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राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के तहत प्रथम चरण में राष्ट्रीय स्तर पर 200 जिलों में कानून को लागू किया गया, जिसमें मध्यप्रदेश के 18 जिलों को शामिल किया गया पर अति पिछड़े आदिवासी एवं दलित बहुल जिलों के रूप में चिन्हित और पात्रता के बावजूद अनूपपुर एवं बुरहानपुर का चयन नहीं किया गया जिसकी वजह से उन जिलों के लाखों लोग रोजगार से वंचित रह गये।
प्रदेश में 2 फरवरी, 2006 से कानून के क्रियान्वयन के लिए मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को लागू किया गया। इस योजना के तहत् झाबुआ, मण्डला, उमरिया, शहडोल, बड़वानी, खरगोन, शिवपुरी, सीधी, टीकमगढ़, बालाघाट, छतरपुर, बैतूल, खण्डवा, श्योपुर, धार, सिवनी, डिण्डोरी और सतना शामिल हैं। कानूनी प्रावधानों के अन्तर्गत 2010 तक पूरे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में इस योजना को लागू करना है। कानून के लागू हुए एक साल से ज्यादा हो गया और अब दूसरे चरण में जिलों के चयन की प्रक्रिया भी पूरी हो गई पर अफसोसजनक बात यह है कि अनूपपुर एवं बुरहानपुर को योजना में शामिल नहीं किया गया। उन जिलों के चयन का आधार सन् 2001 की जनगणना एवं भौगोलिक स्थिति थी। इसमें अविभाजित पूर्वी निमाड़ (खण्डवा) एवं शहडोल को शामिल किया गया था पर जब यह योजना लागू हुई, तब उक्त दोनों जिलों का विभाजन हो गया और शहडोल से अलग हुए अनूपपुर एवं पूर्वी निमाड़ से अलग हुए बुरहानपुर को योजना से नहीं जोड़ा गया। योजना को पूर्व की स्थिति में लागू करने से अविभाजित शहडोल और पूर्वी निमाड़ को अनूपपुर एवं बुरहानपुर की जनसंख्या एवं क्षेत्र के आधार पर संसाधन आवंटित किये गये, जिसकी वजह से उक्त दोनों जिलों के लाखों ग्रामीणों को लाभ नहीं मिल पाया। शुरुआती विसंगतियों के बावजूद यह माना जा रहा था कि कुछ दिनों बाद उन जिलों को योजना में शामिल किर लिया जाएगा, पर अभी तक ऐसा नहीं हो पाया, जबकि इस योजना के वे हकदार भी हैं और उनकी जरूरतों के आधार पर तय संसाधनों को उनके पूर्ववर्ती जिलों को आवंटित भी कर दिया गया है। इस विसंगति को दुरुस्त नहीं किये जाने से उक्त दोनों जिलों के लाखों ग्रामीण इस योजना के लाभकारी उद्देश्यों से वंचित हैं। बुरहानपुर एवं अनूपपुर प्रदेश के अति पिछड़े जिलों में आते हैं। दोनों जिलों से पलायन की दर भी ज्यादा है। अनूपपुर के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे के लोगों की संख्या 50 फीसदी से ज्यादा है। 55584 लघु सीमान्त किसान एवं 16861 भूमिहीन मजदूर परिवार रहते हैं। हजारों लोगों को साल भर भरपेट भोजन नहीं मिल पाता। कमोबेश ऐसी ही स्थिति बुरहानपुर की है।
अनुपपुर में तो इस विसंगति को लेकर आंदोलन भी चलाये गये। सर्वोच्च न्यायालय के आयुक्त ने 24 मई, 2006 को ग्रामीण विकास विभाग को इस सम्बन्ध में एक पत्र भी लिखा था, जिसमें कहा गया था कि उन दोनों जिलों को योजना में शामिल किया जाये। जन संगठनों एवं स्वयंसेवी संस्थाओं के दबाव के बाद भारत के योजना आयोग और केन्द्रीय ग्रामीण विकास विभाग ने इस भूल को स्वीकार कर दोनों जिलों को योजना में शामिल करने का फैसला कर लिया पर मध्यप्रदेश सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं किया, जिससे मामला अभी तक अटका हुआ है। अब योजना का दूसरा चरण लागू होने वाला है पर अभी भी इन दोनों जिलों को योजना में शामिल करवाने के प्रति सरकार की उदासीनता दिख रही है, जबकि स्वयंसेवी संस्थाएं एवं जन संगठन लगातार संघर्ष कर रहे हैं।
राजु कुमार |
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