होंने कभी भी ग्रामसभा के प्रस्तावों और निर्णयों का सम्मान होते नहीं देखा है। इस स्थिति में अब जबकि वास्तव में एक मांग आधारित विकास योजना शुरू हुई है तो पंचायत प्रतिनिधि उसमें सहज ही विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। वास्तव में जब ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना का एक साल पूरा होने की स्थिति में जब हम ऊपर से स्थिति पर नजर डालते है। तो एक क्रांति जैसा दृष्य हमारे सामने आता है। कानून के लाभ के 43 लाख हकदारों के पास रोजगार कार्ड तो है ही, साथ ही साथ 2548 लाख मजदूरों को 148 लाख दिनों की मजदूरी मिली। इतिहास में इतने सरकारी रोजगार की उपलब्धता का कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। पर जब हम धरातल पर पंचायत प्रतिनिधियों से एक संवाद करते है। तो एक पल को यह जरूर लगता है कि कहीं चुने हुये पंचायत जनप्रतिनिधियों के लिये कोई गंभीर संकट तो खड़ा नहीं होने वाला है।

रोजगार गारण्टी योजना कितनी सार्थक हो पायेगी इसका दारोमदार बहुत हद तक ग्राम पंचायतों और जनपद पंचायतों की सक्रियता पर निर्भर है। यह सही है कि योजना और कानून बनाने का काम राज्य एवं केन्द्र स्तर पर हुआ है और संसाधनों का बहाव भी ऊपर से नीचे की ओर है; परन्तु गांव के तंत्र में कितना गुरूत्वाकर्षण है उससे ही तय होगा कि वह कितने संसाधन केन्द्र और राज्य से खींच कर अपनी झोली में डाल पाता है।

यह कानून पंचायतों और ग्रामसभा को बहुत से अधिकार तो देता ही है परन्तु क्रियान्वयन के स्तर पर अब तक की सीखों को देखते हुये जनप्रतिनिधि खासतौर पर इसे एक जोखिम भरी हुई योजना मान रहे हैं। जिस तरह से इस योजना को महत्वाकांक्षी बनाया गया है उससे सरकार को भी इसे सफल बनाने के लिये ठोस प्रयास करने होंगे। इसके लिये बहुत जरूरी है कि पंचायत प्रतिनिधियों में सबसे पहले यह विश्वास जगाया जाये कि अब उनके साथ विश्वासघात नहीं होगा। और यह कानून अधिकारों की मृगमरीचिका नहीं है बल्कि अब उन्हें वास्तव में ताकत मिली है अपने विकास की परिभाषा तय करने की। लगभग डेढ़ दशकों की पंचायतीराज व्यवस्था में गांव के विकास की परिभाषा तय होती रही है और ग्राम सभाओं ने उसे केवल रटने का काम किया है। जिसका यह सीधा परिणाम है कि तमाम कोशिशों के बावजूद गांव और गांव के लोग वहीं के वहीं खड़े नजर आते है - गरीब, कमजोर, नाऊम्मीद और ऊर्जाविहीन। रोजगार गारण्टी योजना इस महौल में एक ऐसी कोशिश है जो व्यवस्था और समाज को बदल सकती है। क्योंकि इसमें लक्ष्य से भटकाने वाले व्यक्ति (केवल पद नहीं) के लिये सजा के भी प्रावधान हैं।

उमरिया जिले में 12 हजार कार्ड सरपंच और सचिवों के पास रखे हुये हैं। इसी तरह टीकमगढ़ जिले में 20 हजार कार्ड सरपंच और सचिवों के पास है, इन्हें वितरित नहीं किया गया है। अमूमन यह स्थिति हर जिले की कहानी है। इस मामले में सरपंच और सचिवों को अपराधी ठहराने की कोशिश की जा रही है ताकि वे भ्रष्टाचारी सिध्द हों। परन्तु सच्चाई कुछ और ही है। रोजगार गारण्टी योजना के अन्तर्गत काम मांगने के बाद यदि मजदूरी नहीं मिली तो आवेदक को बेरोजगारी भत्तो का भुगतान करना होगा। वास्तव में बेरोजगारी भत्‍ता दिये जाने का मतलब ही यह होगा कि योजना का क्रियान्वयन नियमानुसार नहीं हो रहा है। ऐसी स्थिति में राज्य से लेकर जनपद पंचायत के अधिकारी तक यह बात ठान ली गई है कि वे किसी भी स्थिति में बेरोजगारी भत्तो का भुगतान नहीं होने देंगे फिर चाहे काम दिया गया हो या न दिया गया हो।

ऐसे में दो रास्ते निकाले गये हैं। पहला रास्ता है जनपद स्तर पर बिना लिखा-पढ़ी के काम करना और दूसरा रास्ता है सरपंच-सचिवों पर जिम्मेदारी डालना। जरहा पंचायत के ग्राम सहायक कृपाशंकर पाण्डेय कहते हैं कि पंचायत में 348 कार्ड बंटे हैं; लोगों ने काम के लिये आवेदन पत्र भी दिये। इसी आधार पर हमने काम का प्रस्ताव जनपद पंचायत को भेजा परन्तु इसकी पावती हमें नहीं दी गई और जब इसके बारे में एक सप्ताह बाद जनपद में चर्चा की गई तो पता चला कि पूरी फाईल ही गुम हो गई है। अब जब लोगों को 15 दिन में रोजगार नहीं मिलेगा तो जिम्मेदारी तो हम पर ही आ रही है।

जहां तक सरपंच और सचिवों द्वारा जॉब कार्ड अपने पास रखे जाने का सवाल हमें उसकी सरकारी राजनीति को समझना होगा। जब राज्य और जिले से उन्हें संसाधन नहीं मिल रहे हैं तो वे काम भी शुरू कर पाने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे में यदि उन्होंने जॉब कार्ड गांव के लोगों में बांट दिये तो रोजगार की मांग आना शुरू हो जायेगी और संसाधन या राशि के अभाव में वे काम शुरू नहीं कर पायेंगे तो बेरोजगारी भत्ता देना पड़ेगा। जिसकी फिर जांच पड़ताल होगी और पंचायत दोषी सिध्द होगी। अब आत्मरक्षा का यही बेहतर तरीका है कि जॉब कार्ड ही न बांटे जायें।

यह एक कल्पना है और यह तब तक वास्तविकता में नहीं बदल सकती है जब तक की जनप्रतिनिधियों और ग्रामसभा का योजना के संबन्ध में सशक्तिकरण नहीं किया जायेगा। इस योजना से जुड़ी समझ के अभाव में यह भी आशंका है कि वे राजनैतिक रूप से तो बदनाम होंगे ही, कानून के प्रावधानों की भी गिरफ्त में होंगे। जरहा पंचायत में पंजीयन भी हो युका है और जॉब कार्ड भी बंट चुके हैं परन्तु मजदूरी इतनी कम मिल रही है कि ग्रामीण इस योजना को बेरोजगारी के हल के रूप में नहीं देख रहे हैं। चूंकि इस योजना में ज्यादातर अत्यंत गरीब लोग काम कर रहे हैं जो शारीरिक रूप से कमजोर हैं। वे सरकार द्वारा तय किया गया टास्क पूरा नहीं कर पा रहे हैं। इसलिये उन्हें 30 से 40 रूपये ही मजदूरी मिल रही है। गांव के लोगों की अपेक्षा है कि न्यूनतम मजदूरी कम से कम 100 रूपये होना चाहिये।

ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना का एक साल - 2 फरवरी 2007
न्यूनतम मजदूरी का अभिशाप - 3

शिवपुरी के मझेरा गांव में आज रोजगार के कोई ठोस विकल्प नहीं हैं। यहां पर अवैध पत्थर की खदानों से जबर्दस्त नुकसान होने के बाद उन्हें बन्द कर दिया गया। लोगों के पास अब रोजगार का दूसरा विकल्प रोजगार गारंटी योजना के रूप में सामने आया। इसके अन्तर्गत उन्होंने 25 दिन के काम की मांग की और उन्हें काम उपलब्ध भी कराया गया परन्तु दो दिन बाद ही उन्होंने काम पर जाना बन्द कर दिया। हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद उन्हें जो न्यूनतम मजदूरी मिल रही थी उससे वे न तो अपने परिवार का पेट भर सकते थे और ना ही स्वास्थ्य, शिक्षा और कपड़ों जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकते थे। यह मामला केवल मझेरा का नहीं है बल्कि हर उस गांव का है जहां लोग न्यूनतम मजदूरी पर काम करके अपनी जरूरतें पूरी करने की कोशिश कर रहे हैं।

वर्तमान न्यूनतम मजदूरी की केवल के दर और राशि में ही नहीं बल्कि सोच में ही आमूल-चूल परितर्वन करने की जरूरत है। अनुभव यह सिध्द करते हैं कि प्रचलित न्यूनतम मजदूरी की व्यवस्था गरीबी को मिटाने का नहीं बल्कि बढ़ाने का काम कर रही है। मध्यप्रदेश में अभी जो न्यूनतम मजदूरी तय की गई है उससे दो वक्त का भरपेट खाना भी जुगाड़ पाना कठिन है, स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास के अधिकार तो सपने हैं।

राज्य में मजदूरों को उनके श्रम के एवज में कितनी मजदूरी मिलेगी यह दरों की अनुसूची से तय होता है। मध्यप्रदेश में सामान्य सह होने की स्थिति में 100 क्यूबिक फिट खुदाई को न्यूनतम लक्ष्य माना गया है जबकि कठोर मिट्टी या मुरूम होने पर 64 क्यूबिक फिट की खुदाई करने पर मजदूर को न्यूनतम मजदूरी मिलेगी, यही मापदण्ड है। दरों की यह अनुसूची वास्तव में उस स्थिति में महत्वपूर्ण मानी जाती थी जब सरकारी योजनाओं में निर्माण कार्य ठेकेदारों के जरिये संपादित कराये जाते थे। उस परिस्थिति में महत्वपूर्ण यह नहीं होता था कि मजदूरों को रोजगार मिले और वे भूख के संकट से मुक्ति पा सकें। तब मकसद निर्माण कार्य पूरा करना ही रहता था। परन्तु अब मजदूरों के हक और जनकल्याण का सिध्दान्त राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून में बहुत महत्वपूर्ण सैध्दान्तिक आधार है। ऐसी स्थिति में यह देखना बहुत जरूरी है कि शारीरिक रूप से कमजोर मजदूर सरकार द्वारा तय किये गये कठोर श्रम मापदण्डों के अनुरूप काम कर पायेंगे अथवा नहीं। कई दलित एवं आदिवासी समुदाय शारीरिक रूप से इतने कमजोर हो चुके हैं कि वे भारी शारीरिक श्रम कर न्यूनतम मजदूरी नहीं कमा पायेंगे। वहीं दूसरी ओर यदि मजदूरी के निर्धारण की प्रक्रिया देखें तो पता चलता है कि निर्माण कार्य की प्रगति को पूरा दिखाने के लिये सरकार नियमों का कठोरता से पालन करती है और परिणाम यह होता है कि जिन मजदूरों को मजदूरी की बहुत जरूरत होती है उन्हें वह पूरी नहीं मिल पाती है। ऐसे में कुपोषण और भूख की यथास्थिति बनी रहती है।

पहली विडम्बना यह है कि राज्य सरकार द्वारा तय की गई दरों में भौगोलिक परिस्थितियों और क्षेत्रीय चरित्रों को कोई स्थान नहीं मिलता है। होशंगाबाद की नरम मिट्टी और बड़वानी की सामान्यत: कठोर सतहों को एक ही नजरिये से मापा जाता रहा है। जबकि व्यावहारिकता के स्तर पर देखा जाये तो पता चलता है कि मिट्टी के नरम या कठोर सतह वाले इलाकों में मजदूर उतना काम नहीं कर पाते हैं तो उन्हें आलसी माना जाता है। इतना ही नहीं जब केवल लक्ष्य को पूरा करने के बाद ही न्यूनतम मजदूरी के सिध्दान्त को भी यदि रोजगार गारण्टी कानून में प्रथमिकता दी जायेगी तो तय है कि महिलाओं को समान मजदूरी का अधिकार भी नहीं मिल पायेगा उन्हें मजदूर के श्रम के आधार पर नहीं बल्कि औरत के श्रम के आधार पर मजदूरी मिलती है। व्यापक स्तर पर महिलाओं के समानता के हक का उल्लंघन तो हो ही रहा है। ऐसी स्थिति में जरूरी है सामुदाय, भौगोलिक परिस्थितियां और जन कल्याण के सिध्दान्त के आधार पर मजदूरी तय करने की प्रक्रिया शुरू हो। इतना ही नहीं इसे बुनियादी अधिकार से जोड़कर परिभाषित किया जाना चाहिए ताकि दरों में वृध्दि हो सके।

दूसरे नजरिये से यह भी देखा जाना जरूरी है कि मजदूरी भुगतान की वर्तमान प्रक्रिया औसत से ज्यादा श्रम की मांग करती है जबकि मजदूर वर्ग का एक हिस्सा विकलांगता, कुपोषण और खाद्य असुरक्षा के संकट का सामना कर रहा है। इस वर्ग के लिये टास्क आधारित मजदूरी का भुगतान शोषण का माध्यम भर है। आज की स्थिति में श्रम के तकनीकी और मशीनीकरण के षडयंत्र को तोड़ने की जरूरत है और इसके लिये सबसे पहले मजदूरी की दरों का मानवीय नजरिये से युक्तियुक्तकरण करना होगा। मजदूरी को जितना ज्यादा उत्पादकता आधारित बनाने की कोषिष होगी उतना ही ज्यादा मशीनों को प्राथमिकता देने का सिध्दान्त प्रभावी होगा। अंतत: यह स्थापित कर दिया जायेगा कि मजदूर विकास और प्रगति की गति को नहीं बढ़ा पा रहे हैं इसलिये उन्हें मजदूरी के बजाये मजदूरी का मुआवजा देकर सरकार को अपना दायित्व पूरा कर देना चाहिये। यह अपने आप में एक गंभीर संकट होगा। इसलिये यह जरूरी है कि हम रोजगार के अधिकार को सुनिश्चित करने वाले कानून का गरीबी और सामयिक परिस्थितियों में विश्लेषण करें।

हालांकि भारत का न्यूनतम मजदूरी कानून, 1948, संविधान के अनुच्छेद 43 की भावना पर खड़ा हुआ है। संविधान स्पष्ट करता है कि सरकार सभी मजदूरों को सम्मानजनक जीवन जीने के लिये जरूरी मजदूरी की दर तय करेगी। न्यूनतम मजदूरी काननू भी अपने आप में ऐसी मजदूरी तय करने की वकालत नहीं करता है जिससे मजदूर और उसका परिवार दो वक्त पेट भर खाना भी हासिल न कर सके। कानून कहता है कि हर मजदूर को कम से कम इतनी मजदूरी तो मिलना ही चाहिए जिससे परिवार के हर वयक्त व्यक्ति को 2700 कैलोरी का भोजन, परिवार के लिये 72 गज कपड़ा, आवास की जरूरत पूरी हो सके। इतना ही नहीं रोशनी और खाना पकाने के लिये ईंधन की जरूरत पूरा करने के लिये न्यूनतम मजदूरी की 20 फीसदी राषि तय हो। इसके बाद 1991 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में कहा कि बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधायें सामाजिक समारोह आयोजत करने की क्षमता और वृध्दों की जरूरत को पूरा करने के लिये न्यूनतम मजदूरी की भेंट की 25 फीसदी राशि और जोड़ी जाये। परन्तु राज्य लगातार संविधान कानून और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को ताक पर रखता रहा है। वर्तमान में मध्यप्रदेश में अनुकूल श्रमिकों के लिये न्यूनतम मजदूरी 61 रूपये 37 पैसे तय है जिसके आधार पर 43 लाख ग्रामीण परिवारों को मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून के अन्तर्गत 100 दिन का रोजगार देने के प्रयास चल रहे हैं। कठोर श्रम के एवज में मिलने वाली इस राषि के पांच सदस्यों के हिस्से में 12.12 रूपये आते हैं यानि एक वक्त के भोजन के लिये 6.6 रूपयें। यदि न्यूनतम मजदूरी कानून 2700 कैलोरी भोजन उपलब्ध कराने की बात करता है तो हमें यह जरूर समझ लेना चाहिये कि भरपेट भोजन के लिये ही एक व्यक्ति पर 20 रूपये खर्च करने होंगे। कपड़े, षिक्षा और स्वास्थ्य की जरूरत को जोड़ा जाये तो 12 रूपये प्रतिदिन अतिरिक्त की जरूरत होगी। इसका साफ मतलब यह है कि 160 रूपये की जरूरत को मध्यप्रदेश सुरकार 61.37 रूपये में पूरा कर रही है। इस सम्बन्ध में एक विरोधाभास गरीबी की रेखा के सम्बन्ध में भी है। सरकार की परिभाषा के अनुसार ही 1800 रूपये प्रतिमाह से कम व्यय करने वाला परिवार भुखमरी की कगार पर है परन्तु वहीं दूसरी ओर सरकार, मजदूरों को केवल 500 रूपये प्रतिमाह की मजदूरी पर जीवनयापन करने के लिये मजबूर कर रही है। यूं तो भारत की सरकारें खुले बाजार और वैश्विकीकरण का तहेदिल से स्वागत करती है। परन्तु गरीबी की रेखा के वैश्विक मापदण्डों के सामने आंखे मूंद लेती हैं। वह ऐसे मापदण्ड स्वीकार कर लागू नहीं करती हैं जो गरीबों का संरक्षण करते हो। गरीबी की रेखा के अर्न्तगत मानक दो डॉलर यानी 90 रूपये प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन का व्यय है परन्तु भारत का योजना आयोग 12 से 14 रूपये हर रोज खर्च करके व्यक्ति सम्मानजनक जीवन हासिल कर सकता है। इस नजरिये को बदलने की जरूरत है। भारत में गरीबी की रेखा वास्तव में भुखमरी की रेखा है। यह भी एक सच्चाई है कि आज हमारे जनप्रतिनिधियों को भी न्यूनतम मजदूरी की कड़वी सच्चाई का आभास नहीं है। हाल ही में संसद की स्थायी समिति ने भी न्यूनतम मजदूरी की दर पर आश्चर्य ही व्यक्त किया।

प्रदेश में इस वक्त 66.90 लाख वंचित और सीमांत मजदूर हैं। जिनमें से 45.52 लाख महिलायें हैं। इसका मतलब यह है कि न्यूनतम मजदूरी की शोषण कर रही व्यवस्था की सबसे बड़ी शिकार महिलायें ही हो रही हैं। सरकार को यह सिध्दान्त समझ लेना होगा कि जब तक मजदूरों को बेहतर मजदूरी नहीं मिलेगी तब तक उनकी शारीरिक और मानसिक क्षमता का विकास नहीं हो पायेगा और इस विकास के अभाव में उनकी उत्पादकता में भी वृध्दि नहीं होगी।

वास्तव में यदि सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना का एक ऐतिहासिक कदम उठाया है तो उसे मजदूरी की दर को भी नये सिरे से परिभाषित करने की पहल करना होगी। वैसे भी यदि केन्द्र सरकार मजदूरी पर होने वाले व्यय का भार वहन कर रही है तो राज्य सरकार को अपने मजदूरों को उनके हक दिलाने की राजनैतिक कोषिष करना चाहिये। इसका भार राज्य सरकार पर नहीं पड़ने वाला है।

एक बेहतर कदम होगा यदि अब असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को भी संगठित क्षेत्र के कर्मकार इसलिये आज बेहतर स्थिति में हैं क्योंकि वे संगठित होकर अपने हकों के लिये लड़ते रहे है। ऐसे में संगठित हुये बिना ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून भी उन्ें संरक्षण नहीं दे पायेगा। भूमण्डलीकरण के दौर में लोकतंत्र के चारों स्तंभ बिना जनदबाव के जनमुद्दों, पर विचार नहीं करेंगे इसलिये संघर्ष की जरूरत को एक सच्चाई के रूप में स्वीकार कर लेना होगा।

ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना का एक साल - 2 फरवरी 2007
रोजगार गारण्टी कानून - अनुभवों का एक साल - 4

रोजगार के अधिकार को कानूनी अधिकार का रूप देने के उद्देश्य से अस्तित्व में आये राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून का पहला साल बहुपक्षीय अनुभवों से भरपूर रहा है। जहां एक तरफ भूमण्डलीकरण के दौर में सरकार बहुत तेज गति से अब आम आदमी के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से नाता तोड़ रही है तो वहीं दूसरी ओर एक संगठित जन संघर्ष के बाद ऐसी ही सरकार को रोजगार कानून बनाना पड़ा। यह अनुभव सिध्द करता है कि अब लोकतंत्र ''लोक'' यानी जनता को अपने अधिकारों के लिये कदम-कदम पर 'तंत्र' यानी सरकार के साथ संघर्ष करते रहना पड़ेगा। संघर्ष के बिना संभवत: अब जीवन का नैसर्गिक अधिकार मिलना भी संभव नजर नहीं आता है। रोजगार की गारण्टी देने वाले इस कानून की सबसे खास बात यह है कि अब गांव में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को सरकार से रोजगार की मांग करने का अधिकार है और सरकार उस मांग को पूरा करने के लिये बाध्य है।

सरकार ने यह कानून बनाकर लागू तो कर दिया पर यह मानना गलत है कि रोजगार गारण्टी कानून से मजदूरों को साल भर में एक सौ दिन का रोजगार ही केवल मिलेगा, वास्तविकता तो यह है कि इस कानून से हम सबने यह सीखना भी शुरू किया है कि जब तक हम अपने अधिकारों का निर्धारित प्रक्रिया के तहत उपयोग करने की आदत नहीं डालेंगे तब तक ऐसे अधिकार निरर्थक ही रहेंगे। 2 फरवरी 2006 से लागू हुये रोजगार गारण्टी कानून की उम्र अब एक साल की हो गई है और 12 महीनों की इस अवधि के अनुभव 12 सीखों पर रोशनी डालने के लिये हमें जरूर प्रेरित करते हैं।

जब यह कहा जाता है कि आज के परिदृश्य असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को रोजगार का अब संवैधानिक अधिकार मिल गया है तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या वास्तव में ऐसा अधिकार मिलना बहुत आसान है या क्या सरकार लोगों को इस तरह के अधिकार का उपयोग करने की स्वतंत्रता भी देगी? रोजगार कानून वैसे तो समाज के गरीबों के लिये बहुत ही महत्वपूर्ण कदम है किन्‍तु सरकार के नजरिये से इस कानून में होने वाला पचास हजार करोंड़ रूपय का दुखदायी ही नजर आ रहा है।

यह कानून अपने आप में अधिकार के लिये संघर्ष की एक प्रक्रिया सिखाता है। यदि कोई भी व्यक्ति इसका उपयोग करता है तो उसे तीन अहम् चरणों से गुजरना होगा। पहला चरण तो यह है कि पंचायत स्तर पर पंजीयन होने और रोजगार कार्ड जारी होने के बाद उसे काम की मांग करनी होगी। काम की मांग किये बिना उसे रोजगार नहीं मिलेगा। दूसरा चरण है यह देखते रहना कि हर मजदूर को कानून में दर्ज सुविधायें, लाभ और मानवीय व्यवहार ही मिले। यह कतई नहीं माना जाये कि सरकार समाज के गरीब, असंगठित और वंचित मजदूरों पर किसी भी तरह का 'उपकार या दया' कर रही है। पर्याप्त मजदूरी सही समय पर मिलना चाहिये, यह भी उनका कानूनी अधिकार है। और तीसरे चरण में यह देखा जाना है कि ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून एक मजदूरी के अधिकार का कानून मात्र नहीं है बल्कि यह गांव और समाज में सहभागी विकास की एक सार्थक प्रक्रिया को आगे बढ़ायें।

विचारों इस धरातल पर खड़े होकर जब हम बीते एक साल पर नजर डालते हैं तो पता चलता है कि रोजगार गारण्टी कानून अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण स्थिति में आ चुका है। एक क्रांतिकारी सोच को लागू करने की तैयारी और क्षमतायें सरकार में नजर नहीं आ रही है। इसकी प्रक्रिया के तहत हम सभी यह मानते है। कि ''रोजगार की मांग'' पैदा होना चाहिये और सरकार को ''दयादाता'' की भूमिका से मुक्त होना होगा किन्तु सरकार ने ठीक इसके विपरीत व्यवहार किया है। मध्यप्रदेश में 43 लाख ग्रामीण परिवारों का पंजीयन कर जॉब कार्ड बनाने की सार्थक कोशिश करने के बाद सरकार का दूसरा कदम पूरी तरह से हट गया नजर आता है। राज्य में एक आम व्यक्ति रोजगार की मांग करे इसका सरकार ने अवसर ही नहीं दिया और बिना मांग के लोगों को एक साल में 1485 लाख मानव दिवस रोजगार उपलब्ध कराया। कानून रोजगार मिलने की बात तो कहता है परन्तु किसी भी तरह के अधिकारों के हनन की स्थिति में मजदूर अपनी लड़ाई तब तक नहीं पायेगा जब तक उसके पास इस बात का प्रमाण नहीं होगा कि उसने काम की मांग की थी पर उसे काम नहीं दिया गया।

मध्यप्रदेश में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 25.48 लाख परिवारों को काम दिया गया है किन्तु उमरिया, छतरपुर, श्योपुर और टीकमगढ़ में केवल सात फीसदी मजदूरों के पास उनके आवेदन की पावती है। श्योपुरा के रोहणी गांव के मजदूरों ने पंचायत की गुहार की परन्तु जिम्मेदार अफसर आवेदन पंजीकृत डाक से आवेदन करना पड़ा; मुद्दा यह है कि आखिर पावती पर बवाल क्यों है? वास्तव में यही पावती कानूनी संघर्ष और सरकार की जवाब-देहिता का आधार बनती है। सरकार के अफसर जानते है कि यदि जिम्‍मेदारी से बचना है तो पावती पर लगाम कसो। जब पावती ही नहीं होगी तो प्रमाण क्या होगा। एक तरह से यह प्रवृत्ति रोजगार गारण्टी कानून के सामने बड़ी चुनौती है।

अगला मुद्दा मजदूरी के सम्बन्ध में बार-बार उभरकर आ रहा है। सरकार मजदूरी का भुगतान लक्ष्य आधारित प्रक्रिया के आधार पर कर रही है और आम तौर पर यह देखा गया है कि कठोर-पथरीली जमीन पर काम करने के लिये भी वही मजदूरी दर है जो दर नरम मिट्टी पर काम करने के लिये दी जाना चाहिए। परिणाम स्वरूप मजदूरों को दस घंटे की मेहनत के एवज में 30 से 40 रूपये की मजदूरी ही मिल पा रही है। यूं तो कानून कहता है कि मजदूरी का भुगतान हर पंद्रह दिन में हो ही जाना चाहिए; परन्तु अब भी बड़े स्तर पर इस प्रावधान का पालन नहीं हो रहा है। विचारधारा तो यह कहती है कि रोजगार गारण्टी योजना के अन्तर्गत पंचायत या गांव में विकास की रूपरेखा तय करने का अधिकार ग्रामसभा और पंचायत को है। इसके लिये पंचायतें पांच साल की एक विकास की दृष्टि योजना और क्रियान्वयन के लिये हर साल वार्षिक योजना बनायेंगी किन्‍तु दृष्टि योजना में पंचायतों की नहीं बल्कि सरकार और योजना बनाने वाली ठेकेदार संस्थाओं की ज्यादातर दृष्टि का समावेश हुआ है। मध्यप्रदेश में 18 में से 13 जिलों में एक-एक पंचायत की पांच साल की योजना तीन-चार घंटों में बनाकर तैयार कर दी गई है। केन्द्र सरकार के मार्ग निर्देशों की मानें तो हर वर्ष दिसम्बर में ग्रामसभा और पंचायतें वार्षिक योजना तैयार करेंगी पहला साल तो गुजर गया परन्‍तु राईट टू फूड कैम्पैन का छह जिलों का अवलोकन स्पष्ट करता है कि वार्षिक योजना बनाने के लिये न तो पंचायतों के स्तर पर समुचित क्षमतावृध्दि की गई है न ही इसे सरकार बहुत ही महत्वपूर्ण मानती है। ऐसे में डर है कि विकास की मूल भावना पर कुठाराघात न हो जाये। राज्य में ज्यादातर ग्रामीण मिट्टी का उपचार और पानी बचाने का काम सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं किन्तु सरकार ने सड़क के काम को सबसे महत्वपूर्ण माना है। और राज्य में सबसे ज्यादा सड़कें ही बनी हैं। कानूनी प्रावधानों में यह स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले पारिवारों, दलित आदिवासी गरीबों और भू-सुधार के हितग्राहियों की ''निजी भूमि'' पर भी उपचार, सिंचाई और उपयोगी बनाने के लिये रोजगार योजना में काम किया जा सकता है परन्तु मध्यप्रदेश की कार्ययोजना और कार्यशैली में इन वर्गों को कोई स्थान अब तक नहीं मिला है। भारत सरकार की ताजा रिपोर्ट के अनुसार बिहार में 1.15 लाख, राजस्थान में 2.93 लाख और आंध्रप्रदेश में 95 हजार गरीब परिवारों की आजीविका को सुदृढ़ बनाने के काम हुये पर मध्यप्रदेश में ऐसा कोई परिवार लाभ न हो पा सका। इसी तरह मध्यप्रदेश में लगभग 450 विकलांगों को ही रोजगार का अधिकार मिला जबकि आंध्रप्रदेश में यह संख्या 18 हजार, पश्चिम बंगाल में 56 हजार, राजस्थान में 58 हजार और हिमाचल प्रदेश में 14 हजार से ज्यादा रही है। एक साल के अनुभवों के विश्लेषण से एक बात तो स्पष्ट रूप से सामने आई है कि सरकार के लिये अब भी यह एक मजदूरी देने वाला कानून है जिसमें सरकार दाता की भूमिका में है। यह एक अधिकार है ऐसी मान्यता स्थापित करने के लिये लगातार संघर्ष की प्रक्रिया चलाना बाकी।

सचिन कुमार जैन

 
     
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