सामाजिक-आर्थिक विकास पर नए नज़रिए की जरूरत

पृष्ठभूमि -

कोरोना-कोविड-19, या जो भी नाम, इस वायरस को देना चाहें दे सकते हैं. इस वायरस की एनाटॉमी में ऐसा कुछ नहीं होता जो उसे इतना शक्तिशाली बना देता है. उसमें आर.एन.ए की बहुलता होती है और वह मूलतः प्रोटीन को हीCovid 2 आधार बनाता है. वह पूरी तरह से आत्मनिर्भर भी नहीं होता और पूर्णतया परावलंबी या पेरासाइट भी नहीं होता है. उसमे अपने डी.एन. ए. भी होते हैं. उसमे अपनी खुद की सोचने की ताकत नहीं होती. वह बेहद यांत्रिक (मेकेनिकल) ढंग से विचरण करता है. वह बिजली के उस उपकरण जैसा है, जिसमें एक साकेट होता है और दूसरा उसमें घुसने वाली छोटी सी पिन. इन दोनों के सम्मिलन से रोशनी हो जाती है. हमारा टीवी या फ्रिज चलने लगता है. इस प्रकृति में मनुष्य ही संभवतः ऐसा है जो अपनी अवनति और विकास दोनों के प्रति बेहद चिंतित व सजग रहता है. परन्तु हमारी सारी सोच, सारी कल्पना उस पांच नैनोमीटर के वायरस के सामने धराशायी है, जिसे हम अपनी आंख से देख तक नहीं सकते. यह नोवल कोविड वायरस हमारे चाहने-न-चाहने की फिक्र नहीं करता अैर एक बिन बुलाये मेहमान की तरह हममें समा जाता है. धीरे-धीरे अपनी एक फौज खड़ी करता है और हमारे शरीर में पहले से विद्यमान हमारे मित्र लड़ाकों को परास्त कर देता है. एक कमोवेश अदृश्य सी वस्तु ने आज हमारी पूरी मानवता को ही संकट

में डाल दिया है. वहीं उसने हमें यह भी सोचने पर मजबूर कर दिया है, कि यह या इस जैसे वायरस अधिकांशतः मनुष्यों को ही अपनी चपेट में क्यों लेते रहे हैं? इसके तमाम विज्ञानजन्य उत्तर हमारे पास मौजूद हैं और उन पर संदेह करने की कोई वजह भी नहीं है.

यहां हमें समझना होगा कि विज्ञान के आगे भी एक दुनिया है जो अपना रहस्य कभी भी पूरी तरह से उद्घाटित नहीं करती. प्रकृति की संरचना परस्परता अथवा परस्पर पूरकता के समानांतर परस्पर नियंत्रण पर आधारित है. विज्ञान वास्तव में सिर्फ इतना है कि हम बुद्धि वाले मनुष्यों ने प्रकृति के कुछ नियमों को जाना और उसमें उसे जानकार कुछ तकनीकें विकसित कर लीं. बात लगातार दोहराई जाती रही है कि मनुष्य ने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली हे, लेकिन वह दावा लगातार झूठा साबित होता जा रहा है. हां, यह तय कि इस जिद में मनुष्य ने परस्पर पूरकता और नियंत्रण को अवश्य नष्ट किया है. जीवाणुओं के माध्यम से जैसे मच्छरों द्वारा फैलाए गए जापानी इन्सेफेलाइटिस, इबोला, बर्डफ्लू के बाद हम अब कोरोना-कोविड-19 वायरस को देख रहे हैं. शरीर की घटती प्रतिरोधक क्षमता के चलते हमारे 6 फुटे शरीर कुछ नैनोमीटर वाले वायरस का मुकाबला कर पाने में असमर्थ पाए जा रहे हैं. हम बड़े खुश होते हैं कि हमने वायरस का तोड़ ढूंढ लिया, उसे नष्ट करने वाली वेक्सीन बना ली. परन्तु तब तक वह वायरस अपनी बाजी खेल चुका होता है, जीत चुका होता है. हम अपनी पीठ थपथपाते हैं. तभी पता चलता है, कि पिछले वायरस का अगला साथी वायरस तैयार है और वह हमें पुनः ग्रस्त/संक्रमित कर देता है. मनुष्य को उसकी कमतरी का अहसास करा देता है और हम पराजित होने की स्वीकार्यता के बजाय नए युद्ध की तैयारी पर निकल लेते हैं, जिसमें हमारी पराजय सुनिश्चित है. वायरस की या फिर यूं कहें कि प्रकृति हमें लगातार तौलती है,  चुनौती देती है कि हम अपनी सीमाएं समझ लें,  लेकिन मनुष्य है कि मानता ही नहीं.

तो फिर हम क्या करें? क्या हार मान लें? स्वयं को किसी एकांत में ले जाएँ? यहीं हमें रूककर सोचना होगा और समझना होगा कि यह मामला हार या जीत का नहीं है, बल्कि समरसता का है, पारस्परिकता का है. पिछले तीन सौ वर्षों में आए बदलाव को किसी पक्षधरता के बजाए एक ऐसी तटस्थता के साथ विश्लेषित करना होगा, जिसमें प्रकृति के साथ हमारे संबंध फिर से मधुर हो जाएं और विजेता की मानसिकता या जिद से खुद को बाहर निकाल सकें. यह अहसास नहीं है, और न ही तत्काल कुछ परिवर्तन ही संभव हे. यह सब एक लंबी सुनियोजित प्रक्रिया के तहत ही करना पड़ेगा.

यह वक्त इस असहज बात को सुनने और गुनने का है. 5 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था, विशालकाय इमारतें, दिलो-दिमाग के भीतर घुस कर हर आदमी को नियंत्रित करने लेने वाली निगरानी व्यवस्था, पारिस्थितिकी का विनाश भारत की खुशहाली और एक बेहतर सभी समाज बन जाने की गारंटी नहीं है. जब हम अन्तरिक्ष पर कब्ज़ा करने की कोशिश कर रहे थे, तकनीक के जरिये प्रकृति और प्राकृतिक व्यवस्थाओं को लगातार चुनौती दिए जा रहे थे, तब प्रकृति ने हमें संकेत देने के लिए अपने प्रतिनिधि के रूप में कोरोना को भेज दिया. मानव बड़ी-बड़ी तकनीक विकसित कर रहा है, किन्तु वह प्रकृति के संकेतों की व्याख्या करने और उनसे सीखने में हमेशा नाकाम रहा है. यह वक्त उन संकेतों को समझने और उसके आधार पर अपनी रीति-नीति बदलने का है.

यह भी सच है कि जीवन शैली में से हमने उस सिद्धांत बाहर निकाल फैंका था कि हम इस पृथ्वी और इसके आसपास पर पाए जाने वाले संसाधन के मालिक नहीं, ट्रस्टी भर हैं. मानव और प्राकृतिक संसाधनों पर पूर्ण नियंत्रण की धकापेल में हम यह देख ही नहीं पाए कि किस तरह अपनी जरूरत और हैसियत से बाहर जाने के कारण हमारी दुनिया में हिंसा, आतंक, असमानता, साम्प्रदायिकता, लैंगिक उत्पीडन, असुरक्षा का असीमित विस्तार हो गया है. मौसम चक्र भी टूट रहा है और धरती का तापमान बढ़ रहा है. इससे मानव अस्तित्व के लिए भी संकट खड़ा हो रहा है.

अधिकतम बेतरतीब उपभोग सकल घरेलू उत्पाद आधारित विकास का पैमाना बन गया. सबकुछ आर्थिक मानकों पर तोला जाने लगा. हम यह देख ही नहीं पा रहे थे कि स्वास्थ्य पर होने वाले खर्चे में वृद्धि को देख कर हम खुश होते हैं और अमन-चैन को हम स्वास्थ्य की परिभाषा में शामिल ही नहीं करते हैं. उद्योगों द्वारा गंगा और यमुना नदी में घातक अवशिष्ट का निस्तार करके विकास की गणना करने में कोई संकोच नहीं करते हैं. हम यह महसूस ही नहीं कर पा रहे थे कि विकास की यह अवधारणा मानव समाज और उसकी संस्थाओं को भीतर ही भीतर खोखला कर रही है.

आश्चर्य की बात तो यह है कि कारपोरेट बाज़ार भी यह समझ नहीं पाया कि इस तरह का उपभोग और संसाधनों का शोषण उनके लिए भी आत्मघाती है. महात्मा गांधी ने इसे ही “शैतानी सभ्यता” की संज्ञा दी थी और कहा था कि यह सभ्यता एक दिन खुद को ही नष्ट कर लेगी.

गांधी जी ने कहा था कि “लोग कहते हैं, आखिर साधन तो साधन ही है. मैं कहूँगा, आखिर तो साधन ही सबकुछ है. जैसे साधन होने वैसा ही साध्य होगा. साधन और साध्य को अलग करने वाली कोई दीवार नहीं है. वास्तव में सृष्टिकर्ता ने हमें साधनों पर सीमित नियंत्रण दिया है, साध्य पर तो कुछ भी नहीं दिया. लक्ष्य की सिद्धि ठीक उतनी की शुद्ध होती है, जितने हमारे साधन शुद्ध होते हैं. यह बात ऐसी है, जिसमें किसी अपवाद की गुंजाइश नहीं है. हिंसापूर्ण उपायों से लिया गया स्वराज्य भी हिंसापूर्ण होगा और वह दुनिया के लिए तथा खुद भारत के लिए भी भय का कारण सिद्ध होगा. गंदे साधनों से मिलने वाले चीज़ भी गन्दी ही होगी. इसलिए राजा को मारकर राजा और प्रजा एक से नहीं बन सकेंगे. मालिक का सिर काटकर मजदूर मालिक नहीं हो सकेंगे”.

भारत ने गांधी विचार को अपनी नीति में शामिल नहीं किया, जबकि वह विचार भारत को उसका सही मुकाम दिलाने का साधन हो सकता था और आज भी हो सकता है. गांधी से कहा जाता रहा कि तकनीक और आर्थिक विकास की द्रुतगति में विश्वास करने वाली इस दुनिया में वे बिलकुल विपरीत बात कर रहे हैं, तब गांधी कहते हैं कि इससे न वे सही साबित होते हैं और न मैं गलत. जब पतंगे का अंत नज़दीक आता है, तब वह दीपक के ज्यादा करीब आकर चक्कर लगाने लगता है.

 कोरोना के संक्रमण काल ने यह सिद्ध किया है कि हमारी जीवन शैली, पृथ्वी का स्वास्थ्य और हमारे विकास की नीतियां विरोधाभासी तत्व नहीं हैं. इनके विरोधभास हमारे अस्तित्व को समाप्त कर देंगे. जब तक हम यह तय नहीं करेंगे कि कौन सी वस्तु या सेवा का उपभोग अनिवार्य है, और इसके हिसाब से गैर-जरूरी का त्याग नहीं करेंगे, तब तक हम भारत के नए स्वरुप का निर्माण नहीं कर पायेंगे. 

प्रकाशक - विकास संवाद

लेखन एवं संयोजन,  सचिन कुमार जैन,  चिन्मय मिश्र

प्रकाशित - मई, 2020

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