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  आदिवासियों को कानूनी अधिकार मिलने में अड़चनें  
     
 

मध्यप्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच ने मध्यप्रदेश में वन अधिकार मान्यता कानून के क्रियान्वयन की जमीनी स्थिति का एक आकलन रिपोर्ट प्रस्तुत किया है। रिपोर्ट प्रस्तुत करने के बाद मंच के संयोजक गोविंद यादव ने बताया कि वन अधिकार कानून के लागू हुए चार महीने हो गए पर सरकार ने अभी भी वनों पर अधिकार देने की प्रक्रिया के सुचारू क्रियान्वयन के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। इतने दिनों के बाद भी वन अधिकार समितियों में शामिल लोगों को यह नहीं मालूम कि हितग्राहियों से दावे आपत्ति कैसे लिये जाए? सबसे दु:खद बात तो यह है कि कई गांवों तक दावा प्रपत्र ही अभी तक नहीं पहुंच पाया है।

मंच से जुड़े विवेक पवार का कहना है कि अनूसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 में अभी भी कई खामियां हैं, जिसमें सबसे बड़ी खामी कानून के अध्याय 6 की धारा 13 में है। इसका आशय है कि यह कानून वन विभाग की मर्जी के मुताबिक ही लागू हो सकता है, क्योंकि इसमें जिक्र नहीं होने की स्थिति में पूर्व के वन कानून शिथिल नहीं होंगे, जबकि उन कानूनों के कारण ही वन निवासियों पर अत्याचार होते रहे हैं।

विवेक की बातों की पुष्टि प्रदेश में कार्यरत अन्य जन संगठन भी कर रहे हैं। एकता परिषद्, आदिवासी मुक्ति संगठन, आदिवासी एकता संगठन एवं अन्य संगठनों के कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन दिनों आदिवासियों पर वन विभाग के अत्याचार भी बढ़े हैं और कानून की इस प्रक्रिया में उसका हस्तक्षेप बढ़ा है, जबकि कानून की प्रक्रिया में वन विभाग को शामिल नहीं किया गया है।

साझा मंच के रमेश शुक्ला एवं सियादुलारी ने बताया कि प्रदेश में वन भूमि पर वैयक्तिक व सामुदायिक वनाधिकारों की दावेदारी हेतु आवेदन मांगने एवं उससे जुड़ी अन्य प्रक्रियाएं चलाई जा रही हैं, पर सर्वेक्षण में यह पाया गया कि कानून के क्रियान्वयन में राजनैतिक प्रतिबध्दता का पूर्ण रूप से अभाव है। सबसे दु:खद बात तो यह है कि समिति के सदस्यों एवं आम लोगों को यह मालूम ही नहीं है कि इस कानून के क्रियान्वयन की जिम्मदारी आदिम जाति कल्याण विभाग की है। इसमें कानूनन वन विभाग का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए पर हकीकत इसके विपरीत है।

मंच ने यह निर्णय लिया है कि वे अपनी रिपोर्ट से शासन को अवगत कराएंगे और इसके बेहतर क्रियान्वयन के लिए स्थानीय स्तर पर दबाव बनाएंगे। कानून का लाभ अधिकतम लोगों तक पहुंचाने के लिए समिति के सदस्यों को मंच से जुड़े संगठन प्रशिक्षण भी देंगे।

कानून के क्रियान्वयन की जमीनी वास्तविकताओं को जानने हेतु मंच से जुड़े 15 संगठनों में से 8 संगठनों ने 15 मार्च से 10 अप्रैल के बीच प्रदेश के आठ जिलों रीवा, धार, श्योपुर, मंडला, बालाघाट, सतना, दमोह, डिण्डोरी के 11 विकासखण्डों के 43 ग्रामों में सर्वेक्षण किया। सर्वे में यह पाया गया कि वन अधिकार मान्यता कानून के तहत 69 प्रतिशत गांवों में ही ग्रामसभा हुई है, जिनमें से भी 98 प्रतिशत ग्रामसभाओं में गणपूर्ति (कोरम) नहीं हुई है। 12 प्रतिशत गांवों में वनविभाग के अफसरों द्वारा ग्राम सभा को अपने तरीके से प्रभावित करने की कोशिश की गई, जबकि कानून की इस पूरी प्रक्रिया में वन विभाग की कोई भी भूमिका नहीं है। 93 प्रतिशत ग्रामसभाओं में कानून पर चर्चा नहीं की गई है जबकि ग्रामसभाओं में कानून पर चर्चा की जानी अनिवार्य थी। 80 प्रतिशत गांवों में वन अधिकार समितियों का गठन हुआ है जबकि 20 प्रतिशत गांवों में आज भी वन समितियों का गठन नहीं हो पाया है। 43 गांवों के 9543 परिवारों से 3054 परिवार (32 प्रतिशत) पलायन कर गये हैं। इन समस्त परिवारों में से 1866 (19 प्रतिशत) परिवारों की भूमि वन क्षेत्र में हैं। ग्राम सभा में बनाई गई वन अधिकार समिति के 34 प्रतिशत सदस्य उस दिन की ग्रामसभा में उपस्थित ही नहीं थे। वन अधिकार समिति के 67 प्रतिशत सदस्यों को यह जानकारी नहीं है कि वे किसी वन अधिकार मान्यता समिति के सदस्य हैं। वन अधिकार समिति के सदस्यों में से 100 प्रतिशत् सदस्यों को यह जानकारी नहीं है कि उनके अधिकार क्या हैं, उनके कार्य क्या हैं? कहीं भी वन अधिकार समिति सदस्यों की अभी तक कोई भी बैठक और प्रशिक्षण नहीं हुआ है जिससे वे इस पूरी प्रक्रिया से अनभिज्ञ हैं।

राजु कुमार

 
     
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