शिवपुरी के मझेरा गांव में आज रोजगार के कोई ठोस विकल्प नहीं हैं। यहां पर अवैध पत्थर की खदानों से जबर्दस्त नुकसान होने के बाद उन्हें बन्द कर दिया गया। लोगों के पास अब रोजगार का दूसरा विकल्प रोजगार गारंटी योजना के रूप में सामने आया। इसके अन्तर्गत उन्होंने 25 दिन के काम की मांग की और उन्हें काम उपलब्ध भी कराया गया परन्तु दो दिन बाद ही उन्होंने काम पर जाना बन्द कर दिया। हाड़तोड़ मेहनत के बावजूद उन्हें जो न्यूनतम मजदूरी मिल रही थी उससे वे न तो अपने परिवार का पेट भर सकते थे और ना ही स्वास्थ्य, शिक्षा और कपड़ों जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा कर सकते थे। यह मामला केवल मझेरा का नहीं है बल्कि हर उस गांव का है जहां लोग न्यूनतम मजदूरी पर काम करके अपनी जरूरतें पूरी करने की कोशिश कर रहे हैं।
वर्तमान न्यूनतम मजदूरी की केवल दर और राशि में ही नहीं बल्कि सोच में ही आमूल-चूल परितर्वन करने की जरूरत है। अनुभव यह सिध्द करते हैं कि प्रचलित न्यूनतम मजदूरी की व्यवस्था गरीबी को मिटाने का नहीं बल्कि बढ़ाने का काम कर रही है। मध्यप्रदेश में अभी जो न्यूनतम मजदूरी तय की गई है उससे दो वक्त का भरपेट खाना भी जुगाड़ पाना कठिन है, स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास के अधिकार तो सपने हैं।
राज्य में मजदूरों को उनके श्रम के एवज में कितनी मजदूरी मिलेगी यह दरों की अनुसूची से तय होता है। मध्यप्रदेश में सामान्य सतह होने की स्थिति में 100 क्यूबिक फिट खुदाई को न्यूनतम लक्ष्य माना गया है जबकि कठोर मिट्टी या मुरूम होने पर 64 क्यूबिक फिट की खुदाई करने पर मजदूर को न्यूनतम मजदूरी मिलेगी, यही मापदण्ड है। दरों की यह अनुसूची वास्तव में उस स्थिति में महत्वपूर्ण मानी जाती थी जब सरकारी योजनाओं में निर्माण कार्य ठेकेदारों के जरिये संपादित कराये जाते थे। उस परिस्थिति में महत्वपूर्ण यह नहीं होता था कि मजदूरों को रोजगार मिले और वे भूख के संकट से मुक्ति पा सकें। तब मकसद निर्माण कार्य पूरा करना ही रहता था। परन्तु अब मजदूरों के हक और जनकल्याण का सिध्दान्त राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून में बहुत महत्वपूर्ण सैध्दान्तिक आधार है। ऐसी स्थिति में यह देखना बहुत जरूरी है कि शारीरिक रूप से कमजोर मजदूर सरकार द्वारा तय किये गये कठोर श्रम मापदण्डों के अनुरूप काम कर पायेंगे अथवा नहीं। कई दलित एवं आदिवासी समुदाय शारीरिक रूप से इतने कमजोर हो चुके हैं कि वे भारी शारीरिक श्रम कर न्यूनतम मजदूरी नहीं कमा पायेंगे। वहीं दूसरी ओर यदि मजदूरी के निर्धारण की प्रक्रिया देखें तो पता चलता है कि निर्माण कार्य की प्रगति को पूरा दिखाने के लिये सरकार नियमों का कठोरता से पालन करती है और परिणाम यह होता है कि जिन मजदूरों को मजदूरी की बहुत जरूरत होती है उन्हें वह पूरी नहीं मिल पाती है। ऐसे में कुपोषण और भूख की यथास्थिति बनी रहती है।
पहली विडम्बना यह है कि राज्य सरकार द्वारा तय की गई दरों में भौगोलिक परिस्थितियों और क्षेत्रीय चरित्रों को कोई स्थान नहीं मिलता है। होषंगाबाद की नरम मिट्टी और बड़वानी की सामान्यत: कठोर सतहों को एक ही नजरिये से मापा जाता रहा है। जबकि व्यावहारिकता के स्तर पर देखा जाये तो पता चलता है कि मिट्टी के नरम या कठोर सतह वाले इलाकों में मजदूर उतना काम नहीं कर पाते हैं तो उन्हें आलसी माना जाता है। इतना ही नहीं जब केवल लक्ष्य को पूरा करने के बाद ही न्यूनतम मजदूरी के सिध्दान्त को भी यदि रोजगार गारण्टी कानून में प्रथमिकता दी जायेगी तो तय है कि महिलाओं को समान मजदूरी का अधिकार भी नहीं मिल पायेगा उन्हें मजदूर के श्रम के आधार पर नहीं बल्कि औरत के श्रम के आधार पर मजदूरी मिलती है। व्यापक स्तर पर महिलाओं के समानता के हक का उल्लंघन तो हो ही रहा है। ऐसी स्थिति में जरूरी है सामुदाय, भौगोलिक परिस्थितियां और जन कल्याण के सिध्दान्त के आधार पर मजदूरी तय करने की प्रक्रिया शुरू हो। इतना ही नहीं इसे बुनियादी अधिकार से जोड़कर परिभाषित किया जाना चाहिए ताकि दरों में वृध्दि हो सके।
दूसरे नजरिये से यह भी देखा जाना जरूरी है कि मजदूरी भुगतान की वर्तमान प्रक्रिया औसत से ज्यादा श्रम की मांग करती है जबकि मजदूर वर्ग का एक हिस्सा विकलांगता, कुपोषण और खाद्य असुरक्षा के संकट का सामना कर रहा है। इस वर्ग के लिये टास्क आधारित मजदूरी का भुगतान शोषण का माध्यम भर है। आज की स्थिति में श्रम के तकनीकी और मशीनीकरण के षडयंत्र को तोड़ने की जरूरत है और इसके लिये सबसे पहले मजदूरी की दरों का मानवीय नजरिये से युक्तियुक्तकरण करना होगा। मजदूरी को जितना ज्यादा उत्पादकता आधारित बनाने की कोशिश होगी उतना ही ज्यादा मशीनों को प्राथमिकता देने का सिध्दान्त प्रभावी होगा। अंतत: यह स्थापित कर दिया जायेगा कि मजदूर विकास और प्रगति की गति को नहीं बढ़ा पा रहे हैं इसलिये उन्हें मजदूरी के बजाये मजदूरी का मुआवजा देकर सरकार को अपना दायित्व पूरा कर देना चाहिये। यह अपने आप में एक गंभीर संकट होगा। इसलिये यह जरूरी है कि हम रोजगार के अधिकार को सुनिश्चित करने वाले कानून का गरीबी और सामयिक परिस्थितियों में विश्लेषण करें।
हालांकि भारत का न्यूनतम मजदूरी कानून, 1948, संविधान के अनुच्छेद 43 की भावना पर खड़ा हुआ है। संविधान स्पष्ट करता है कि सरकार सभी मजदूरों को सम्मानजनक जीवन जीने के लिये जरूरी मजदूरी की दर तय करेगी। न्यूनतम मजदूरी काननू भी अपने आप में ऐसी मजदूरी तय करने की वकालत नहीं करता है जिससे मजदूर और उसका परिवार दो वक्त पेट भर खाना भी हासिल न कर सके। कानून कहता है कि हर मजदूर को कम से कम इतनी मजदूरी तो मिलना ही चाहिए जिससे परिवार के हर वयक्त व्यक्ति को 2700 कैलोरी का भोजन, परिवार के लिये 72 गज कपड़ा, आवास की जरूरत पूरी हो सके। इतना ही नहीं रोशनी और खाना पकाने के लिये ईंधन की जरूरत पूरा करने के लिये न्यूनतम मजदूरी की 20 फीसदी राशि तय हो। इसके बाद 1991 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में कहा कि बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधायें सामाजिक समारोह आयोजत करने की क्षमता और वृध्दों की जरूरत को पूरा करने के लिये न्यूनतम मजदूरी की भेंट की 25 फीसदी राशि और जोड़ी जाये। परन्तु राज्य लगातार संविधान कानून और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों को ताक पर रखता रहा है। वर्तमान में मध्यप्रदेश में अनुकूल श्रमिकों के लिये न्यूनतम मजदूरी 61 रूपये 37 पैसे तय है जिसके आधार पर 43 लाख ग्रामीण परिवारों को मध्यप्रदेश ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून के अन्तर्गत 100 दिन का रोजगार देने के प्रयास चल रहे हैं। कठोर श्रम के एवज में मिलने वाली इस राशि के पांच सदस्यों के हिस्से में 12.12 रूपये आते हैं यानि एक वक्त के भोजन के लिये 6.6 रूपयें। यदि न्यूनतम मजदूरी कानून 2700 कैलोरी भोजन उपलब्ध कराने की बात करता है तो हमें यह जरूर समझ लेना चाहिये कि भरपेट भोजन के लिये ही एक व्यक्ति पर 20 रूपये खर्च करने होंगे। कपड़े, शिक्षा और स्वास्थ्य की जरूरत को जोड़ा जाये तो 12 रूपये प्रतिदिन अतिरिक्त की जरूरत होगी। इसका साफ मतलब यह है कि 160 रूपये की जरूरत को मध्यप्रदेश सुरकार 61.37 रूपये में पूरा कर रही है। इस सम्बन्ध में एक विरोधाभास गरीबी की रेखा के सम्बन्ध में भी है। सरकार की परिभाषा के अनुसार ही 1800 रूपये प्रतिमाह से कम व्यय करने वाला परिवार भुखमरी की कगार पर है परन्तु वहीं दूसरी ओर सरकार, मजदूरों को केवल 500 रूपये प्रतिमाह की मजदूरी पर जीवनयापन करने के लिये मजबूर कर रही है। यूं तो भारत की सरकारें खुले बाजार और वैश्विकीकरण का तहेदिल से स्वागत करती है। परन्तु गरीबी की रेखा के वैश्विक मापदण्डों के सामने आंखे मूंद लेती हैं। वह ऐसे मापदण्ड स्वीकार कर लागू नहीं करती हैं जो गरीबों का संरक्षण करते हो। गरीबी की रेखा के अर्न्तगत मानक दो डॉलर यानी 90 रूपये प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन का व्यय है परन्तु भारत का योजना आयोग 12 से 14 रूपये हर रोज खर्च करके व्यक्ति सम्मानजनक जीवन हासिल कर सकता है। इस नजरिये को बदलने की जरूरत है। भारत में गरीबी की रेखा वास्तव में भुखमरी की रेखा है। यह भी एक सच्चाई है कि आज हमारे जनप्रतिनिधियों को भी न्यूनतम मजदूरी की कड़वी सच्चाई का आभास नहीं है। हाल ही में संसद की स्थायी समिति ने भी न्यूनतम मजदूरी की दर पर आश्चर्य ही व्यक्त किया।
प्रदेश में इस वक्त 66.90 लाख वंचित और सीमांत मजदूर हैं। जिनमें से 45.52 लाख महिलायें हैं। इसका मतलब यह है कि न्यूनतम मजदूरी की शोषण कर रही व्यवस्था की सबसे बड़ी शिकार महिलायें ही हो रही हैं। सरकार को यह सिध्दान्त समझ लेना होगा कि जब तक मजदूरों को बेहतर मजदूरी नहीं मिलेगी तब तक उनकी शारीरिक और मानसिक क्षमता का विकास नहीं हो पायेगा। और इस विकास के अभाव में उनकी उत्पादकता में भी वृध्दि नहीं होगी।
वास्तव में यदि सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना का एक ऐतिहासिक कदम उठाया है तो उसे मजदूरी की दर को भी नये सिरे से परिभाषित करने की पहल करना होगी। वैसे भी यदि केन्द्र सरकार मजदूरी पर होने वाले व्यय का भार वहन कर रही है तो राज्य सरकार को अपने मजदूरों को उनके हक दिलाने की राजनैतिक कोषिष करना चाहिये। इसका भार राज्य सरकार पर नहीं पड़ने वाला है।
एक बेहतर कदम होगा यदि अब असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को भी संगठित क्षेत्र के कमकार इसलिये आज बेहतर स्थिति में हैं क्योंकि वे संगठित होकर अपने हकों के लिये लड़ते रहे है। ऐसे में संगठित हुये बिना ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून भी उन्हे संरक्षण नहीं दे पायेगा। भूमण्डलीकरण के दौर में लोकतंत्र के चारों स्तंभ बिना जनदबाव के जनमुद्दों, पर विचार नहीं करेंगे इसलिये संघर्ष की जरूरत को एक सच्चाई के रूप में स्वीकार कर लेना होगा।
सचिन कुमार जैन
|