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दलित-आदिवासियों ने मजदूरी के लिए लड़ी लंबी लड़ाई

 
     
 

रीवा जिले के सिमरिया तहसील का एक गांव है हरदुआ। गांव के एक किनारे वर्षों पुराने शिव तालाब पर पिछले 28 सितम्बर से लगातार काम करते मजदूर। मजदूरी मिलने की खुशी किसी भी मजदूर के चेहरे पर नहीं। लगभग दो महीने तक सैकड़ों मजदूरों को कार्य करने के बावजूद एक भी धेला किसी भी मजदूर को नसीब नहीं। दो दलित मजदूरों की काम के दौरान मजदूरी न मिलने के कारण मौत। 40 से अधिक बच्चे अत्यधिक गंभीर स्तर के कुपोषण का शिकार। अपने हक में प्रदर्शन कर रहे मजदूर नेताओं पर प्रकरण पंजीबध्द। 29 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे मजदूरों की दो माह तक प्रशासन ने की उपेक्षा।

उपरोक्त स्थिति रोजगार गारंटी योजना के तहत काम कर रहे मजदूरों के साथ हुई। इनमें से लगभग सभी मजदूर आदिवासी एवं दलित समुदाय के हैं। प्रशासन की उपेक्षा उन्हें भुखमरी के कगार पर ला खड़ा कर दिया पर उन्होंने संघर्ष का दामन नहीं छोड़ा और दो महीने की लंबी लड़ाई के बाद उनकी मजदूरी के भुगतान का आदेश जिला प्रशासन को करना पड़ा।

प्रदेश में पड़ी सूखे की मार से न रीवा जिला अछूता है और न ही जिले का हरदुआ गांव। रोजगार के अभाव में गांव के दलितों एवं आदिवासियों ने आजीविका के लिए रोजगार गारंटी योजना के तहत काम करने का विचार किया। पिछले 28 सितंबर को ग्राम पंचायत से उन्होंने रोजगार गारंटी के तहत काम मांगा। पंचायत ने उन्हें गांव के पुराने शिव तालाब की खुदाई का काम सौंप दिया। 341 मजदूरों ने आवेदन दिया था, जिसमें से अधिकांश मजदूरी करने लगे। रोजगार गारंटी योजना के अनुसार मजदूरों को उनकी मजदूरी का भुगतान 7 से 15 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए, पर इन मजदूरों को तय समय बीत जाने के बाद भी मजदूरी नहीं मिल सकी। इस बीच गरीबी और इलाज के अभाव में दो मजदूरों ने दम तोड़ दिया। मजदूरी मांगने के कारण सरपंच ने उन्हें धमकियां देना शुरू कर दिया। इन विपरीत परिस्थितियों में मजदूरों ने अपने अधिकारों के लिए दो-दो के समूह में तहसील मुख्यालय के सामने अनिश्चितकालीन क्रमिक भूख हड़ताल पर बैठना शुरू कर दिया। उनके संघर्ष में एक स्थानीय वकील ने साथ देना शुरू कर दिया।

यह मुद्दा स्थानीय ही था और प्रशासन एवं सरपंच की पुरजोर कोशिश थी कि मजदूरी का भुगतान नहीं किया जा सके। भोजन के अधिकार अभियान की रोजी-रोटी यात्रा के दरम्यान इस घटना की जानकारी यात्रा में शामिल लोगों को मिली। जब वहां जाकर इस मामले को देखा गया तो पता चला कि मजदूरों का यहां दमन हो रहा है। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का मूल उद्देश्य समाज के वंचित और गरीब तबकों को भुखमरी से मुक्ति दिलाकर विकास की मुख्यधारा से जोड़ना है, पर हरदुआ पंचायत में मजदूरों के शोषण की गंभीर स्थिति देखने को मिली।

मजदूरों द्वारा काम मांगने पर पंचायत ने ही उन्हें शिवतालाब की खुदाई के काम में लगाया। वे लगातार काम करते रहे क्योंकि काम बंद करने के संदर्भ में उन्हें कोई लिखित या औपचारिक आदेश नहीं दिया गया। प्रशासन ने बताया कि जिस जमीन पर कार्य किया जा रहा था, वह निजी है, पर भोजन ग्रामीणों को सहयोग कर रहे वकील राजकुमार पांडे का कहना है कि जहां कार्य शुरू किया गया, उसका खसरा नंबर 1572 से लेकर 1576 तक है, जो निजी जमीन नहीं है। इस जमीन पर पिछले वर्ष पंचायत द्वारा 1.5 लाख रुपये का कार्य कराया गया और इस वर्ष भी कार्य पंचायत ने ही शुरू कराया था, जिस दिन कार्य प्रारंभ कराया गया उस दिन सरपंच व सचिव भी वहां पर मौजूद थे तथा उन्होंने ही कार्य की शुरूआत कराई थी, और इसका वीडियो अभिलेख भी पंचायत के पास उपलब्ध है। वैसे भी दलित व आदिवासी मजदूरों को पंचायत ने जिस जगह पर काम दिया, उन्होंने वहीं पर काम किया।

राजकुमार पांडे का कहना है कि कार्य करते हुये मजदूरी का भुगतान न होने पर दो दलित मजदूरों (श्रीमती सुखवंती चर्मकार तथा श्री शिवमंगल साकेत) की मौत हो गई, यह क्रम आगे भी बढ़ जाता क्योंकि अधिकांश मजदूर भुखमरी के शिकार हो गए हैं। इस कार्य में शामिल मजदूरों के बच्चों की उचित व पोषणयुक्त आहार न मिलने के कारण स्थिति अति गंभीर हो गई, ऐसे बच्चों की संख्या लगभग 40 है जो कि गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार हैं। उनका कहना है कि जब श्रमिकों ने सरपंच से मजदूरी के भुगतान की मांग की तो उसने मौखिक रूप से काम बंद करने का आदेश दे दिया और 6 कि.मी. दूर बड़ागांव (दूसरी पंचायत) में वैकल्पिक काम देने का कहा। शिकायत करने पर सरपंच ने मजदूरों को जातिसूचक गाली और धमकी दी। इस गांव के मामले से नायब तहसीलदार, कलेक्टर और संभागायुक्त सभी को अवगत कराया गया पर प्रशासन ने कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया। सभी मजदूर अतिगरीब व भूमिहीन परिवारों से संबंध रखते हैं, पर आश्चर्यजनक रूप से इन 400 आदिवासी एवं दलित परिवारों में से केवल 3 परिवारों को छोड़कर किसी को भी गरीबी रेखा की सूची में शामिल नहीं किया गया है। मजदूरों के आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि मजदूरों को मजदूरी के भुगतान में लापरवाही बरते जाने पर न्यूनतम मजदूरी मुआवजा कानून,1936 के तहत् मजदूरी मुआवजा भी दिया जाना चाहिए। कार्य के दौरान जिन मजदूरों की मौत हुई है, उन परिवारों को मुआवजा भी दिया जाना चाहिए। गांव की रामकली कहती है कि तीन साल पहले 5000 रुपये का कर्ज लिया था, जिसका मूल भी अभी तक नहीं पटा है, ब्याज की कौन कहे। रोजगार गारंटी से आस बनी थी कि कुछ काम मिलेगा तो तालाब का ऐसा काम मिला कि आस ही तोड़ गया। इतने लंबे समय के बाद भी मजदूरी एक दिन की नहीं मिली। तालाब के काम के दरम्यान मर चुकी सुखवंती की पुत्रवधू ललिता बताती है कि हम भूमिहीन हैं, गरीबी रेखा में नाम नहीं है, राशन कार्ड भी नहीं है। सास और मैं दोनों यहां काम करने आते थे, अब सास तो मजदूरी न मिलने के कारण भूखी मर गई और चली गई। ललिता कहती है कि पहले जब सूखा नहीं था तब तो कुछ मजदूरी मिल जाती थी, लेकिन अब तो कहीं कुछ नहीं।

बहरहाल, मजदूरों को अपने हक की इस लड़ाई में दो महीने बाद जीत हासिल हुई, जब प्रशासन को गांव में आकर ग्रामीणों से बात करनी पड़ी और मजदूरों की मजदूरी के भुगतान का आदेश देना पड़ा। यह मध्यप्रदेश के लिए एक मिसाल है, पर बात सिर्फ हरदुआ की नहीं है, बल्कि प्रदेश के अन्य हिस्सों में योजना का सही क्रियान्वयन हो और ऐसी नौबत नहीं आए, इसके लिए उपाय करने की जरूरत है।

राजु कुमार

 
     
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