महामारियों का इतिहास

महामारियों का इतिहास

वायरस के प्रकोप और इससे होने वाली महामारियों का इतिहास जानना बहुत महत्वपूर्ण है. इससे पता चलता है कि वायरसों ने कब, कहाँ, क्यों, कितना प्रभाव डाला? यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि नए कोरोना वायरस का फैलाव काCovid 3 दायरा अब तक के वायरस के सभी भौगोलिक फैलावों से ज्यादा है. लेकिन इससे होने वाली वाली मृत्यु दर कम है.

इसके फैलाव से यह भी सोचना पड़ रहा है कि क्या इसका मतलब यह है कि वायरसों में पूरी दुनिया में एक साथ छा जाने की क्षमता विकसित हो गयी है? ये सभी तापमानों, सभी पारिस्थितिकी परिस्थितियों में अपना असर दिखाने में सक्षम हो गए हैं? बहरहाल इसके पहले भी प्लेग ने एशिया, यूरोप और अफ्रीका को प्रभावित किया है. मानव इतिहास के साथ कई महामारियां भी जुडी हुई हैं. इन सभी महामारियों के स्रोत पारिस्थितिकी तंत्र और मानव समाज की व्यापारिक गतिविधियों के साथ भी जुड़े हुए हैं. चूहे या गंदे पानी या चमगादड़ या मच्छर कुछ ख़ास वायरसों और बैक्टीरिया के संवाहक होते हैं. मानवीय गतिविधियों और उसकी गतिशीलता के कारण ये वायरस और बैक्टीरिया मानव तक पहुँचते रहे हैं. पिछले 20 सालों का अनुभव बताता है कि मानव जितना जंगलों और वन्य जीवन को प्रभावित करने लगा है, उतना ही वायरस प्रकोप भी बढ़ने लगा है. 

पुरातन काल में जब भी कोई महामारी फैलती थी, तो उसे प्लेग ही कहा जाता था. प्लेग को महामारी, देवीय कोप, विपत्ति, उत्पाद आचार भ्रष्टता के पर्यायवाची के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा. मानव इतिहास में महामारियां फैलती रही हैं. चिकित्सा इतिहासकारों के मुताबिक ईसा पूर्व के समय में 41 महामारियों के दस्तावेज मिले हैं. ईसा पश्चात भी दुनिया में महामारियां फैलती रही हैं. इनके उपचार नहीं होने के कारण हर बार महामारियों में कुछ लाख से कुछ करोड़ लोगों तक की मृत्यु हुई है. एक तरह की कहावत रही है कि प्लेग सिन्धु नदी पार नहीं कर सकता यानी महामारियां भारत को प्रभावित नहीं करती थीं, लेकिन 19वीं शताब्दी में उपनिवेशवाद भारत में प्लेग और हैजा सरीखी महामारियां भी ले आया. आज़ादी के बाद हमें केवल आर्थिक सम्पन्नता की जरूरत भर नहीं थी, बल्कि स्वस्थ जीवन का लक्ष्य भी तय किया जाना था, जो नहीं किया गया.   

वायरस और बैक्टीरिया यानी क्या?

हमें यह समझना होगा कि महामारियां वायरस (विषाणु) के कारण भी फैलती हैं और बैक्टीरिया (जीवाणु) के कारण भी. वायरस अपने आप में एक सूक्ष्म अकोशिकीय जीव होता है, जो कई हज़ार सालों तक सुसुप्तावस्था में रह सकता है. इसका व्यवहार एक बीज की तरह होता है, जब बीज को मिटटी-नमी-पानी-हवा-सूरज की रौशनी में मिलती है, तब बीज अंकुरित होता है, उसी तरह वायरस भी किसी जीवित कोशिका (जैसे मानव शरीर में प्रवेश) के संपर्क में आकर सक्रिय हो जाता है. कोरोना का उदाहरण बताता है कि यह वायरस मानव की लार, खून या आंसू के संपर्क में आकर यह सक्रिय हो जाता है और अपना वंश बढाने लगता है. ये जिस कोशिका से जुड़ते हैं, उसे संक्रमित कर देते हैं. वायरस लैटिन शब्द है, जिसका अर्थ होता है लसलसा तरह या जहरीला.

जबकि बैक्टीरिया का मतलब है जीवाणु यानी जीवित अणु या कोशिकीय जीव; ये शरीर के भीतर भी रहते हैं और बाहर भी. हमारे पाचन तंत्र में करोड़ों बैक्टीरिया होते हैं, जो पाचन में मदद भी करते हैं. ज्यादातर बैक्टीरिया अच्छे होते हैं, लेकिन कुछ बैक्टीरिया मानव के लिए घातक भी होते है. मसलन प्लेग की बीमारी बैक्टीरिया से फैलती है. इसका मतलब है कि जब संतुलन बिगड़ा और मानव ने अपनी सीमाओं का अतिक्रमण किया, तब महामारी फैली.  

प्रकाशक - विकास संवाद

लेखन एवं संयोजन,  सचिन कुमार जैन

प्रकाशित - अप्रैल, 2020

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