बहुत सी समस्यायें अब सामाजिक-राजनैतिक व्यवहार का सामान्य मुहावरा बन कर रह गई हैं। वहीं दूसरी ओर विचारधाराओं के साथ जुड़े हुये मूल्य अब सवालों के दायरे में हैं। यह कोई नयी सच्चाई नहीं है कि रोजगार की असुरक्षा और हक का अभाव समाज के एक बड़े वर्ग की सामाजिक असुरक्षा का रूप ले चुका है। और उन लोगों के चूल्हे में ईंधन की आग नहीं पेट में भूख की पीड़ा नियमित रूप से से सुलगती है। इसी संकट पर यह संघर्ष खड़ा हुआ कि उपेक्षित और वंचित तबकों को रोजगार का कानूनी अधिकार मिले बिना खाद्य सुरक्षित नहीं बनाया जा सकता है। समस्या तो समझ में आ गई और उसे दूर करने के लिये संघर्ष भी शुरू हो गया परन्तु भूमण्डलीकरण के प्रति बढ़ते जा रहे राजनैतिक समर्थन के परिप्रेक्ष्य में रोजगार गारण्टी कानून बहुत सार्थक होगा इस पर संदेह है।
वैश्विकीकरण ने विकास की परिभाषा को ही बदल दिया है। वहां हर वस्तु और हर मूल्य एक बिक सकने वाली उत्पाद है। यहां सामाजिक नियंत्रण और सहभागिता का कोई स्थान है ही नहीं। परन्तु रोजगार गारण्टी की वकालत करते हुये समाजवादी और साम्यवादी अर्थशास्त्रियों ने वैश्विकीकरण के प्रभावों, नीतियों और अर्थव्यवस्था का मानवीय संदर्भों में विश्लेषण ही नहीं किया है। यह सही है कि आर्थिक नीतियों का सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रभाव अवसरों और काम के अधिकार पर ही पड़ा है। किसानों और आदिवासियों का जंगल और जमीन पर कोई नियंत्रण नहीं रहा और 4 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ये संसाधन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और निजी क्षेत्र के नियंत्रण में जा रहे हैं। आदिवासी और किसान, जिन्हें अब, गरीब, उपेक्षित, वंचित समुदाय की संज्ञाओं से परिभाषित किया जाने लगा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि संसाधनों पर अधिकार होने के कारण उनके जीवन में भुखमरी और असुरक्षा का दायरा बहुत बढ़ गया। जिसे पूरा करने के लिये रोजगार के अधिकार को कानूनी रूप देने की वकालत की जा रही है। इसका दूसरा पक्ष है कि लोगों को मालिक से मजदूर बनाने की वकालत की जा रही है। यही कानून न्यूनतम मजदूरी कानून 1948 में भी बदलाव करने के रास्ते खोलेगा। जिसके बाद सरकारें न्यूनतम मजदूरी को जितना वह चाहें कम कर सकेंगी।
नई व्यवस्था में आम आदमी का संसाधनों पर कोई अधिकार नहीं है। स्वतंत्रता के बाद सरकार का दायित्व यह था कि वह प्रजातंत्र में पालन की भूमिका निभायेगी। जनता के अभावों और संकटों को खत्म करने की जिम्मेदारी सरकार की थी। परन्तु 1990 के बाद इस भूमिका में बहुत व्यापक स्तर पर बदलाव आया है और अब सरकार ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को हर तरह का संरक्षण देना अपना दायित्व बना लिया है। आयात-निर्यात नीति, कृषि नीति, जल नीति और सामाजिक क्षेत्रों में लगातार कम होते बजट के प्रावधान से यह सिध्द होता है कि कल्याणकारी राज्य के चरित्र से वर्तमान भारतीय संघ का कोई नाता नजर नहीं आता है। भूमण्डलीकरण के दौर में यह दावा किया गया था कि इन नीतियों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह होगी कि गरीबी दूर होगी और रोजगार बढ़ेंगे जिससे सरकार को रियायत नहीं देना पड़ेगी। इस उपलब्धि का तो इंतजार आज भी हो रहा है परन्तु जनकल्याणकारी क्षेत्र और सामाजिक सेवाओं पर सरकारी बजट लगातार कम होता गया।
इन स्थितियों में यह पीड़ादायक तथ्य है कि कभी मालिक रहा किसान मजदूरी के लिये पलायन करता है और रोजगार के हक का संघर्ष इसी बात पर केंद्रित है कि उन्हें पलायन करना पड़े। प्राकृतिक संसाधनों पर समुदाय के नियंत्रण और अधिकार सुनिश्चित करने के लिये कहीं कोई स्थान नहीं है। अब वैधानिक रूप से किसानों, दलितों और आदिवासियों को अब अन्नदाता और पर्यावरण के संरक्षक के पदों से हटाकर याचक की भूमिका में लगा दिया गया है। संसद में जो विधेयक पेश किया गया उसके जरिए कभी भी लोगों को रोजगार गारंटी मिलना संभव नहीं है। सबसे पहला मुद्दा तो यही है कि इस विधेयक में इस कानून के देश के हर हिस्से में लागू होने की कोई समयावधि तय नहीं की गई है और कुछ खास जिलों में प्राथमिक रूप से यह चलता रहेगा। दूसरा मुद्दा यह है कि यह कानून परिवार से केवल एक व्यक्ति को सौ दिन रोजगार देने का वायदा करता है। सरकार ने संयुक्त परिवार को भी एक परिवार ही माना है जबकि हर बालिग व्यक्ति के परिवार को एक ईकाई माना जाना चाहिए था। ऐसा न होने के कारण बड़े परिवारों से भी एक ही व्यक्ति को रोजगार के अवसर मिलेंगे और महिलाओं के लिए स्वाभाविक रूप से किसी भी तरह की रोजगार गारंटी मिलना संभव नहीं हो पायेगा और वे पुन: कम मजदूरी पर काम करने के लिए बाध्य होंगी। यूं तो चुनाव के समय सभी को रोजगार गारंटी देने की बात कही गई थी परन्तु सत्ता में आने के बाद जब रोजगार कानून बनने की प्रक्रिया शुरू हुई तो इसे केवल ग्रामीण ईलाकों तक ही सीमित कर दिया गया और जब तक पचास लोग सामुहिक रूप से काम की मांग नहीं करेंगे तब तक रोजगार पैदा नहीं किया जायेगा। ग्रामीण और खासकर आदिवासी इलाकों में एक समय में इतने लोगों का हमेषा इकट्ठा होना मुश्किल होता है और इससे दस-बीस लोगों का छोटा समूह रोजगार से वंचित होगा।
इसके अलावा अब सरकार केवल गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को इस कानून के दायरे में ला रही है जबकि वायदा हर जरूरतमंद व्यक्ति को रोजगार की गारंटी देने का था। अनुभव यह है कि सरकार द्वारा पहचाने गए गरीबों के समूह में अब भी बहुत सारे वास्तविक गरीब शामिल नहीं हैं। परन्तु उन्हें हर क्षण सामाजिक सुरक्षा के संरक्षण की जरूरत है जो कि प्रस्तावित कानून नहीं देता। यदि रोजगार गारंटी कानून वर्तमान स्वरूप में स्वीकार कर लिया जाता है तो सरकार को कभी भी न्यूनतम मजदूरी की दर बिना किसी कारण और आधार के किसी भी सीमा तक कम करने का अधिकार मिल जायेगा यानि सरकार वैधानिक रूप से मजदूरों का शोषण करने के लिए अधिकृत हो जायेगी। वर्तमान सरकार के दृष्टिकोण पर सवाल इसलिए भी है क्योंकि प्रस्तावित कानून के अन्तर्गत होने वाले कामों को ज्यादातर निर्माण कायों के आसपास सीमित किया गया है। इस संदर्भ में उत्पादक कायों कृषि के स्थायी विकास, जंगलों के पुन:निर्माण और जीवन की गुणवत्ता को उभारने वाले कार्यों को परिभाषा से बाहर किया गया है। यूं तो व्यापक स्तर पर ग्रामसभा के सशक्तिकरण के दावे किये जा रहे हैं परन्तु प्रस्तावित राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून में ग्रामसभा एक दर्शक मात्र की भूमिका निभायेगी और उसे गांव में क्या काम हो और राशि किस तरह खर्च की जाये यह तय करने का कोई अधिकार नहीं होगा। इसके बाद सरकार ने एक प्रावधान यह भी रखा है कि कि एक अधिसूचना जारी करके इस कानून में कोई भी संशोधन किया जा सकता है या कानून को खत्म किया जा सकता है यानि उसके लिए जन प्रतिनिधियों के बीच बहस की कोई जरूरत नहीं होगी।
ऐसी परिस्थितियों में जबकि शिक्षा, रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं करवा पा रही है। बाजारों में चीन और जापान के उत्पाद बिक रहे हैं। किसानों को सरकार का संरक्षण नहीं है और वह बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को संरक्षण दे रही है, ऐसे में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी कानून को रोजगार के संकट के हल के रूप में देखना कतई उपयुक्त नहीं है। इससे कोई हल तो होगा नहीं बल्कि गरीबों के रोजगार के नाम पर होने वाला 40-45 हजार करोड़ रूपये का निवेश बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को ही फायदे पहुंचायेगा और स्वाभाविक है कि बहुत ही सुनियोजित ढंग से इसके लिये वकालत भी की जा रही है।
अब जो बहस है वह आजीविका और आत्मनिर्भरता के आसपास केन्द्रित नहीं है बल्कि बहुत ही सुनियोजित ढंग बजट के आस-पास केन्द्रित हो गई। योजना आयोग और वित्ता मंत्रालय ने बजट की कमी का मुद्दा उठाकर विवाद गर्मा दिया और वामपंथी अर्थशास्त्री जोड-घटाने में लग गये कि 40 हजार करोड़ कहां से आयेंगे और इस निवेष से राज्य को कितना फायदा होगा। वे तो इस हद तक समझौता करने के लिये तैयार हो गये कि इस खर्चे का भार कम करने के लिय सरकार न्यूनतम मजदूरी को और कम कर दे। वे अन्य खर्चे में कमी के लिये भूमण्डलीकरण की घोर समर्थक कांग्रेस पर दबाव नहीं डालना चाहते हैं। इस सवाल के अन्य राजनैतिक पक्षों पर बहस को नेपथ्य में ढकेल दिया गया है। इस तरह का कानून अस्तित्व के बाद जल, जंगल और जमीन का सामाजिक संघर्ष नि:संदेह और कठिन हो जायेगा।
मूल्यहीन कानून से नहीं मिलेगी रोजगार गारंटी
असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को संरक्षण देने की सरकार की मंशा पर सवाल
रोजगार की राजनीति को नजरअंदाज करना बहुत घातक होगा। चुनाव के चलते तो रोजगार गारंटी कानून का वायदा प्रगतिशील गठबंधन के राजनैतिक दलों ने कर दिया था। संभवत: इसलिये क्योंकि राजनैतिक वायदे के प्रति उनकी कोई जवाबदेहता नहीं होती है परन्तु सत्ता के आने के बाद जनान्दोलनों के दबाव ने उन्हें इस वायदे को भूलने नहीं दिया। लगातार रोजगार के कम होते अवसरों मजदूरों की खाद्य असुरक्षा, भूख से मौतों और कृश संस्कृति पर बढ़ते संकट के व्यापक विश्लेषणों के चलते भूमण्डलीकरण की समर्थक सरकार इस तथ्य से मुंह मोड़ नहीं पाई कि लोगों को रोजगार गारंटी तो देना ही होगी और फिर वामपंथियों के औपचारिक दबाव ने भी थोड़ा दबाव तो बनाया ही। इस सच्चाई को नहीं भूलना चाहिये कि समाज की धुरी मजदूर हैं और यह धुरी भुखमरी की शिकार है क्योंकि उसके श्रम को बाजार में शोषण रहते स्थाई सुरक्षा नहीं मिल रही है। इसी आधार पर देश में रोजगार गारंटी कानून बनाने की मांग को लेकर व्यापक सामाजिक जन आंदोलन हुआ और अलग-अलग स्तरों पर कानून कैसे हो यह बहस शुरू हुई। गठबंधन चूंकि प्रगतिशील है इसलिये प्रारूप बनाने के लिये प्रगतिशील विद्वानों का समूह ही सामने आया। उनके द्वारा तैयार किया गया प्रारूप अपने आप में सामाजिक सुरक्षा का दस्तावेज था। यदि वह कानूनी रूप लेता तो माना जा सकता था कि 93 फीसदी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को रोजगार का वैधानिक हक मिलेगा, वंचितों को समता, महिलाओं को संरक्षण मिल्रेगा और लोगों के संगठन मजबूत होंगे परन्तु सरकार ने सम्मान के साथ प्रारूप् लिया और उसका एक माह बाद ही उसकी असामायिक मृत्यु हो गई क्योंकि वह उदारवादी नीतियों के अनुरूप नहीं था और सरकार को जवाबदेय बनाकर वास्तव में रोजगार की गारंटी देता था। जबकि सरकार कानून तो बनाना चाहिती थी पर हक या संरक्षण जैसा कुछ नहीं।
और संसद में जो विधेयक पेश किया गया उसके जरिए कभी भी लोगों को रोजगार गारंटी मिलना संभव नहीं है। सबसे पहला मुद्दा तो यही है कि इस विधेयक में इस कानून के देश के हर हिस्से में लागू होने की कोई समयावधि तय नहीं की गई है और कुछ खास जिलों में प्राथमिक रूप से यह चलता रहेगा। दूसरा मुद्दा यह है कि यह कानून परिवार से केवल एक व्यक्ति को सौ दिन रोजगार देने का वायदा करता है। सरकार ने संयुक्त परिवार को भी एक परिवार ही माना है जबकि हर बालिग व्यक्ति के परिवार को एक ईकाई माना जाना चाहिए था। ऐसा न होने के कारण बड़े परिवारों से भी एक ही व्यक्ति को रोजगार के अवसर मिलेंगे और महिलाओं के लिए स्वाभाविक रूप से किसी भी तरह की रोजगार गारंटी मिलना संभव नहीं हो पायेगा और वे पुन: कम मजदूरी पर काम करने के लिए बाध्य होंगी। यूं तो चुनाव के समय सभी को रोजगार गारंटी देने की बात कही गई थी परन्तु सत्ता में आने के बाद जब रोजगार कानून बनने की प्रक्रिया शुरू हुई तो इसे केवल ग्रामीण ईलाकों तक ही सीमित कर दिया गया और जब तक पचास लोग सामुहिक रूप से काम की मांग नहीं करेंगे तब तक रोजगार पैदा नहीं किया जायेगा। ग्रामीण और खासकर आदिवासी इलाकों में एक समय में इतने लोगों का हमेषा इकट्ठा होना मुश्किल होता है और इससे दस-बीस लोगों का छोटा समूह रोजगार से वंचित होगा।
इसके अलावा अब सरकार केवल गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को इस कानून के दायरे में ला रही है जबकि वायदा हर जरूरतमंद व्यक्ति को रोजगार की गारंटी देने का था। अनुभव यह है कि सरकार द्वारा पहचाने गए गरीबों के समूह में अब भी बहुत सारे वास्तविक गरीब शामिल नहीं हैं। परन्तु उन्हें हर क्षण सामाजिक सुरक्षा के संरक्षण की जरूरत है जो कि प्रस्तावित कानून नहीं देता। यदि रोजगार गारंटी कानून वर्तमान स्वरूप में स्वीकार कर लिया जाता है तो सरकार को कभी भी न्यूनतम मजदूरी की दर बिना किसी कारण और आधार के किसी भी सीमा तक कम करने का अधिकार मिल जायेगा यानि सरकार वैधानिक रूप से मजदूरों का शोषण करने के लिए अधिकृत हो जायेगी। वर्तमान सरकार के दृष्टिकोण पर सवाल इसलिए भी है क्योंकि प्रस्तावित कानून के अन्तर्गत होने वाले कामों को ज्यादातर निर्माण कायों के आसपास सीमित किया गया है। इस संदर्भ में उत्पादक कायों कृषि के स्थायी विकास, जंगलों के पुन: निर्माण और जीवन की गुणवत्ता को उभारने वाले कार्यों को परिभाषा से बाहर किया गया है। यूं तो व्यापक स्तर पर ग्रामसभा के सशक्तिकरण के दावे किये जा रहे हैं परन्तु प्रस्तावित राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून में ग्रामसभा एक दर्शक मात्र की भूमिका निभायेगी और उसे गांव में क्या काम हो और राशि किस तरह खर्च की जाये यह तय करने का कोई अधिकार नहीं होगा। इसके बाद सरकार ने एक प्रावधान यह भी रखा है कि कि एक अधिसूचना जारी करके इस कानून में कोई भी संशोधन किया जा सकता है या कानून को खत्म किया जा सकता है यानि उसके लिए जन प्रतिनिधियों के बीच बहस की कोई जरूरत नहीं होगी।
अभी संसद के भीतर और बाहर बहस हो रही है कि परिवार के हर सदस्य को रोजगार की गारण्टी दें या परिवार के एक सक्षम व्यक्ति को। यदि 100 दिन का रोजगार देंगे तो बाकी 265 दिन का क्या होगा? आश्चर्य यह है कि इसमें कृषि और स्थानीय संसाधनों के विकास पर निवेश करके उनका नियंत्रण समुदाय को देने का कहीं कोई मनतव्य नहीं है। कृषि नीति यह साफ करती है कि खेती-किसानी अब आम कृषक नहीं बल्कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के अधिपत्य में होगा। शुरूआती दौर में यह सवाल माहौल में चारों ओर तैर रहा था कि वामपंथी और जनसंगठन रोजगार गारण्टी कानून के संघर्ष से दूर-दूर क्यों हैं? उन्हें भी साथ लाया गया परन्तु यह सवाल अभी भी अनुत्तारित है किसानों और आदिवासियों को मालिक से मजदूर बनाने की प्रक्रिया से हम सैध्दान्तिक रूप से सहमत हैं? स्थानीय समस्यायें इतनी गंभीर हैं कि जमीनी स्तर पर समुदाय से जुड़े संगठन इस मजदूरी की गारंण्टी की लड़ाई में शामिल होने के लिये मजबूर हो गये हैं।
ट्रेड यूनियनें मूलत: विगत चार दशकों से संगठत क्षेत्र के मजदूरों के हितों के लिये आवाज उठाती रही हैं। उन्हें महसूस होता रहा है कि इसी तरह से उनके हितों की रक्षा की जा सकेगी। परन्तु इस संदर्भ में तीन बिन्दुओं पर चर्चा करना जरूरी है। पहला बिन्दु यह है कि मजदूर संगठनों का संघर्ष ज्यादातर मजदूरों के वेतन, बोनस और नौकरी की सुरक्षा के आसपास ही ज्यादा केन्द्रित रहा है। और 93 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के मुद्दे रोजगार की राजनीति के हिस्से बन ही नहीं पाये। दूसरा बिन्दु यह है कि मजदूर संगठनों की कार्यशैली और अहं का परिणाम यह रहा कि मजदूर हमेशा मजदूर ही रहे, उनकी असुरक्षा भी दूर न हो सकी न ही वे उद्योगों में हिस्सेदार बन पाये और आज बिना जनाधार वाली बहुराष्ट्रीय कम्पनियां सरकारी क्षेत्र के उपक्रमों की न केवल हिस्सेदार बन रही हैं बल्कि कई उपक्रमों पर अब उनका मालिकाना हक है। तीसरा बिन्दु राजनैतिक है, वह इस तरह कि उन्होंने विचारधारा को एक कट्टरपंथ के रूप में स्थापित किया है और हकों के सिध्दान्त पर आधारित यह विचारधारा सामाजिक नहीं हो पाई। यदि यह एक जनान्दोलन है तो इसमें सम्मिलिन और मूल्य आधारित आमंत्रण का लचीलापन भी होना चाहिये था, जो अभी तो नजर नहीं आता है। रोजगार गारण्टी कानून के मसले पर भी उन्होंने अवसरवादिता का ही परिचय दिया है। जब रोजगार के अधिकार का आंदोलन पूरी तरह से परिपक्व हो चुका था तब उनकी सक्रियता नजर आई। वे आंदोलन का नेतृत्व लेने के लिये तो सहमत हैं किन्तु संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के सबसे प्रभावी घटक होने के नाते संसद में तोड़-मरोड़ कर पेश किये गये राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी विधेयक - 2004 को पुरजोर ढंग से उठाते नजर नहीं आये। ऐसा नहीं है कि रोजगार गरण्टी कानून का मसला कोई नया मसला है। यह तो कांग्रेस के चुनावी घोषणा पत्र का अहम् हिस्सा रहा है। और सभी वामपंथी दल इसके हिमायती भी रहे हैं। इससे भी आगे संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के न्यूनतम साझा कार्यक्रम का सबसे पहला बिन्दु भी यही है। ऐसे में संकेत यही मिलता है कि क्या वामपंथी भी भूमण्डलीकरण और उदारवाद का मौन रहकर समर्थन कर रहे हैं और अब केवल भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से दूर रखने की राजनैतक मजबूरी उनकी रणनीत का आधार बन गई है।
यह एक वास्तविकता है कि वामपंथी विचारधारा और मजदूरों के हितों का संघर्ष स्वाभाविक रूप से गुथे-मुथे से प्रतीत होते रहे हैं। एक दूसरे के बिना उनके परस्पर अस्तित्व की संकल्पना कभी असंभव सी मानी जाती थी। एक समय में वामपंथी टे्रड यूनियनें समाज के बीच संघर्ष का आधार तैयार करती रही तो दूसरी ओर वामपंथी दल राजनैतिक सत्ता के पटल पर उन्हें स्वर देते रहे। जीवन शैली, विचार और व्यवहार के आधार पर तो यही मान्यता रही है वास्तव में समर्पित सन्यास की यह व्यवस्था 20 करोड़ मजदूरों को दलदल से निकालकर आत्म सम्मान और सामाजिक सुरक्षा के लक्ष्य तक ले पायेगी परन्तु अब यह मान्यता कमजोर पड़ती दिख रही है। आज असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के सामने रोजगार की अनिश्चितता और सामाजिक असुरक्षा दोनों ही बहुत बड़े सवाल खड़े हुये हैं। स्वाभाविक तौर पर अपेक्षा यह रही है कि वामपंथी विचारधारा ऐसे में उनके लिये संरक्षक की भूमिका निभायेगी। इसी दौरान जब रोजगार गारण्टी कानून की मांग ने सामाजिक आंदोलन का रूप लिया तो उम्मीद थी कि उसे वामपंथी का निर्णायक समर्थन मिलेगा; परन्तु अनुभवों से लगता है कि राजनैतक मजबूरियों ने इस विचारधारा की ऊर्जा को बंद कर दया है।
प्रकाश करात ने एक धार खो चुकी तलवार को संभाला है। ऐसा लगता है कि दुनिया के मजदूर एक हों का वामपंथी नारा अब रूप बदलकर दुनिया में सभी मजदूर हों हो गया है। संसद में उनकी संख्या ज्यादा हो सकती है परन्तु विचारधारा अब केवल बयानों और चेतावनियों तक ही सीमित है। वे अब भी तय नहीं कर पा रहे हैं कि क्या केवल बजट बढ़ने से मजदूर और मध्यम वर्ग सुरक्षित हो जायेगा। रोजगार गारण्टी का कानून बनने से संघर्ष के नये रास्ते जरूर खुलेंगे परन्तु मजदूरों को समता का हक मिल पायेगा इसमें संदेह है। केवल स्वर्ण चुतुर्भुज सड़क योजना का ही उदाहरण लें क्या खरीदो, चलाओं और बेचो (बी.ओ.टी) का सिध्दान्त केवल बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये है, तेजी से हो रहे अधोसंरचनात्मक विकास में मजदूरों को कहां हिस्सेदार बनाया जा रहा है। सवाल यह है कि श्रम के स्वावलम्बन और आत्मसम्मान का संघर्ष इस लड़ाई में कहीं नहीं है। क्या वे भी चाहते हैं कि भारत के 945 रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत 4.11करोड़ शिक्षित बेरोजगार भी याचक के रूप में न्यूनतम मजदूरी के लिये इस कानून का समर्थन करें और छोटे किसान कभी आत्म निर्भर न हो पायें।
स्वाभाविक रूप से यह परिस्थितियां सिध्द कर रही हैं कि भूमण्डलीकरण का विरोध करने और समाज के 80 फीसदी हिस्से, जिसके लिये राज्य एक अभिशाप बन गया है, के मुद्दों पर राजनैतिक-सामाजिक संघर्ष की मूल्य आधारित बुनियाद अब कमजोर पड़ चुकी है। और संघर्ष केवल सत्ता में या सत्ता के आस-पास बने रहने का साधन बन गया है। इन परिस्थितियों में इस सच्चाई पर मंचों से हट कर लोगों के बीच बहस की प्रक्रिया शुरू करना होगी।
सचिन कुमार जैन
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